मोदी के नौसीखिए मंत्री

मंत्रीमंडल विस्तार के साथ जहाँ ख़राब कामकाज को कई मंत्रियों की छुट्टी करने की वजह बताया गया, वहीं गिरिराज किशोर, निरंजन ज्योति, संजीव बालियान और महेश शर्मा जैसे नफरत के तिजारतियों को बख्स दिया गया

New Delhi: HRD Minister Smriti Irani with new Cabinet minister Prakash Javadekar after a Cabinet meeting at South Block in New Delhi on Tuesday. PTI Photo by Vijay Kumar Joshi (PTI7_5_2016_000149B)

मोदी मंत्रिमंडल के बारे में जो बात सबसे खटकने वाली है वह है योग्य और अनुभवी मंत्रियों का टोटा। अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, सुरेश प्रसाद, सदानंद गौड़ा, वेंकैया नायडू, रविशंकर प्रसाद, जयंत सिन्हा, निर्मला सीतारामन और कुछ हद तक प्रकाश जावड़ेकर को छोड़ कर अधिकांश मंत्री व राज्य मंत्री नौसीखिए हैं। उन्हें सरकार चलाने का बहुत कम या कोई अनुभव नहीं हैं। यहाँ तक कि उन्होंने किसी और क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय नहीं दिया है।

यह शायद मोदी के ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सीमम गवर्नेंस’ के वायदे को साकार करने का प्रयास है! खरीदे हुए मीडिया के प्रचार अभियान के बल पर दो साल पहले सत्ता में आयी मोदी सरकार का रथ हांफने लगा है। यह सरकार कुछ भी उल्लेखनीय नहीं कर सकी है। प्रधानमंत्री विश्वभ्रमण करते रहे और संभवतः उन्होंने संसद से ज्यादा समय विदेशों में बिताया। मगर उनकी इन बहुप्रचारित विदेश यात्राओं से देश को क्या हासिल हुआ? उपलब्धियां उँगलियों पर गिनी जाने लायक हैं और नाकामयाबियाँ ढेर सारी। भारत एनएसजी में प्रवेश नहीं पा सका और अफ़ग़ानिस्तान में ख़राब होती राजनीतिक स्थितियों के चलते, उस देश के पुनर्निर्माण के भारत के प्रयास पूरी तरह विफल होते नज़र आ रहे हैं।

पीछे मुड़ कर देखने पर ऐसा लगता है कि बेहतर होता कि मोदी भारत में रहकर अपनी अनुभवहीन टीम के कार्यकलापों पर नज़र रखते। सबसे विवादित मंत्री स्मृति ईरानी को अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण कपडा मंत्रालय सौंप दिया गया है। एक तरह से यह ठीक भी है। रंगबिरंगी साड़ियाँ पहनने का उन्हें जबरदस्त शौक है और वे इस भारतीय पहनावे की ब्रांड ऍमबेसेडर हो सकती हैं।

उनसे कहीं कम खड़ूस, नए मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? दिल्लीवासी भाजपा प्रेक्षक बताते है वे मिलनसार और विनम्र हैं और मुश्किल हालातों में से निकलना उन्हें आता है। पर्यावरण मंत्रालय में उन्होंने पर्यावरणीय अनुमतियाँ ज्यादा दीं और पर्यावरण की रक्षा कम की, परन्तु ईरानी के विपरीत उन्हें नागरिक समाज और जनांदोलनों के कड़े विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसमें कोई संदेह नहीं के वे शिक्षा के निजीकरण और पाठ्यक्रमों व शिक्षण संस्थानों के भगवाकरण की प्रकिया जारी रखेंगे परन्तु साथ ही वे यह भी सुनिश्चित करेंगे कि ईरानी की तरह वे कटु हमलों का शिकार न बनें।

मोदी ने पांच राज्य मंत्रियों को ख़राब प्रदर्शन के कारण मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया और विधि मंत्रालय गौड़ा से लेकर रविशंकर प्रसाद को सौंप दिया। परन्तु जयंत सिन्हा, जो अरुण जेटली के काबिल और प्रभावी सहायक थे, को वित्त विभाग से बाहर का रास्ता क्यों दिखाया गया?  शायद इसलिए, क्योंकि उनके पिता यशवंत सिन्हा मोदी सरकार के कड़े आलोचक हैं और उन्होंने एनएसजी में प्रवेश के भारत के असफल प्रयास की निंदा करते हुए कहा था कि यह कोशिश की ही नहीं जानी थी।

