जाति के आधार पर और ध्रुवीकृत हुआ बिहार

स्थिति में नाटकीय परिवर्तन आया आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत के इस बयान के बाद कि आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। इससे आरक्षण से लाभान्वित होने वाले ओबीसी व दलित वर्गों के मतदाताओं के मन में असुरक्षा व अनिश्चितता का भाव पैदा हो गया

08111-pti11_8_2015_000247bबिहार चुनाव नतीजों को लेकर लंबे समय से चली आ रही अटकलबाजियों पर जदयू-राजद-कांग्रेस के महागठबंधन की शानदार जीत के साथ ही विराम लग गया है। महागठबंधन ने 178 सीटें और 42 प्रतिशत मत पाकर, चुनाव में एकतरफा जीत हासिल की। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की बुरी गत बनी और उसे केवल 58 सीटों और 34 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा। बिहार में मुकाबला द्वि-ध्रुवीय बन गया था। इन दोनों गठबंधनों के बाहर के दलों, जिनमें समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और पप्पू यादव का जन अधिकार मोर्चा शामिल हैं, का पूरी तरह सफाया हो गया। निर्दलीय प्रत्याशियों और अन्य पार्टियों को कुल मिलाकर 23 प्रतिशत मत प्राप्त हुए और वे केवल सात सीटें जीत सकें।

महागठबंधन की चमत्कारिक विजय के पीछे उसकी तीनों पार्टियों का शानदार प्रदर्शन है। राजद ने 101 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 80 ने विजय प्राप्त की। जदयू के इतने ही उम्मीदवारों में से 71 जीते। कांग्रेस 41 चुनाव क्षेत्रों में मैदान में थी, जिनमें से 27 उसने जीत लिए। पिछली विधानसभा में कांग्रेस के केवल चार सदस्य थे और इस दृष्टि से उसकी ताकत में आशातीत बढ़ोत्तरी हुई है। जब यह महागठबंधन बना था, उस समय संदेह व्यक्त किया गया था कि यह प्रयोग सफल नहीं होगा क्योंकि जदयू और राजद के कट्टर समर्थकों को एक-दूसरे के उम्मीदवारों को मत देने के लिए राजी करना मुश्किल होगा। चुनाव नतीजों ने इन सभी संदेहों को झुठला दिया है। गठबंधन के साथी दलों ने सफलतापूर्वक एक-दूसरे को अपने मत हस्तांतरित किए और इसी कारण यह गठबंधन इतनी बड़ी जीत दर्ज करा सका।

एनडीए के धूल चाटने का कारण इस गठबंधन की छोटी पार्टियों का खराब प्रदर्शन तो था ही, भाजपा ने भी इन चुनावों में बुरी तरह मुंह की खाई। भाजपा ने 160 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से वह केवल 53 सीटें जीत सकी और उसे मात्र 24 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। यद्यपि मतों के प्रतिशत के लिहाज से भाजपा सबसे बड़ी अकेली पार्टी के रूप में उभरी है परंतु इसका कारण सिर्फ यह है कि किसी भी अन्य पार्टी की तुलना में, उसने ज्यादा सीटों (160) पर चुनाव लड़ा था। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में उसके मतों में पांच प्रतिशत की कमी आई है। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे, लोकसभा 2014 चुनाव के बाद, चार अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों की तर्ज पर ही आए हैं। यह महत्वपूर्ण है कि सीटों की संख्या की दृष्टि से भाजपा तीसरे स्थान पर खिसक गई है। बिहार विधानसभा में सबसे अधिक सीटें राजद की हैं और दूसरे स्थान पर जदयू है।

भाजपा के गठबंधन साथियों में से लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी), 40 में से सिर्फ दो सीटें जीत सकी। जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा ने 20 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से वह केवल एक सीट पा सकी। इस पार्टी के एकमात्र विजयी उम्मीदवार स्वयं जीतनराम मांझी हैं। उपेन्द्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से मात्र दो पर उसे विजय प्राप्त हुई। एनडीए के गठबंधन साथी न केवल एक-दूसरे को अपने मत हस्तांतरित करने में असफल रहे वरन् ऐसा लगता है कि गठबंधन में दो बड़े दलित नेताओं – रामविलास पासवान और जीतनराम मांझी – के होते हुए भी, एनडीए, दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका।

यह जनादेश स्पष्टत: विकास के पक्ष में जनादेश है – उस विकास के नहीं, जिसका वायदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था, बल्कि नीतीश कुमार की सरकार के दो कार्यकालों में बिहार में हुए विकास के। इस जीत को केवल जातिगत गठजोड़ और चुनावी गणित की जीत नहीं मानी जानी चाहिए। जिन मतदाताओं ने महागठबंधन को केवल जातिगत कारणों से वोट दिया, उनका भी यह दृढ़ विश्वास था कि लालू यादव ने उन्हें आवाज और आत्मसम्मान दिया और अपने पर गर्व करना सिखाया। इन मतदाताओं के शब्दकोष में विकास का कुछ अलग ही अर्थ था।

