दुर्गा, महिषासुर व जाति की राजनीति

हम सबको यह पता है कि मैसूर नगर का नाम महिषासुर पर रखा गया है। एक मित्र ने मेरा ध्यान तैयब मेहता की ‘काली’ श्रंखला की पेंटिंग्स में से एक की ओर आकर्षित किया, जिसमें देवी को महिषासुर के आलिंगन में दिखाया गया है। यह पेंटिंग बहुत बड़ी कीमत पर बिकी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर हालिया हल्ले ने भारतीय पौराणिकता और उसकी व्याख्या से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत किया है। अपनी सरकार की कार्यवाही का बचाव करते हुए केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि जेएनयू, राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का अड्डा बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जेएनयू के दलित व ओबीसी विद्यार्थियों के कुछ समूह, ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन कर रहे हैं और आरोप लगाया कि इन विद्यार्थियों ने एक पर्चा जारी किया था, जिसमें देवी दुर्गा के बारे में कई अपमानजनक बातें कही गईं थीं। कई लोग देवी दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा करते हैं।

महिषासुर-जिसे आमतौर पर राक्षस बताया जाता है-के वध की कई अलग-अलग व्याख्याएं की जाती रही हैं। इस मुद्दे के चर्चा में आने के कुछ वर्ष पहले, देवी दुर्गा के संबंध में एक अन्य विवाद भी खड़ा हुआ था। संसद में एक सदस्य ने इस बात पर आपत्ति प्रगट की कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की एक पुस्तक में कहा गया है कि देवी दुर्गा मदिरा का सेवन करती थीं। उत्तर में तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ‘‘चंडीपाठ’’ के एक श्लोक को उद्धृत किया, जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह ‘‘देवी ने युद्ध के बीच में एक बार, और फिर, और फिर मदिरा का सेवन किया और किस प्रकार उनके नेत्र रक्तमय हो गए-उदित होते सूर्य की किरणों की तरह’’।

‘‘फारवर्ड प्रेस’’ पत्रिका के अक्टूबर 2014 अंक में महिषासुर-दुर्गा कथा की बहुजन व्याख्या के संबंध में कई लेख प्रकाशित किए गए। पुलिस ने इस अंक की प्रतियां ज़ब्त कर ली थीं क्योंकि किसी व्यक्ति ने यह शिकायत की थी कि पत्रिका में प्रकाषित लेख, ब्राह्मणों और ओबीसी के बीच शत्रुता उत्पन्न करने वाले हैं। यह मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। आज जिस स्वरूप में दुर्गा पूजा मनायी जाती है, उसकी शुरूआत महज 260 साल पहले, 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद लार्ड क्लाइव के सम्मान में कलकत्ता के नवाब कृष्णदेव ने की थी। इस प्रकार, यह त्योहार न सिर्फ नया है बल्कि इसके उत्स में मुसलमानों का विरोध और साम्राज्यवाद-परस्ती भी छुपी हुई है।

JNU-Mahishasur-Day_2013_Udit-Raj-e1457368173150यद्यपि कई समुदाय लंबे समय से महिषासुर की अभ्यर्थना करते आए हैं परंतु महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन कुछ ही वर्ष पहले शुरू हुआ। सन 2011 में विद्यार्थियों के एक समूह ने जेएनयू में इसका आयोजन किया। बाद में, उदित राज-जो अब भाजपा सांसद हैं-ने भी ऐसे ही एक कार्यक्रम में शिरकत की। हमें अब यह पता चल रहा है कि देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर बंगाल, में कई आदिवासी समुदाय, सदियों से महिषासुर को पूजते आए हैं। पिछले वर्ष महिषासुर के सम्मान में लगभग 300 कार्यक्रम देशभर में आयोजित हुए। ‘‘फारवर्ड प्रेस’’ व अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित अपने लेखों में कई बहुजन अध्येताओं ने यह तर्क दिया कि महिषासुर वध को त्योहार के रूप में मनाया जाना दो कारणों से अनुचित है: पहला, यह मृत्यु का जश्न मनाना है और दूसरा, यह महिषासुर के चरित्र की ब्राह्मणवादी व्याख्या को स्वीकार करना है। ब्राह्मणवादी व्याख्या के अनुसार, महिषासुर एक असुर था जबकि अन्यों का कहना है कि वह आदिवासियों का राजा था।

पौराणिक ग्रंथों की व्याख्या आसान नहीं है। इनमें वर्णित घटनाओं को इतिहासविद सत्य की कसौटी पर नहीं कस सकते क्योंकि ये घटनाएं प्रागऐतिहासिक काल में हुई थीं। अधिकतर लोग यह मानते हैं कि देवी ने राक्षस का वध किया था और इसलिए इस दिन को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है। इस कथा के अनुसार, चूंकि दानव को हराना आसान नहीं था इसलिए ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अपनी संपूर्ण शक्तियों का प्रयोग कर आलौकिक शक्तियों से लैस दुर्गा का सृजन किया। इस कथा में यह भी बताया गया है कि दानवराज आधा मनुष्य और आधा भैंसा था।

