नवीकृत फुले-आंबेडकरवाद की आवश्यकता

दलित बहुजनों का सशक्तिकरण तबतक संभव नहीं है जब तक कि फुले और आंबेडकर की मुक्तिदायिनी विचारधारा का पुनर्निर्माण नहीं किया जाता

स्वतंत्रता के बाद से भारत एक प्रजातंत्र है, जिसका संविधान समावेशी, समतामूलक समाज के निर्माण की बात कहता है। परंतु भारत की सदियों पुरानी जाति-आधारित संस्कृति भी है, जिसके अपने निहितार्थ हैं। भारत के सामाजिक डी.एन.ए. की सबसे जिद्दी जीन्स है ब्राह्मणवाद व जाति-जनित ऊँचनीच। शायद इसलिए संविधानसभा में सन् 1948 में दिए गए अपने एक भाषण में डॉ. आंबेडकर ने भारतीय प्रजातंत्र को ‘‘मूलतः गैर-प्रजातांत्रिक भूमि का झीना आवरण’’ निरूपित किया था।

जाति व्यवस्था केवल असमानता व शोषण पर आधारित नहीं है, वह श्रेणीबद्ध असमानता व श्रेणीबद्ध शोषण पर आधारित है। इस व्यवस्था में इस तरह का स्वचालित तंत्र है, जो व्यक्तियों का दर्जा व पदक्रम में उनका स्थान लगातार नीचा करता जाता है, जिसका अंतिम नतीजा यह होता है कि इस पदक्रम के सबसे निचली सीढी पर खड़े लोगों का अमानवीकरण हो जाता है। एक ही वर्ग (श्रम विभाजन में एक ही स्थिति वाले व्यक्तियों का समूह) कई जातियों में बंट जाता है और उनके बीच एकता असंभव हो जाती है। इस श्रेणीबद्ध पदक्रम को धार्मिक गं्रथों की स्वीकृति प्राप्त है और समाज भी हमें इस व्यवस्था को स्वीकार करना सिखाता है। नतीजे में, श्रेणीबद्ध पदक्रम की यह व्यवस्था चलती रहती है और जातिगत व वर्गीय भेदभाव के विरूद्ध समाज में न तो असंतोष उभरता है और ना एकता बन पाती है।
दलितबहुजनों के मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिस जातिगत-वर्गीय भेदभाव के वे शिकार हैं, वही उन्हें विभाजित भी करता है।

दलितबहुजनः नेतृत्व का संकट

सरसरी निगाह से देखने पर भी किसी को भी यह समझ में आ जायेगा कि अधीनस्थ जातियों में भी लैंगिक व जातिगत भेदभाव आम है। ऐसा लगता है कि अन्य पिछड़ा वर्गों के सदस्यों ने जातिगत मूल्यों और पितृसत्तात्मक मानदंडों को उतना ही आत्मसात कर लिया है, जितना कि उच्च जातियों ने। ओबीसी के कुछ समूह, दलितों का दमन करते हैं और उनका व्यवहार, ऊँची जातियों के लोगों से कुछ अलग नहीं है। ये समुदाय और उनके पारंपरिक नेता, अपने समुदाय के आंतरिक दमनकारी सत्ता समीकरणों, विशेषकर महिलाओं के संदर्भ में, को बदलने के लिए भी तैयार नहीं हैं। ये तथाकथित नेता, जो सामाजिक जीवन की मूल समस्यायों को सुलझाने के लिए आगे आना नहीं चाहते, असल में स्वयं एक समस्या हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन समुदायों को आत्मपरीक्षण और आत्मालोचना करने की आवश्यकता है। पीड़ित समुदायों को ऐसे नेताओं को जन्म देना होगा, जिनमें उन मूल समस्याओं, जिनके चलते ये समुदाय उभर ना सके, का हल निकालने की योग्यता व निष्ठा हो। नए नेता, ऐसे विचारशील व्यक्ति होने चाहिए जो बुद्धिजीवी तो हों ही, साथ ही उनमें सामाजिक समस्याओं का इस तरह से समाधान करने की क्षमता होनी चाहिए, जिससे समतामूलक परिवर्तनों को बढ़ावा मिले।