एनडीए और महागठबंधन दोनो ने अपने चुनाव अभियान की शुरूआत विकास और अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों से की परंतु जल्द ही यह अभियान, जाति और धर्म पर केन्द्रित हो गया। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) द्वारा किए गए मतदान-पश्चात सर्वेक्षण से यह स्पष्ट है कि पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में, इस बार मतदाता जातिगत आधार पर कहीं अधिक ध्रुवीकृत थे। तालिका क्रमांक दो में दिए गए आंकड़ों से यह साफ है कि पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में, 2015 के चुनाव में ऐसे उत्तरदाताओं की संख्या में आठ प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिनका यह कहना था कि उनके लिए विकास से ज्यादा जाति महत्वपूर्ण थी। यह सोच सभी जातियों के मतदाताओं की थी, विशेषकर ऊँची जातियों के।

विभिन्न जाति समूहों ने एक होकर इस या उस गठबंधन को अपना पूरा समर्थन दिया। जहां ऊँची जातियां एनडीए के पक्ष में खड़ी दिखीं वहीं यादवों, मुसलमानों और कुर्मियों ने महागठबंधन का साथ दिया। ऊँची जातियों के 84 प्रतिशत मतदाताओं ने एनडीए को वोट दिया। बिहार में एनडीए के पक्ष में ऊँची जातियों का इतना जबरदस्त ध्रुवीकरण पहले कभी नहीं हुआ था। 68 प्रतिशत यादवों और 71 प्रतिशत कुर्मियों ने महागठबंधन को अपना मत दिया। इन जातियों के केवल नाममात्र के मतदाताओं ने एनडीए का साथ दिया। एनडीए को आशा थी कि उसे निम्न-ओबीसी जातियों का समर्थन मिलेगा परंतु उसकी यह आशा पूरी न हो सकी। अति पिछड़ी जातियों के 43 प्रतिशत मतदाताओं ने एनडीए और 35 प्रतिशत ने महागठबंधन को मत दिया। एनडीए को उम्मीद थी कि दलित नेताओं के उससे जुड़े होने के कारण उसे दलित मतदाताओं का पूरा समर्थन मिलेगा। एनडीए को पासवान मतों का खासा हिस्सा (54 प्रतिशत) तो मिला परंतु महादलित मत, महागठबंधन, एनडीए और अन्य पार्टियों (मुख्यत: बसपा) में बंट गए। जैसी कि अपेक्षा थी, मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से ने महागठबंधन का साथ दिया। मतदाताओं का जातिगत ध्रुवीकरण, राज्य में व्याप्त अंतरजातीय तनावों को प्रतिबिंबित करता है।

मतदाता केवल जातिगत आधार पर विभाजित नहीं थे। वे वर्गीय आधार पर भी बंटे हुए थे (देखें तालिका तीन)। एक ऐसे राज्य में, जहां की दो-तिहाई आबादी (मकान के प्रकार, पारिवारिक आय व परिसंपत्तियों के आधार पर) या तो निर्धन अथवा निम्न मध्यम वर्ग में है, इस वर्गीय ध्रुवीकरण से महागठबंधन को एनडीए की तुलना में कहीं अधिक लाभ हुआ। एनडीए को मुख्यत: मध्यम व उच्च मध्यम वर्ग के मत मिले-उच्च मध्यम वर्ग के 56 प्रतिशत व मध्यम वर्ग के 36 प्रतिशत। महागठबंधन, निम्न मध्यमवर्गीय मतदाताओं के बीच बहुत लोकप्रिय था। उनमें से 46 प्रतिशत ने उसे मत दिया। इस जनादेश से यह साफ हो गया है कि दमित वर्गों की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले सामाजिक दृष्टि से समावेशी एजेन्डे को आम मतदाता, विकास की हवा-हवाई बातों की तुलना में कहीं अधिक तरजीह देते हैं।

पांच सप्ताह लंबे चुनाव अभियान का भी नतीजों पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब चुनाव की घोषणा हुई थी, उस समय एनडीए सबसे आगे था। परंतु जैसे-जैसे अभियान आगे बढ़ता गया, एनडीए पिछड़ता गया। चुनाव अभियान के दौरान हर दिन एनडीए कमजोर होता गया और महागठबंधन की ताकत बढ़ती गई। अभियान के उत्तराद्र्घ में भाजपा ने विकास के वायदे करने बंद कर दिए और व्यक्तिगत हमले करने में जुट गई। यह बिहार के मतदाताओं को नहीं भाया।

modibanner-mainस्थिति में नाटकीय परिवर्तन आया आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत के इस बयान के बाद कि आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। इससे आरक्षण से लाभान्वित होने वाले ओबीसी व दलित वर्गों के मतदाताओं के मन में असुरक्षा व अनिश्चितता का भाव पैदा हो गया। निम्न ओबीसी, जो अभियान की शुरूआत में बंटे हुए नजर आ रहे थे, महागठबंधन के पक्ष में लामबंद हो गए क्योंकि इसने ओबीसी के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन किया। इस प्रकार, चुनाव अभियान के दौरान जहां निम्न ओबीसी और दलित भाजपा से दूर खिसक गए वहीं यादव और कुर्मी, महागठबंधन के पक्ष में मजबूती से आ खड़े हुए। सच यह है कि बिहार में जाति-आधारित आरक्षण की व्यवस्था को जनता का जबरदस्त समर्थन प्राप्त है और यही कारण है कि भागवत के वक्तव्य ने भाजपा की मुश्किलों में बहुत इजाफा कर दिया।

