झारखंड राज्य के पक्षधर और विकास के प्रणेता डा. आंबेडकर

20 जुलाई 1942, भारतीय इतिहास का एक अविस्मरणीय दिन है। इस दिन एक अछूत परिवार में जन्मे डा. बी.आर. आंबेडकर को वायसराय की कार्यकारिणी का श्रम सदस्य नियुक्त किया गया

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श्रम सदस्य डा. आंबेडकर धनबाद में कोयला मजदूरों के साथ (दिसंबर 1943)

20 जुलाई 1942, भारतीय इतिहास का एक अविस्मरणीय दिन है। इस दिन एक अछूत परिवार में जन्मे डा. बी.आर. आंबेडकर को वायसराय की कार्यकारिणी का श्रम सदस्य नियुक्त किया गया। डा. आंबेडकर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री होने के साथ ही मजदूरों के नेता भी थे। उन्हें मजदूरों की बस्तियों में रहने का भी अनुभव था। इसलिए श्रमिकों की समस्याओं एवं समाधान की तरकीब उन्हें मालूम थे। डा. आंबेडकर 1942 से 46 तक श्रम सदस्य के रूप में रहकर श्रमिकों के हित में कई कानून बनवाये तथा सुविधायें प्रदान की। उन्हीं के कार्यकाल में श्रमिकों की समस्याओं के समाधान हेतु त्रिपक्षी मण्डल (सरकार, मालिक और मजदूर) की नींव डाली गयी।

यहां पर हम मुख्य रूप से डा. आंबेडकर के छोटानागपुर दौरे तथा उनके योगदान की चर्चा करना चाहेंगें। वायसराय के एक्जीक्यूटिव काउन्सिल के श्रम सदस्य के रूप में डा. आंबेडकर 9 दिसम्बर (गुरूवार) 1943 को श्रमिकों की स्थिति का जायजा लेने धनबाद पहुंचे। धनबाद में उनके स्वागत के लिए स्थानीय कर्मचारियों के अतिरिक्त बिहार के तत्कालीन श्रमायुक्त एस.एन. मजुमदार, मुख्य खनन निरीक्षक मि. डब्लू कीरबी तथा माइनिंग एसोसिएशन के प्रतिनिधीगण और कोलियरी के मालिक भी थे। श्रम विभाग के सचिव एच.सी.प्रेयर, भारत सरकार के लेबर वेलफेयर एडवाइजर मि. आर. एस. नीमवकर पहले से ही मौजूद थे।

धनबाद पहुंचने के शीघ्र बाद आंबेडकर मि. प्रेयर, मि. नीमवकर, कीरवी तथा कोलियरी मालिकों के साथ भूलन बरारी कोलियरी देखने गये। इन्डियन फेडरेशन ऑफ लेबर की ओर से मि. कारनीक तथा आल इण्डिया ट्रेड यूनियन की तरफ से सुश्री शांता भाल राव प्रतिनिधित्व कर रही थी।

उन्होंने सिर पर सुरक्षा टोपी लगाकर अधिकारियों के साथ भूलनवरारी कोलियरी के 400 फीट गहरे खदान में कोयला काटते मजदूरों को देखा, उनसे कई तरह के सवाल किये। शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधाओं को भी नजदीक से देखा तथा महिला वार्ड का भी निरीक्षण किया।

‘हम अन्दर आ सकते हैं?’.यह कहकर आंबेडकर ने श्रमिकों के निवास स्थान में प्रवेश कर घरेलू सामान, खान-पान तथा अन्य चीजों का जायजा लिया। उसी दिन डिगवाडीह कोलियरी में लगी नई मशीनों को भी देखा। तीसरा कोलियरी के खदान के अन्दर जाकर श्रमिकों की स्थिति का पता लगाया। दूसरे दिन 10 दिसम्बर शुक्रवार 1943 को श्रम मंत्री आंबेडकर रानीगंज कोयला खदान के श्रमिकों की समस्याओं तथा उत्पादन के तरीकों का अध्ययन करने गये। रास्तें में डा. आंबेडकर एक प्राइमरी स्कूल भी देखने गये। स्कूली छात्रों ने आंबेडकर को फूल माला से स्वागत किया। रानीगंज से लौटने के बाद 11 दिसम्बर 1943, शनिवार को धनबाद में भारत सरकार, बिहार, बंगाल के अधिकारी तथा श्रमिक संगठन के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित किया।