phule

फुले

ऊँचनीच का विचार और श्रेणीबद्ध पदक्रम में अपने लिए नियत भूमिका का निर्वहन करने की अपरिहार्यता हमारे दिलो-दिमाग में गहरे तक पैठी हुई है। इसलिए परिवर्तन लाने के लिए यह आवश्यक है कि सामान्य राजनीति की जगह सांस्कृतिक बदलाव के लिए सतत संघर्ष किया जाए। अधीनस्थ जातियों, विशेषकर दलितों व ओबीसी के परस्पर विरोधाभासों को दूर करना नितांत आवश्यक है।

इसकी शुरूआत, समस्या का अस्तित्व स्वीकार करके और ईमानदारी से आत्मालोचना व आत्मपरीक्षण करके की जा सकती है। सबसे पहले जरूरी यह है कि जो लोग सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं, वे अपने स्वयं के जातिगत पूर्वाग्रहों और जातिवादी मानसिकता को पहचानें और उनसे मुक्त हों। इससे एकता और मेल-मिलाप की वह भूमि तैयार होगी, जिस पर खड़े होकर एक संयुक्त संघर्ष शुरू किया जा सकेगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि ओबीसी, दलितों व उन जातियों व समुदायों के नजदीक जायें जो दलितों से भी अधिक शोषित हैं। परंतु आज के ओबीसी राजनेता केवल सत्ता की भौंडी राजनीति करने में व्यस्त हैं। उन्हें न तो जाति व्यवस्था की जटिलता व उसके परस्पर विरोधाभासों की समझ है और ना ही वे उन दमनकारी सत्ता-संबंधों को परिवर्तित करने के इच्छुक हैं, जिनका शिकार दलित और महिलाएं हो रहे हैं। अधिकांश ओबीसी राजनेता बौद्धिक और नैतिक दृष्टि से अपंग हैं। उनमें न तो इतनी बुद्धि है और ना ही इतनी संवेदना कि वे अपने से भी अधिक दमित समुदायों के साथ खड़े हों।

कुल मिलाकर, ओबीसी राजनेताओं ने समतामूलक समाज के निर्माण व प्रजातंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित नहीं की है। और ना ही ऐसा लगता है कि उनकी रूचि समाज को न्यायपूर्ण बनाने और दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों व अन्य परेशानहाल समुदायों के साथ सत्ता में भागीदारी करने में है। दलित और आदिवासी राजनीतिज्ञ इनसे बेहतर हैं परंतु दोनों में कोई खास फर्क नहीं है। केवल पहचान की राजनीति करने की प्रवृत्ति, भ्रष्टाचार के नये कीर्तिमान स्थापित करने की आतुरता और दलितबहुजन पार्टियों के जाति व उपजाति के आधार पर विभाजन के घातक नतीजे अब सबके सामने हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के कटु संबंध जगजाहिर हैं। हम सब यह देख रहे हैं कि किस प्रकार अनेक शीर्ष दलित और ओबीसी नेताओं को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जाना पड़ रहा है। संपूर्ण दलितबहुजन नेतृत्व की लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड के आरोपियों के बरी होने पर शर्मनाक चुप्पी भी किसी से छुपी नहीं है।

