साहित्य के रण संग्राम में ओबीसी ने युद्ध का शंखनाद किया है

दलित साहित्‍य की अवधारणा मराठी की उर्वर जमीन से 1990 के आसपास हिंदी में आयी। इन दिनों जिस ओबीसी साहित्‍य की थोडी बहुत चर्चा हिंदी में शुरू हुई है, उसकी अवधरणा भी मराठी में ही पहले-पहले अंखुआयी थी। हम यहां वर्ष 2008 में नासिक में हुए ओबीसी साहित्‍य सम्‍मेलन के अवसर पर पारित प्रस्‍ताव को अविकल प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

1990 के आसपास दलित साहित्‍य की अवधारणा मराठी की उर्वर जमीन से हिंदी में आयी। इन दिनों जिस ओबीसी साहित्‍य की थोडी बहुत चर्चा हिंदी में शुरू हुई है, उसकी अवधरणा भी मराठी में ही पहले-पहले अंखुआयी थी। 2006 व 2008 में महाराष्‍ट्र में इस विषय पर बड़े साहित्‍य सम्‍मेलन हुए थे। हम यहां फारवर्ड प्रेस के पाठकों के लिए 16-17 फरवरी, 2008 को नासिक में हुए ओबीसी साहित्‍य सम्‍मेलन के अवसर पर एक छोटी पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर वितरित किये गये प्रस्‍ताव को अविकल प्रस्‍तुत कर रहे हैं। यह प्रस्‍ताव मूल मराठी से अनुदित है। – संपादक

तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले साहित्य नगरी में (कालिदास कलामंदिर, नासिक) दिनांक 16 एवं 17 फरवरी, 2008  को द्वितीय साहित्य सम्मेलन हो रहा है। हर वर्ग, जाति या समाज  के स्वतंत्र सम्मेलन होते ही रहते हैं। दलित साहित्य सम्मेलन, आदिवासी साहित्य सम्मेलन, मजदूर साहित्य सम्मेलन आदि जातीय एवं वर्गीय सम्मेलनों के दौर शुरू हुए और खत्म भी हो चुके! किंतु मंडल के धक्के के कारण सन ’80 के बाद जागृत हो रहा यह महाकाय ओबीसी समाज अब अपनी अस्मिताओं को साहित्य के माध्यम से जगाते हुए दिखाई दे रहा है। ऐसे ओबीसी साहित्यकारों को मंच उपलब्ध कराने और उन्हें वैचारिक दिशा प्रदान करने के लिए यह साहित्य सम्मेलन हो रहा है।

बलुतों* का बलीराज्य। दानव दैत्य पावन।

दानशूर बली था। सुखी उसके प्रजाजन।।

पूर्वज यही हमारे। गुरू उनके शुक्रानन।

उन्हें पद-पद पर वंदन। वंशज उनके हम सब जन।।-क्रांतिज्योति सावित्री माई फुले

(*बलुतं : गाँव से संबंधित अन्यान्य कार्य करनेवाले बहुजन समाज के लोग। जैसे- सुनार, लुहार, बढ़ई, कुम्हार, चमार, कहार आदि।)

प्रथम साहित्य सम्मेलन सितंबर 2006 में सफलतापूर्वक संपन्न होने पर ओबीसी आंदोलन को एक नई प्रेरणा प्राप्त हुई। कोई भी जनांदोलन हो उसके सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि विविध आयाम होते हैं। उसमें से साहित्य भी एक महत्वपूर्ण अंग है। सुस्त और भ्रष्ट हुए दलित आंदोलन को दलित साहित्य ने जो नया क्रांतिकारी मोड़ दिया, उसमें से ही पैंथर नामक विद्रोह पैदा हुआ।

OBC Sahitya Sammelanसाहित्य यानी समाज जीवन का आविष्कार! समाज जीवन का इतिहास, वर्तमान और भविष्य का प्रतिबिंब साहित्य के माध्यम से दिखाई देता है। उसमें से समाज के विकास का और पतन का आलेख भी स्पष्ट होता है। साहित्य के माध्यम से समाज की समस्याओं का प्रस्तुतिकरण प्रभावी रूप से होता है। समाज की रूढ़ि, परंपराओं का विधायक रूप से प्रयोग करते हुए संस्कृति का प्रस्तुतिकरण एवं निर्माण करने की क्षमता साहित्य में प्रभावी रूप से होती है। मनुष्य को आदिम अवस्था से आगे निकलते समय मनुष्यता का अहसास देनेवाली जो संगठित कृत्य उस समय वह कर रहा था, उसमें उसकी साहित्य कृति अग्रणी थी।