मंत्रिमंडल में फेरबदल उत्तरप्रदेश में होने जा रहे महत्वपूर्ण चुनाव में भाजपा की रणनीति की ओर भी संकेत करने हैं। अनुप्रिया पटेल, जिनके ‘अपना दल’ की उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में पैठ है, को इसलिए मंत्री पद से नवाज़ा गया ताकि समाजवादी पार्टी द्वारा कुर्मी नेता बेनीप्रसाद वर्मा पर डोरे डालने के प्रयास का मुकाबला किया जा सके। कुर्मियों की उत्तरप्रदेश में खासी आबादी है। अनुप्रिया, ईरानी के लिए घातक सिद्ध हो सकतीं हैं, क्योंकि यह माना जा रहा है कि ईरानी उत्तरप्रदेश में भाजपा के प्रचार की कमान सम्हालेगीं। दिल्ली के लेडी श्री राम कॉलेज की पूर्व छात्रा अनुप्रिया युवा और परिष्कृत हैं और अगर कांग्रेस उत्तरप्रदेश में प्रियंका को मैदान में उतारती है तो अनुप्रिया भाजपा के लिए उपयोगी साबित हो सकतीं हैं।

cabinet-list-finalनए राज्य मंत्रियों में से पांच अनुसूचित जातियों के हैं: महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य रामदास अठावले (सामाजिक न्याय), कर्नाटक के रमेश जिजगिनगी (पेयजल), उत्तराखंड के अजय तमटा (कपड़ा), राजस्थान के अर्जुन राम मेघवाल (वित्त व कंपनी मामले) और उत्तरप्रदेश के कृष्ण राज (महिला व बाल विकास)।

उत्तरप्रदेश से महेन्द्रनाथ पाण्डेय, मध्यप्रदेश से अनिल माधव दवे, दिल्ली से विजय गोयल, असम से राजेन गोहेन व गुजरात से पुरुषोत्तम रुपाला व मनसुख मंदाविया उन अगड़ी जातियों के सांसदों में शामिल हैं जिन्हें राज्य मंत्री बनाया गया है। रुपाला गुजरात के मुख्यमंत्री पद के मजबूत उम्मीदवार थे और मोदी के ख़ास समर्थकों में गिने जाते हैं। वे और मंदाविया दोनों पाटीदार पटेल हैं।

आदिवासी मामलों के राज्य मंत्री गुजरात के मनसुख वसावा, जिनकी मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी गयी है, बहुत नाराज़ हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालय के कामकाज में पारदर्शिता लाने के उनके प्रयासों का परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा है। उन्होंने गुजरात सरकार पर यह आरोप लगाया कि वह आदिवासियों की बेहतरी के लिए कुछ नहीं कर रही है। हटाये गए एक अन्य मंत्री, गुजरात के ही मोहनभाई कुन्दरिया। ने कहा कि उन्हें पार्टी का निर्णय स्वीकार है।

जाने-माने पत्रकार व राजनीतिज्ञ एम.जे. अकबर अब व्ही.के.सिंह के साथ विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री होंगे। सिंह को सांख्यिकी व कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार से मुक्त कर दिया गया है।

कई प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। उत्तरप्रदेश के आगामी चुनावों के मद्देनज़र उन्हीं पुराने, घिसेपिटे जातिगत समीकरणों के आधार पर अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल कर मोदी ने देश को अपनी प्राथमिकताओं के सम्बन्ध में संदेश देने का एक सुनहरा अवसर खो दिया है। गिरिराज किशोर, महेश शर्मा, संजीव बालियान व निरंजन ज्योति, जो लगातार नफरत फैलाने वाले भाषण देते रहे हैं, को छुआ तक नहीं गया है। पंचायती राज मंत्रालय, जो जनता के हाथों में सत्ता के सूत्र सौंपने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है, का बजट 7000 करोड़ रुपये से घटा कर मात्र 96 करोड़ रुपये कर दिया गया है और उसे ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन कर दिया गया है। यह निर्णय जनता के लिए, जनता के, जनता के द्वारा शासन के सिद्धांत की बलि देना है।

आम आदमी के किये इस फेरबदल में कुछ भी नहीं है। मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा भर है। हमारा और आपका अच्छे दिनों का इंतज़ार अभी जारी रहेगा। सरकार उसी पुराने ढर्रे पर चलती रहेगी। मोदी भारत की ज़मीन, पानी और बाज़ार के सेल्समेन बतौर दुनिया की सैर करते रहेंगे और वे व उनके मंत्री अपना समय और देश का धन बर्बाद करना जारी रखेगें।

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