समस्या, दरअसल, जितनी गहरी दिखती है, उससे कहीं अधिक गहरी है। यदि उच्च जातियां, दलित-ओबीसी राजनेताओं पर यह आरोप लगाती हैं कि वे जाति-आधारित राजनीति कर रहे हैं तो वे गलत नहीं कहतीं। परंतु यह केवल अर्धसत्य है। दरअसल, दलित और ओबीसी नेता केवल परिवारवाद की अनैतिक राजनीति कर रहे हैं। वे केवल अपने परिवार में सारी सत्ता को केंद्रित रखना चाहते हैं, वे केवल अपने परिवार पर भरोसा करते हैं और केवल उसके सशक्तिकरण में जुटे हुए हैं। अधिकांश ओबीसी-दलित नेता, ओबीसी या दलित समुदायों को तो छोड़िए, अपनी जाति के लोगों पर भी विश्वास नहीं करते। सच तो यह है कि वे अपने परिवार को छोड़कर किसी पर विश्वास नहीं करते। उनकी व्यक्तिवादी सत्ता की राजनीति, बौद्धिक दिवालियेपन और दलितबहुजनों की पीड़ा और यंत्रणा की उनकी अनदेखी की पोल खुल चुकी है। यही वे लोग हैं जिनके कारण ऐसी परिस्थितियां बनीं कि आज राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर केवल दो ही पार्टियां बचीं हैं-कांग्रेस व भाजपा। और ये दोनों पार्टियां, ब्राह्मणवादी राजनीति के सिक्के के दो पहलू भर हैं। यह इससे स्पष्ट है कि अधिकांश दलित-ओबीसी राजनेता इन दो में से किसी एक पार्टी के साथ हैं। जो बचे हैं, वे एक व्यक्ति-एक परिवार वाली पार्टियों का नेतृत्व कर रहे हैं। दलितबहुजनों के हितों के लिए उनकी इस स्वार्थपूर्ण व नमकहरामी की राजनीति से अधिक खतरनाक कुछ नहीं हो सकता। सत्ता और धन के भूखे इन विदूषकों ने दलितबहुजन राजनीति को बड़ी निर्लज्जता से पारिवारिक व्यवसाय में बदल दिया है।

इस सबका नतीजा यह है कि दलितबहुजन विचारों, नीतियों और दृष्टि के संदर्भ में कहीं नहीं ठहरते। यही वे क्षेत्र हैं, जिनमें प्रजातंत्र में प्रतियोगिता होती है। ऐसा कोई सांस्कृतिक-राजनैतिक ढांचा दूर-दूर तक नजर नहीं आता जो दलितबहुजनों को एक कर सके। ब्राह्मणवाद और जाति की संस्था की समालोचना और उनके उन्मूलन का जो कार्य फुले, आंबेडकर और पेरियार ने शुरू किया था, उसे छोड़, दलितबहुजन राजनेता केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को पूरा करने में जुटे हुए हैं। आधुनिकीकरण, शहरीकरण व बाजारीकरण से उपजे व्यापक भौतिक व तकनीकी परिवर्तनों के कारण, प्रभुता स्थापित करने के जो नये तंत्र व सांचे उभरे हैं, उन्हें समझने की कोशिश तक नहीं हो रही है। प्रतिभा का सम्मान, समान अवसर व उर्ध्वगामी गतिशीलता जैसे मनमोहक मिथकों को चुनौती देने के लिए नई राजनीतिक दृष्टि का निर्माण करने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है।

मीडिया बड़े जोरशोर से यह कह रहा है कि बिजली-सड़क-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाना, प्रतिगामी जातिवादी राजनीति का प्रतिषेधी है। परंतु यह सोच, व्यापक नीतियों और विस्तृत परिप्रेक्ष्य को पूरी तरह नजरअंदाज करती है। इसी तरह, आक्रामक निजीकरण के इस दौर में, बेहतरी की आधी-अधूरी परिकल्पनाएं, कुछ समूहों तक सीमित संकीर्ण सोच व दिखावटी सांस्कृतिक परिवर्तन हमें सर्वनाश की ओर ढकेल रहे हैं। तथ्य यह है कि सत्ता में हिस्सेदारी के कुछ टुकड़े फेंककर, न्यायपालिका, नौकरशाही, सेना, मीडिया व शिक्षा जगत के घोर अप्रतिनिधिक चरित्र को बनाये रखने का षड़यंत्र किया जा रहा है। इसी के चलते, शिक्षा के व्यवसायिकरण और प्राकृतिक संसाधनों के निजीकरण की अनदेखी की जा रही है, जिसके नतीजे में एक नई जाति-वर्ग व्यवस्था मजबूत हो रही है। इस नई व्यवस्था के सबसे बड़े शिकार केवल और केवल दलितबहुजन होंगे।