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डा. आंबेडकर मंत्रीपद से त्याग पत्र देकर 18 नवंबर 1951 को मुम्बई लौट आये

डा. आंबेडकर अबरख खदान देखने तथा अबरख श्रमिकों की समस्याओं का अध्ययन करते हेतु 28 अप्रैल 1944 को कोडरमा पहुंचे, सीढ़ियों के सहारे खदान के अन्दर जाकर अबरख निकालने की प्रक्रिया को देखा। श्रमिकों की झोपड़पट्टी को देखा तथा जीवन स्तर के बारे में चर्चा की। 29 अप्रैल 1944 केा कोडरमा से, अबरख खदान परिषद की बैठक हुई, अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा ’’यदि मजदूरों को पर्याप्त वेतन नहीं मिलेगा तो किसी भी प्रकार का सुधार सम्भव नहीं है, यह मालिकों का कर्तव्य है कि वे श्रमिकों के जीवन स्तर की ओर ध्यान दें’’ बाद में आंबेडकर की सिफारिश पर श्रमिक कल्याण कोष का गठन किया गया। काम के घंटे को 10 घन्टे की बजाय 8 घन्टे करने तथा महिला कर्मियों को प्रसूति अवकाश देने की शुरुआत भी उन्होंने ही प्रारम्भ की थी।

दामोदर नदी बिहार और बंगाल का शोक नदी कही जाती थी, हर तीन चार साल में बाढ़ आने से जान माल की काफी क्षति होती थी। इस नदी की तुलना में अमेरिका के टेनेसी नदी से की जा सकती है। अमेरिका सरकार ने टेनेसी वैली आथरिटी (टीवीए) बनाकर नदी को नियंत्रित किया तथा उसका उपयोग जनहित में किया। टेनेसी घाटी योजना के बारे में अनेक पुस्तकों को मंगाकर आंबेडकर ने अध्ययन किया। तीन महीनों तक इस विषय पर विचार-विमर्श चलता रहा। अंत में डा. आंबेडकर की दृढ़ता से सरकारी निर्णय लिया गया।

डा. आंबेडकर ग्रंथावली के प्रधान सम्पादक वसंत मून ने ठीक ही लिखा है कि ”दामोदर घाटी येाजना आंबेडकर के दिमाग की उपज है और उन्होंने ही इस योजना के स्वप्न को साकार करवाया। इस योजना के लिए उन्होंने अथक परिश्रम, मुसीबतें झेली, परेशानियां मोल ली, जान लड़ा दी और बिहार, उड़ीसा, बंगाल केा बहार दियाए जनजीवन दिया। उसकी हमें याद भी नहीं आती।’’

श्रम एंव जल संसाधन मंत्री के रूप में उन्होंने हाइड्रोइलेक्ट्रिक  पावर के लिए मैथन डैम तथा तिलैया डैम की स्वीकृति करवायी। झारखण्ड के समर्थक डा. आंबेडकर भाषायी आधार पर राज्यों के बंटवारे के पक्षधर थे। 1955 में उन्होंने राज्य पुनर्गठन आयोग भारत सरकार को एक पुस्तक लिखकर सलाह दी थी कि बिहार को दो भागों में बांट दी जाय। उत्तर बिहार, जिसकी राजधानी पटना हो, तथा दक्षिण बिहार, जिसकी राजधानी रांची हो। (W & S, Vol. 1, Page no. 181-82)।

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  2. Manisha Reply
  3. Ravi Kumar Bharti Reply
  4. subodh Reply

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