दलितों के मनोबल के लिए हथियार जरूरी!

बहरहाल मनोबल से लैस करने में हथियारों की अहमियत दुनिया का कोई और समाज समझे या न समझे किन्तु भारत के हर जागरूक व्यक्ति को ही इसकी अहमियत का अहसास होना चाहिए, क्योंकि यह एक मात्र भारत समाज है, जहां सदियों पूर्व अस्त्र-शस्त्र से लैस एक जाति विशेष के मनोबल को एवरेस्ट सरीखा बुलंद करने का विरल दृष्टांत स्थापित किया गया

वैसे तो दलित-उत्पीड़न राष्ट्र के दैनिक जीवन का अंग बन चुका है। मार-पीट, गाली-गलौच, हत्या–बलात्कार जैसी दलित उत्पीड़न की सैकड़ों घटनाएँ नियमित रूप से घटित होते रहती हैं। किन्तु इन रूटीन घटनाओं के मध्य ही थोड़े-थोड़े अन्तराल पर कुछ ऐसी घटनाएँ जनता के समक्ष आ जाती हैं कि आमतौर पर निर्लिप्त रहने वाला राष्ट्र इस समस्या पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य हो जाता है। ऐसी ही एक घटना 11 जुलाई को गुजरात के गीर-सोमनाथ जिले के ऊना शहर में घटित हुई,जहां मरी हुई गाय का खाल उतारने के जुर्म में चार दलितों को सरियों और डंडों से बुरी तरह पीटने के बाद कार के पीछे रस्सी से बांध कर घसीटते और पीटते हुए थाने ले जाया गया। विगत दो वर्षों में हिंदुत्ववादी सत्ता के केंद्र में कायम होने के बाद से कई प्रान्तों सहित खुद गुजरात में भी इस किस्म की कई घटनाएं घटीं, किन्तु ऊना की घटना को अंजाम देने वाले गोरक्षकों का दुर्भाग्य यह रहा कि उन्होंने दुस्साहस की सारी हदें पार करते हुए इस्लामिक स्टेट के आतंकियों की भांति पूरी घटना का वीडियो बना कर खुद ही वायरल कर दिया, ताकि दूसरे गोरक्षकों का हौसला बढ़े। लेकिन सोशल मीडिया में इसके वायरल होते ही राष्ट्र स्तब्ध रह गया और दलित-वंचित समुदाय के लोग गुस्से से फट पड़े।

ऊना की घटना में नया मोड़ : मायावती का भाषण 

Dalit-protest-in-Gujaratसोशल मीडिया पर बहुजनों की सक्रियता से यह घटना राष्ट्रमय प्रचारित हो गयी, किन्तु मुख्यधारा की मीडिया सोयी रही और राजनेता ख़ामोशी अख्तियार किये रहे। इस बीच वहां के दलित इस घटना को लेकर संगठित होने लगे। घटना की गंभीरता को देखते हुए वहां की भाजपा सरकार द्वारा कुछ पुलिस वालों को सस्पेंड भी किया गया। लेकिन इसमें नया मोड़ ठीक एक सप्ताह बाद तब आया जब संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन अर्थात 18 जुलाई को बसपाध्यक्ष मायावती ने बेहद आक्रामक अंदाज में संसद में ऊना के दलित उत्पीड़न का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि मरे जानवरों का चमड़ा उतारने वाले लोगों के साथ दबंगों और असामाजिक तत्वों ने अमानवीय व्यवहार किया है। राज्य की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि उसने आरोपियों पर त्वरित कार्रवाई करने में देरी की है। उन्होंने भाजपा को दलित विरोधी बताते हुए साफ़ तौर पर कह दिया कि जबसे भाजपा केंद्र की सत्ता में आई है, तबसे देश भर में दलितों पर अत्याचार बढ़ा है। इसी दौरान बसपा के सदस्यों ने सरकार विरोधी नारे लगाना शुरू कर दिए। इससे हंगामा इतना बढ़ गया कि कुछ समय के लिए सदन को स्थगित करना पड़ गया।