कोई समाज एकात्म नहीं होता। वह वंश, वर्ग, वर्ण, जाति आदि व्यवस्थाओं की नींव पर बँटा हुआ होता है। ये शोषण की व्यवस्थाएँ होने के कारण यह बिखराव नींवगत होता है। और इसलिए उनका साहित्य भी अलग-अलग होता है। भारत में मुख्य रूप से वर्ण, जाति, वंश आदि व्यवस्थाओं की नींव पर समाज विभाजित है। उच्चवर्णीय ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य या उच्चवर्णीय जातियों ने शोषक होने के कारण शूद्रातिशूद्र वर्ण-जातियों का हमेशा दमन करने का प्रयास किया। उनका दमन करने के लिए जिस प्रकार जमीनी युद्ध के शस्त्रास्त्रों का प्रयोग किया गया उसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र के अस्त्रों का भी प्रयोग किया गया। भारतीय संदर्भ में यदि सोचा जाए तो निम्न जातियों को कुचलने के लिए साहित्य का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ। सामान्य मजदूरी करने वाली जनता उत्स्फुर्त रूप से कहानियाँ, पोवाड़ा, भारुड आदि के माध्यम से साहित्य का निर्माण करते रहते हैं। यह साहित्य प्रवहमान होने के कारण उसमें से आगे लोककथा, लोकगीत निर्माण होते हैं। यह साहित्य मात्र मनोरंजन के लिए नहीं होता, तो उसमें अपना इतिहास पिरोने का और उसे सहेजने का उद्देश्य होता है। इसी साहित्य में हमारे जीवन का दर्शन कौन-सा है और जीवन के मूल्य कौन-से हैं इसका आग्रही प्रतिपादन किया होता है। इसी आग्रह के कारण आगे मिथक और कर्मकांडों का निर्माण होता है। शोषण-व्यवस्थारहित एकाकार समाज में इस साहित्य का प्रवाह कलकल करता निर्मल रूप से बहता रहता है; किंतु शोषण की व्यवस्था का निर्माण होते ही समाज बिखरता है और युद्धभूमि की तरह धर्म, संस्कृति, साहित्य आदि क्षेत्रों में भी संघर्ष आरंभ हो जाता है। प्राचीन काल में जिस साहित्य का निर्माण शूद्रातिशूद्रों वर्ण एवं जातियों ने निर्माण किया था उस साहित्य का उच्चवर्णियों ने ब्राह्मणीकरण किया। वेद, रामायण, महाभारत, स्मृति, श्रृति आदि साहित्य द्वारा बहुजन समाज की गुलामी की मानसिकता गढ़ी गई। उसमें से वर्ण-जातिव्यवस्था अधिक दृढ़ करने का प्रयास हुआ।

इस उच्चभ्रू मनुवादी साहित्य से टकराने के लिए और बहुजनों को वर्ण-जातिव्यवस्था की मानसिक गुलामी से मुक्त करने के लिए बहुजन बुद्धिजीवियों ने भी साहित्य का निर्माण किया। बहुजनों के साहित्य का भी अपना इतिहास रहा है। उसमें चार्वाक, बुद्ध, संत परंपरा के संतों ने काफी मात्रा में साहित्य का निर्माण किया। संत नामदेव, संत गाडगे महाराज, संत सावता, संत चोखोबा, संत तुकाराम आदि संत परंपरा ने मौलिक काम किया है।

अर्वाचीन काल में तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले जी ने शूद्रातिशूद्रों को संघर्ष की प्रेरणा प्राप्त हो इसके लिए साहित्य का निर्माण किया। ‘शेतकन्यांचा आसूड’, ‘सत्सार’  ‘ब्राम्हणांचे कसब’, ‘तृतीय रत्न’ आदि साहित्य ब्राह्मणवादी साहित्य पर कोड़े बरसाने वाला था। इस साहित्य ने कुलवाडी कुलभूषण छत्रपति शिवाजी, किसानों का राजा- बलीराजा आदि समतावादी प्रतीकों को खड़ा किया। इस साहित्य को दबाने के लिए उच्चवर्णीय मनुवादियों ने बड़ी मात्रा में साहित्य निर्माण कर गोब्राह्मण प्रतिपालक शिवाजी राजा का और गणपति का प्रतीक खड़ा किया।

