शोध दृष्टि और ओबीसी

पिछड़ी जातियों के प्रसंग हिन्दी साहित्य में मौजूद हैं, मगर हिन्दी आलोचना से अनुपस्थित। यदि सामाजिक विज्ञान के सिद्धांतकार इस पक्ष पर कोई सिद्धांत लेकर आते तो संभव है हिन्दी में शोध-कार्यों की भरमार लग जाती

reading_roomहिन्दी साहित्य में शोध की अनेक परंपरागत संभावनाओं के साथ-साथ बदलते परिवेश में नए क्षेत्रों से जुडऩे के भी विकल्प उपलब्ध हो गए हैं। पिछले कुछ दशकों में सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों को साहित्य से जोड़कर अन्तर अनुशासनात्मक शोध-प्रसंगों को खोजा गया है। इससे साहित्य की समझ का विस्तार हुआ है तथा साहित्य लेखन के नए अवसरों का विकास हुआ है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘जनता की चित्तवृत्ति’ और ‘साहित्य परंपरा’ के बीच सामंजस्य दिखाने को ‘साहित्य का इतिहास’ बताया था। साहित्य की भाषिक बनावट को स्वायत्त संसार न मानते हुए हिन्दी आलोचना का झुकाव सामाजिक अध्ययनों से जुड़ता गया। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता आदि से हम बहुत आगे आ चुके हैं। इस यात्रा में अनेक चीज़ें बदलीं, और हिन्दी आलोचना की सामाजिक अध्ययनशीलता क्रमश: जटिलतर होती गयी। शोधकार्यों के विवरणों एवं निष्कर्षों ने हिन्दी आलोचना की चिन्ताधारा तथा तकनीक पर आश्चर्यजनक प्रभाव डाला। अस्तित्ववाद, नयी समीक्षा, स्त्री-विमर्श आदि भूमंडलीय विषयों से हिन्दी शोधकार्य जुड़ते और प्रभावित होते गए; वहीं दलित-विमर्श की विशुद्ध देशी (भारतीय) संभावना साहित्य-सृष्टि के साथ शोध-सृष्टि को भी समृद्ध करने लगी।

हिन्दी के आलोचकीय विवेके को देखते हुए यह कहना एकदम प्रासंगिक लगता है कि आज तक पिछड़ी जातियों के प्रश्न को लेकर शोध-दृष्टि का विकसित न हो पाना आश्चर्यजनक है। भारत की आबादी में 15 प्रतिशत दलित और 46 प्रतिशत महिलाएँ हैं। पिछड़ी जातियाँ अनुमानत: 65 प्रतिशत हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इतने बड़े जाति-समूह के सम्बन्ध में हमारे पास विस्तृत सामाजिक अध्ययन का अभाव है। सामाजिक विज्ञान की पुस्तकें  प्राय: वर्गीय आधार पर अध्ययन तथा सर्वेक्षण प्रस्तुत करती रही हैं। ऐसी स्थिति में हिन्दी शोध कार्य में पिछड़ी जातियों को लेकर किसी सैद्धांतिक दृष्टि का विकास हो पाना एक कठिन कार्य है।

हमारी शोध-दृष्टियोंं का संबंध चूँकि साहित्येतर अनुशासनों से जुड़ता जा रहा है, इसलिए हमें नई दृष्टि के लिए सामाजिक विज्ञान के अध्येताओं की तरफ देखना पड़ता है। यह सही है कि फील्ड-वर्क, सैम्पलिंग, प्रश्नावली, आँकड़े, फीडबैक आदि पद्धतियों का प्रयोग अभी भी साहित्य के अध्येताओं के द्वारा प्राय: नहीं किया जाता है। इन पद्धतियों की सहायता से सैद्धांतिकी गढऩे से प्रामाणिकता की गुंजाइश बढ़ जाती है।

