गुर्जर आरक्षण से उठते सवाल

सन 2012 में राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने राज्य सरकार से सिफारिश की कि गुर्जर बंजारा, गडिया लोहार, रैबारी और गडरिया आदि समुदायों को विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल किया जाये और इनके लिये 5 प्रतिशत अलग से आरक्षण का प्रावधान किया जाये

28 मई 2015 को समाचारपत्रों में छपा कि गुर्जरों का आरक्षण आन्दोलन समाप्त हो गया है और राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने 5 प्रतिशत आरक्षण की उनकी मांग मान ली है। यह गुर्जर आन्दोलन का दूसरा चरण था, जो आठ दिनों तक चला। गुर्जर, ओबीसी कोटे में 5 प्रतिशत ‘विशेष आरक्षण’ के ‘सब-कोटे’ की मांग कर रहे थे। इसके लिए वे रेल की पटरियों और राष्ट्रीय राजमार्ग पर डेरा डाले हुये थे। ”इन्डियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस आन्दोलन के दौरान भारतीय रेलवे को प्रतिदिन दो करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इससे पहले सन 2007 में गुर्जरों का आरक्षण आन्दोलन हुआ था। उस समय गुर्जर, अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के लिये लड़ रहे थे। उस समय भी वसुन्धराराजे मुख्यमंत्री थीं।इस तरह 2003 से शुरू हुआ गुर्जर आरक्षण आन्दोलन का सफऱ 2015 में ख़त्म हो गया। लेकिन कुछ सवाल अनुत्तरित हैं। यथा सरकार इसे कैसे लागू करेगी? क्या राज्य सरकार का आदेश न्यायिक चुनौतियों को पार कर सकेगा?

gujjar-agitation1गुर्जर मुख्यत: एक खेतिहर और चरवाहा समुदाय है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में गुर्जरों को वीर तथा लड़ाकू समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। संस्कृत साहित्य में गुर्जरों को ‘शत्रु-संहारक’ बताया गया है। ‘एन्थ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया’  के अनुसार गुर्जर, कश्मीर से लेकर गुजरात और महाराष्ट्र में एक प्रमुख समुदाय है, जिसने गुर्जर राज्य की स्थापना की थी। यह क्षेत्र आज का गुजरात राज्य है। गुर्जरों का रहन-सहन और राजनैतिक समीपता कुर्मी/पटेल समुदाय से है। कुर्मियों की भांति गुर्जर भी अपने को सरदार पटेल और छत्रपति शिवाजी का वंशज मानते है। गुर्जर समुदाय में कुछ समूहों का क्षत्रियकरण हो गया, जो हिन्दू धर्म में आ गये और शेष आज भी चरवाहे और जनजाति समुदाय के रूप में पाये जाते हैं। गुर्जर समुदाय में हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों के अनुयायी हैं। भारत में गुर्जर मुख्यतया राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में पाये जाते है। राजस्थान में गुर्जरों की आबादी लगभग सात प्रतिशत है और उन्हें राज्य सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल किया है।

राजस्थान में ओबीसी वर्ग मं सबसे सशक्त जाट समुदाय है, जो कोटे की ज्यादातर नौकरियों पर काबिज है। इसके कारण शेष 90 समुदायों को शिकायत रहती है कि उन्हें उनका वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। गुर्जर समुदाय अन्य ह्रक्चष्ट समुदायों की तुलना में सामाजिक-शैक्षणिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। इस कारण ये अपने को जनजातियों के समकक्ष पातें हैं। उनकी मूल मांग यही थी कि उन्हें स्अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाये, जिससे अन्य जनजातियों की भांति उन्हें भी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में ‘विशेष अवसर’ उपलब्ध हो सकें। गुर्जरों के आरक्षण की मांग को भारतीय जनता पार्टी ने 2003 में समर्थन दिया था।