किसी भी समाज को प्रदीर्घ काल तक गुलाम बनाना हो तो उस समाज की इकाई पर अपने (विजेताओं के) मूल्यों को लादना चाहिए, यह सूत्र विश्वभर के सत्ताधारी वर्ग ने अमल में लाया है। किंतु इस सूत्र के अनुसार 200-400 वर्षों से अधिक समय तक सत्ता को बचाए रखना संभव नहीं होता। हमारे बलीस्थान देश का ब्राह्मण सत्ताधीश वर्ग दुनिया के किसी भी अन्य देश के सत्ताधारी वर्ग से ज्यादा चालाक और धूर्त है, क्योंकि उसने 5000 वर्षों से भी अधिक समय तक सत्ता को टिकाए रखा है। इसके लिए उसने कौन-से भिन्न सूत्र का प्रयोग किया, इसका उत्तर खोजना चाहिए। किसी भी समाज के मूल्य बोने के लिए या लादने के लिए साहित्य का निर्माण आवश्यक होता है; किन्तु उस समाज की इकाई का स्वयं का साहित्य निर्माण होता रहा तो ऐसे समय विद्रोह-क्रांति करने की प्रेरणाएँ जीवित रहती हैं। इसलिए बलीस्थान के मूलनिवासी जनता को हमेशा के लिए और एकतरफा गुलाम बनाना हो तो उन्हें साहित्य के निर्माण से वंचित किया जाना चाहिए, यह दुनिया से अलग सूत्र इस देश के उच्चवर्णियों ने खोज निकाला और उसका प्रभावी रूप से कार्यान्वित किया।

दो प्रसिद्ध उदाहरण देकर इसे सिद्ध किया जा सकता है। पहला उदाहरण है बलीराजा। इस देश का नाम बलीस्थान था, ऐसा तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले हमें बताते हैं। इससे बली राजा इस देश के मूल निवासियों का सर्वाधिक लोकप्रिय महापुरुष था, यह सिद्ध होता है। इस प्रिय महापुरुष की याद आज भी ग्रामीण क्षेत्र के बहुजन करते हैं। हर दीपावली-दशहरे को ‘इडा पीडा जाओ। बळीचे राज्य येवो।।’ (दुःख-दर्द नष्ट हो। बली का राज आए।।) ऐसा एक दूसरे को बताते हुए उसकी याद की जाती है। यह बली राजा बहुजनों का महानायक ही था और बहुजनों ने अपने साहित्य में उसे सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है। किंतु इस प्रकार के साहित्य का निर्माण बंद करने के लिए शोषक उच्चवर्णीय लोगों ने बहुजनों का शिक्षा का अधिकार छीन कर वाचन-लेखन खंडित किया। दूसरी ओर ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने बड़ी मात्रा में साहित्य का निर्माण आरंभ कर दिया। श्रुतियाँ, स्मृतियाँ, पुराण, पोथियों की भरमार हो गई। इस प्रकार के प्रत्येक साहित्य में उन्होंने बलीराजा और उनके जैसे महापुरुषों की काफी बदनामी की। यह सारा साहित्य धार्मिक पवित्र ग्रंथ के रूप में सामने लाया गया। बहुजनों की साहित्य निर्माण की प्रक्रिया बंद न हुई होती तो बहुजन बुद्धिजीवियों ने इस ब्राह्मणी साहित्य को टक्कर देनेवाला स्वयं का साहित्य निर्माण किया होता और बलीराजा को इस बदनामी से बचाया होता।

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द्वितीय ओबीसी साहित्य सम्मलेन, नासिक का आमंत्रण पत्र

मनुष्य का इतिहास से अटूट रिश्ता है। अपना गौरवशाली इतिहास, प्रेरणादायी संघर्ष और उस संघर्ष के महानायकों को सुरक्षित करने का उसका प्रयास सदैव जारी रहता है। उसके लिए समय आने पर वह जानलेवा संघर्ष भी करने के लिए तैयार होता है। साधनहीन शोषित जनता अपने इतिहास को सुरक्षित करने के लिए रूढ़ि-परंपरा और कर्मकांड का रूप देते हैं। फिर समय के प्रवाह में यह इतिहास अंतश्चेतना का हिस्सा बन जाता है। निऋति जैसी मातृदेवताओं और बली राजा जैसे महान योद्धाओं का संघर्षशील इतिहास इसी प्रकार बहुजनों की अंतश्चेतना का हिस्सा बन गए। बौद्ध साहित्यकारों ने बली राजा को पाताल से ऊपर लाने प्रयास किया। डॉ. आ.ह. साळुंखे  ने अपने महाग्रंथ ‘बलीवंश’ में सूचित किया है कि बौद्ध साहित्यकारों ने भी बली राजा को आदर्श मानकर साहित्य सृजन किया है। यदि ब्राह्मणवादी साहित्यकारों ने वर्णव्यवस्था के समर्थन हेतु राम और कृष्ण जैसे नायक खड़े किए हैं तो बौद्ध साहित्यकारों द्वारा समतावादी के रूप में बली राजा को नायक बनाया जाना स्वाभाविक है। आज पाँच हजार वर्षों के पश्चात भी ब्राह्मणवादी संस्कृति के जानलेवा सांस्कृतिक आक्रमणों को झेलता हुआ यह बली राजा बहुजनों के हृदय रूपी सिंहासन पर सम्मान के साथ आरूढ़ है। यह सबसे बड़ा जीवंत सबूत ध्यान में रखने पर सालुंखे जी का ऐसा सूचित करना सिद्ध होता है। संत साहित्यकारों ने बली राजा को पाताल से ऊपर निकालने का प्रयास किया; किंतु पश्चात के कालखंड में बहुजनों की पठन-लेखन-चिंतन प्रक्रिया ही बंद कराने के कारण साहित्य की रणभूमि के इस युद्ध में बहुजनों की छावणी युद्ध आरंभ होने से पहले ही पराजित हुई। सांस्कृतिक युद्ध के इस दीर्घकालीन पराजय की परंपरा के परिणाम आज दिखाई दे रहे हैं। जिन किसानों को आज बली राजा कहा जाता है, उनके पास आज आत्महत्या करने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प शेष नहीं है। युद्ध आरंभ होने से पूर्व ही शत्रु को आत्महत्या करने पर मजबूर करने वाले इस ब्राह्मणवादी नीति का प्रमुख सुराग साहित्य के युद्ध तक जा पहुँचता है।

