शेक्सपियर और सवर्ण मनोग्रंथि

एक योग्य व कुशल व्यक्ति को रूढ़िबद्ध धारणा के चश्मे से देखकर, शेक्सपियर की रचना, नस्ल के मुद्दे पर जनचेतना जाग्रत करने की संभावनाओं पर पानी फेर देती है

Thomas_Keene_in_Othello_1884_Posterसाहित्य में बाहरी, विदेशी या किसी भी ‘दूसरे’ का प्रस्तुतीकरण अक्सर पूर्वाग्रहपूर्ण, एकतरफा, विरूपित और तथ्यों की अनदेखी करने वाला होता है। काली व भूरी चमड़ी वालों, एशियाईयों, यहूदियों, दलितों और महिलाओं सहित अतीत व वर्तमान के सभी वंचित समूहों के प्रस्तुतीकरण में यह स्पष्ट नज़र आता है।

मैं इस लेख में शेक्सपियर के साहित्य में ‘दूसरे’ के नस्लीय व अन्य विरूपणों और सवर्णों द्वारा लिखित दो उपन्यासों में दलितों को बेआवाज़ व तुच्छ समुदाय के रूप में प्रस्तुतीकरण की संक्षिप्त विवेचना कर रहा हूँ।

शेक्सपियर के चरित्र हैं: ‘ऑथेलो’ का ऑथेलो और ‘द टेम्पेस्ट’ का कैलिबेन और दलित चरित्र हैं मुल्कराज आनंद के उपन्यास ‘अनटचेबिल’ का बाखा और अरुंधती रॉय के उपन्यास ‘द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स’ का वेलुथा।

पर सबसे पहले मैं ‘भारतीय साहित्य’ पर कुछ कहना चाहूँगा।  क्या इसे ‘सवर्ण साहित्य’ या ‘जातिवादी साहित्य’ नहीं कहा जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जिस तरह सबाल्टर्न साहित्य को ‘जाति-विरोधी’, ‘बहुजन’, ‘दलित’ या ‘अल्पसंख्यक’ (दरअसल ‘बहुसंख्यक’) साहित्य कहा जाता है? तथाकथित प्रगतिशीलों द्वारा लिखित सवर्ण साहित्य में भी समाज पर अपना वर्चस्व और प्राधान्य स्थापित करने के अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए, सवर्ण, भारतीयता के प्रतिनिधि व संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं। आश्चर्य नहीं कि यह साहित्य, सवर्णों की ‘सांस्कृतिक पूंजी’ बन जाता है। अश्वेतों और दलितों को साहित्य में उनके उचित स्थान से वंचित किया जाता है और सत्ता के चहेते बुद्धिजीवियों द्वारा इन वर्गों के भोगे यथार्थ को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है। इससे इन वर्गों का अलगाव और बढ़ता है। साहित्य में इस तरह के प्रस्तुतीकरण, उस राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भेदभाव और दमन को प्रतिबिंबित करते हैं, जो सदियों से हो रहे हैं और आज भी जारी हैं। वंचित वर्गों के व्यक्तियों और समूहों का यह सोचा-समझा विरूपण इस डर– जो काल्पनिक भी हो सकता है – से किया जाता है कि वे वर्चस्वशाली समूहों की सत्ता और विशेषाधिकारों के लिए चुनौती हैं। यद्यपि किसी दलित या अश्वेत व्यक्ति विशेष में कोई कमी या दोष हो सकता परन्तु यह पूरे समुदाय के मुंह पर कालिख पोतने का आधार नहीं बन सकता। कैरेबियन अश्वेत बुद्धिजीवी फ्रान्त्ज़ फेनन, श्वेतों के अश्वेतों के प्रति दृष्टिकोण का सार इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं: “यूरोप में, अश्वेत व्यक्ति बुराई का प्रतीक है” (‘ब्लैक स्किन, वाइट मास्क्स’, 2008)।  यही बात दलितों के प्रति सवर्ण लेखकों और बुद्धिजीवीयोँ के दृष्टिकोण के बारे में भी सही है: दलित बुराई के प्रतीक हैं। सवर्ण साहित्य को भारतीय साहित्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है परन्तु यह साहित्य देश के बहुसंख्यक लोगों को स्वर और गरिमा नहीं प्रदान करता। इस अर्थ में यह शेक्सपियर के साहित्य, जिसकी हम अब चर्चा करेगें, से कहीं ज्यादा कपटी है।

