पेरियार की क्रांतिकारी विरासत को पुनर्जीवित करने की ज़रुरत

द्रविड़ आंदोलन पूरे देश के लिए एक मॉडल है, जिसके जरिए जाति व्यवस्था की बर्बरता से मुकाबला कर एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सकता है, जहां उच्च जाति के हिन्दुओं की तानाशाही की बजाए तर्कवाद और प्रजातंत्र का राज होगा

हिन्दू अतिवाद और साम्प्रदायिकता के बढ़ते बोलबाले और धार्मिक अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे कुठाराघात से चिंतित भारत का धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी तबका, गाँधी, नेहरु व आंबेडकर – और वामपंथी हलकों में भगत सिंह – की विरासत की याद देश को दिला रहा है। आधुनिक भारत की इन विभूतियों को धार्मिक सहिष्णुता, अहिंसा, दलित सशक्तिकरण व समाजवादी क्रांति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

परन्तु बहुत कम लोग ई. व्ही रामासामी नाईकर, जिन्हें पेरियार के नाम से बेहतर जाना जाता है, को याद कर रहे हैं। पेरियार, दक्षिण भारत में द्रविड़ आन्दोलन के संस्थापक थे। जैसा कि मैं आगे बताऊंगा, पेरियार के दर्शन, उनके कार्यों और लोगों को एक करने के उनके तरीकों को समझे बिना, ऊंची जातियों के वर्चस्व का प्रतिनिधित्व करने वाली हिंदुत्व की विचारधारा और साम्प्रदायिक व अंधकारवादी शक्तियों को चुनौती देना संभव नहीं है।

periyar1निसंदेह, पेरियार का सबसे बड़ा योगदान था वर्णाश्रम व्यवस्था और हिन्दू जाति व्यवस्था-जो व्यक्ति को उसके गुणों के आधार पर नहीं वरन उसके जन्म के आधार पर ऊंचा या नीचा दर्जा देते हैं-को बेनकाब करना। पेरियार ऐसा करने वाले पहले व्यक्ति नहीं थे परन्तु वे हिन्दू धर्म द्वारा समाज को मनमाने ढंग से ‘उच्च’ व ‘निम्न’  वर्गों में विभाजित करने के कटु आलोचक थे।

‘प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे का वैसा ही सम्मान करना चाहिए, जैसा वह स्वयं का चाहता है। यह हिन्दुओं के लिए एक क्रांतिकारी विचार है और इसे सुधार के जरिये नहीं बल्कि क्रांति के रास्ते ही लागू किया जा सकता है। कुछ चीज़े सुधारी नहीं जा सकतीं, उन्हें खत्म करना होता है। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म ऐसी ही एक चीज़ है,’ पेरियार ने कहा था।

बीसवीं सदी की शुरुआत में, पूरे देश की तरह, तमिलनाडु में भी राजनीति, प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था पर ब्राह्मणों का संपूर्ण वर्चस्व था। उदाहरण के लिए, 1870 से 1900 के बीच कालेजों से पढ़कर निकलने वाले स्नातकों में से 70 प्रतिशत ब्राह्मण थे जबकि आबादी में उनका हिस्सा मात्र 3.2 प्रतिशत था। सन 1912 में, 55 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर, 82.3 प्रतिशत उप-न्यायाधीश और 72.6 प्रतिशत मुंसिफ ब्राह्मण थे। इसके विपरीत, गैर-ब्राह्मणों की कहीं बड़ी आबादी की इन पदों में हिस्सेदारी क्रमश: 2.5, 16.7 और 19.5 प्रतिशत थी। इस वर्चस्व का कारण ब्रिटिश-पूर्व काल से समाज में ब्राह्मणों को प्राप्त उच्च दर्जे के अलावा यह भी था कि तमिलनाडु में ब्राह्मणों ने अन्य जातियों की तुलना में अधिक संख्या में और गंभीरता व परिश्रम से अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण की। पेरियार ने अन्य राजनैतिक शक्तियों के साथ मिलकर यह मांग की कि शासकीय सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में गैर-ब्राह्मणों के लिए आनुपातिक आरक्षण हो। ब्राह्मण लॉबी के कड़े विरोध के बावजूद, मद्रास राज्य, जो कि वर्तमान तमिलनाडु का पूर्ववर्ती था, में सन 1928 में आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी गयी। मद्रास, ऐसा करने वाला देश का पहला प्रान्त था।

