फांस : एक सच्चा बहुजन उपन्यास

संजीव के नए उपन्यास ‘फाँस’ की पृष्ठभूमि है देशभर में लगभग पिछले दो दशकों से बढ़ रही किसानों की आत्महत्याएं। यों उपन्यास में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के गांव के बनगांव का चित्रण गया है, लेकिन इसमें आंध्रप्रदेश व कर्नाटक के किसानों सहित भारत के उन सभी किसानों की कहानियां शामिल हैं

Sanjiv

संजीव

बहुजन की एक सहज व्याख्या मेरी समझ से होगी इस देश के अधिकांश नागरिक, मजदूर, किसान, मोची, रिक्शाचालक, पल्लेदार, मछुआरे, मिस्त्री…यानि कि वे सब जो शारीरिक श्रम पर जीते हैं और जिनकी हालत आजादी के इतने बरस बाद और ढेर सारी घोषणाओं, सेमीनारों, पत्रिकाओं की वार्षिकी के बावजूद लगातार पतली होती जा रही है। उनका हाशिये पर भी बने रहना धर्मवादी, जातिवादी सत्तांओं को बरदाश्त नहीं। सत्ता की कुटिलता देखिये कि वह नाटक तो धर्म-जाति के विरोध का करती है लेकिन मजबूत इसी ‘वाद’ से होती है। ऐसे समय में कोई रचनाकार हम सबका पेट भरने के लिये अन्न उपजाने वाले किसानों की जिंदगी में घुसकर ‘फॉंस’ जैसी नायाब औपन्यासिक कृति हिंदी साहित्य को दे तो यह बहुजन के लिए किया गया एक महत्वपूर्ण योगदान माना जायेगा। कथाकार संजीव विदर्भ में रहे, आत्महत्या करते किसानों के परिवारों के दुख में शामिल हुए और फिर एक रचनाकार की भूमिका अदा की।

संजीव के नए उपन्यास ‘फाँस’ की पृष्ठभूमि है देशभर में लगभग पिछले दो दशकों से बढ़ रही किसानों की आत्महत्याएं। यों उपन्यास में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के गांव के बनगांव का चित्रण गया है, लेकिन इसमें आंध्रप्रदेश व कर्नाटक के किसानों सहित भारत के उन सभी किसानों की कहानियां शामिल हैं, जिन्हें पहले जीएम बीजों का इस्तेमाल करने के लिए फुसलाया गया और फिर कर्ज दिया गया। लेकिन कुछ सूखे की मार और कुछ प्रकृति के साथ अनाचार के कारण सीधे-सादे किसानों की जिन्दगी कर्ज और सूखे के बोझ तले इस तबाही में आत्महत्या की तरफ बढ़ती गई। बहुत ज्वलंत मुद्दा चुना है संजीव ने और शायद हिन्दी में पहली बार प्रेमचंद के ‘गोदान’ के बाद किसानों और गांव की पूरी जिन्दगी का दर्द और कसमसाहट सामने आई है ।

सचमुच, समाज का यथार्थ ही साहित्य में बोलता है, बस दृष्टि चाहिये उसे समझने और फिर बयान करने की। उपन्यास की शुरूआत में ही समाज की एक प्रवृत्ति सामने आ जाती है और वह है लड़कियों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाने की। महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के वनगांव में भी लड़कियों के प्रति वही नजरिया है, जो हिन्दी प्रांतों में। ‘छोटी मुलगी’ (लड़की) स्कूल के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद अपनी सहेली मंजुला के साथ उसके गांव क्यं चली गयी,तूफान आ गया, मानो अनर्थ हो गया। ‘और पढ़ाओ इन मुलगियों को, जैसे बैरिस्टर बनेगी।’ पिता शिबू ने फरमान सुना दिया आगे से स्कूल जाना बंद ।

क्या लड़कों के साथ इस तरह पेश आते हैं या आ सकते हैं? फिर लड़के लड़कियों में भेदभाव क्यों? हमारे प्रधानमंत्री ने भी लालकिले से वही पूछा था, जो संजीव उपन्यास के तीसरे पृष्ठे पर उठा रहे हैं ।

