छज्जूलाल सिलाणा : डॉ. आंबेडकर और महिषासुर के हरियाणवी लोककवि

हरियाणवी दलित लोककवि छज्जूलाल ,मेहता के बारे में बता रहे हैं राजेन्द्र बड़गूजर और यह भी कि एक लोकगायक के रूप में एक शख्सियत किस तरह ब्राह्मणवाद को चुनौती दे सकता है

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छज्जूलाल सिलाणा

हरियाणा के लोकसाहित्य में जहां एक ओर लखमीचंद और मांगेराम की द्विज परंपरा में भाग्य, किस्मत, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, वर्ण, जाति, स्त्री-विरोध और सांप्रदायिक कट्टरता है, वहीं दूसरी ओर संघर्ष और कमेरी जातियों के दलित लोककवि हैं, जिन्होंने पाखंड, अवैज्ञानिकता और अंधविश्वासों से खुले रूप में टक्कर ली है। ऐसे ही एक लोककवि हैं— महाशय छज्जूलाल सिलाणा। उनका जन्म पिता महंत रिछपाल और मां दाखां देवी के घर 14 अप्रैल सन् 1922 को झज्जर जिले के गांव सिलाणा में हुआ। सुखद आश्चर्य है कि सन् 1891 में इसी दिन बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर का भी जन्म हुआ था। यह और भी आश्चर्यजनक है कि म. छज्जूलाल ने आजीवन बाबा साहब की जिजीविषा को ही लोक साहित्यिक रूप प्रदान किया। जीवन में अनेक बाधाएं आईं, परंतु वे चुनौतियों के बीच हमेशा डटे रहे।

उनका मन बचपन से ही संगीत में रम गया था। अल्प आयु में ही उन्होंने अपनी संगीत-मंडली तैयार कर ली थी। उनके सामने दासता में जी रहा लंबा-चौड़ा समाज था, जो निकृष्टतम जीवन जीने का आदी हो चुका था। उन्होंने रागणियों का रुख समाज सुधार की ओर मोड़ दिया। डॉ. आंबेडकर की वाणी को उन्होंने लोक रूप देना शुरू कर दिया। डॉ. आंबेडकर ने कहा था—”शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।” म. छज्जूलाल ने लिखा—’उसका जन्म सुधरज्या जो नर लिख—पढ़ज्या सै।’ उन्होंने किसी तथाकथित ब्रह्मज्ञानी पंडित को अपना गुरु नहीं बनाया, अपितु उस समय हरियाणा के सबसे प्रसिद्ध कलाकार म. दयाचंद मायना को अपना गुरु स्वीकारा। दर्जनों शिष्य बनाए जो आज भी झज्जर, बहादुरगढ़, रोहतक, गुड़गांव, सोनीपत, दिल्ली, राजस्थान आदि अनेक स्थानों पर विद्यमान हैं।

निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि रागणियों में सामाजिक सुधार की जो शुरुआत म. दयाचंद ने की थी, उसी को उनके शिष्य ने पकड़ा। केवल पकड़ा ही नहीं, उसे सींचा तथा गुणात्मक रूप में उसे आगे भी बढ़ाया। जहां म. दयाचंद ने ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस’ किस्सा लिखकर देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी, वहीं म. छज्जूलाल ने ‘डॉ. बी.आर. आंबेडकर’ किस्सा लिखकर दलित समाज में जागृति लाने की अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया। हरियाणा में डॉ. अंबेडकर पर पहला लोकनाट्य लिखने का श्रेय उन्हीं को जाता है। एक ओर उन्होने हरियाणवी जनता में खासे लोकप्रिय ‘ध्रुवभगत’, ‘राजा हरिश्चंद्र’ तथा ‘नौटंकी’ जैसे विशुद्ध काल्पनिक और परंपरावादी किस्से लिखे, तो दूसरी ओर ‘डॉ. बी.आर. आंबेडकर’ और ‘वेदवती-रतन सिंह’ उनके बहुद्देश्यीय किस्से भी हैं। उनके किस्से ‘डॉ. बी.आर. आंबेडकर’ पर पूरा हरियाणवी लोक साहित्य न्यौछावर किया जा सकता है। अपनी रागणियों में शिक्षा, संघर्ष, स्वाभिमान, सम्मान, स्त्री-पुरुष समानता आदि विषयों को महत्त्व देने के कारण वे हरियाणा के एक अप्रतिम कलाकार सिद्ध होते हैं।

म. छज्जूलाल ने समकालीन हरियाणवी समाज की व्यवस्था और उसमें प्रचलित सामाजिक आकांक्षाओं, मर्यादाओं व मूल्यों का अत्यंत व्यापक, सटीक एवं सार्थक चित्रण किया है। हरियाणवी संस्कृति तथा सामाजिक व्यवस्था के उज्ज्वल पक्ष को जहां उन्होंने सराहा है, वहीं समाज में प्रचलित बुराइयों का भंडा-फोड़ भी किया है और उन पर तीखे प्रहार भी किये है। कम पढ़े—लिखे होकर भी वे संस्कृति की ताकत को जानते थे। जानते थे द्विज जातियों ने सांस्कृतिक इतिहास और प्रतीकों को अपने स्वार्थ के अनुरूप बड़ी चतुराई से तोड़ा-मरोड़ा है नतीजा यह हुआ कि जो शोषक थे, वे दाता बन गए और जो आक्रामक थे, उन्हें देवता मानकर पूजा जाने लगा. संस्कृति के साथ ऐसी छेड़छाड़ को देख उनकी रागणियों में आक्रोश उतर आता है—

