क्या कमंडल का विस्तार था मंडल?

संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीतिए हिंदू धर्म के कमजोर तबकों कोए जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक तौर पर मजबूत हो रहे थे, राजनीतिक तौर पर मजबूत कर रही है

मोदी के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आने और सामाजिक न्याय की कथित पार्टियों का लगभग सफाया हो जाने के बाद, पिछड़ों और दलितों की अस्मितावादी राजनीति के सामने अस्तित्व का जो संकट पैदा हुआ था, वह ९ महीने बाद भी जारी है। महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों के नतीजों से यह स्पष्ट हो गया है कि पिछड़ों और दलितों ने बड़े पैमाने पर भगवा पार्टी का साथ दिया। इससे एक बार फिर यह साबित हुआ कि लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकावए आकस्मिक या किसी लहर के कारण नहीं था।

यह समझने के लिए कि ऐसा होना क्यों लाजिम था, सन १९८० के दशक के अंत और १९९० के दशक की शुरुआत की राजनीति पर नजर डालना जरूरी होगा। मंडल आयोग की सिफारिशों, जिनमें पिछड़ी जातियों के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात कही गई थी, के लागू होते ही पिछड़ी हिंदू जातियों, खासकर यादवों के नेतृत्व ने जोर-शोर से यह प्रचारित करना शुरु कर दिया कि अब पिछड़ों का ‘क्रांतिकारी राजनीतिक उभार’ हो गया है, जिससे सामाजिक न्याय का राज कायम होगा और हजारों साल से ‘छले’ गए पिछड़ों (शूद्रों) को अब ‘उनका हक’ मिलेगा। जाहिर है कि यह ‘हक’ उन्हें हिंदू वर्ण व्यवस्था, जिस पर सवर्ण जातियों का वर्चस्व था, से मिलने थे । यानी ‘हक’ का यह लेनदेन हिंदू वर्ण व्यवस्था की आंतरिक परिघटना थी। ‘सामाजिक न्याय’ मूलतः ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ था . एक तरह का हिंदू राजनीतिक सुधार।

इसका एक प्रभाव यह हुआ कि पिछड़ी जातियों के बीच हिंदू धर्म के विरोध में जो परिवर्तनकामी आंदोलन चल रहे थे, उनकी परंपरा अवरूद्ध हो गयी क्योंकि अब वे राजनीतिक और सामाजिक शब्दावली में पिछड़े ‘हिंदू’ थे।

ठगे गये मुसलमान

अस्मितावाद का यह ‘करिश्माई और गौरवपूर्ण’ राजनीतिक ‘उभार’ दो कारणों से मिथक था। पहला, क्योंकि यह कोई उभार था ही नहीं। राजनीतिक भाषा में ‘उभार’ वह होता है जिसके लिए लम्बे समय से संघर्ष किया जा रहा हो, जेल जाया जा रहा हो और जिसमें समय के साथ आवाम की भागीदारी बढ़ती जा रही हो। लेकिन मुलायम सिंह, लालू प्रसाद या नीतीश कुमार ने इसके लिए गिरफ्तारी देना तो दूर, एक धरना तक नहीं दिया था। बल्कि यह ‘न्याय’ तो उन्हें अचानक वीपी सिंह ने 1980 से पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके भेंट कर दिया था, जिसका इन्हें अनुमान तक नहीं था। यानी ‘उभार’ अचानक हुआ था। लेकिन इस छली नेतृत्व ने उसे ‘मंडल आंदोलन’ का नाम दे दिया। जबकि आंदोलन तो अपने एकाधिकार में सेंधमारी से नाराज मंडल-विरोधी लोग चला रहे थे।

kamandal

लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकावए आकस्मिक नहीं था

दूसरे, ऐसा नहीं था कि मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू हो जाने के बाद पिछड़ों की आबादी में अचानक कोई गुणात्मक वृद्धि हो गई हो या वे इसके बल पर सत्ता तक पहुंच गए हों। जाहिर है कि यह ‘करिश्मा’ इसलिए सम्भव हो पाया कि बिहार और यूपी में पिछड़ों, खासकर यादवों –  की तकरीबन 8-9 फीसद आबादी में मुसलमानों की 16-18 फीसद आबादी जुड़ गयी। मुसलमान बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के कारण कांग्रेस से नाराज थे और कोई नया राजनीतिक ठिकाना ढूंढ़ रहे थे। यानी इस ‘उभार’ का मुख्य आधार मुसलमानों का एकमुश्त वोट था,  जिसने सत्ता का नया समीकरण सम्भव बनाया। इस तथ्य को ‘पिछड़ा उभार’ के शोर में उसके नेतृत्व द्वारा जानबूझकर दबाया गया। नयी उम्मीद से चहकते मुसलमानों को पीछे रखा गया। मुसलमानों को इस नई सम्भावनाओं वाली राजनीति में उत्साही या सकारात्मक समूह के बतौर नहीं उभरने दिया गया। यह अनायास नहीं था बल्कि तेजी से हिंदुत्ववादी दायरे में सिमटते राजनीतिक माहौल में एक सोची-समझी रणनीति थी। अस्मितावादी राजनीति के नेतृत्व को मालूम था कि अगर मुसलमान सकारात्मक नजरिये से इस समीकरण में शामिल होंगे तो अपनी संख्या बल के कारण वे अपनी मोलभाव की ताकत बढ़ा लेंगे। उन्हें बैकफुट पर रखने के लिए जरूरी था कि बाबरी मस्जिद, दंगों, उर्दू आदि जैसे मुद्दों,  जिन पर वे हारे और ठगे हुए महसूस करते रहे हैं,  के इर्दगिर्द उनकी राजनीतिक बहसों को केंद्रित रखा जाए। यानी यह उनके फियर साइकोसिस से खेलने की रणनीति थी।

