नामवरजी के दलित कबीर

‘दलित-आलोचना’ के द्वारा बनाए गए इस नए माहौल में नामवरजी कबीर और प्रेमचंद को जोड़कर हिन्दी आलोचना के एक नए स्टैण्ड को मजबूती प्रदान करने का प्रयास करते हैं। अब तक कबीर की क्रांतिकारिता, रहस्यवाद, सामाजिक दृष्टि आदि पर विचार हो चुका था, तब नामवरजी कबीर का एक नया पक्ष लेकर आए- ‘कबीर का दुख’

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कबीर

नामवर सिंह ने डाॅ. धर्मवीर के कबीर-संबंधी लेखन को महत्वपूर्ण माना है , ‘‘निश्चित रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण काम डाॅ. धर्मवीर ने किया है। डाॅ. धर्मवीर ने अपने पूर्ववर्ती लेखकों की सीमाएँ दिखाई हैं। जिन पर लोगों का ध्यान नहीं गया था। मेरा भी नहीं गया था।’’ (1) नामवरजी इसी साक्षात्कार में डाॅ. धर्मवीर की कबीर-संबंधी आलोचना को ‘दलित आलोचना’ मानते हैं तथा इस दृष्टि की प्रशंसा करते हैं। यहाँ केवल इस बात पर विचार किया जा रहा है कि मार्क्सवादी आलोचना के प्रमुख आलोचक नामवरजी के कबीर-संबंधी लेखन से कबीर के दलित-पक्ष पर कैसी रौशनी पड़ती है। कबीर का जन्म जुलाहा परिवार में हुआ था- यह सभी स्रोतों से प्रमाणित तथ्य है। अतः कबीर को दलित बताना सरासर गलत बात है। हजारी प्रसाद द्विवेदी से कबीर को दलित और अस्पृश्य बताने की परम्परा की शुरुआत हुई, जिसे मार्क्सवादी आलोचना में कभी मौन, कभी मुखरित तो कभी अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त होता रहा। कबीर को सर्वांशतः दलित घोषित करने का काम डाॅ. धर्मवीर की पुस्तकों ने पूरा किया। यहाँ विचारणीय विषय यह है कि कबीर को ‘दलित’ बताने में नामवरजी के लेखन की भूमिका किस प्रकार की रही है।
मार्क्सवादी आलोचना प्रत्यक्षतः जाति पर विचार करने से भले कतराती रही, पर यह ध्वनि जरूर उत्पन्न करती रही कि निर्गुण संत दलित समाज से थे। कबीर और रैदास को एक साथ दलित बताया गया। रैदास का दलित होना स्पष्ट है, परंतु कबीर को दलित बताने में भूल हुई है। ‘दलित आलोचना’ ने कबीर को लेकर जो किया सो किया,  मार्क्सवादी आलोचना ने भी कबीर को दलित बताने तथा इसी कारण से क्रांतिकारी बताने की लगातार कोशिश की।

