फारवर्ड विचार, मई 2016

यह आवश्यक है कि विद्वतजन बहुजन साहित्य पर शोध करें, उसके गुम हो चुके पन्नों को खोद निकालें, उन्हें सूचीबद्ध कर उनका आलोचनात्मक आंकलन करें और बहुजन समाज की प्रमुख शाखाओं के साहित्य की समानताओं और भिन्नताओं का ठोस अध्ययन करें।

सात को समापन का अंक माना जाता है। बाईबिल के अनुसार, सृष्टि निर्माण के छठवें दिन, मानव का सृजन करने के पश्चात, ईश्वर ने ‘विश्राम’ किया। ऐसा नहीं था कि ईश्वर को विश्राम की आवश्यकता थी वरन उसने इसलिए ऐसा किया ताकि वह हमें यह सीख दे सके कि छह दिन मेहनत करने के बाद, हमें भी अपने शरीर और दिमाग को आराम देना चाहिए। शायद इसीलिये, ‘सब्बाथ’ (साप्ताहिक विश्राम) की यहूदी अवधारणा को पूरे विश्व ने अपना लिया है। परन्तु फारवर्ड प्रेस में हमें यह स्वीकार करने में कोई गुरेज़ नहीं है कि हम छह साल की मेहनत के बाद आराम नहीं कर रहे हैं। बल्कि पत्रिका की सातवीं वर्षगांठ पर हमारी सम्पादकीय टीम कुछ ज्यादा ही व्यस्त है। हमने अपना पिछले साल का वायदा निभाया है। एफपी की वेबसाइट सुचारू रूप से चल रही है और 1 जून, 2016 से यह स्वतंत्र रूप से कार्य करने लगेगी। और जैसा कि हमने द्वितीय बहुजन साहित्य वार्षिकी के सम्पादकीय में वादा किया था, जल्दी ही हम बहुजन साहित्य और अन्य विषयों पर एफपी बुक्स का प्रकाशन शुरू करेंगे।

यह पांचवीं बहुजन साहित्य वार्षिकी, एफपी की सातवीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित हो रही है। यह हमारे लिए खट्टी-मीठी वर्षगांठ है क्योंकि, जैसा कि आप जानते हैं, हमारा जून अंक, एफपी का अंतिम मुद्रित अंक होगा। यदि कोई बच्चा सात साल का होने के बाद काल के गाल में समा जाये, तो उसका दु:ख, बच्चे की पहले मृत्यु हो जाने से कहीं अधिक होता है। कारण यह कि सात वर्ष का होने तक उसका चरित्र आकार ले चुका होता है और हम उसके प्रेम के मज़बूत बंधन में बंध चुके होते हैं। ऐसे मौकों पर भावुक हो जाना स्वाभाविक है परन्तु हम इस तथ्य को कैसे भुला सकते हैं कि भारत में किसी दलितबहुजन पत्रिका का सात साल तक जिंदा रहना अत्यंत गर्व का विषय है। इस परिवर्तन को देखने का एक बेहतर तरीका यह है कि हम सीमित पहुँच वाले मासिक प्रकाशन को पीछे छोड़कर, असीमित पहुँच वाले दैनिक इन्टरनेट अवतार के रूप में पुनर्जन्म ले रहे हैं। और मुद्रित पुस्तकों के रूप में, हमारी ठोस उपस्थिति तो बनी रहेगी ही।

एफपी के मुद्रित संस्करण का उपांत्य और बहुजन साहित्य वार्षिकी का अंतिम सम्पादकीय लिखते हुए, मुझे यह अहसास है कि यह एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस लेख को लिखने से पहले मैंने पिछली चार बहुजन साहित्य वार्षिकियों के अपने सम्पादकीय कई बार पढ़े। इनमें से कुछ में मैंने भी साहित्यिक आलोचना में अपने हाथ आजमाए थे और एक में तो अपनी एक कविता भी लिख डाली थी। इससे मुझे यह अहसास हुआ कि पत्रकार से पहले (और मैं चालीस साल से पत्रकार हूँ) और उससे कहीं ज्यादा मैं साहित्यिक लेखक हूँ।

इस वार्षिकी के संपादक प्रमोद रंजन और मैं शुरू से ही इस मत के हैं कि पत्रकारिता की तुलना में, साहित्यिक लेखन का प्रभाव अधिक गहरा और लम्बा होता है। इसलिए, एफपी चाहे जो अवतार ले, हम बहुजन साहित्य पर विमर्श जारी रखेंगे। परन्तु बहस करने में सिद्धहस्त भारतीयों के लिए भी, केवल विमर्श और विचार-विनिमय काफी नहीं हैं। यह आवश्यक है कि विद्वतजन बहुजन साहित्य पर शोध करें, उसके गुम हो चुके पन्नों को खोद निकालें, उन्हें सूचीबद्ध कर उनका आलोचनात्मक आंकलन करें और बहुजन समाज की प्रमुख शाखाओं के साहित्य की समानताओं और भिन्नताओं का ठोस अध्ययन करें।

जैसा कि मैंने अपने एक पुराने सम्पादकीय में भी लिखा था, हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद होना आवश्यक है ताकि वह अखिल भारत और अखिल विश्व के पाठकों तक पहुँच सके। इस सन्दर्भ में एफपी ने एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है। हम हमारे असीमित इन्टरनेट संस्करण और पुस्तकों के जरिये इस प्रयास को आगे ले जाएंगे। आईये हम www.ForwardPress.in पर और ज्यादा मिलें और खूब बातें करें।

(फारवर्ड प्रेस के मई 2016 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

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