दूर की सोचने वाले संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीति हिंदू धर्म के कमजोर तबकों को, जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक तौर पर मजबूत हो रहे थे, राजनीतिक तौर पर मजबूत कर रहे हैं  और उनमें इस बिरादरी के चालाक इस्तेमाल का हुनर भी विकसित कर रही है। जैसे कि यह राजनीति, मंडल आयोग की रपट के लागू होने को सामाजिक न्याय बताती है लेकिन सच्चर समिति की रिपोर्ट को मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति।

संघ परिवार को अपने आकलन पर दो कारणों से पूर्ण विश्वास था। पहला, इन जातियों का वह बहुत पहले से मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा में सफलतापूर्वक इस्तेमाल करता आ रहा था। मसलन, कुख्यात भागलपुर दंगे में दंगाईयों का सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का था। दूसरा, उसे मालूम था कि यादव-मुस्लिम गठजोड़ की सांस्कृतिक अपील संघ के वैचारिकी के अनुरूप थी। इस गठजोड़ में यादवों का बोलबाला था और इस एकता का आधार यह था कि मुसलमान भी पहले यादवों की तरह पिछड़े और दमित हिंदू थे,  जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था। संघ का मुसलमानों और ईसाईयों के बारे में हमेशा से यही मानना रहा है कि वे धर्मपरिवर्तित हिन्दू हैं। यही सोच संघ के ‘घरवापसी’ कार्यक्रम का आधार है। यानी संघ को मालूम था कि इस एकता का जो आधार बताया जा रहा है उससे पिछड़ों में उसकी इस सांस्कृतिक धारणा का प्रचार हो रहा है कि मुसलमान भूतपूर्व हिन्दू हैं और यह एकता मुसलमानों की स्वतंत्र धार्मिक पहचान को खारिज करके बन रही है।

यानी इस यादव-मुस्लिम एकता से हिंदुत्व और मजबूत हो रहा था। पहली बार वह इस एकता के जरिए पिछड़ों में किसी हिंसक कार्रवाई की बजाए राजनीतिक और रचनात्मक तरीके से घुसपैठ कर रहा था। मंडल या हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति पिछड़ों में हिंदुत्व के सांस्कृतिक बीज बो रही थी,  जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना को गांव-गांव तक पहुंचाना और उसका नेतृत्व करना था। जैसा कि फैजाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में देखा गया और मुस्लिम विरोधी जनंसहार के सबसे बड़े चेहरे के राज्याभिषेक में भी। यानी आम धारणा के विपरीतए मंडल की राजनीति ने कमंडल को रोका नहीं बल्कि उसे गांव-गांव और पिछड़ी जातियों तक  पहुंचाया, जहां स्वयं संघ उसे नहीं पहुंचा पाया था।

सियासी मोर्चे पर संघ देख रहा था कि हिंदुत्व की यह ‘बी टीम’ वह कर सकती थी,  जो वह खुद अपने सवर्णवादी ढांचे के कारण करने में समर्थ नहीं था यानी – वामपंथ का सफाया। जातीय अस्मिता पर सवार यह राजनीति पिछड़ों (और दलितों) को वामपंथियों से दूर करने लगी। उसने वामपंथियों पर सवर्ण नेतृत्व थोपने का आरोप लगाया। इस आरोप ने न सिर्फ वामपंथी पार्टियों के जनाधार को प्रभावित किया बल्कि उनके नेतृत्व के पिछड़े नेताओं की एक जमात ने अपने को हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति का हिस्सा बना लिया। यहां गौरतलब है कि पिछड़ों की राजनीति ने भाजपा में तेजी से जाते पिछड़ों को रोकने के लिए भाजपा के सवर्ण नेतृत्व पर उतने तीखे सवाल नहीं उठाए जिसके चलते भाजपा के मुस्लिम विरोधी फासीवादी एजेंडे का संगठित और विचारधारात्मक प्रतिरोध कमजोर हुआ। अब धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले खेमे में धर्मनिरपेक्ष लोग नहीं थे,  वे पिछड़ी जातियों के ‘हिंदू’ थे,  जिनकी संघ के मनुवाद से सिर्फ भागीदारी या समायोजन को लेकर बहस थी। यह ‘गीता‘ को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किये जाने की कवायद को अपनी जाति की जीत के रूप में देखने वालों का कुनबा था।