पता नहीं बसपा सुप्रीमो की संसद में आक्रामक भूमिका से कोई सम्बन्ध है या महज संयोग है कि मायावती के भाषण के कुछ देर बाद ही गुजरात के दलितों के विरोध ने उग्र रूप धारण कर लिया। गुस्साए दलितों ने राजकोट जिले के धोराजी कस्बे में दो सरकारी बसों में आग लगा दी। जामनगर के धरोल कसबे में भी एक सरकारी बस को जला दिया एवं राजकोट से पोरबन्दर को जोड़ने वाले एनएच-27 को भी ब्लॉक कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने राजकोट कलेक्टर ऑफिस के सामने धरना दे कर धर्मान्तरण की इच्छा जताना शुरू किया। गोरक्षकों की बर्बरता से एक दर्जन के करीब दलितों ने फिनाइल व कीटनाशक पी कर आत्महत्या का प्रयास किया, जिसमें एक व्यक्ति की मौत भी हो गयी। इसी दिन उग्र धरना-प्रदर्शनों के बीच कुछ दलितों ने तीन ट्रकों में भरी मृत गए गायें लाकर सुरेन्द्र नगर कलेक्टर ऑफिस के सामने फेंक दिया। इसके बाद सौराष्ट्र के जामनगर, पोरबंदर, अमरेली, राजकोट इत्यादि सहित अन्य कई शहरों में हिंसा, आगजनी तथा हाईवे जाम की घटनाओं में और इजाफा हो गया। 20 जुलाई को ऊना की अमानवीय घटना के विरोध में गुजरात बंद का आह्वान किया गया। बंद के दौरान राज्य भर में ट्रेन-बसें रोकने, आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस के साथ झडपें हुईं तथा मान-अपमान से दग्ध कुछ दलितों ने आत्मदाह का प्रयास किया। इन पक्तियों को लिखने के दौरान गुजरात में दलितों के उग्र धरना-प्रदर्शनों का सिलसिला पूर्ववत जारी है।

सुरेन्द्र नगर में एक नया अहिंसक आन्दोलन : मृत पशु

surendranagarबहरहाल ऊना की बर्बर घटना के बाद जो कुछ हो रहा है, वह नया नहीं है। बाकी जगहों पर भी ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आने के बाद दलित उग्र धरना-प्रदर्शन करते रहे हैं, किन्तु दो बातों के कारण गुजरात के दलितों का विरोध ऐतिहासिक हो गया है। पहला सुरेन्द्र नगर कलेक्टर ऑफिस के सामने मृत मवेशी फेंकना और दूसरा मोरवी जिले के 200 दलितों द्वारा बन्दूक के लिए आवेदन करना। जहां तक सुरेन्द्र नगर कलेक्टर ऑफिस के सामने मरे हुए मवेशी फेंकने का सवाल है, इस घटना ने अभूतपूर्व तरीके से राष्ट्र का ध्यान खींचा। सोशल मीडिया फेंके गए मृत पशुओं से पट गयी। दलितों ने इसके समर्थन में सारी सीमाएं तोड़ी ही, विवेकवान गैर-दलितों तक का भी इसे भरपूर समर्थन मिला। कुछ दलित बुद्धिजीवियों ने तो सुरेन्द्र नगर अभियान की तुलना अंग्रेज भारत में महात्मा गांधी के उस ‘असहयोग आन्दोलन’ से कर दी जो कालांतर में भारत की आजादी में मील का पत्थर साबित हुआ। सचमुच गुजरात के दलितों ने सुरेन्द्र नगर अभियान के जरिये दलितों को एक ऐसा अभिनव अहिंसक हथियार सुलभ करा दिया है, जिसका इस्तेमाल कर बर्बर हिन्दुओं का होश ठिकाने लाया जा सकता है।

दलितों ने किया बंदूकों के लिए आवेदन

बहरहाल सुरेन्द्र नगर में गुजरात के दलितों द्वारा इस्तेमाल किये गये ‘अहिंसक हथियार’  ने जितना राष्ट्र का ध्यान आकर्षित किया, उसके मुकाबले मोरवी के दलितों द्वारा बंदूकों के लिए किया गया आवेदन प्रायः पूरी तरह उपेक्षित रहा गया। लेकिन इसमें दलित उत्पीड़न से निजात के जितने भरपूर तत्व हैं, उसे देखते हुए इसे बहश का बड़ा मुद्दा बनना चाहिए था। खैर! मोरवी के दलितों ने आग्नेयास्त्र की मांग उठा कर एक नयी जमीन तोड़ने का प्रयास किया है, इसे जानने के लिए दलित उत्पीड़न के प्रतिकार पर डॉ. आंबेडकर की राय जान लेना श्रेयस्कर होगा।