एलिजाबेथ काल, जिसमें शेक्सपियर का नाटक ऑथेलो लिखा गया, में विदेशियों, विशेषकर यहूदियों और अश्वेतों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। नाटक का मुख्य पात्र ऑथेलो, वेनिस निवासी मूर (मुसलमान) है परन्तु वेनिस की सेना का एक जनरल भी है। वह न तो वर्चस्वशाली सांस्कृतिक समूह में शामिल है और ना ही सत्ताधारी राजनैतिक समूह का हिस्सा है। परन्तु वह श्वेतों के श्रेष्ठता भाव को चुनौती देता है, क्योंकि वह एक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण पद पर है। वह श्वेतों की ईर्ष्या का पात्र भी है। शेक्सपियर की रचना, एलिजाबेथ काल में अश्वेतों व विदेशियों के प्रति व्याप्त भय और संदेह के भाव को प्रतिबिंबित करती है। यह भय और चिंता ऑथेलो के प्रति घृणा का रूप ले लेती है। ऑथेलो का सामना सांस्कृतिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूह से है परन्तु वह दब्बू नहीं है। वह वर्चस्ववादी व्यवस्था के सामने घुटने नहीं टेकता, बल्कि वह अपनी ताकत का खुलकर इस्तेमाल करता है और श्वेत वर्चस्वादियों के आँखों में खटकने लगता है।

बाहरी व्यक्ति (ऑथेलो) को ख़त्म कर डालने की श्वेत नस्ल की तमन्ना को प्रतिबिंबित करता है इआगो, जो सफ़ेद रंग का प्रतिनिधि है। ऑथेलो का अस्तित्व, श्वेतों के सांस्कृतिक वर्चस्व का मखौल है। अतः ऑथेलो को या तो चुप कराना होगा या उसका विरूपण करना होगा। इआगो लगातार ऑथेलो की छवि को विकृत करने में लगा रहता है ताकि उस ‘काले मेढ़े’ को पदच्युत किया जा सका। वह ऑथेलो के लिए ‘काले मेढ़े’ (ब्लैक रेम) शब्द का इस्तेमाल इसलिए करता है क्योंकि वह यह बताना चाहता है कि ऑथेलो मनुष्य कम पशु ज्यादा है।  ब्राबंटीयो की यह मान्यता कि ऑथेलो किसी श्वेत महिला का सहचर बनने के काबिल नहीं है, भी नस्लीय सोच की प्रतीक है। ऑथेलो के पुरुषत्व पर प्रहार, अश्वेत नस्ल और विशेषकर अश्वेत पुरुषों को नीचा दिखाने का प्रयास है। इआगो केवल एक चरित्र का नाम नहीं है, वह प्रत्येक अश्वेत व्यक्ति के मनुष्यत्व को योजनाबद्ध तरीके से चोट पहुंचाने की तकनीक भी है।  एक योग्य व कुशल व्यक्ति को रूढ़िबद्ध धारणा के चश्मे से देखकर, शेक्सपियर की रचना, नस्ल के मुद्दे पर जनचेतना जाग्रत करने की संभावनाओं पर पानी फेर देती है।

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1978 में ‘टेम्पेस्ट’ के एक मंचन में कैलिबेन की भूमिका में डेविड सचेट (बाएं) और मोरिअरिटी तथा रिचर्ड ग्रिफिथ्स