नवीकृत फुले-आंबेडकरवादी विमर्श की आवश्यकता

समस्या केवल यह नहीं है कि दलितबहुजन, भारत की विकास की धारा से बाहर ढ़केल दिये गये हैं बल्कि समस्या यह भी है कि उनके पास वह दृष्टि ही नहीं है, जिसके चलते वे वांछनीय परिवर्तन लाने के लिए संगठित प्रयास कर सकें। निःसंदेह, वे हमेशा से मुक्तिकामी रहे हैं और गौतम बुद्ध के काल से लेकर आज तक कई ऐसे विचार व आंदोलन उभरते रहे हैं, जिन्होंने उन्हें गुलामी की जंजीरों से मुक्त होने की प्रेरणा दी है (और जिसके नतीजे में कुछ परिवर्तन व सामाजिक गतिशीलता भी आई है), परंतु कुल मिलाकर, वे अब भी गुलाम हैं, चाहे छिपे रूप में या जाहिराना तौर पर-जैसा कि समकालीन सर्वेक्षण और आंकड़े बताते हैं। भारतीय समाज आज भी दुनिया के सबसे असमान समाजों में से एक है और दमित समुदायों में मुक्ति पाने के लिए आवश्यक दृष्टि का अभाव है। उनके पास न तो विचारधारा है, न नेतृत्व और ना ही संगठन। और यही कारण है कि वे सामाजिक परिवर्तन के लिए कोई आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ हैं।

वे कौन-से मूल कारक हैं जिनके कारण दलितबहुजन राजनैतिक दृष्टि से पालतू और बौद्धिक दृष्टि से लकवाग्रस्त बने हुए हैं और नयी दृष्टि (जो भारत को बदलने की मुख्यधारा की दृष्टि बन सकती है) उभर ही नहीं पा रही है। इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमें संपूर्ण व्यवस्था पर समग्रता से गौर करना होगा। इसके लिए यह जरूरी होगा कि हम भारत की ऊँचनीच की व्यवस्था के बहुआयामी (धर्म से परे व धार्मिक दोनों) चरित्र को समझें-उस व्यवस्था के चरित्र को, जिसकी जड़ें श्रेणीबद्ध जातिगत पदक्रम में है।

यह भी जरूरी होगा कि हम वर्ग व पितृसत्ता जैसे असमानता के अन्य स्वरूपों को भी संज्ञान में लें, जिनके कारण दमित जातियां बंटी हुई हैं और इन जातियों व हाशिए पर पड़े अन्य समुदायों के बीच एकता स्थापित नहीं हो पा रही है।