सन 1950 में उच्चतम न्यायालय ने इस आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद तमिलनाडु में इतना जबरदस्त आन्दोलन भड़का कि मजबूर होकर जवाहरलाल नेहरु सरकार को प्रथम संवैधानिक संशोधन के ज़रिये, सरकारों को यह अधिकार देना पड़ा कि वे कमज़ोर वर्गों के लिए आरक्षण सहित अन्य ‘विशेष प्रावधान’ कर सकती हैं।

रोजग़ार व शिक्षा के क्षेत्रों में गैर-ब्राह्मणों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त, पेरियार ने जाति व्यवस्था के सैद्धांतिक आधार को भी चुनौती दी। जाति व्यवस्था को वेद व अन्य हिन्दू धर्मग्रन्थ जैसे पुराण और रामायण व महाभारत जैसे महाकाव्य वैधता प्रदान करते हैं।

पेरियार व उनके द्वारा स्थापित द्रविड़ कषगम से सम्बद्ध अध्येताओं ने इन धार्मिक ग्रंथों के विरोधाभासों, पूर्वाग्रहों व अनैतिक अवधारणाओं को विस्तार से आमजनों के सम्मुख प्रस्तुत किया और यह बताया कि किस प्रकार ये ग्रंथ जाति व्यवस्था को धार्मिक मान्यता प्रदान करते हैं।

उदाहरण के लिए, द्रविड़ आन्दोलन ने ‘रामायण’ का विस्तृत आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। पेरियार के अनुसार, रामायण, दरअसल, मध्य एशिया से आये आर्यों की भारत के मूल निवासियों-मुख्यत: द्रविड़ों-पर विजय की कथा है। तमिलनाडु के ब्राह्मणों ने आर्यों की ‘सांस्कृतिक श्रेष्ठता’ की मैक्समूलर की अवधारणा का इस्तेमाल, अपने वर्चस्व को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने कि लिए किया। द्रविड़ आन्दोलन ने इस अवधारणा को अपनी राजनीति का प्रस्थान बिन्दु बनाया।

नायक के रूप में रावण

रामायण की द्रविड़ व्याख्या के अनुसार, इस महाकाव्य का नायक राम आक्रान्ता खलनायक है और तथाकथित ‘दैत्यराज’ रावण, राम के आक्रमण का शिकार है। द्रविड़ आन्दोलन के शुरूआती दौर में लिखी गयी ”रावण काव्यम्’, रावण के गुणों की प्रशंसा से भरी हुई है। द्रविड़ कषगम कार्यकर्ता और फिल्मी दुनिया से जुड़े एमआर राधा की रामायण पर पैरोडी, रावण को एक महानायक निरुपित करती है। उन दिनों, द्रविड़ कार्यकर्ता आमसभाओं में रामायण की प्रतियाँ सार्वजनिक रूप से जलाया करते थे क्योंकि उनका कहना था कि उसमें द्रविड़ों को ‘राक्षस’ और ज्यादा से ज्यादा, राम के सहायक बन्दर और भालू बताया गया है।

‘रावण के प्रतीक के इस्तेमाल ने तमिलों को गैर-संस्कृत, क्षेत्रीय संस्कृति पर गर्व करना सिखाया और ब्राह्मणवाद-विरोधी लहर का सृजन करने में मदद की। रावण, दरअसल, अपनी आर्य जड़ों पर गर्वित भारतीय राष्ट्रवाद को, अलग-थलग महसूस कर रहे दक्षिण भारत का प्रतिउत्तर था’, द्रविड़ आन्दोलन के अध्येता एमएमएस पांडियन ने लिखा।

पेरियार ने धर्म में अंधश्रद्धा और अन्धविश्वासों का विरोध किया और तार्किक सोच को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ, आधुनिक विज्ञान का अध्ययन करने और उसे समझने की ज़रुरत पर जोर दिया। वे आम आदमी के परिश्रम से कमाए धन और उसके संसाधनों को अर्थहीन धार्मिक कर्मकांडों पर लुटाने के कटु विरोधी थे। वे मंदिरों में दान देने के भी खिलाफ थे। उनकी मान्यता थी कि कर्मकांडों और दान पर खर्च किया गया धन, अंतत: ऊंची जातियों को आर्थिक दृष्टि से संपन्न बनाता है।

यद्यपि वे धर्म के विरोधी थे तथापि वे हिंदू मंदिरों के गर्भगृह में गैर-ब्राह्मणों के प्रवेश के अधिकार के पैरोकार थे। उनका तर्क था कि गैर-ब्राह्मणों को मंदिरों के गर्भगृह में प्रवेश करने से रोकना, एक प्रकार से उन्हें मनुष्य के दर्जे से वंचित करना होगा। सन् 1970 में तमिलनाडु की सीएन अन्नादुराई के नेतृत्व वाली द्रविण मुनेत्र कषगम सरकार ने एक कानून बनाया, जिसके तहत सभी जातियों के लोगों को मंदिरों का पुजारी बनने का अधिकार प्राप्त हो गया। तमिलनाडु ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य था।