दलित उत्पीड़न पर डॉ. आंबेडकर की राय 

डॉ. आंबेडकर ने वर्षों पहले दलित उत्पीड़न पर अपना विचार प्रस्तुत करते हुए कहा था- ‘ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न हैं। एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय या अत्याचार का प्रश्न नहीं है, बल्कि एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर जबरदस्ती से किये जा रहे आक्रमण और जुल्म, शोषण तथा उत्पीड़न का प्रश्न है. किस तरह से इस वर्ग कलह से अपना बचाव किया जा सकता है, इसका विचार करना आवश्यक है। इस वर्ग कलह से अपना बचाव कैसे होगा, इस प्रश्न का निर्णय करना मैं समझता हूँ मेरे लिए कोई असंभव नहीं है। यहाँ इकठ्ठा हुए आप सभी लोगों को एक ही बात मान्य करनी पड़ेगी और वह यह कि किसी भी कलह में, संघर्ष में, जिनके हाथ में सामर्थ्य होती, उन्ही के हाथ में विजय होती है। जिनमें  सामर्थ्य नहीं उन्हें अपनी विजय की अपेक्षा रखना फिजूल की बकवास है। इसके समर्थन में अन्य कोई आधार खोजने की बात ही फिजूल है। इसलिए तमाम दलित वर्ग को अब अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकट्ठा करना बहुत जरुरी है।’ दलितों पर हो रहे शोषण-उत्पीड़न के प्रतिकार के लिए बल संचित करने का सुझाते हुए उन्होंने आगे कहा था-

तीन बल से शून्य : दलित

‘मनुष्य समाज के पास तीन प्रकार का बल होता है। एक है मनुष्य-बल। दूसरा है धन-बल और तीसरा है मनोबल। मनुष्य बल की दृष्टि से आप अल्पसंख्यक ही नहीं, संगठित भी नहीं हैं। धन-बल की दृष्टि से देखा जाय तो आपके पास थोड़ा-बहुत जनबल तो है भी लेकिन धनबल तो बिलकुल ही नहीं है। सरकारी आकड़ों के अनुसार देश की कुल आबादी में 55 प्रतिशत जो जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रही है, उसका 90 प्रतिशत अंश दलित वर्ग का ही है। मानसिक बल की तो उससे भी बुरी हालत है। सैकड़ों साल से हिन्दुओं द्वारा हो रहे जुल्म, छि-थूक, मुर्दों की भांति बर्दाश्त करने के कारण प्रतिकार करने की आदत पूरी तरह नष्ट हो गयी है। आप लोगों के आत्मविश्वास, उत्साह और महत्वाकांक्षा की चेतना का मूलोच्छेद कर दिया गया है। हम भी कुछ कर सकते हैं, इसका विचार ही किसी के मन में नहीं आता। ’बहरहाल बाबा साहेब डा. आंबेडकर ने हिन्दुओं के जुल्म से दलितों को निजात दिलाने के लिए जो तीन किस्म के बल से लैस करने का सुझाव दिया था, उस दिशा में जहां दलित संगठनों की ओर से उन्हें एकबद्ध कर जनबल से समृद्ध करने का प्रयास हुए वहीँ राज्य द्वारा उन्हें विभिन्न योजनाओं के जरिये कुछ-कुछ धन-बल से लैस करने का प्रयास हुआ, पर ‘मनो-बल’ को प्रायः पूरी तरह उपेक्षित कर दिया गया। अगर दलित उत्पीड़न पर छाती पीटने वाले असंख्य सामाजिक संगठनों ,राजनीतिक दलों और सरकारों ने ‘मनो-बल’ की अहमियत को समझा होता, तब निश्चय ही उन्होंने दलितों को हथियारों से लैस करने का उपक्रम चलाये होते।