दूसरा उदाहरण कुलवाडी कुलभूषण शिवराया का! तात्यासाहब महात्मा फुले जी ने शिवराय (शिवाजी महाराज) को जनमानस में प्रचारित करने के लिए 35 पृष्ठों का पोवाड़ा लिखा। अनेक अखंड लिखे। बहुजन साहित्यकारों ने इसी सूत्र को पकड़कर आगे साहित्य निर्माण किया होता तो आज जनमानस में शिवाजी की गलत प्रतिमा प्रचारित न हुई होती। तात्यासाहब के कुलवाडी कुलभूषण शिवराया को पराजित करने के लिए ब्राह्मण साहित्यकार युद्ध में उतरे हैं। उन्होंने ‘गोब्राह्मण प्रतिपालक’ का अस्त्र तैनात किया है, किंतु तत्कालीन अल्पमति सत्यशोधक ब्राह्मणों की शरण में चले गए। शीघ्र राजनीतिक सत्ता के लिए लालायित इन लोगों ने गोब्राह्मण प्रतिपालक शिवाजी स्वीकार कर ब्राह्मणों से गठबंधन किया। युद्ध आरंभ होने से पहले ही आत्महत्या करने का यह नया प्रकार! पिछले 60-70 वर्षों में शिवराय को गोब्राह्मण प्रतिपालक बनाने के लिए और उसे जनमानस में बैठानेके लिए ब्राह्मण साहित्यकारों ने और विचारकों ने जी-तोड़ मेहनत की। किसी ने इतिहास ग्रंथ लिखा, किसी ने उपन्यास, पोवाडा, किसी ने नाटक तो किसी ने वीरगाथाएँ गाना आरंभ किया। यह सारा साहित्य उन्होंने सिर्फ पुस्तक-ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा। उसे उन्होंने पाठशालाओं-महाविद्यालयों में पाठ्यक्रम में लाकर बालमन पर और युवाओं पर थोप दिया।

इस एकतरफा युद्ध का परिणाम क्या होगा? जनमानस ही गोब्राह्मण प्रतिपालक बन गया। आपका शिवाजी जैसा पराक्रमी वीर राजा ही यदि ब्राह्मणों की सेवा करता हो तो आपके द्वारा चुनाव में चुना गया राजा भी गोब्राह्मण प्रतिपालक ही होना चाहिए। परिणामतः ब्राह्मणों को जो नहीं चाहिए था, वह ओबीसी का कालेलकर और मंडल आयोग, सत्ताधीशों ने दबा दिया। बौद्धों को, आदिवासियों को और दलितों को कुचलनेवाले यही राजनीतिक सत्ताधीश थेयह सब उन्होंने् क्यों किया? क्योंकि इसके द्वारा ही ब्राह्मण सेवा होने वाली थी? और इस प्रकार की ब्राह्मण सेवा करने पर ही उनके सिर पर गोब्राह्मण प्रतिपालक का राजमुकुट स्थायी रहने वाला था। आज भी उनकी ब्राह्मण-सेवा कहीं खंडित नहीं हुई। साढ़े तीन प्रतिशत वालों के ब्राह्मणवादी साहित्य सम्मेलन को 25 लाख और 52 प्रतिशत वाले ओबीसी साहित्य सम्मेलन के लिए केवल 2 लाख रूपये !