द्रविड़ आंदोलन की सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण था लोगों को जागृत करने के लिए भाषा और संस्कृति का चतुराईपूर्ण व प्रभावकारी उपयोग। आंदोलन के कई नेता न केवल प्रभावी वक्ता थे वरन् उच्च कोटि के कवि, संगीतज्ञ, कलाकार और लेखक भी थे। भारत सरकार द्वारा दक्षिणी राज्यों पर हिंदी थोपने का द्रविड़ आंदोलन ने विरोध किया। यह स्वाभाविक था क्योंकि आंदोलन का आधार ही आमजनों को तमिल भाषा और संस्कृति पर गर्व करने के लिए प्रेरित करना था। पेरियार ने इस मुद्दे पर एक अलग ‘द्रविणनाडु’ की स्थापना के लिए संघर्ष शुरू करने की धमकी भी दी थी।

हिंदी के मुद्दे पर उठे शक्तिशाली आंदोलन ने डीएमके-जो कि पेरियार की द्रविड़ कषगम से टूटकर बनी पार्टी थी- को 1967 के चुनाव में सत्ता दिलवाई। तमिलनाडु में अलगाववाद की जड़ें जमने के डर और जबरदस्त हिंदी-विरोधी आंदोलन के चलते, भारत सरकार द्रविड़ आंदोलन की मांगों को गंभीरता से लेने पर मजबूर हो गई और आर्थिक व राजनैतिक मोर्चों पर तमिलनाडु को कई विशेष रियायतें और सुविधाएं दी गईं।

सामाजिक मोर्चे पर आम आदमी की रोजाना की जिंदगी में ब्राह्मणों की भूमिका कम करने के उद्देश्य से पेरियार ने ‘स्वाभिमान विवाहों’ का आयोजन शुरू किया, जिनमें किसी भी धर्म के महिला और पुरूष विवाह कर सकते थे। इन समारोहों में किसी धर्म का कोई पुरोहित नहीं रहता था और ये पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष होते थे। विवाह केवल एक-दूसरे को माला पहनाकर संपन्न हो जाता था। इन विवाहों को कानूनी दर्जा देने के लिए डीएमके सरकार ने सन् 1967 में एक विशेष अधिनियम लागू किया।

पेरियार का स्त्रीवाद

पेरियार की क्रांतिकारी सोच, उनके मौलिक स्त्रीवाद में झलकती है, जिसका सैद्धांतिक खाका उन्होंने दुनिया में कहीं भी स्त्रीवाद शब्द के प्रयोग से कहीं पहले तैयार कर लिया था। उदाहरण के लिए, पेरियार महिलाओं की ‘पवित्रता’ या सतीत्व की दमनकारी अवधारणा के कटु विरोधी थे। उनका कहना था कि ”यह मान्यता कि केवल महिलाओं के लिए पवित्रता आवश्यक है, पुरूषों के लिए नहीं, इस विचार पर आधारित है कि महिलाएं पुरूषों की संपत्ति हैं। यह मान्यता वर्तमान में महिलाओं के दर्जे की द्योतक है”।

jinnah-periyar-and-ambedkarपेरियार महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, काम करने, अपने ढंग से जीने और प्यार करने के अधिकार के जबरदस्त समर्थक थे। इस मुद्दे पर उनके विचार इतने क्रांतिकारी थे कि द्रविण कषगम के उनके कई घोर समर्थकों को भी वे रास नहीं आए और इसलिए पार्टी ने न तो उनका प्रचार किया और ना ही उनके अनुरूप आचरण। जैसा कि स्त्रीवादी व पेरियार के विचारों की अध्येता व्ही गीथा ने हाल में 19वीं सदी की समाजसुधारक सावित्रीबाई फुले की स्मृति में आयोजित एक परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा, ”पेरियार के क्रांतिकारी विचारों को दरकिनार कर उन्हें केवल आरक्षण, भोंडे नास्तिकवाद और कटु ब्राह्मण-विरोध के प्रतिपादक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और जाति, ऊँचनीच, लिंग व सेक्स आदि से जुड़े प्रश्नों पर उनके विचारों को मानो किसी अलमारी में बंद कर भुला दिया गया है।”