नामवरजी लिखते हैं, ‘‘कबीर की विद्रोही भावना स्वयं उनकी सामाजिक स्थिति की स्वाभाविक उपज थी”। (2) और अपने कथन के समर्थन में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को वे उद्धृत करते हैं, ‘‘वे दरिद्र और दलित थे’’ (3) मार्क्सवादी आलोचना की भाषा में भक्ति आंदोलन की व्याख्या करते हुए जब ‘सामाजिक स्थिति’, ‘नीची जाति’, ‘निम्न जाति’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है तब अभिप्राय यही रहता है कि ये लोग दलित वर्ग या अछूत वर्ग से थे। मार्क्सवादी आलोचना अस्पृश्यता या जातिवाद पर सीधी बहस भले न करती हो, परंतु ‘सामाजिक स्थिति’ के स्तरीकरण पर उसकी गहरी दृष्टि बनी रही है। सामाजिक यथार्थ पर सर्वाधिक ज़ोर देनेवाली मार्क्सवादी आलोचना भिन्न शब्दावली में कबीर को दलित वर्ग से जोड़ती रही। द्विवेदी जी के ‘फक्कड़’ और ‘अक्खड़’ को कबीर के संदर्भ में व्याख्यायित करने के क्रम में नामवरजी अपने गुरु के व्यक्तित्व और कृतित्व से इन दोनों शब्दों को जोड़ते हैं तथा अंत में समाजिक यथार्थ का बयान देतीं उनकी ये पंक्तियाँ, ‘‘क्या यह आकस्मिक है कि ‘अनामदास का पोथा’ के ये दोनों फक्कड़ और अक्खड़ साधु छोटी जातियों से सम्बद्ध हैं और धर्म-कर्म में ब्राह्मण विरोधी हैं।’’ (4) ‘छोटी जातियों’ से नामवरजी का अभिप्राय किन जातियों से है! ज़ाहिर-सी बात है कि प्रतिरोध का स्वर जितना नीचे से उठे, क्रांति की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है!! यह इशारा ‘बिलाशक’ दलितों की तरफ है। इसी लेख में आगे जाकर नामवरजी का यह इशारा स्पष्टता में बदलता है, ‘‘चूँकि यह जाति-व्यवस्था धार्मिक विधि-विधानों के रूप में ही समाज का नियमन करती रही है, इसलिए दलित जातियों का असन्तोष और आक्रोश भी प्रायः धर्म के ही रूप में प्रकट होता रहा है।’’ (5) अब आया ‘दलित’ शब्द। कबीर पर लिखे गए इस लेख में ‘दलित जातियों’ के ‘असन्तोष और आक्रोश’ को कबीर से जोड़कर ही बताया जा रहा है। पूरे लेख की ध्वनि यही है कि कबीर दलित थे। नामवरजी का यह लेख 1982 का है और कबीर की क्रांतिकारिता को सामने लाना लेखक का लक्ष्य है। इस क्रांतिकारिता के दो जरूरी पक्ष हैं- एक यह कि कबीर ने ‘सामंती-पुरोहिती दमन के चक्र’ के खि़लाफ़ आवाज़ उठाई और दूसरा यह कि वे स्वयं दलित थे।

नामवरजी ‘कबीर का दुख’ लिखते हैं। ‘अस्वीकार का साहस’ रखनेवाले ‘कबीर का दुख’ कैसा था, इसकी पड़ताल नामवरजी ‘दलित आलोचना’ के माहौल में करते हुए मानो हिंदी आलोचना के कबीर-संबंधी अवाक् को वाणी देते हैं। ‘दलित आलोचना’ तब तक प्रेमचन्द के प्रति ‘अस्वीकार का साहस’ दिखा चुकी थी और कबीर के प्रति अतिरिक्त ‘स्वीकार का साहस’। कमाल की बात यह है कि प्रेमचंद ने दलितों के बारे में बहुत लिखा और कबीर ने दलितों के बारे में कुछ नहीं लिखा; फिर भी ’दलित आलोचना’ ने प्रेमचंद को अस्वीकारा और कबीर को अपना ‘धर्मगुरु’ बताया। इसके पीछे बस एक ही तर्क दिया गया कि प्रेमचंद दलित नहीं थे और कबीर दलित थे!! कबीर ने दलितों के बारे में कुछ नहीं लिखा-ऐसा कहना बिल्कुल उचित है।

godan-e1466016039253-201x300कबीर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के विरूद्ध कविताएँ रचते हैं। इस तरह की कविताओं में वर्ण-धर्म और जातिवाद का विरोध है। वे जातिवाद की अवधारणा का विरोध करते हैं। जाति के आधार पर ऊँच-नीच का वे विरोध करते हैं। परंतु वे कहीं भी दलित जातियों ‘दलित-आलोचना’ के द्वारा बनाए गए इस नए माहौल में नामवरजी कबीर और प्रेमचंद को जोड़कर हिन्दी आलोचना के एक नए स्टैण्ड को मजबूती प्रदान करने का प्रयास करते हैं। अब तक कबीर की क्रांतिकारिता, रहस्यवाद, सामाजिक दृष्टि आदि पर विचार हो चुका था, तब नामवरजी कबीर का एक नया पक्ष लेकर आए- ‘कबीर का दुख’। कबीर के दुख पर अब तक विचार नहीं हुआ था। हिन्दी आलोचना में कबीर को स्थापित करने में काफी ताकत ख़र्च हो चुकी थी। ‘दलित आलोचना’ ने कबीर की ऐसी संशोधित स्थापना की कि हिंदी आलोचना कबीर के पुराने मुद्दों पर लौटने का साहस न कर सकी। नामवरजी कबीर के ‘दुख’ की तरफ गए और डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर के प्रेम की तरफ। हिंदी आलोचना ने कबीर के उन पक्षों पर विचार करने का मन बनाया जो जब तक ‘अकथ’ रह गया था, जैसे कबीर का दुख, कबीर का प्रेम- ‘अकथ कहानी प्रेम की’।