मनो-बल की समस्या

बहरहाल मनोबल से लैस करने में हथियारों की अहमियत दुनिया का कोई और समाज समझे या न समझे किन्तु भारत के हर जागरूक व्यक्ति को ही इसकी अहमियत का अहसास होना चाहिए, क्योंकि यह एक मात्र भारत समाज है, जहां सदियों पूर्व अस्त्र-शस्त्र से लैस एक जाति विशेष के मनोबल को एवरेस्ट सरीखा बुलंद करने का विरल दृष्टांत स्थापित किया गया। जी हां! बात क्षत्रियों की कर रहा हूँ। सहस्रों वर्ष पूर्व आर्य मनीषियों ने शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) के बंटवारे के इरादे से वर्ण-व्यवस्था का जो प्रवर्तन किया, उसमें बौद्धिक और धार्मिक कर्म ब्राह्मणों, पशु पालन ,व्यवसाय-वाणिज्य वैश्यों और राज्य संचालन, भूस्वामित्व ,सैन्य वृत्ति क्षत्रियों के लिए आरक्षित की गयी। किन्तु क्षत्रियों को सैन्य-वृत्ति आरक्षित करने के क्रम में उन्हें एक ऐसे विशेष अधिकार से समृद्ध किया गया, जिसके फलस्वरूप चिरकाल के लिए बाकी जातियां डरपोक बनने के लिए अभिशप्त हुईं।

क्षत्रियों के मनोबल का कारण : अस्त्र-शस्त्र पर एकाधिकार

जी हां, यह एकमात्र क्षत्रिय रहे, जिन्हें हजारों वर्ष पूर्व अस्त्र-शस्त्र के संचालन का अधिकार सुरक्षित हुए। अकेले अस्त्र-शस्त्र रखने के शास्त्र-सम्मत अधिकार के चलते भारतीय समाज में क्षत्रियों की हैसियत जन-अरण्य के सिंहों जैसी हो गयी। चूंकि ब्राह्मणों ने खुद की छवि भूदेवता के रूप में निर्मित कर सत्तर वर्ष के क्षत्रियों तक को दस वर्ष के अपने बच्चों के क़दमों में झुकाने का प्रावधान कर लिया था, इसलिए उनके मनोबल पर तो विपरीत असर नहीं पड़ा,किन्तु शेष जातियां चिरकाल के लिए सिंहों (क्षत्रियों) के समक्ष बकरी बनने के लिए विवश हुई। यहां तक कि वैश्य वित्तशाली होकर भी क्षत्रियों की अनुकम्पा जीतने के लिए आज भी प्रयासरत रहते हैं। यही कारण है हमारे यूपी पूर्वांचल में वैश्यों को लेकर यह कहावत आज भी खूब प्रचलित है- ‘बनिया क जीउ धनिया बराबरठ’। ’बहरहाल सदियों पूर्व भारतीय समाज में एकमात्र क्षत्रियों को हथियारों से लैस करने के परिणाम स्वरूप आज भी उनका मनोबल इतना उंचा रहता है कि एक क्षत्रिय का लड़का भी यदि लाठी-डंडा लेकर बहुजनों की बस्तियों में पहुंच जाता है तो लोग भींगी बिल्ली बन जाते हैं। क्षत्रियों के इस मनोबल का राज शायद सबसे पहले गुरु गोबिंद सिंह ने समझा इसलिए उन्होंने किसी जाति विशेष को नहीं, सम्पूर्ण सिख समुदाय के स्त्री-पुरुषों को ही कृपाण से लैस कर मनोबल के लिहाज से सिख समुदाय को एक विरल मानव समुदाय में तब्दील कर दिया।