गुर्जर आरक्षण आन्दोलन की भूमिका 2003 में बननी शुरू हो गयी थी, जब भाजपा ने विधानसभा चुनाव के समय गुर्जरों से वादा किया था कि अगर वह शासन में आयी तो उनके लिये विशेष आरक्षण का प्रावधान किया जायेगा। परन्तु शासन में आने के बाद तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार ने इस मामले में हीला-हवाली की, जिससे गुर्जर समुदाय, भाजपा सरकार के खिलाफ गोलबंद हो गया। उन्होंने कोटे में शामिल होने के लिये सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस मांग का मुखर प्रतिरोध मीणा समुदाय ने किया, जो राजस्थान की प्रमुख जनजाति है। 2007 में गुर्जर-मीणा के बीच व्यापक जातीय संघर्ष के आसार दिखाई देने लगे थे। मीणा समुदाय के संगठन ‘जनजाति आरक्षण बचाओ संयुक्त संघर्ष समिति’  ने सरकार को चेतावनी दी कि गुर्जरों द्वारा रेल और सड़क परिवहन रोकने के खिलाफ सख्त कार्यवाही करे नहीं तो आदिवासी समुदाय, गुर्जरों से सीधा संघर्ष करेगा। मीणा-बहुल इलाकों जैसे दौसा, सवाई माधोपुर, बांसवाडा और करौली में मीणाओं ने गुर्जरों का प्रतिरोध किया। वहीँ गुर्जरों ने आरोप लगाया कि गुर्जर आन्दोलन को रोकने में असफल सरकार मीणाओं को आगे कर रही है। गुर्जरों की महापंचायतों ने भरतपुर, दौसा व पीलूकापुरा में बड़े प्रदर्शन किये और अगले साल तक आरक्षण आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया, जिसमें इस समाज के 72 लोग मारे गये। अंत में वसुंधराराजे सरकार ने गुर्जरों को विशेष श्रेणी में 5 प्रतिशत आरक्षण का वायदा किया। तभी आन्दोलन समाप्त हुआ।
सन 2008 में भाजपा सरकार ने गुर्जरों के लिये विशेष पिछड़ा वर्ग के रूप में पांच प्रतिशत और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिये 14 प्रतिशत आरक्षण की स्वीकृति दी। इसे राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी और न्यायालय ने उस पर रोक लगा दी। राजस्थान में कुल 49 प्रतिशत आरक्षण है।ओबीसी के लिये 21 प्रतिशत, अनुसूचित जाति के लिये 16 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के लिये 12 प्रतिशत। सन 2012 में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने राज्य सरकार से सिफारिश की कि गुर्जर बंजारा, गडिया लोहार, रैबारी और गडरिया आदि समुदायों को विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल किया जाये और इनके लिये 5 प्रतिशत अलग से आरक्षण का प्रावधान किया जाये। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने कार्मिक विभाग को सर्विस रूल्स में बदलाव का आदेश दिया, जिससे अलग से 5 प्रतिशत आरक्षण को समायोजित किया जा सके। जनवरी 2013 में सरकार के इस कदम को हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी और गुर्जरों सहित चार अन्य समुदायों के लिये प्रस्तावित 5 प्रतिशत आरक्षण स्थगित हो गया। कांग्रेस सरकार ने गुर्जरों के लिए 1 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया और बाकी 4 प्रतिशत पर अदालत का निर्णय आने तक के लिए रोक लगा दी। गुर्जरों ने इसे अपर्याप्त माना। प्रमुख गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने नयी मांग सामने रखी। उनका कहना था कि ओबीसी कोटे को दो श्रेणियों में बांटा जाये और गुर्जरों को अत्यंत पिछड़ा वर्ग के रूप में 5 प्रतिशत आरक्षण दिया जाये। जाटों ने सब-कोटे का विरोध किया। हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्रीय स्तर की नौकरियों में जाटों को ओबीसी आरक्षण पाने के योग्य नहीं माना है। जाट राजनैतिक और सामाजिक रूप से सशक्त समुदाय है इसलिये वसुंधराराजे सरकार जाटों को नाराज नहीं करना चाहती। अत: गुर्जरों के लिए ‘विशेष आरक्षित वर्ग’ के रूप में 5 प्रतिशत कोटे का प्रावधान किया। साथ ही यह भरोसा भी दिलाया गया कि इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में डालने की विधिक प्रक्रिया भी पूरी की जाएगी, जिससे न्यायालय में इसे चुनौती न दी जा सके।

भाजपा और कांग्रेस दोनों गुर्जरों की मांग का स्थायी हल ढूँढने में असफल रही है। जब भी कोई राज्य सरकार 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण प्रस्तावित करती है तो उसे न्यायालय अवैध घोषित कर देते हैं।दूसरी ओर, ओबीसी कोटे पर दबाव बढ़ता जा रहा है। सच्चर कमेटी ने मुसलमानों के लिए विशेष कोटे की सिफारिश की है, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को विशेष कोटा देने के लिए कहा है। जो भी समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है, उन्हें ओबीसी कोटे में डालने का प्रस्ताव कर दिया जाता है। इससे ओबीसी समुदायों में आन्तरिक कलह बढ़ रहा है। इसका‍ निदान यह है कि जाति जनगणना अतिशीघ्र सम्पन्न होनी चाहिये। जाति जनगणना से सभी जातियों के सामाजिक-आर्थिक-शैक्षिणिक स्तर के सम्बन्ध में आंकड़े मिल जायेंगे जिससे आरक्षण व्यवस्था और सकारत्मक योजनाओं को न्यायसंगत व व्यवस्थित बनाया जा सकेगा।

फारवर्ड प्रेस के जुलाई, 2015 अंक में प्रकाशित

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