DR.-BHIM-RAO-AMBEDKAR

आंबेडकर

इन कारकों को फुले और आंबेडकर से बेहतर कोई नहीं समझ सका था। भारतीय यथार्थ की उनकी समझ, केवल लिखित स्त्रोतों और ज्ञान-मीमांसा पर ही नहीं बल्कि व्यवहारिक जीवन और जो उन्होंने स्वयं भोगा था, उस पर भी आधारित थी। पश्चिमी और भारतीय बुद्धिजीवियों के विपरीत, उन्होंने भूतकाल को वर्तमान और वर्तमान को भूतकाल के जरिये समझने की कोशिश की। उन्होंने समग्र धार्मिक स्थापनाओं, पदक्रम के ढांचे और उन राजनैतिक संस्थाओं, जिनका मूल लक्ष्य आमजनों को अज्ञानी, दास व विभाजित रखना था-इन सभी का गहन अध्ययन और समालोचना की। उन्होंने यह बताया कि किस प्रकार ब्राह्मणवादियों ने ज्ञान पर अपना एकाधिकार बनाये रखा व नीची जातियों और महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा। इसने भारत की जातिगत व पितृसत्तात्मक संस्कृति को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्र के सवाल पर उन्होंने इस मूल बिन्दु पर बार-बार जोर दिया कि राष्ट्र, दरअसल, उसके निवासी ही हैं। समाज के जातिगत-वर्गीय ढांचे के संबंध में उनका तर्क यह था कि जिस समाज में भेदभाव होता हो, वह कभी एक सच्चे राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता। कई मुसीबतों का सामना करते हुए उन्होंने उन शक्तियों के विरूद्ध संघर्ष किया, जो हमारे देश में भूतकाल में व्याप्त भयावह असमानता को या तो औचित्यपूर्ण ठहराती थीं या उसे छुपाने का प्रयास करती थीं और जो इन असमानताओं को बनाये रखना चाहती थीं, ताकि उनकी सत्ता कायम रह सके।

परंतु फुले और आंबेडकर ने जिस सांस्कृतिक क्रांति की नींव रखी थी वह न केवल अधूरी रह गई बल्कि आने वाली पीढ़ियों ने उसे नजरअंदाज किया और तोड़ा-मरोड़ा। वे लोग जो भारत के मुक्तिदायक हो सकते थे, उनका मखौल बनाया गया और उन्हें केवल ‘नीची जातियों’ व ‘अछूतों’ का नेता बताकर हाशिए पर ढकेल दिया गया। कनाडा के दर्शनशास्त्री चार्ल्स टेलर का तर्क है कि वर्चस्वशाली समूह द्वारा किसी सांस्कृतिक समुदाय को ‘तुच्छ’ बताना, अधीनस्थ समुदाय द्वारा अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता को बढ़ावा देने वाली राजनीति करने का औचित्यपूर्ण आधार हो सकता है। किसी वर्ग की समानता को स्वीकार करने से इंकार, उस वर्ग को हानि पहुंचा सकता है। किसी को निम्न या तुच्छ बताना, अपने आप में उसका दमन करना है। किसी वर्ग पर शूद्र, अछूत और नीची जाति का लेबल चस्पा करने से अधिक अमानवीय क्या हो सकता है? ऊँची जातियों के महानतम भारतीय राष्ट्रवादियों (जैसे गांधी व नेहरू, तिलक व सावरकर) ने इस तथ्य को स्वीकार करने से ही इंकार कर दिया था जिसके कारण दलितबहुजनों को मजबूर होकर स्वतंत्रता के लिए अपना स्वायत्त संघर्ष शुरू करना पड़ा। सच यह है कि फुले-आंबेडकर विचारधारा की समाज की समग्र समझ, गांधी व नेहरू या तिलक व सावरकर की समझ से नैतिक दृष्टि से श्रेष्ठ थी क्योंकि वह दमित बहुसंख्यकों की महत्वाकांक्षाओं और चेतना की प्रतिनिधि थी।