आज बहुजन-ओबीसी के काफी, टके के तीन साहित्यिक हैं; किंतु उन्हें बली राजा पर चार पंक्तियाँ भी लिखने की इच्छा नहीं होती! इसका कारण बहुजन साहित्यकारों की कृतियाँ केवल अहसास पर आधारित हैं। मनुष्य की कोई भी कृति जान बूझ कर होती है फिर भी अंतश्चेतना की प्रेरणा से भी वह अनजाने में कोई कृति करता रहता है! पठन, लेखन और बोधन यह कृतियाँ ज्ञानपूर्वक होती हैं। जातिव्यवस्था ने उस पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद ग्रामीण बहुजन साहित्यकारों ने बली राजा की कहानियाँ रची, मातृदेवताओं के गीत गाए। ये साहित्यिक कृतियाँ अंतश्चेतना से आयी। मनुष्य के मन (दिमाग) में चेतना और अंतश्चेतना इस प्रकार के दो खाने होते हैं। इसकी खोज फ्रायड नामक शोधकर्ता ने की है; किंतु आर्नाल्डो टाइनबी और दैसाकु इकेडा इन दो विशेषज्ञों ने इस खोज का श्रेय बौद्ध दर्शन को दिया है। तत्कालीन बौद्ध दार्शनिक और साहित्यिक वसुबंधू, दिग्नाग और धर्मकीर्ति ने चेतना और अंतश्चेतना इन दोनों ज्ञान साधनों का उपयोग करते हुए नए साहित्यशास्त्र और नए सौंदर्यशास्त्र का निर्माण किया। इसलिए तत्कालीन बौद्ध साहित्य क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। इस क्रांतिकारी साहित्य के प्रबोधन से ही जनता की क्रांतिकारी मानसिकता तैयार की गई। और इस प्रबोधित जनता ने वर्णव्यवस्था नष्ट करने वाली अहिंसक क्रांति की। वह अखंड रूप से 700 सौ वर्षों तक विकसित होती गई। कॉ. शरद पाटिल ने इस सौंदर्यशास्त्र का आधुनिक संदर्भ में विकास किया है जिसका बहुजन साहित्यकारों को मौलिक रूप से अध्ययन करना चाहिए। इस नए सौंदर्यशास्त्र का आधार ग्रहण कर बहुजन समाज ने यदि ज्ञान साधना की तो उन्हें अपने साहित्य के लिए बली राजा और मातृदेवता के समान नए नायक-नायिकाएँ आसानी से प्राप्त हो जाएँगे। अपनी गौरवशाली परंपरा, अपनी अस्मिता के प्रतीक इनका परिचय होने पर बहुजनों की अपनी पहचान  तैयार होगी। फिर उसमें से मनुवादियों के द्वारा उन पर लादे हुए गुलाम, शूद्र, कनिष्ठ आदि प्रकार की हीन पहचान से मुक्त होने का उनका संघर्ष आरंभ हो जाएगा। बली राजा, मातृदेवता ये उनकी लड़ाई की प्रेरणा होंगी। इसमें से ही वर्ण-जातिव्यवस्था नष्ट करने वाली क्रांति का शंखनाद किया जा सकेगा। वर्ण व्यवस्था नष्ट करने वाली बौद्ध क्रांति के समान आज की जातिअंत की क्रांति भी अहिंसक हो ऐसा लगता हो तो उपर्युक्त की तरह ढेर सारे साहित्य के निर्माण के कार्य में बहुजन साहित्यकारों ने जुट जाना चाहिए।