नामवरजी कबीर को प्रेमचन्द के दलित पात्रों के माध्यम से समझने का नया रास्ता निकालते हैं, ‘‘कबीर के दुख से मेरा ‘परिचय’ हुआ प्रेमचन्द की कहानी ‘क़फ़न’ में। परिचय कराया घीसू और माधव ने। इन दोनों के परिचय के लिए फिलहाल इतना ही काफी है कि वे जाति के चमार हैं, जिन्हें अब ‘दलित’ कहा जाता है।’’ (6) कबीर से प्रेमचन्द के दलित पात्रों को जोड़कर देखना और बताना कि यह नया ‘परिचय’ है। नामवरजी कबीर के एक नए रूप को इस लेख में प्रस्तुत करना चाहते हैं। पुनः लिखते हैं, ‘‘घीसू और माधव अपना कबीर गा रहे हैं, अपना कबीर नाच रहे हैं और लगता है कि उन्हीं के साथ स्वयं कबीर भी नाच रहे हैं और गा रहे हैं।’’ (7) ‘अपना कबीर’ का क्या अर्थ निकाला जाए? तब के माहौल तथा इस लेख में नामवरजी के भावबोध को ध्यान में रखा जाए तो यही अर्थ निकलेगा कि घीसू और माधव को दलित होने के कारण कबीर ‘अपना’ लगते हैं। नामवरजी पुष्टि भी करते हैं, ‘‘कबीर के दुख का एक निश्चित सामाजिक आधार है’’ (8) यह ‘सामाजिक आधार’ दलित समाज से जुड़ा है। और लेख के अंत में पूरे दलित समाज को कबीर से जोड़ने का आलोचकीय कौशल देखा जा सकता है, ‘‘कल के ही नहीं, आज के भी करोड़ों घीसू-माधव कबीर के ‘निरगुन’ के ठोस आधार हैं और निरगुन को अपना भरोसेमंद आधार समझते हैं। इस सुनिश्चित सामाजिक आधार के बावजूद कबीर इससे संतुष्ट प्रतीत नहीं होते।’’ (9) नामवरजी ‘दलित आलोचना’ की स्थापनाओं को स्वीकृति देते हैं कि कबीर की कविता का सामाजिक आधार दलित समाज है। परंतु हिन्दी आलोचना के लिए संभावना खोलते हैं कि कबीर इस दलित समाज के आधार से ‘संतुष्ट प्रतीत नहीं होते’। इसलिए कबीर की ऐसी पुनव्र्याख्या की जरूरत है जो उन्हें दलित-आलोचना को अतिक्रमित कर पूरे समाज का कवि बना सके।

नामवरज़ी के इस प्रयास के बावजूद यह लेख यही बताता है कि कबीर दलित थे। एक जुलाहे को दलित बनाने की यह सामाजशास्त्रीय दृष्टि लाजवाब है! इसी पुस्तक का अगला लेख है ‘कबीर का सच’। यह कबीर के ‘व्यक्तित्व-विश्लेषण’ का एक नया पक्ष है। नामवरजी ने ढूँढ़कर बताया कि कबीर ‘अनल पक्षी’ हैं। कबीर के बारे में नई बात कहने की प्रबल इच्छा-शक्ति के कारण नामवरजी लिख बैठते हैं, ‘‘पैदा हुए मुसलमान लेकिन जुलाहे के घर में। इसलिए मुसलमान होकर भी दलित।’’ (10) फिर वही लाजवाब समाजशास्त्रीय दृष्टि! आज एक भी मुलसलमान व्यक्ति दलित नहीं है और एक भी दलित व्यक्ति मुसलमान नहीं है। मगर दलित ‘अनहद’ का ऐसा कमाल कि ‘अजपा जाप’ ज़ारी है।