ऑथेलो के ‘द टेम्पेस्ट’ में एक चुड़ैल के पुत्र कैलिबेन के चरित्रों के शेक्सपियर के प्रस्तुतीकरण में कुछ समानताएं हैं और कुछ असमानताएं। कैलिबेन एक ऐसे द्वीप का वासी है, जिस पर मिलान से निष्कासित एक ड्यूक प्रोस्पेरो ने कुछ ही समय पूर्व अपना शासन स्थापित किया है। प्रोस्पेरो का शासन कैलिबेन को मंज़ूर नहीं है। कैलिबेन के भाषा कौशल के संबंध में प्रोस्पेरो की टिप्पणियोँ से ऐसा बोध होता है कि वह यह मानता है कि कैलिबेन में सभ्यता और संस्कृति का अभाव है।  इससे ऐसा प्रतीत होता कि प्रोस्पेरो की संस्कृति ‘उच्च’ है और उसका वर्चस्व, स्वाभाविक। कैलिबेन भी अपनी नाकाबलियत को स्वीकार पर, एक तरह से प्रोस्पेरो की संस्कृति की श्रेष्ठता  पर मुहर लगा देता है। यद्यपि कैलिबेन को निम्न नैतिकता, भाषा और संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तथापि चूँकि वह समर्पण कर देता है इसलिए उसे प्रोस्पेरो की संस्कृति में समाहित कर लिया जाता है और ओथेलो के विपरीत, उसे जान से नहीं मारा जाता। हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि शेक्सपियर की दुनिया में, कोई सबाल्टर्न तभी जिंदा रह सकता है जब वह दमनकर्ता की भाषा, संस्कृति और राजनीति को अपना ले। जैसा कि भाषा के सांस्कृतिक वर्चस्वाद में भूमिका के बारे में फेनन लिखते हैं, “बोलने का  अर्थ है किसी संस्कृति को अपनाना, किसी सभ्यता का हिस्सा बनना” (फेनन, 2008, पृष्ठ 8)।

भारतीय साहित्य में

मुल्कराज आनंद अंग्रेजी के पहले भारतीय उपन्यासकारों में से एक थे। जाहिर है, सबाल्टर्न वर्ग के उनके प्रस्तुतीकरण ने बाद के लेखकों को भी प्रभावित किया। उनके पहले उपन्यास ‘अनटचेबिल’ के सबाल्टर्न मुख्य पात्र बाखा का चित्रण उसी तरह की विकल्पहीनता का शिकार है, जिसका सामना हमारे देश की बहुसंख्यक आबादी को करना पड़ता है। बाखा एक हट्टाकट्टा लड़का है, जो जाति से मेहतर है और मैला साफ़ करने का काम करता है। उसे आनंद ने एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसे शिक्षा पाने और अंग्रेजों जैसे कपड़े और जूते पहनने की उत्कट इच्छा है। ऐसा लगता है कि आनंद के लिए दलित दया के पात्र हैं। यह गाँधी के दलितों के प्रति संरक्षणात्मक नजरिये से मिलताजुलता है, जिसके चलते उन्होंने दलितों को हरिजन का नाम दिया था। बाखा ईसाई बनने की हिम्मत नहीं जुटा पाता और इसलिए उसकी मुक्ति इसी में हैं कि फ्लश की व्यवस्था वाले शौचालयोँ की संख्या बढ़े। दूसरे शब्दों में, आधुनिक टेक्नोलॉजी ही उसकी मुक्ति की वाहक है। परन्तु आनंद के इस बात पर विचार नहीं करने कि कारण है कि जहाँ प्रोटोस्टेंट ईसाईयों ने इस तरह की तकनीकी का विकास किया, वहीं हम भारतीयों ने ऐसा क्यों नहीं किया! आनंद का बाखा, अपचयवाद और भाग्यवाद का प्रतीक है। वह वर्णाश्रम धर्म, जिसका (परोक्ष रूप से) आनंद समर्थन करते दिखते हैं, का शिकार तो है ही, वह अनिर्णय का शिकार भी है। वह यह तय नहीं कर पाता कि उसकी मुक्ति की राह क्या है और क्या धर्मपरिवर्तन उसे मुक्ति दिलाएगा।