ईरानी ने जिस तथाकथित पर्चे को संसद में पढ़ा, उसके अनुसार, दुर्गा एक वैश्या थी जिसे महिषासुर का वध करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उसने नौ रातों तक महिषासुर के साथ प्रणयक्रीड़ा की और फिर, जब वह सो रहा था, तब उसे मार डाला। हम सबको यह पता है कि मैसूर नगर का नाम महिषासुर पर रखा गया है। एक मित्र ने मेरा ध्यान तैयब मेहता की ‘काली’ श्रंखला की पेंटिंग्स में से एक की ओर आकर्षित किया, जिसमें देवी को महिषासुर के आलिंगन में दिखाया गया है। यह पेंटिंग बहुत बड़ी कीमत पर बिकी।

देवी दुर्गा का वर्णन सबसे पहले मार्कण्डेय पुराण में मिलता है, जिसका काल 250 से 500 ईस्वी बताया जाता है। यह सही है कि आमजन इस त्योहार को उसी रूप में मनाते हैं, जैसा कि ईरानी ने बताया। परंतु यह, इस कथा का ब्राह्मणवादी व वर्चस्ववादी संस्करण है। यह बात कम ही लोग जानते हैं कि कई समुदाय, इसी दिन को महिषासुर दिवस के रूप में भी मनाते हैं। यह तथ्य तथाकथित मुख्यधारा का भाग हाल में तब बना जब जेएनयू में यह दिवस मनाया गया और ‘‘फारवर्ड प्रेस’’ पत्रिका ने इस विषय पर काफी कुछ लिखा। यहां मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि वर्चस्वशाली विमर्श हमेशा वर्चस्वशाली जातियों/वर्गों द्वारा निर्मित व प्रायोजित होता है।

लोकमान्यता यही है कि यह अच्छाई और बुराई, ईश्वर और असुरों के बीच संघर्ष था। इस त्योहार की यह व्याख्या आर्यों के भारत में आगमन को एक शुभ घटना बताती है। एक अन्य व्याख्या जोतिराव फुले ने प्रस्तुत की थी। उन्होंने ब्राह्मणवादी व्याख्या के ठीक उलट यह कहा कि आर्यभट्ट ब्राह्मणों ने भारत पर आक्रमण कर और मूल निवासी आदिवासियों को छल-बल से पराजित किया। यह व्याख्या उस सामाजिक परिवर्तन के साथ उभरी, जिसका आगाज़ पददलित वर्गों द्वारा अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष शुरू करने से हुआ। इसी तरह, राम-रावण की कथा की भी पुनर्व्याख्या की जा रही है। कई लोगों को यह आश्चर्यजनक लग सकता है परंतु यह सच है कि कई समुदाय रावण को पूज्यनीय मानते हैं। वे यह मानते हैं कि वह एक परमज्ञानी व महान व्यक्ति था।

जहां हिंदुत्व की राजनीति, भगवान राम पर केंद्रित है वहीं राम की अंबेडकर व पेरियार दोनों ने कटु आलोचना की है। अंबेडकर, राम को लोकप्रिय राजा बाली की पीछे से तीर मारकर हत्या करने को अनैतिक बताते हैं। बाली के शासन में गैर-ब्राह्मणजन प्रसन्न और समृद्ध थे और राजा बाली को आज भी पूजा जाता है। भगवान राम द्वारा शंबूक की केवल इसलिए हत्या की जाना क्योंकि वह तपस्या कर रहा था जो शूद्रों के लिए निषेध थी, भी समाज पर अपना वर्चस्व कायम रखने के ब्राह्मणवादी अभियान का हिस्सा है। राम द्वारा अपनी गर्भवती पत्नी सीता को घर से निकालना किसी भी तरह से क्षम्य नहीं है। इस प्रकार, राम-रावण की कहानी के जातिगत, नस्लीय व लैंगिक आयाम भी हैं।

यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि अब यह माना जाता है कि आर्य न तो यहां आए और ना ही उन्होंने भारत पर आक्रमण किया बल्कि आज के भारत के निवासियों के पूर्वज, विभिन्न नस्लों की लंबी अवधि में घुलनेमिलने से अस्तित्व में आए। देवी दुर्गा की कथा का भी एक लैंगिक पहलू है। मृणाल पांडे ने ‘‘स्क्राल’’ में प्रकाशित अपने एक लेख में इसे पितृसत्तात्मकता को महिलाओं द्वारा दी गई चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया है। इस तरह, इस कथा से नस्ल, जाति और लिंग के मुद्दे जुड़े हुए हैं। हमारे जैसे विविधताओं से भरे समाज में अलग-अलग तरह की कथाओं का होना स्वाभाविक है और इनमें से किसी को भी कुचलने या दबाने का प्रयास अनुचित होगा।

ईरानी-भाजपा-आरएसएस, सबाल्टर्न कथाओं के उभार को समाज पर ऊँची जातियों/उच्च वर्ग का वर्चस्व स्थापित करने के अपने अभियान के लिए खतरा मानते हैं। बहुवाद उन्हें पसंद नहीं है और यही कारण है कि ईरानी ने संसद में दुर्गा-महिषासुर कथा की एक भिन्न व्याख्या को राष्ट्र-विरोधी और अवांछनीय बताया।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(महिषासुर आंदोलन से संबंधित विस्‍तृत जानकारी के लिए पढ़ें ‘फॉरवर्ड प्रेस बुक्स’ की किताब ‘महिषासुर: एक जननायक’ (हिन्दी)। घर बैठे मंगवाएं : http://www.amazon.in/dp/819325841X किताब का अंग्रेजी संस्करण भी शीघ्र उपलब्ध होगा )

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