दलितों का मनोबल बढाने में : हथियारों की अनदेखी     

अब जहां तक दलितों का सवाल है, उन्हें भी शूद्रों के साथ शक्ति के तमाम स्रोतों सहित अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग से वंचित किया गया। किन्तु शूद्रों के मुकाबले भी दलितों का मनोबल इसलिए निम्न स्तर पहुँच गया क्योंकि हिन्दू धर्म-शास्त्रों के सौजन्य से इनकी हैसियत मनुष्य नहीं, मनुष्येतर प्राणी जैसी बना दी गयी, जिनसे खुद अधिकार व मनोबल-शून्य शूद्र  तक घृणा करने की हैसियत अख्तियार कर लिए। धर्म शास्त्रों द्वारा हथियार निषिद्ध मानवेतर प्राणी में तब्दील किये जाने के कारण ही दलित हजारों साल से हिन्दुओं द्वारा हो रहे जुल्म, छि-थूक, मुर्दों की भांति बर्दाश्त करने के लिए अभिशप्त रहे; हजारों साल से अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग के वर्जित रहने के कारण ही आज इक्कीसवीं सदी में भी दलितों का मनोबल करुणतर है। हां, इनमें दुसाध, महार इत्यादि जैसी कुछ कथित लड़ाकू अस्पृश्य जातियों का मनोबल जरुर थोडा ठीक-ठाक है लेकिन ऐसा इसलिए नहीं है कि इनका शरीर किसी अलग धातु से बना है या ये शारीरिक रूप से अतिरिक्त मजबूत हैं ,बल्कि इसलिए कि इन्हें कतिपय कारणों से अंग्रेजों के सौजन्य से दो-ढाई सौ साल पहले फौजी, चौकीदार इत्यादि बनकर हथियार स्पर्श करने का अवसर मिला। अस्त्र-शस्त्र के इस्तेमाल के अवसर से दुर्बल से दुर्बल व्यक्ति भी बड़े से बड़े हट्टे-कट्टे व्यक्ति के खौफ से मुक्त रहता है, इस सार्वदेशिक सच्चाई को अगर भारत के सामाजिक कार्यकर्त्ताओं , बुद्धिजीवियों और नेताओं ने दृष्टिगत रखे होते तो दलितों को हथियार सुलभ कराने की दिशा में अवश्य कुछ उपक्रम चलाये होते। लेकिन उन्होंने इस अप्रिय सच्चाई तक से भी आंखे मूंदे रखा कि यदि दलित हथियारों से लैस होते उनसे अपार घृणा करने वाले हिन्दू कुम्हेर,चकवाडा, एकलेरा, नवलपुर, पिन्ट्री देशमुख, सीखरा ,बेलछी, पिपरा, लक्ष्मणपुर बाथे, भगाणा, डांगावास या ताजातरीन ऊना जैसे काण्ड अंजाम देकर अंतररार्ष्ट्रीय जगत में भारत की छवि एक बर्बर राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में शायद कभी सफल नहीं हो पाते।

भोपाल घोषणा में उठी : दलितों को हथियार सुलभ करने की मांग   

बहरहाल आजाद भारत में दलित-उत्पीड़न को कम करने में हथियारों की अहमियत का पहली बार अहसास का दिग्विजय सिंह के सौजन्य से 12-13 जनवरी, 2002 को आयोजित भोपाल सम्मलेन में चंद्रभान प्रसाद के नेतृत्व में दलित बुद्धिजीवियों ने कराया। उस कांफ्रेंस में शिरकत किये देश भर के चुनिन्दा दो-ढाई सौ दलित बुद्धिजीवियों ने दो दिनों तक दलितों की आर्थिक-शैक्षिक, सामाजिक इत्यादि गहन चिंतन-मंथन किया। उसके बाद 13 जनवरी की शाम डाइवर्सिटी केन्द्रित 21 सूत्रीय ऐतिहासिक भोपाल घोषणा पत्र जारी हुआ। इसी भोपाल घोषणापत्र में पहली बार दलितों को धन-बल से संपन्न करने के लिए जहां नौकरियों से आगे बढ़ कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि सहित समस्त आर्थिक गतिविधियों में हिस्सेदारी दिलाने का एजेंडा प्रस्तुत किया गया ,वहीँ दलितों का मनोबल बढाने के लिए राज्य के समक्ष एक भिन्न एजेंडा रखा गया।