मंडल पर भारी कमंडल

दरअसल, मंडल की राजनीति ने बहुत पहले से ही हिंदुत्‍व के एजेंडे पर चलना शुरू कर दिया था। इसके दो रोचक उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, सपा-बसपा ने 1993 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान जो नारा ‘मिले  मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम’  लगाया था उसे फिर कभी नहीं दोहराया क्योंकि उन्‍हें मालूम था कि इस नारे के साथ उन्हें अपनी हिंदू बिरादरी का वोट नहीं मिलने वाला।  यह कोई धोखा भी नहीं था।  स्वाभाविक था।  क्योंकि हजारों साल के अन्याय का ‘मुआवजा’ वसूलने के बाद अस्मितावादी राजनीति को वृहद हिंदू अस्मिता में विलीन होने की ओर ही बढ़ना था। दूसरा, जद(यू) के स्थापना कार्यक्रम में वल्लभभाई पटेल की तस्‍वीरें प्रमुखता से लगाईं गयीं थीं। पटेल कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के वाहक थे। जाहिर है ऐसा करके जद(यू) ने अपने हिंदू पिछड़े समुदाय को संदेश दे दिया था कि मुसलमानों के बारे में वह क्या सोच रखती है और उसे भाजपा के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं है।

इसीलिए जब सपा या बसपा ठाकुर या ब्राह्मण जातियों के सहयोग से सत्ता चलाती हैं तो यह उनके द्वारा पिछड़ों या दलितों के वोटों का सवर्णों के पास गिरवी रखना नहीं है यह हिंदू जातियों का स्वाभाविक गठजोड़ है जिसे वर्गीय रूप से मजबूत होने के कारण सवर्ण नियंत्रित करते हैं और जिस पर उनके जनाधार को कोई दिक्कत न हो, इसके लिए अस्मितावादी हिंदुत्ववादी तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं। मसलन, इस लेखक द्वारा बसपा के एक कार्यकर्ता से पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह पूछने पर कि बसपा ने ब्राह्मणों की पार्टी भाजपा के साथ सरकार क्यों बनाई थी,  उसका लाजवाब तर्क था कि ब्राह्मणों को राजनीति में आज तक कोई धोखा नहीं दे पाया था। बसपा ने उन्हें धोखा देकर ऐतिहासिक काम किया। छः महीने बसपा का मुख्यमंत्री रह लेने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो उसे धोखा दे दिया!

इसीलिए जब पिछड़ों-दलितों के सामने में संघ ने मोदी को उनकी पिछड़ी जाति की पहचान के साथ परोसा तो उसने उसे हाथों-हाथ लिया क्योंकि उन्हें पहली बार ‘अपने’ आदमी को प्रधानमंत्री बनाने का अवसर मिल रहा था। उसके लिए यह कोई विचारणीय सवाल ही नहीं था कि वह उनकी सांप्रदायिक छवि पर सोचे भी क्योंकि इस पर उसकी मोदी से वैचारिक असहमति नहीं थी। इसीलिये सपा व बसपा जैसी पार्टियों ने अपने जनाधार के बीच पर मोदी की दंगाई छवि को सवाल नहीं बनाया। पिछडों ने अपने पुराने मतदाता सहयोगी मुसलमानों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और बिल्कुल किसी युद्ध की रणनीति की तरह उसे इस भ्रम में रखा कि वह तो ‘सेक्यूलर’ सपा या बसपा के साथ है। विचार की जगह सिर्फ जाति पर भरोसे की यह जमीन मंडल राजनीति ने पिछले 25 सालों में तैयार की थीए जिसे बहुत आसानी से अस्मितावादी बुद्धिजीवी भाजपा का जनतांत्रीकरण बताकर जायज ठहरा सकते थे। जैसा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद फारवर्ड प्रेस के जुलाई, 2014 अंक में प्रेमकुमार मणि ने अपने लेख ‘चुनाव परिणामों को कैसे देखें बहुजन?’ में किया था। मुझे याद है कि 2003 में मध्यप्रदेश में पहली बार उमा भारती,  जो पिछड़ी जाति से आती हैं के मुख्यमंत्री बनने पर गेल ओम्बेट समेत कई अस्मितावादियों ने भी यही किया था। वे इसमें भाजपा के जनतांत्रिकरण की सम्भावना ढूंढने लगे थे। 2014 में जब नरेंद्र मोदी की जीत से देश का धर्मनिरपेक्ष समुदाय सकते में था और 2003 मेंए यानी ठीक गुजरात दंगों के बाद जब पूरी दुनिया भाजपा को दुरदुरा रही थी तब इस तरह की सम्भावना की खोज आसान खोज नहीं थी। जाहिर है यह सम्भावना उन्हें इसीलिए दिखी कि उनके लिए प्रजातंत्र का मतलब पिछड़ों और दलितों की सत्ता में भागीदारी से ज्यादा कुछ नहीं है। मुसलमानों के जनसंहार से उनके ‘जनतंत्र’ पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2015 अंक में प्रकाशित

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