हमें गौर करना चाहिए कि हिंदी के शोधार्थी के द्वारा उपर्युक्त पद्धतियों का प्रयोग भले न किया जाता हो परंतु हिन्दी के साहित्यकारों ने अपनी रचनाशीलता की निर्मिति में इन पद्धतियों का भरपूर उपयोग किया है। रचनाकार के पास जबरदस्त फील्ड-वर्क होता है। उसमें सैम्पलिंग की अद्भुत क्षमता होती है। उसकी बारीक दृष्टि प्रक्रियाओं को पूरी पारदर्शिता से समझने का माद्दा रखती है। रचनाकार जिस विषय को उठाता है, उसके बारे में वह अपनी तरह से भरपूर सर्वेक्षण करता है। वह अपने दिलो-दिमाग को विषय से इस कदर जोड़ता है कि ऊपरी तौर पर अदृश्य दिखनेवाले तंतु भी उसकी रचना में प्रत्यक्ष होने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर हम प्रेमचन्द को याद कर सकते हैं। किसान-समस्या पर प्रेमचन्द ने भरपूर लिखा, जिसे हम महज भाषिक दुनिया की रचना नहीं मान सकते। किसान-समस्या पर विचार करने वाली सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में जो बारीकियाँ दिखायी पड़ती हैं, क्या प्रेमचंद के विवरण उससे कमतर कहे जा सकते हैं? बिल्कुल नहीं! यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अपने समय के किसानों के बारे में जितने ‘शेड्स’ प्रेमचंद ने दिखाए उतने सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में मौजूद नहीं हैं।

यह सब कहने के पीछे मेरी मंशा यही है कि शोध-दृष्टि के लिए सैद्धांतिकी या मुद्दे की तलाश के लिए हम रचनाकार के पास भी जा सकते हैं। गौर करने पर हम पाते हैं कि रचनाकार अपने सिद्धान्तों/पद्धतियों/प्रक्रियाओं को विधिवत शास्त्रीय भाषा में भले ही नहीं रख रहा हो, मगर उसके पास यह सारी संपत्ति होती जरूर है।

पिछड़ी जातियों के प्रसंग, हिन्दी साहित्य में मौजूद हैं, मगर हिन्दी आलोचना से अनुपस्थित। यदि सामाजिक विज्ञान के सिद्धांतकार इस पक्ष पर कोई सिद्धांत लेकर आते तो संभव है हिन्दी में शोध-कार्यों की भरमार लग जाती। जाति के प्रश्न पर भले असहमतियाँ रही हों परंतु समाज, इतिहास, राजनीति और अर्थशास्त्र के अध्येताओं ने जाति-समूहों पर विस्तार से विचार किया है। दलित-विमर्श एक जाति-समूह को लेकर ही विकसित हुआ है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अँग्रेजी हुकूमत के द्वारा दलित समाज को एक नयी पहचान मिलने के बाद अनेक प्रसंग और प्रयास जुड़ते गए, जिनके परिणामस्वरूप दलित-विमर्श का विकसित रूप हमारे सामने आ सका। मंडल आयोग, जनता दल, वी.पी.सिंह, समाजवादी विचारधारा की पार्टियों का पुनर्जन्म आदि प्रकरणों से गुजरती हुई भारतीय राजनीति पिछड़ी जातियों की सशक्त उपस्थिति से नयी शक्ल अख्तियार करती गई। एक दशक होते-होते ओबीसी के नाम से यह जाति-समूह भारतीय राजनीति का अपरिहार्यपक्ष बन गया। लगभग तीन दशक बीत जाने के बावजूद हिन्दी आलोचना और शोध-कार्य में इस विषय का प्रवेश नहीं हो पाया है।

प्रेमचन्द के पास किसानों के बारे में एक व्यवस्थित दृष्टि है। उन्होंने किसान-समस्या को लेकर जो कुछ रचाए उसमें संरचनात्मक सावधानी है। प्रेमचंद की किसान-संबंधी समझ को जाति-अधारित संरचना के रूप में भी व्याख्यायित किया जा सकता है। उन्होंने गाँव की आबादी को किसान और गैर-किसान के रूप में बखूबी पहचाना है। उनके किसान-पात्र पिछड़ी जातियों से हैं। अगड़ी और दलित जातियों के पात्र प्रेमचंद के कथा-साहित्य में किसान के रूप में चित्रित नहीं हुए हैं। ‘गोदान’ के झींगुरी सिंह, पं. दातादीन आदि पात्र ग्रामीण आबादी का हिस्सा ज़रूर हैं; मगर वे किसान नहीं हैं। इसी तरह दलित पात्र खेतिहर मजदूर हैं, किसान नहीं। हिन्दी के सबसे बड़े कथाकार प्रेमचन्द की यह दृष्टि है कि भारत की जो आबादी ‘किसान’ कहलाने की हक़दार है तथा जो किसानी की समस्या से लगातार जूझ रही है, उसका संबंध पिछड़ी जातियों से है। प्रेमचंद की इस नजऱ को हिन्दी आलोचना ने आज तक रेखांकित नहीं किया हैं। सामाजिक विज्ञान के विषयों ने भी जाति-आधारित ऐसे विश्लेषणों के उपकरण विकसित नहीं किए हैं। हिन्दी शोध में संभावना का एक द्वार खुल सकता है यदि प्रेमचंद की इस नजऱ पर गौर किया जाए। प्रेमचंद ने इस संदर्भ में भरपूर सामग्री दी है, मगर हिन्दी-शोध ने किसानों का विश्लेषण ज्यादातर आर्थिक आयामों के आधार पर किया है।