21 सूत्रीय भोपाल घोषणापत्र के एजेंडा नम्बर-16 में सरकारों के समक्ष सुझाव रखा गया – ‘सरकार अनुसूचित जाति (अजा) और अनुसूचित जनजाति (अजजा)  की सुरक्षा की स्वयं अकेले जिम्मेवारी ले। सरकार, अधिक अत्याचार वाले क्षेत्रों की पहचान कर वहां सशस्त्र बल तैयार करे। इसके अलावा, अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रावधान के अनुसार अत्याचारों से रक्षा के लिए अजा और अजजा के लोगों को हथियारों के लायसेंस दिए जाएं, गाँव स्तर से ऊपर तक दलित आत्मरक्षा समूहों के गठन को अनिवार्य किया जाय तथा अपराधियों व अत्याचार करने वालों से स्वयं की रक्षा करने के लिए दलित महिलाओं को हथियार चलाने का विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया जाय। ’

बहरहाल आजाद भारत में दलितों को शक्ति के स्रोतों में मुकम्मल हिस्सेदारी व उन्हें हिन्दुओं के जुल्मों से निजात दिलाने के लिए जैसा ठोस सुझाव भोपाल घोषणा पत्र में आया,वह खुद में एक मील का पत्थर है। आज तमाम दलित संगठन ही अपने-अपने तरीके से नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप,ठेकों इत्यादि में मांग उठा रहे हैं, वह भोपाल घोषणा पत्र का ही असर है। ऐसी मांगे उठाने का असर सरकारों पर भी पड़ रहा है। कई सरकारें दलित-वंचितों को ठेकों, सप्लाई, डीलरशिप इत्यादि में कुछ-कुछ आरक्षण दिलाने का प्रयास कर चुकी हैं। केंद्र की मौजूदा सरकार भी इनमें उद्यमिता को बढ़ावा देने के प्रति प्रयासरत है। कहने का मतलब भोपाल घोषणा से प्रेरणा लेकर देश में दलितों को धन-बल से संपन्न करने की दिशा में कुछ-कुछ काम हो रहा है, किन्तु मनो-बल के मोर्चे पर कुछ नहीं हो रहा है, जबकि राज्य और समाज यदि ठान ले तो दलितों को धन-बल से लैस करने के मुकाबले यह काम रातों-रात किया जा सकता है।

हथियारों की दुकानों और लाइसेंस बंटवारे में : डाइवर्सिटी की जरुरत

Gun House1वैसे इसमें कोई शक नहीं कि देश में अन्य समुदायों की भांति ही दलितों को भी बंदूकों का लाइसेंस लेने का समान अवसर है। लेकिन जिस तरह हर क्षेत्र में समान अवसर का लाभ शक्तिसंपन्न तबके उठा लेते हैं, उसी तरह इसका अधिकतम लाभ शक्तिशाली समुदायों ने उठाया है। विविध कारणों से लाइसेंस हासिल करने की जो शर्तें हैं, आम तौर पर दलितों के लिए पूरा करना आसान नहीं होता। इसलिए शर्तें आसान कर और हथियारों की खरीद में सब्सिडी देकर ही दलितों के मनो-बल में इजाफा किया जा सकता है और यह काम सिर्फ और सिर्फ सरकारें ही कर सकती हैं। दलितों को बंदूकें सुलभ कराने में सरकार की सक्रियता से दलित विरोधियों में एक भिन्न मनोवैज्ञानिक सन्देश भी जायेगा। और सरकारें ऐसा करें इसके लिए दलित संगठनों को सक्रिय होना होगा। अतः जिस तरह दलित संगठन सप्लाई,डीलरशिप,ठेकों इत्यादि में डाइवर्सिटी की मांग उठा रहे हैं,उसी तरह हथियारों के लाइसेंस के बटवारे में मांग भी विविधता के प्रतिबिम्बन की मांग उठानी होगी। इस क्रम में हथियारों की जनसांख्यिकी का जायजा ले लेना बेहतर होगा।