आज के अधिकांश बहुजन साहित्यकार थोड़ी बहुत मात्रा में ब्राह्मणवादी मानसिकता के शिकार हैं। बहुस्तरसत्ताक पद्धति केवल राजनीति के क्षेत्र में नहीं है। सर्वोच्च ब्राह्मणवादी सत्ताधीश अपने दलालों की नियुक्तियाँ शीर्ष राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं करते अपितु साहित्य, इतिहास, अर्थ, दर्शन, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में वे दलालों की नियुक्तियाँ करते रहते हैं। ओबीसी-बहुजनों के मामूली दर्जे के साहित्यकार, विचारक, अर्थशास्त्री, इतिहासविद् सत्ताधीशों की दलाली के मोहताज बनकर कतार में खड़े रहते हैं। जो सत्ताधीशों की जितनी अच्छी सेवा (दलाली) करेगा उसे उसी अनुपात में पुरस्कार, महामंडल आदि प्राप्त होता है। (अर्थात इसके कतिपय समादरणीय अपवाद भी हैं।) उच्च जाति के सत्ताधारियों की सेवा करने के लिए जो ओबीसी-बहुजन कतार में खड़े होते हैं, उस कतार के मामूली दर्जे के लोगों को साहित्यकार, विचारक आदि का दर्जा देने का काम मुंबई-दिल्ली के प्रसार माध्यम करते रहते हैं। विशेषज्ञ, साहित्यकार, विचारक, समीक्षक के रूप में उन्हें बड़े समाचार पत्रों में प्रसिद्धि मिल जाती है। इन दो-चार समाचारपत्रों में जो छपकर आता है उसे ही ब्रह्मवाक्य के रूप में मान्यता दी जाती है। यही तथाकथित ब्रह्मवाक्य प्रमाण मानकर स्थानीय प्रसार माध्यम अपने पेट भरते हैं। इसीकारण ये ब्रह्मवाक्य  बहुजनों पर भी अंकित किए जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बहुजनों के सच्चे साहित्यकार, लेखक, विशेषज्ञ और सच्चे राजनीतिक-सामाजिक नेता दबाए जाते हैं। विविध गलत रास्तों से हम पर लादे गए सभी क्षेत्रों के ये झूठे नेता हमेशा संघर्ष की बड़ी-बड़ी गप्पें हाँकते हैं, किंतु लड़ाई के ठीक मौके पर दुम दबाकर घर में बैठ जाते हैं। युद्ध शुरू होने से पहले ही शत्रु को नेतृत्वहीन करने का (आत्महत्या का) ये भी एक नया प्रकार!

आज भी समस्त बहुजन समाज इन उच्चभ्रू मनुवादी साहित्य से और उसमें से प्रसारित किए गए ब्राह्मणवादी मूल्यों के कारण दबा दिया गया है। इसी कारण स्वाधीनता प्राप्त होने के पश्चात भी ओबीसी का कालेलकर आयोग दबाने में सत्ताधारियों को आसानी से सफलता मिली। इसी कारण ओबीसी जातियाँ राजनीतिक, सामाजिक दृष्टि से पिछड़ गईं। किंतु सन सत्तर के बाद उच्च जातीय-वर्गीय सत्ताधारी वर्ग में राजनीतिक सत्ता के लिए मतभेद बढ़ते गए। इन मतभेदों के कारण मंडल आयोग आया। इन्हीं मतभेदों का विस्तार होते होते मंडल आयोग का आंदोलन खड़ा हो गया। इस कारण ओबीसी जातियों में अहसास जगा। सत्व का अहसास होने पर ओबीसी जाति के अनेक बुद्धिजीवियों ने साहित्य का निर्माण किया। अर्थात उससे पहले डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन ने जो संघर्ष खड़ा किया, उसके परिणामस्वरूप दलित साहित्य निर्माण हुआ। उसमें से तात्यासाहब महात्मा फुले जी का दबाया गया साहित्य प्रकाश में आया। फुले-आंबेडकर की प्रेरणा से आज ओबीसी जातियों का विद्रोह सड़क पर आते समय ओबीसी साहित्य का आविष्कार होना स्वाभाविक है।

ओबीसी साहित्य का यह विद्रोह संगठित करने के लिए और उसे दिशा देने हेतु हमने ओबीसी साहित्य सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया है।

इस साहित्य सम्मेलन में ओबीसी बुद्धिजीवियों को साहित्य की प्रेरणा प्राप्त हो और उसके द्वारा वे अपनी अस्मिता का साहित्य सृजित करें, इस उद्देश्य से विविध विषयों पर चर्चा रखी गई है। ‘‘ओबीसी साहित्य के महानायक : बलीराजा’’ यह संगोष्ठी का विषय इसी उद्देश्य से रखा गया है। नरकासुर से लेकर बाणासुर तक के बली वंश के राजा, सम्राट चंद्रगुप्त, सम्राट अशोक, राजा शिवाजी, संभाजी, शाहू राजा आदि ओबीसी साहित्य के महानायक हो सकते हैं। आज के बलीस्थान के जनतंत्र की क्रांति का घोषणापत्र मंडल आयोग ब्राह्मणवादी पाताल से ऊपर खींच लाने वाला मांडे का राजा वी.पी. सिंह  बहुजनों के साहित्य का महानायक क्यों नहीं हो सकता? ‘‘ग्रामीण और वारकरी साहित्य में ओबीसी साहित्य का प्रतिबिंब (नामदेवे रचिला पाया, तुका झालासे कळस)’’। ‘‘ओबीसी साहित्य का तात्विक अधिष्ठान : फुलेवाद’’ जैसे विषय ओबीसी साहित्य को तात्विक आधार प्रदान करेंगे। मराठवाडा साहित्य परिषद ने जनवरी 2006 में 27 वाँ मराठवाडा साहित्य सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में संगोष्ठी का एक विषय था- ‘‘ग्रामीण साहित्य के आंदोलन क्या कोई तात्विक अधिष्ठान है?’’ दलित एवं आदिवासी साहित्य प्रकार स्वतंत्र होने पर जो शेष रहता है वह ओबीसी साहित्य! ग्रामीण साहित्य ओबीसी साहित्य है! इसलिए तात्विक अधिष्ठान का प्रश्न ओबीसी आंदोलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। इस प्रश्न का उत्तर ठोस रूप में देने के लिए ही इस सम्मेलन में यह विषय लिया गया है। इस सम्मेलन में अनेक महत्वपूर्ण संकल्प होने हैं। इसके अतिरिक्त सम्मेलन में एकपात्री नाटिका, वारकरी प्रवचन, लोकनाट्य तमाशा, काव्य सम्मेलन, शाहिरी जलसा आदि कार्यक्रमों की काफी भारमार है। कुल मिलाकर इस सम्मेलन में ओबीसी बुद्धिजीवियों को भरपूर वैचारिक और मनोरंजन की दावत मिलनेवाली है।