अपने किसान पात्रों के प्रति प्रेमचंद के मन में अपार सम्मान का भाव है। यही कारण है कि उन्होंने अपने किसान को सबसे ज्यादा ‘मरजाद’ के लिए चिंतित दिखाया है। ‘ऋणग्रस्तता की समस्या’ का असली कारण ‘मरजाद’ को बचाए रखने की इच्छा-शक्ति और किसान के अपने पारिवारिक-सामाजिक संस्कार हैं। प्रेमचंद के कथा-साहित्य में ‘मरजाद’ की चिंता न करनेवाले अगड़े और दलित पात्रों के सामने ‘ऋणग्रस्तता की समस्या’ बिल्कुल नहीं है। ‘ऋणग्रस्तता की समस्या’ को ऐतिहासिक शक्ति के रूप में माननेवाली हिन्दी की वामपंथी आलोचना प्रेमचंद की इस दृष्टि की अवहेलना करती है कि असली कारण ‘मरजाद’ थी और जो लोग ‘मरजाद’ की चिंता नहीं कर रहे थे उनके सामने ‘ऋणग्रस्तता की समस्या’ भी नहीं थी।

12029149प्रेमचंद के कथा-साहित्य के अनेक प्रकरण उन ग्रामीणों से जुड़े हैं, जो किसान नहीं हैं। ऐसी रचनाओं में मूल समस्या अन्य प्रकार की है। ‘बड़े घर की बेटी’ कहानी गाँव से जुड़ी है, मगर किसान-समस्या से जुड़ी नहीं है। परिवार की एकता को बनाए रखने में संस्कारशीला बहू आनन्दी तथा देवर लालबिहारी के भावुक प्रकरण इसमें मुख्य विषय हैं। यह कहानी अगड़ी जाति के एक परिवार से जुड़ी है। ‘कफऩ’ कहानी के दलित पात्र घीसू तथा माधव ग्रामीण तो हैं मगर खेतिहर मजदूर हैं। प्रेमचंद किसान के रूप में पिछड़ी जातियों को जितनी व्यापकता के साथ रेखांकित करते हैं, उसका व्यवस्थित क्रम बनाना आवश्यक है। क्रम बनने पर हमारे निष्कर्ष भिन्न हो सकते हैं।

प्रेमचंद के किसान-प्रकरण से भारतीय संस्कृति का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। भारत की संस्कृति मुख्यत: कृषि-संस्कृति मानी जाती रही है। कृषि-संस्कृति के निर्माता किसान रहे हैं और प्रेमचंद के सभी किसान पिछड़ी जातियों से हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि भारत की संस्कृति के निर्माण में पिछड़ी जातियों की भूमिका सबसे बड़ी रही है।