काबिले गौर है कि जिस अमेरिका के फिल्म-टीवी, टेक्नोलाजी, फैशन, लोकतान्त्रिक जीवन शैली इत्यादि का भारत के लोग अन्धानुकरण करते हैं, वहां  प्रत्येक 100 व्यक्ति पर 112.7 बंदूकें हैं। उसके बाद सर्बिया का नंबर आता है जहाँ प्रत्येक 100 लोगों पर 75 बंदूकें हैं। भारत इस मामले में 107 वें नंबर पर है। हमारे देश में सौ लोगों पर 4.3 बंदूकें है। लाइसेंसशुदा हथियारों के हिसाब हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान विश्व में 55 वें स्थान पर काबिज है, जहां सौ पर 12 बंदूकें हैं। अगर भारत में बदूकों के लाइसेंस वितरण में सामाजिक विविधता को ढूँढा जाय तो एससी/एसटी के 22. 5 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के लिहाज से इस वर्ग के सौ लोगों पर एक बंदूक होनी चाहिए। किन्तु हम जानते हैं जिस तरह 10-15 प्रतिशत विशेधिकारयुक्त व सुविधासम्पन्न तबके का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत प्रभुत्व है, शायद उससे भिन्न स्थिति हथियारों के क्षेत्र में भी नहीं होगी। ऐसे में हथियारों के लाइसेंस बंटवारे में सरकारें यदि भारत की सामाजिक विविधता का ख्याल करते हुए प्रत्येक सौ दलितों पर एक बन्दूक सुलभ कराने का सकारात्मक कदम उठाये तो गैर –दलितों की बर्बरता से दलितों को काफी हद तक बचाया जा सकता है। स्मरण रहे जब गैर-दलित किसी दलित को निशाना बनाते हैं तो उसकी चपेट में प्रायः सारी दलित बस्ती ही आ जाती है। अब यदि दो-तीन सौ लोगों की दलित बस्तियों 2-3 बंदूकें हों तो अंततः सामूहिक हत्या-काण्ड या उत्पीड़न का काम अंजाम देना आसान नहीं होगा। भारी ख़ुशी की बात है केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारता मंत्री माननीय रामदास आठवले ने 16 जुलाई को एक चैनल को साक्षात्कार देते हुए दलितों को सुरक्षा के लिए हथियार दिए जाने का समर्थन किया है। बहरहाल हथियारों के बंटवारे के साथ यदि इनके दूकानों के बंटवारे में भी विविधता नीति लागू कर दिया जाय तो दलितों का मनोबल बढ़ाने में चमत्कार घटित हो सकता।

यह सच्चाई है कि विभिन्न शहरों में जो बंदूकों की दूकाने हैं वह प्रायः पूरी तरह विशेषाधिकारयुक्त तबकों की है। मसलन भारत की राजधानी और भारत की राजनीति को दिशा देने वाले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के दूकानों का नाम देखने से तो साफ़ पता चलता है कि दूकानों के बंटवारे में सामाजिक विविधता की घोरतर अवहेलना हुई है। दिल्ली की कुछ प्रमुख अस्त्र-शस्त्र दुकानों का नाम देखें- मोहनलाल एंड कंपनी, पंडित आर्म्स स्टोर, पंडित नरसिंह दास ,एस. कोहली एंड संस, शमशुद्दीन गन्स हाउस, शिखर एंटरपप्राइजेज, सिंह एंड आर्म्स कारपोरेशन, सिंह आर्म्स हाउस, सिंह गन हाउस, मिसेज उषा सिंह आर्म्स स्टोर, गर्ग आर्म्स हाउस। इसी तरह लखनऊ में इंडियन आर्म्स कारपोरेशन ,शुक्ला गन हाउस, सिंह गन हाउस, कैपिटल गन हॉउस, गन हाउस इत्यादि हथियारों की प्रमुख दुकानें हैं। हथियारों के इन अधिकांश दुकानों के साथ पंडित, शुक्ला, सिंह, गर्ग इत्यादि सरनेम देखकर जहाँ परम्परागत प्रभुत्वशाली तबके का हौसला बढ़ता है,वहीँ दलित-वंचिंत वर्गों का मनोबल रसातल में पहुँच जाता है। इन दुकानों के साथ यदि ठीकठाक मात्रा में दुसाध, जाटव, मुर्मुर इत्यादि सरनेम भी दिखने लगे तो उसका वंचितों के मनोबल पर क्या असर पड़ सकता है, इसकी सहज कल्पना कोई भी विवेकवान व्यक्ति कर सकता है।

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  1. D.S.WANKHEDE Reply

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