नई सदी में उन्होंने ‘कबीर को भगवा?’ लिखाए जिसमें ‘दलित’ शब्द का स्थानापन्न बनकर आया ‘शूद्र’ शब्द, ‘‘…. वे जन्म से जुलाहे हैं? समाज में जुलाहे की स्थिति वही है, जो स्त्री की। चाहे इस्लाम हो, चाहे हिन्दू धर्म दोनों ही जगह स्त्री और शूद्र की दशा एक-सी है।’’
(11) नामवरजी ‘शूद्र’ शब्द को ‘दलित’ का स्थानापन्न बना रहे हैं जो गलत है। डाॅ. अम्बेडकर बहुत पहले बता चुके थे कि आज के दलित प्राचीनकाल के शूद्र नहीं हैं। नई सदी में ही नामवरजी ने लिखा ‘कबीर को अगवा?’। इस लेख में उन्होंने कबीर को ‘मुसलमान जुलाहा’ बताया, ‘‘इसलिए इस पद का वक्ता निर्विवाद रूप से स्वयं कबीर हैं, जो स्वयं मुसलमान जुलाहे हैं और अपने आपको मुसलमान जुलाहा मानते हैं।’’ (12) इस लेख में कबीर को उन्होंने न तो दलित बताया और न नही शूद्र! इसमें बताया ‘मुसलमान जुलाहा’। इस तरह, नामवरजी की समाजशास्त्रीय दृष्टि कबीर को ‘छोटी जाति’ से शुरू करके दलित और शूद्र के रास्ते मुसलमान जुलाहा तक पहुँचाती है। कबीर पर नामवरजी के विचारों को कालक्रम से रखने का उद्देश्य यह है कि कबीर को दलित बताए जान में मार्क्सवादी आलोचना के एक प्रमुख आलोचक की भूमिका पर प्रकाश डाला जा सके।

नामवर सिंह

नामवरजी के द्वारा कबीर की जो आलोचना की गई थी, उससे डाॅ. धर्मवीर को निश्चित रूप संबल मिला होगा- ऐसा कहना विवाद की संभावनाओं से युक्त होगा। परंतु डाॅ. धर्मवीर को असली ताकत इसी बात से मिली कि कबीर को सबने दलित माना था। अब जब कबीर दलित हो ही गए तो उनपर एकाधिकार दलितकुलोत्पन्न विद्वानों का ही होगा! कबीर को दलित बनाने में द्विवेदीजी और डाॅ. नामवर सिंह का बड़ा हाथ है। मुक्तिबोध, मैनेजर पांडेय और शिवकुमार मिश्र ने सीधे-सीधे कबीर को दलित तो नहीं बताया, परंतु उनके लेखन में पूरी ध्वनि मौजूद है जो कबीर को दलित बनाने में सहयोग प्रदान करती है। रैदास, धन्ना, सेना, पीपा की गिनती में कबीर सबसे पहले गिने जाते रहे और आचार्य शुक्ल से लेकर डाॅ. पांडेय ने यही कहा कि ये संत निचली जातियों से थे।