यहाँ इस तरह के अतिवाद से बचने की भी जरूरत है कि संस्कृति-निर्माण के अन्य कारकों की उपेक्षा कर दी जाए। व्यापार, सामंतवाद, धर्मआदि कारकों की अपनी भूमिका रही है। मगर उत्पादन की प्रणाली के रूप में कृषि की प्रमुखता रही है। संस्कृति उत्पादन की प्रणाली से अधिक प्रभावित होती है। कृषि को महज उत्पादन की मुनाफेदार प्रणाली के रूप में प्रेमचंद के किसान नहीं अपनाते बल्कि वे इसे ‘मरजाद’ के प्रश्न से जोड़ते हैं। पूरे परिवार के साथ मिलकर अपने खेतों में श्रम करनेवाले इन किसानों के सांस्कृतिक संदर्भों का प्रेमचंद सदैव ख्याल रखते हैं। परिवार की एकता की चिन्ता में घुलता किसान क्रमश: टूट जरूर रहा है मगर जहाँ भी प्रेमचंद को कुछ उम्मीद बची दिखी है, उसका रूपांतरण उन्होंने ‘मरजाद’ के रूप में ही किया है। मरते वक्त ”होरी ने अस्थिर आँखों से देखा और बोला-तुम आ गए गोबर? मैंने मंगल के लिए गाय ले ली है। वह खड़ी है, देखो (गोदान-प्रेमचंद, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 1989)।  ‘गोदान’ के अंतिम पृष्ठ के इस उद्धरण तक पहुँचते तक होरी अपने जीवन में आर्थिक पतन और ‘मरजाद’ को बचाए रखने के अंतिम संघर्ष तक पहुँच चुका है। मृत्यु के वक्त अपनी डूबती निगाहों से वह रुपयों की थैली नहीं देखता बल्कि अपने बेटे-पोते को देखता है और इत्मीनान होने का मन ही मन दावा करता है कि गाय घर पर आ गई है। उसके अवचेतन में भी परिवार की एकता तथा मरजाद की चिन्ता बनी हुई है। ‘मरजाद’ संस्कृति का प्रश्न है और ‘ऋणग्रस्तता की समस्या’ महाजनी सभ्यता का प्रश्न। हिन्दी आलोचना ‘सभ्यता-समीक्षा’ में रुचि लेती रही है, इस संदर्भ में व्यापक पैमाने पर शोधकार्य हुए हैं। ‘मरजाद’ की किसान-संस्कृति को भावनात्मक प्रश्न मानकर प्राय: छोड़ दिया जाता है कि इससे सटीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक निष्कर्ष नहीं निकल पाएँगे। मगर देखना चाहिए कि रचानाकार यदि एक जाति-समूह को ‘मरजाद’ के लिए प्रतिबद्ध दिखा रहा है तो उसका विश्लेषण किए बगैर हमारा सामाजिक विश्लेषण सम्यक् कैसे हो पाएगा?

किसानी ‘मरजाद’ की चिंता न तो अगड़ी जातियों की समस्या है और न ही दलित जातियों की। किसानी समस्या से जुड़ी प्रेमचंद की रचनाओं में अगड़ी जातियों का चित्रण किसान-विरोधी तत्त्वों के रूप में किया गया है। वे किसान का शाषण कर रहे हैं। कृषि-संस्कृति मे शोषकोंं का प्रतीक बन गई हैं अगड़ी जातियाँ। वे इस संस्कृति का पोषण नहीं करती बल्कि उसे दूषित करती हैं। दलित जातियों के पात्र कृषि-संस्कृति के सर्वाधिक शोषित-उपेक्षित और प्राय: भूमिहीन खेतिहर मजदूर के रूप में प्रेमचंद के किसानी साहित्य में चित्रित हुए हैं। ‘रंगभूमि’ के दलित नायक सूरदास की स्थिति अलग दिखायी गयी है, मगर इस उपन्यास का विषय किसान नहीं है।

हिन्दी शोध के विषय के रूप में प्रेमचंद के किसान की सांस्कृतिक भूमि की तलाश की जा सकती है। पिछड़ी जातियों को जाति-समूह के रूप में प्रवृत्तिगत अध्ययन का विषय बनाया जा सकता है। इस शोध-दृष्टि से भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी की साहित्यिक उपस्थिति का मूल्यांकन किया जा सकता है। मार्क्सवादी दृष्टि से रचित साहित्य और विश्लेषित आलोचना में जो सर्वहारा की अवधारणा है उसका अस्तित्व, भारत के संदर्भ में, पिछड़ी जातियों की 65 प्रतिशत आबादी की उपेक्षा करके कायम रह सकता है क्या? प्रेमचंद के आलोचक आर्थिक दृष्टि से विश्लषण करते रहे हैं, मगर इन किसानों की सांस्कृतिक समझ का शब्दांकन प्रेमचंद की असली ताकत है। प्रेमचंद के बाद किसान-जीवन के संबंध में आर्थिक आँकड़े तो भरपूर मात्रा में हमें उपलब्ध हुए, मगर वैसा किसान-साहित्य नहीं रचा जा सका। सांस्कृतिक संदर्भ को समझे बिना आर्थिक प्रश्नों को साहित्य में ढालना कठिन होता है। साहित्य की दृष्टि में केवल वैसे आर्थिक प्रश्न महत्त्वपूर्ण होते हैं, जो सांस्कृतिक प्रतिरूप बनने की क्षमता रखते हैं।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2016 अंक में प्रकाशित )

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