जब पेरियार की प्रसिद्धी और प्रभाव अपने चरम पर था, तब से अब तक कावेरी नदी में बहुत पानी बह चुका है और द्रविड़ आंदोलन की कोख से जन्मी राजनैतिक पार्टियों का इस हद तक पतन हो गया है कि उन्होंने अनेक मुद्दों पर समझौते कर लिये हैं। आज के तमिलनाडु के राजनेता, भ्रष्टाचार, जातिवाद और पितृसत्तात्मकता के वाहक के तौर पर बदनाम हैं। यहां तक कि उन्हें भाजपा से समझौता करने में भी कोई गुरेज़ नहीं रह गया है। यह वही भाजपा है, जिसे एक समय ‘आर्य श्रेष्ठता’ और हिंदी अंधभक्ति के प्रतीक के रूप में घृणा का पात्र माना जाता था।

हाल के कुछ वर्षों में मध्यस्तर की जातियों द्वारा दलितों पर सुनियोजित हमलों के लिए तमिलनाडु बदनाम रहा है। ये वे जातियां हैं जो ब्राहम्ण-विरोधी आंदोलन से लाभान्वित हुई परंतु वे अपने से नीची जातियों को उनके अधिकार देने के लिए तैयार नहीं हैं। पेरियार ने इस संबंध में बहुत पहले चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि जब तक भारतीय समाज में जातियों का पदक्रम बना रहेगा तब तक यह संभावना भी रहेगी कि इस पदक्रम की हर सीढ़ी पर खड़ी जाति, अपने से नीची सीढ़ी की जाति का दमन करने का प्रयास करेगी।

पेरियार की विरासत को उनके गुजर जाने के बाद तोड़े-मरोड़े जाने के बावजूद, बिना किसी अतिश्योक्ति के यह कहा जा सकता है कि द्रविड़ आंदोलन, आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे सफल सामाजिक परिवर्तन का वाहक था और इस परिवर्तन का विस्तार जाति, शिक्षा, भाषा व लैंगिक अधिकारों से जुड़े सभी मुद्दों तक था। मुख्यत: पेरियार के कारण ही तमिलानाडु देश का एकमात्र ऐसा राज्य बन सका है जहां ब्राहम्णों का राजनीति और समाज पर वर्चस्व नहीं है और ना ही ब्राहम्ण, सांस्कृतिक ‘श्रेष्ठता’ के मानक माने जाते हैं।

आमजनों में तमिल भाषा के प्रति गर्व का भाव उत्पन्न होने से उनकी मातृभाषा में साहित्य सृजन को प्रोत्साहन मिला और द्रविड़ आंदोलन के समाजवादी झुकाव के कारण राज्य, देश की सर्वश्रेष्ठ प्राथमिक स्वास्थ्य अधोसंरचना का निर्माण करने में सफल हो सका। तमिलनाडु में साम्प्रदायिकता की समस्या न के बराबर है और हिन्दुत्व की शक्तियां अपनी पूरी कोशिश के बावजूद वहां जड़ें नहीं जमा सकी हैं।
ये सभी उपलब्धियां एक ऐसे अहिंसक आंदोलन के जरिए हासिल की गईं, जिसकी सफलता के पीछे थे शोध-आधारित तर्क, रचनात्मक संवाद तकनीकें और आम लोगों को जोडऩे के नवोन्मेषी तरीके। द्रविड़ आंदोलन पूरे देश के लिए एक मॉडल है जिसके जरिए जाति व्यवस्था की बर्बरता से मुकाबला कर एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सकता है जहां उच्च जाति के हिन्दुओं की तानाशाही की बजाए तर्कवाद और प्रजातंत्र का राज होगा।

द्रविड़ आंदोलन में एक कमी भी थी और वह यह कि उसने वर्गीय मुद्दों को उचित व पर्याप्त महत्व नहीं दिया। पेरियार सन् 1930 के दशक में सोवियत संघ गए और उस नवोदित राष्ट्र के जबरदस्त प्रशंसक बनकर लौटे। वे समाजवादी सिद्धांतों में विश्वास रखते थे परंतु उन्होंने समाज में व्याप्त आर्थिक गैर-बराबरी की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया। उनका फोकस मुख्यत: जाति पर ही बना रहा।
आज, जबकि वैश्विक व घरेलू पूंजीपतियों और पारंपरिक धार्मिक श्रेष्ठि वर्ग का अपवित्र गठबंधन देश को बहुसंख्यकवादी फासीवाद की ओर धकेल रहा है तब केवल निम्न आर्थिक वर्गों और नीची जातियों का संयुक्त मोर्चा बनाकर ही इन तत्वों का मुकाबला किया जा सकता है।

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फारवर्ड प्रेस के जून, 2015 अंक में प्रकाशित

 

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  1. Mahesh Dange Reply
  2. दिनेश कुमार Reply

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