आचार्य शुक्ल, आचार्य द्विवेदी, मुक्तिबोध, नामवरजी, पांडेयजी और मिश्रजी को अच्छी तरह पता है कि हमारा समाज केवल ऊँची और नीची जातियों से नहीं बना है। ऊँची जातियों की स्थिति तो स्पष्ट है। नीची कही जानेवाली जातियों में कुछ जातियाँ सदियों से ‘अस्पृश्य’ मानी गयी हैं तथा असंख्य जातियाँ ऐसी हैं जो सामाजिक रूप से पिछड़ी हैं। ये पिछड़ी जातियाँ ‘अस्पृश्य’ नहीं हैं। ‘अस्पृश्य’ कही जानेवाली जातियों से दलित समाज बना है तथा इन्हीं जातियों का वैचारिक उभार दलित-विमर्श है। पिछड़ी जातियो की संख्या इस देश की आधी आबादी से ज़्यादा है। पिछड़ी जातियों में हिंदू भी हैं और मुसलमान भी हैं। जुलाहा जाति हमेशा से मुसलमान रही है। कबीर अपने को मुसलमान मानते थे या नहीं- यह बहस अलग कारणों से उचित है। परंतु कबीर का जन्म जुलाहा जाति में हुआ था, यह तो हर तरह से प्रमाणित तथ्य है। जुलाहा जाति एक पिछड़ी जाति है। सैय्यद, पठान, शेख की तरह यह ऊँची जाति नहीं हैै। भारत के मुसलमानों में जुलाहा जाति संभवतः सर्वाधिक आबादी वाली जाति है। कबीर इसी आबादी में जन्मे कवि थे। आलोचकों की भूल ने कबीर को ‘स्पृश्य’ से ‘अस्पृश्य’ बनाया। ‘अस्पृश्य’ बन जाने के बाद कबीर का ‘दलित’ बनना स्वाभाविक था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने इतिहास में रचनाकारों की जाति का यथासंभव उल्लेख करते चलते हैं। उनकी इस शैली के प्रति भले ही असहमति प्रकट की जाए, परंतु हिन्दी साहित्य के वातावरण की निर्मिति में जाति-भेद एक महत्त्वपूर्ण आधार हमेशा रहा है। इस जाति-भेद की बनावट में एक रोचक तथ्य यह है कि प्रमुख कवियों की जाति या तो ऊँची रही है या नीची। कबीर इसी बनावट के शिकार हुए। विधवा ब्राह्मणी का रक्त कबीर के व्यक्तित्व से पानी बनकर बह गया, क्योंकि उनकी कविता ब्राह्मणी या ब्राह्मण के पक्ष में बैठ ही नहीं पाती थी। कबीर को ब्राह्मण नहीं बनाया जा सका, इसलिए नीची जाति में स्वतः जगह दे दी गयी। मगर कबीर न तो ऊँची जाति के थे और न ही तथाकथित नीची जाति के। वे पिछड़ी जाति के थे, बहुसंख्यक आबादी के समृद्ध कवि। आबादी की दृष्टि से एक ताकतवर समाज के कवि थे कबीर। अत्यंत कम आबादी वाले दलित समाज से उनका जन्म का रिश्ता नहीं था।

कबीर की कविता का फ़लक विशाल है। उनकी कविता का विश्लेषण न ब्राह्मणी दृष्टि से संभव है, न दलित-दृष्टि से। कबीर की कविता को पसंद करने वाले पाठक सभी जातियों के लोग हैं। कबीर ने ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के विरूद्ध कविताएँ इसलिए नहीं लिखी थीं कि वे कविताएँ दलित-समाज की अभिव्यक्ति समझ ली जाएँ। दलित आलोचना कबीर से प्रेरणा प्राप्त करती है तो यह अच्छी बात है। कबीर की कविता मुक्तिकामी तो है ही। मगर कबीर की कविता वर्चस्वकामी नहीं है। कबीर की मुक्तिकामी कविता को दलित-आलोचना वर्चस्वकामी बनाने का प्रयास करती रही है। कबीर को ‘दलित’ शब्द से मुक्त करके भी दलित-आलोचना अपने लिए उनमें प्रकाश की तलाश कर सकती है। यह अलग बात है कि ‘दलित’ शब्द से कबीर के मुक्त होने के बाद दलित-आलोचना की उनमें कितनी और किस प्रकार की रुचि रह जाती है?

संदर्भ
1. सम्मुख- नामवर सिंह, सं.- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 188
2. दूसरी परंपरा की खोज- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1994, पृ. 44
3. वही, पृ. 44
4. वही, पृ. 53
5. वही, पृ. 56
6. कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, मार्च 2011, पृ. 35
7. वही, पृ. 35
8. वही, पृ. 39
9. वही, पृ.42
10. वही, पृ. 49
11. वहीं, पृ. 53
12. वहीं, पृ. 59


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