OBC Sahitya Bhumika

द्वितीय ओबीसी साहित्य सम्मलेन की भूमिका का मुख्यपृष्ठ

यह सम्मेलन मात्र ‘हवशा-नवशा-गवशा’ (शौकिन-मन्नत माननेवाले-उठाईगीर) लोगों का मेला नहीं है, यह इस भूमिका से ज्ञात हो जाएगा। तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले जी ने पिछले 5 हजार वर्षों के संघर्षशील इतिहास का जो आलेख हमें बताया है, उसी का एक हिस्सा यह सम्मेलन है। मनुवादी साहित्य-संस्कृति के विरुद्ध तात्यासाहब ने जो शंखनाद किया था, उसका घोषणापत्र उन्होंने ही पत्र के रूप में लिख रखा है। सन 1885 में संपन्न प्रथम मराठी साहित्य सम्मेलन का निमंत्रण न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे जी ने तात्यासाहब को दिया। इस निमंत्रण क जो उत्तर तात्यासाहब ने पत्र के रूप में दिया है वह पत्र ही ओबीसी साहित्य सम्मेलन के घोषणापत्र की आधारभूत नींव है। इस साहित्य सम्मेलन के लिए राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक क्षेत्र के मान्यवर आएँगे; किंतु ओबीसी के बुद्धिजीवी वर्ग और कार्यकर्ता वर्ग के समन्वय से ओबीसी आंदोलन निश्चित ही अगले पड़ाव पर पहुँचने में सहायता होगी। अर्थात यह पहला ही साहित्य सम्मेलन होने के कारण कोई इसके सौ प्रतिशत सफल होने का भरोसा न रखे; किंतु बड़ी संख्या में ओबीसी इस सम्मेलन में उपस्थित रहेंगे, इसका भरोसा है। अपने गाँव  में बसे माँ-बाप से और बहन-भाइयों से जिनका ममता का धागा अभी टूटा नहीं है, वे सभी इस सम्मेलन में उपस्थित रहेंगे इसमें कोई आशंका नहीं है। इस सम्मेलन के अवसर पर सभी फुले-शाहू-आंबेडकर प्रेमी एकत्रित होंगे और ‘इडा पीडा जाओ, बळीचं राज्य येवो’ यह हमारी गाँव की माता-बहनों की आर्त्त पुकार अब जयघोष के रूप में आसमान को गुंजाइत करेंगे!

 