शुरू के पृष्ठों में ही वातावरण उभरने लगता है भारत के गांवों के जीवन का। संजीव ग्रामीण भारत के कथाकार हैं, इसलिये हर शब्द से प्रमाणिक तस्वीर बनती चलती है। किसान के लिये गाय, बैल,बकरी सब परिवार के हिस्से होते हैं। माकड़ू बैल घर का वासरू है। मकरी गाय की निशानी। ‘उसके बाद गाय नहीं ले पाये हम। उसे मत बेचना।’ गोदान के दृश्यों की याद दिलाता और हीरा मोती (दो बैलों की कथा की भी)। कीचड़ में फंसे लालू बैल की मर्मातक मौत का चित्र वही खींच सकता है जो उस कीचड़ में सना हो।

विकास के नाम पर आदिवासियों से उनका सब कुछ छीन लिया गया। जंगल में रहते हैं लेकिन पेड़ की एक पत्ती तक नहीं छू सकते बिना सरकार की इजाजत के। सरकार की मिलीभगत से तरह-तरह के अत्याचार सहते हैं। सरकारी कारिंदों को उसकी बदतमीजियों के लिए गांव की औरतों ने पीट डाला तो पूरे गांव पर ही तबाही आ गई। सबकी पेशी होती है। पूछा जाता है, ‘आप लोगों को मालूम नहीं कि बिना परमीशन के आप जंगल के किसी पेड़ को छू भी नहीं सकते न बांस, न बल्ली।’

भीड़ से जवाब आता है, ‘और जो सुअर, भालू, बंदर खाते हैं परमीशन लेते हैं?’

‘बहस मत करो,’सरकारी कर्मचारी गुर्राया।

‘और हम आपके सिपाही को अपनी मुलगियों के साथ मनमर्जी करने देते वो ठीक था? मुलगी ने मुंह नोच लिया तो गलत हो गया?’

शिबू का एक हाथ शिवाजी ने पकड़ रखा था, दूसरा राणा प्रताप ने, शिबू करे तो क्या करे? शिवाजी और राणा प्रताप…… ! आप पूछेंगे इक्की सवीं सदी में ये कहां से आए। तो ऐसा है कि ऐसे समझना होगा। शकुन का पति शिबू आपको बताएगा कि अपने सुनील काका में थोड़ा-थोड़ा दोनों हैं। एक हुँकारती हुई आवाज का नाम है सुनील, ‘खबरदार जो किसी ने कर्ज लिया, खबरदार जो किसी ने आत्मसहत्या की तरफ कदम बढ़ाए। कोई भी खुद-ब-खुद यमराज के पास नहीं जाएगा…!’ काश जिन्द गी सुनील काका की हुँकार की तरह सीधी और सपाट होती । (पृष्ठ 27)

जब से वनरक्षी खुदाबख्श ने उसकी छोटी बेटी कलावती की बॉंह पकड़ी उसके संकल्प हिल गए हैं। लड़की की जात। आज खुदाबख्श है, कल कोई और होगा, परसों कोई ओर! इसका जल्दी शादी-ब्याह करना पड़ेगा। सुनील ने कहा,’कर्ज मत लो।’ चलो, नहीं लेते कर्ज। लेकिन पहले के लिए हुए कर्ज का क्या होगा?

जिन्दरगी एक दूसरे को कैसे प्रभावित करती है। बस शादी की चिंता हो गई पिता शिबू को। आज खुदाबख्श, तो कल कोई और, स्कूल जाने से तो पहले ही रोक लिया था।

किसान मोहन बाघमारे कर्ज लेने जाता है किसी अधिकारी के पास। उपन्यास का एक-एक शब्द पाठक के आर-पार होता जाता है। किसानों के नाम पर वोट लेने वाली सरकारें कैसी क्रूरता से किसानों से पेश आती हैं, मानो अंग्रेजी सरकार अभी भी कायम हो। खेती के लिए कर्ज न देने के हजार बहाने। पचास कानूनों की दुहाई लेकिन मोटर साईकिल के लिए तुरंत तैयार। जैसे-तैसे कर्ज लेकर जिन्दगी खींच रहा था मोहन बाघमारे का परिवार कि सूखे की चपेट में पूरा क्षेत्र आ गया। सूखे की चपेट में बैल(भाई) का सौदा करना पड़ा। एक को सांप ने काट खाया दूसरे को मजबूरी में कसाई को बेचना पड़ा और फिर खुद ही मोहन बैल की जगह खेत जोत रहे हैं। सिन्धु ताई ने हल की मूठ पकड़ रखी है। लेकिन धर्म का फंदा ऐसे सस्ते में थोड़े छोड़ेगा। ‘कसाई को बैल बेचा। महापाप। बहुत भयंकर पाप है गो वध। प्रायश्चित का एक ही उपाय है बैल के गले का फंदा गले में डालकर भिक्षा पात्र लेकर भीख मांगनी पड़ेगी। शुद्धि तक न घर में घुस सकते है न मनुष्ये की बोली बोल सकते हैं।’ स्वामी निरंजन देव गिरी जैसे पंडित सुझाते हैं ये प्रायश्चित। काशी के जो हैं। पूरी दुनिया में काशी के पंडितों का कोई सानी नहीं। शिवाजी महाराज को भी उन्होंने क्षत्रिय बनाया। (पृष्ठ 57)