अगर मुल्कराज आनंद, अंग्रेजी में लिखने वाले शुरूआती भारतीय सवर्ण लेखकों में थे तो अरुंधती रॉय, आनंद का समकालीन संस्करण हैं। वे 1990 के बाद के सवर्ण साहित्य के दलित मुद्दों को पर्याप्त मजबूती से न उठा पाने की असफलता की प्रतीक हैं। याद रहे कि 1990, बाबासाहेब का जन्म शताब्दी वर्ष था। रॉय का बुकर पुरस्कार विजेता उपन्यास ‘द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स’, ‘प्रगतिशील’ केरल में व्याप्त सामाजिक प्रतिबंधों और इस रचना के पात्रों पर उनके प्रभाव के बारे में है। वेलुथा एक मेधावी राजनीतिक कार्यकर्ता है परन्तु उसके दलित होने के कारण उसकी राय को कम्युनिस्ट पार्टी में अपेक्षित महत्व नहीं मिलता (और रॉय भी नहीं देतीं)। यहाँ ब्राह्मणवाद का चेहरा है एक सवर्ण ईसाई परिवार, जिसके ऑक्सफ़ोर्ड-शिक्षित सदस्य वेलुथा जैसे दलितों को इस क्रन्तिकारी पार्टी में उच्च पदों पर नहीं देख सकते। इससे, सवर्ण साहित्य की प्रगतिशीलता का पाखंड उजागर होता है। ऑथेलो के तरह, अंत में वेलुथा भी मारा जाता है। इन रचनाओं में सबाल्टर्न पात्रों की सीमाएं जिस तरह से निर्धारित की गयीं हैं, उनके लेखकों के सामाजिक सरोकारों का पर्दाफाश होता है। रॉय का उपन्यास, प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की जाति व्यवस्था में जकड़ी मानसिकता को उजागर करता है। ये बुद्धिजीवी जाति व्यवस्था को चिरायु बनाये रखने में सहायक हैं।

चाहे वह शेक्सपियर का साहित्य हो या सवर्ण साहित्य, दोनों में सबाल्टर्न पात्रों का चित्रण यह बताता है कि किस प्रकार वर्चस्वशाली राजनैतिक तंत्र, साहित्य का इस्तेमाल सबाल्टर्न वर्ग का मिथ्या निरूपण करने के लिए कर रहा है और जनभावना  को श्रेष्ठि वर्ग के वर्चस्व को स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहा है। इससे इन बेआवाज़ समूहों को भारी क्षति हुई है।

यह नुकसान तब और बढ़ जाता है जब बहुजन, दलित और सबाल्टर्न अध्येता, सवर्ण बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित सैद्धान्तिक ढांचे के अन्दर रहते हुए उन सबाल्टर्न लेखकों के साहित्य की व्याख्या करते हैं, जो अभी उभर ही रहे हैं और अपने दमित अतीत को पीछे छोड़कर अपनी बात रख रहे हैं।  ‘मनुस्मृति’ जैसे ग्रंथों की नस्लवादी, महिला-विरोधी और जातिवादी मानसिकता, हमारे तथाकथित प्रगतिशीलों की मानसिकता में अनजाने ही प्रवेश कर चुकी है और इस कारण वे ‘अन्य’ को अमानवीय तरीके से प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि आलोचक एवं जनबुद्धिजीवी के. के. कोचु लिखते हैं, “यह विचार कि दलित हमेशा से और हमेशा के लिए गुलाम हैं, उनके लिए सांस्कृतिक विमर्श के द्वार बंद कर देता है। हम इतिहास में सबाल्टर्न लोगों की अनुपस्थिति और अदृश्यता का अंत तभी कर सकते हैं जब हम राष्ट्रीय, आधुनिक और मार्क्सवादी इतिहासलेखन को विखंडित करें क्योंकि यही सवर्णों की शक्ति को संस्थागत रूप देते हैं” (के. के. कोचु, नो अल्फाबेट इन साईट, 2011)। मैंने शेक्सपियर, मुल्कराज आनंद और अरुंधती रॉय के साहित्य से सम्बंधित इस लेख में मैंने यही करने का प्रयास किया है।

(बहुजन साहित्य से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें ‘फॉरवर्ड प्रेस बुक्स’ की किताब ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ (हिंदी संस्करण) अमेजन से घर बैठे मंगवाएं . http://www.amazon.in/dp/8193258428 किताब का अंग्रेजी संस्करण भी शीघ्र ही उपलब्ध होगा)

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  1. विवेक बंजारे Reply

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