फुले-आंबेडकर की विचारधारा के मूल में था अन्याय के सभी स्वरूपों का विरोध। उनकी इस विरासत को आगे बढ़ाकर ही भारत को सामाजिक प्रजातंत्र बनाया जा सकता है। आज के वैश्विकृत भारत में उदारवादी (पूंजीवादी) प्रजातंत्र और सामाजिक प्रजातंत्र की शक्तियों के बीच भीषण टकराव चल रहा है। यह संघर्ष, इन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों के बीच चल रहे वैश्विक संघर्ष का भाग है। आज जिस उदारवादी प्रजातंत्र का बोलबाला है, वह मूलतः बुर्जुआ-ब्राह्मणवादी प्रजातंत्र है, जो आत्म-विनियमित बाजार और निजी संपत्ति के असीमित अधिकार पर केंद्रित है। उदारवादी प्रजातंत्र के मुखौटे के पीछे हठी अपरिवर्तनवाद छुपा हुआ है। दूसरी ओर, सामाजिक प्रजातंत्र का अर्थ न केवल सबको समान नागरिक व राजनैतिक अधिकार उपलब्ध करवाना है वरन् कुछ मूल आर्थिक व सामाजिक अधिकारों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करना है। यह तब तक संभव नहीं है जब तक कि राजनैतिक जिम्मेवारी को बाजार की शक्तियों पर प्राथमिकता न दी जाए। सामाजिक प्रजातंत्र, शोषण-मुक्त समाज के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध है जिसमें सभी को सामाजिक सुरक्षा व समान अवसर प्राप्त होंगे और जिसका चरित्र समावेशी होगा। भारतीय संदर्भ में सामाजिक प्रजातंत्र का अर्थ है एक ऐसा समाज जो जाति, वर्ग व लिंग पर आधारित एक-दूसरे से जुड़ीं, बहुविध असमानताओं से मुक्त हो। फुले और आंबेडकर ने ऐसे ही समाज के निर्माण का स्वप्न देखा था।

अगर भारत को जाति आधारित समाज से सामाजिक प्रजातंत्र में परिवर्तित किया जाना है तो फुले-आंबेडकर विमर्श को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। इसमें सबसे बड़ी बाधा है दलित-बहुजनों में शिक्षा के व्यापक प्रसार का अभाव व ज्ञान के निर्माण व प्रसार की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी न होना। यह इस तथ्य के बावजूद कि कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दलित-बहुजन बुद्धिजीवियों ने प्रशंसनीय कार्य किया था। फुले और आम्बेडकर का यह निष्कर्ष था कि श्रेष्ठि वर्ग के प्रभुत्व और अधीनस्थ वर्गों में मनोबल के अभाव की जड़ में है दमित वर्गों को हमेशा से शिक्षा से वंचित किया जाना। यहां तक कि दलित-बहुजनों को धार्मिक शिक्षा से भी वंचित रखा गया और उन्होंने अपने अनुभव से जो ज्ञानार्जन किया, उसे न सिर्फ कोई स्वीकृति नहीं दी गई वरन् उसे लांछित भी किया गया ताकि ज्ञान की किसी वैकल्पिक धारा के विकास की संभावना को न्यून किया जा सके।

आज के बहुजन जिन जटिल समस्याओं के कारण बंटे हुए और असहाय हैं उनके पीछे इतिहास में उनके साथ सांस्कृतिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक क्षेत्रों में किया गया सुनियोजित व प्रणालीगत भेदभाव है। परंतु आज के दलित-ओबीसी नेतृत्व के भ्रष्टाचार, बौद्धिक दिवालिएपन और हथियार डाल देने की उनकी प्रवृत्ति ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। जातिप्रथा-जनित राजनैतिक व बौद्धिक प्रभुता और उसके परिणामों की समझ को विकसित करना एक चुनौती बनी हुई है। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि जिन जातिवादी व पितृसत्तामक मूल्यों को इन वर्गों ने आत्मसात कर लिया है, उनसे वे मुक्ति पाएं। निःसंदेह समाज में कई परिवर्तन हो रहे हैं पंरतु वर्तमान प्रजातंत्रिक व्यवस्था की कमियों के चलते, भारतीय समाज का प्रजातांत्रिकरण करने और दमित जातियों और समुदायों की मुक्ति के लिए फुले-आंबेडकरवादी विमर्श को पुनर्जीवित करना अपरिहार्य है। इस अर्थ में दलित-बहुजनों का वर्तमान संकट एक अवसर भी है।

यह आलेख फुले स्मृति व्याख्यान से लिया गया है, जो 28 फरवरी 2015 को मुंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में आयोजित था। कार्यक्रम के प्रभारी प्राध्यापक के अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ जाने के कारण इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया था।

 

फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2015 अंक में प्रकाशित

 

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