नासिक के द्वितीय ओबीसी साहित्य सम्मेलन में प्रतिपादित महत्वपूर्ण संकल्प –

  1. ओबीसी की जनसंख्या 52 प्रतिशत होने के कारण सरकार उनका स्वतंत्र साहित्य एवं संस्कृति मंडल स्थापित करें।
  2. इस मंडल के द्वारा ग्रामीण क्षेत्र के पारंपारिक साहित्य का अनुसंधान कर उसे प्रकाशित करना, ओबीसी जातियों के नवोदितों के साहित्य को प्रकाशित करना आदि परियोजनाएँ कार्यान्वित की जानी चाहिए। उसी प्रकार उस पर समीक्षात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए स्कॉलरशिप की घोषणा करें। उसके लिए आवश्यक आर्थिक प्रावधान करें।
  3. ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिक अशिक्षित होकर भी स्वयं के पोवाडे (गीत) रचकर गाते हैं, लोककथा कहते हैं, सार्वजनिक उत्सव और विवाह आदि प्रसंगों के गीत, चक्की के गीत, भारुड आदि बड़ी मात्रा में गाए जाते हैं। इन सबको साहित्य का दर्जा प्रदान कर संबंधित ग्रामीण श्रमिकों को साहित्यकार के रूप में प्रोत्साहित करें।
  4. प्रत्येक विश्वविद्यालय में ओबीसी-ग्रामीण साहित्य का स्वतंत्र विभाग स्थापित कर उस क्षेत्र के अशिक्षित साहित्यकारों का मार्गदर्शन करना, प्रोत्साहित करना और सम्मानित करना आदि कार्यक्रमों को कार्यान्वित करना चाहिए।
  5. मंडल आयोग के सभी सिफारिशों को तुरंत अमल में लाकर उसे सभी क्षेत्रों के लिए लागू करें।
  6. ओबीसी जाति के आरक्षण को सुरक्षा प्राप्त हो इसलिए उनके लिए तृतीय शेड्यूल का निर्माण किया जाए। राज्य सरकार इस प्रकार की सिफारिश तुरंत केंद्र सरकार को करें।
  7. राज्य में 52 प्रतिशत ओबीसी का स्वतंत्र मंत्रालय कार्यान्वित करें।
  8. आनेवाली 2011 की जनगणना में ओबीसी की जनगणना की जाए।
  9. ओबीसी आर्थिक विकास महामंडल में ओबीसी के लिए जनसंख्या के अनुपात में प्रावधान करें।
  10. ओबीसी छात्रों के लिए प्राथमिक पाठशाला से छात्रवृत्ति की योजना आरंभ कर उनकी शैक्षिक क्षेत्र में घटती संख्या को रोके।
  11. ओबीसी छात्रों को अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों की तरह छात्रवृत्ति प्राप्त हो।
  12. क्रिमी लेअर की सीमा 8 लाख तक बढ़ाएँ।
  13. ओबीसी के परंपरागत व्यवसायों का रूपांतर बड़े उद्योगों में हुआ है; किंतु इन उद्योगों में वे बंधुआ मजदूर के रूप में ही खट रहे हैं। इन उद्योगों में उन्हें सहकारिता तत्व पर सहभाग प्राप्त होना चाहिए।
  14. निजी क्षेत्र में भी ओबीसी आरक्षण प्राप्त हो।
  15. आय.आय.टी., आय.आय.एम. और एम्स जैसे उच्च शिक्षा के संस्थानों में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षित स्थान इसी वर्ष से पूर्णतः लागू कर पिछले दो वर्षों का बॅकलॉग पूरा करें।
  16. ओबीसी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण दें। नौकरियों में भरती की बिंदू नामावली ओबीसी पर अन्याय करने वाली है। उसमें सुधार किया जाए।
  17. खेती को उद्योग का दर्जा प्राप्त हो।
  18. लोकसभा द्वारा नियुक्त की गई नचिअप्पन समिति की सिफारिशें (क्रिमी लेअर की शर्त को हटाना, ओबीसी कर्मचारी और अधिकारियों को प्रमोशन में आरक्षण आदि) तुरंत लागू करें।
  19. क्रिकेट, हॉकी जैसे पश्चीमी खेलों को दिए गए अतिर्नित महत्व के कारण ग्रामीण-ओबीसी के खेलों को तुच्छ समझा जाता है। इसके कारण उनका खेल का दर्जा मिट रहा है। ग्रामीण-ओबीसी के गुणों को अवसर देने के लिए कबड्डी, गुल्ली-डंडा जैसे ग्रामीण खेलों को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दी जानी चाहिए।
  20. गणेशोत्सव जैसे कृत्रिम उत्सवों को अतिमहत्व देने के कारण ग्रामीण-ओबीसी के वैज्ञानिक और खेती से जुड़े बलीराजा उत्सव के जैसे उत्सव विलुप्त हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के अशिक्षित आज भी बली राजा का उत्सव बड़े पैमाने पर मनाते हैं। 70 प्रतिशत कृषि वाले देश में खेती का उत्सव देश के स्तर पर नहीं मनाया जाता। इसलिए बली राजा उत्सव को राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
  21. बहुजन महामानवों द्वारा दिए गए समतावादी और वैज्ञानिक मूल्य संस्कार रूप में प्रसारित करने के लिए उनपर आधारित पाठ्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए और उसका अध्यापन पाठशालाओं और महाविद्यालयों में किया जाना चाहिए।

सूचक :- शंकरराव लिंगे, श्रीराम काले, किशोर पुदाने, चंद्रकांत मोकल, वसंतराव मुंड

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