पुस्तक : फाँस लेखक : संजीव प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

पुस्तक : फाँस
लेखक : संजीव
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

और सीधे-सादे किसान को धर्म और विकास की चक्की के दो पाटों ने किस्सा किवंदती बना दिया । कोई कहता वर्धा बस स्टैंड पर उन्हें देखा कोई सेवा ग्राम में बताता कोई फलाने मंदिर में। बा..बा…करके भीख मांगते।

जाति की जकडऩ, भूख की तड़पन और बराबरी की आकांक्षा ले गई इन्हें बौद्ध धर्म की शरण में। संजीव ने सचमुच घटना की बुनियाद को पकड़ा है। आखिर बाबा साहेब आम्बेडकर और दूसरे लोग पचास के दशक में बोद्ध धर्म की तरफ क्यों गये? पहले आजादी का इंतजार किया और हारकर धर्म छोडऩा पड़ा।

फूल-पत्ती का ऐसा चित्रण और विवरण उसी के बस का है, जो उसमें रमा हो। संजीव के लिए गांव पिकनिक नहीं है और ना ही शहर में सेमीनार का विषय। वे उसकी रगरग समझते हैं।

विकास का अविवेकपूर्ण मॉडल सारे देश के किसानों को तबाही के रास्ते पर धकेल रहा है। विदेशी गाय तो आ गई। तीस-तीस किलो दूध भी देती हैं। लेकिन इस बार तो समस्या और विकराल थी। आखिर इतना दूध देनेवाली गायों को खिलाए क्या? जब अपने पेट के लाले पड़ रहे हों तो इन गायों का साना पानी कैसे हो? दूध बेचने बाजार निकले तो उसके खरीददार नहीं। बस सरकारी दलालों की बन आई। जब ये गाय दी गई थीं तो उन्हें कमीशन मिला और मजबूरी में किसानों को बेचनी पड़ रही हैं तो इन साहूकारों और दलालों के फिर वारे न्यारे। प्रसिद्ध पत्रकार पी.साईंनाथ ने अपने मशहूर रिपोर्ताज में बार-बार इन समस्याओं पर लिखा है। ये विदेशी नस्ल की गाय खुद तो खत्म हुई ही देसी नस्ल की गाय और बछड़े भी क्षेत्र से गायब हो गये। यानि विकास की अंधी दौड़ में खेत भी बंजर और जानवर भी। और अब आत्म्हत्या के बाद मनुष्य भी।

उपन्यास की एक खूबी या सीमा है अपने समय के सभी मौजूदा जीवित चरित्रों की छायाएं। लेकिन मराठा पृष्ठभूमि के नायक,उनके जीवन में डूबे हैं संजीव। पाठकों के लिये भी नये शब्द लुगड़ा यानि कि साड़ी की लांग, नबरा-पति, मुलगा-मुलगी यानि लड़का -लड़की । एक खटकने वाली बात है अंग्रेजी के शब्दों की तरफ झुकाव। मानों बोलचाल की भाषा में इनका प्रचलन हो। एक हिंदी कथाकार के पास जब ग्रामीण बोली भाषा के इतने शब्दु हैं तो क्यों न उनका प्रयोग किया जाये।

सही अर्थों में बहुजनवादी की साहित्य का उम्दा उदाहरण है संजीव का नया उपन्यावस ‘फाँस’।

फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर, 2015 अंक में प्रकाशित

(बहुजन साहित्य से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें ‘फॉरवर्ड प्रेस बुक्स’ की किताब ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ (हिंदी संस्करण) अमेजन से घर बैठे मंगवाएं . http://www.amazon.in/dp/8193258428 किताब का अंग्रेजी संस्करण भी शीघ्र ही उपलब्ध होगा)

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