भाजपा के चुनाव अभियान की केन्द्रीकृत प्रवृत्ति की भी एनडीए को भारी कीमत अदा करनी पड़ी। भाजपा ने सिर्फ दो लोकप्रिय चेहरे प्रस्तुत किए-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह। जैसा कि राज्य में चुनाव अभियान के दौरान लगाए गए पोस्टरों और होर्डिगों से साफ था, स्थानीय नेतृत्व को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। नीतीश-लालू ने इसका पूरा लाभ उठाया और ‘बिहारी’ बनाम ‘बाहरी’ को अपने चुनाव अभियान का मुद्दा बना लिया। भाजपा को इस कारण भी नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि उसने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। ऊपर से दालों की कीमतों के आसमान छूने से मतदाताओं का एक तबका नाराज हो गया। चूंकि यह वृद्धि पूरे देश में हुई थी इसलिए उसने इसके लिए राज्य सरकार से अधिक केन्द्र सरकार को दोषी माना और एनडीए को सबक सिखाने की ठान ली।

महागठबंधन की इस जीत से भविष्य में गैर-भाजापाई पार्टियों के बीच गठजोड़ की संभावनाओं के द्वार खुल गए हैं। इसके संकेत हमें उन चार राज्यों में मिल सकते हैं, जहां मई 2016 में चुनाव होने वाले हैं। अपनी दुर्गति के बाद भाजपा निश्चित तौर पर इस मुद्दे पर चिंतन करना चाहेगी कि उसके चुनाव अभियान की रणनीति में क्या कमियां थीं। भाजपा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अगर विपक्ष एक हो जाए तो वह चुनाव कैसे जीते।

 

तालिका 1 – बिहार विधान सभा चुनाव 2015 जाति व समुदाय वार मत प्रतिशत

महागठबंधन एनडीए
ऊँची जातियां 9 84
यादव 68 12
कुर्मी 71 18
कोयरी 31 28
अति पिछड़ी जातियां 35 43
पासवान 19 54
महादलित 25 30
मुसलमान 69 6

सभी आंकड़े प्रतिशत में, स्रोत : सीएसडीएस

 

 तालिका 2 – जाति या विकास – मतदाताओं के लिए क्या अधिक महत्ववपूर्ण था?

2010 2015 मतदान-पश्चात
विकास से जाति अधिक महत्वपूर्ण थी 28 36
जाति से विकास अधिक महत्वपूर्ण था 61 54
कोई राय नहीं 11 10

सभी आंकड़े प्रतिशत में, स्रोत : सीएसडीएस

 

तालिका 3 – राजनैतिक दलों के समर्थकों का वर्गीय विभाजन

महागठबंधन एनडीए महागठबंधन की एनडीए पर बढत
निर्धन 41 29 +12
निम्न मध्यम वर्ग 46 33 +13
मध्यम वर्ग 39 36 +3
उच्च मध्यम वर्ग 36 52 -16

सभी आंकड़े प्रतिशत में, स्रोत : सीएसडीएस

 

सर्वेक्षण प्रविधि

यह विश्लेषण, लोकनीति, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) द्वारा किये गए मतदान-पश्चात सर्वेक्षण पर आधारित है। इस सर्वेक्षण में बिहार के 60 विधानसभा क्षेत्रों के 240 विभिन्न स्थानों के 3,946 उत्तरदाता (अंतिम नमूना) शामिल थे। इन विधानसभा क्षेत्रों का चयन ‘आकार के अनुपात में संभाव्यता’ विधि द्वारा यादृच्छिक रूप से किया गया। इसके बाद, इन सभी क्षेत्रों में यादृच्छिक नमूना विधि द्वारा चार-चार मतदान केंद्र चुने गए।अंत में, सम्बंधित मतदान केंद्र की नवीनतम मतदाता सूची से उत्तरदाताओं का चयन इसी विधि से किया गया। हर चरण के मतदान के पश्चात प्रशिक्षित सर्वेक्षकों ने उत्तरदाताओं से रूबरू होकर लगभग 20-25 मिनट तक विस्तार से प्रश्न पूछे। जो नमूना चुना गया, वह बिहार के जनसांख्यिकीय चरित्र से काफी हद तक मेल खाता था। विश्लेषण के लिए प्रयुक्त आंकड़ों को प्रमुख पार्टियों को मिले वोटों के प्रतिशत के आधार पर भारित किया गया।

मैदानी कार्य का संयोजन पटना विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर राकेश रंजन और पर्यवेक्षण विजय कुमार सिंह (वी.एम. कॉलेज, पावापुरी) ने किया। सर्वेक्षण की रूपरेखा और उसका विश्लेषण सीएसडीएसए दिल्ली में शोधकर्ताओं के एक दल ने सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार के नेतृत्व में किया।

 

About The Author

Reply