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तैयब मेहता की महिषासुर श्रृंखला की एक पेंटिंग। 1996 में मेहता के द्वारा बनाई गई इस श्रृंखला की पेंटिंग 10.6 करोड़ में बिकी। पेंटिंग में दुर्गा को महिषासुर की बाहों में दिखाया गया है।

   देख-देख के मौका धोखा धुर तै करते आए                     

घणे पोलसीबाज, पोप, पक्के बदमाश बताए…..

धोखे से बलराजा का बावन ने राज लिया था

तीन चरण पृथ्वी मांगी फेर मृत्युदंड दिया था

सती वृंदा संग विष्णु नै छल और कपट किया था

मर्या जलंधर अधम मौत ना पूरी उमर जिया था

धोखे तै दुर्गे के धोरै महकासुर मरवाए

घणे पोलसीबाज…….

एक पंपापुर म्हं बाली था छुपकै वाणां तै सार दिया

हिरणाकुश, शिशुपाल, जरासंध, कंस ज्यान से मार दिया

भोमासुर, वाणासुर भी कर कत्ल जमीं पै डार दिया

मधुकैटक दो यौद्धा थे, धोखे तै शीश उतार दिया

विश्वासघात कर-करकै सब मृत्यु कै घाट पहुंचाए

घणे पोलसीबाज……

त्रोता युग म्हं शंबूक संग घणा, मोटा जुल्म कमाया था

रैदास, कबीर, भक्त चेता पै जाति आरोप लगाया था

गुरु वाल्मीक, सबरी भीलणी नैं चमत्कार दिखलाया था

कांशी म्हं कालिया भंगी ने हरिचंद का धर्म बचाया था

हिंदुओं के पोथी-पुस्तक म्हं वे चण्डाल कहाए

घणे पोलसीबाज…..

झूठी बात, गलत नीति उल्टा पैगाम जरा राख्या

सुग्रीव, नील, नल, अंगद का बंदरौं म्हं नाम धरा राख्या

हनुमान यौद्धा का देख ल्यो चित्र तलक तरा राख्या

एक द्रोणाचारी नै एकलव्य का गूंठा कलम करा राख्या

ये लिखे हुए प्रमाण देख छंद छज्जूलाल नै गाए

घणे पोलसीबाज……

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डॉ. भीमराव अंबेडकर

पचास वर्ष पहले लिखी गई यह रागिणी भारत में संस्कृति के नाम पर हुई भारी बेईमानी को सामने लाती है. म. छज्जूलाल की काव्य-संपदा में प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए सामग्री उपलब्ध है। सामयिक युग चित्रण के ऐसे चितेरे हरियाणवी लोक कवियों में अत्यंत विरल हैं। वे निर्भीक, स्पष्टवादी एवं भीम-मिशनरी के रूप में विख्यात थे। उनकी रागणियों में उनके अपने समाज की दुर्दशा के प्रति गहरी टीस मिलती है। वे एक साथ शिक्षक, उपदेशक, प्रेरक और कठोर अनुशासक भी हैं। उनका सामाजिक उत्तरदायित्व ही उसे महती कलाकार बनाता है, जिसके तहत वे एक ओर शराब की बुराई से लोगों को जागरूक करते हैं, तो दूसरी ओर दहेज को स्त्री विरोधी करार देकर उसके विरुद्ध अलख जगाने लगते हैं। जार-कर्म, पर्यावरण चेतना, कन्या भ्रूण जैसी समस्याओं को ऊन्होंने दशकों पहले अपनी चिंता का विषय बनाया था।

घर-परिवार और समाज को कमजोर बनाने के कारणों में एक अति घृणित कारण है—जार कर्म। स्त्री एवं पुरुष द्वारा अपने दांपत्य संबंधों के अतिरिक्त अन्य से यौन संबंध स्थापित करना जार-कर्म के अन्तर्गत आता है। देवी-देवताओं के आचरण में जार-संस्कार व्यवहार रूप में धारण किया जाता है। डॉ. धर्मवीर ने जार-संस्कृति को देश की तमाम समस्याओं की जड़ माना है। कवि का ‘सरवर नीर’ किस्सा एक धनी के जार-कर्म का जीता-जागता उदाहरण है। रानी अमली सौदागर की जार-लिप्सा का शिकार होती है। सौदागर रानी अमली के साथ दुराचार करना चाहता है तो रानी अमली विरोध करती है और उसे जार-कर्म के परिणामों से सचेत करती है—

पर तिरिया नै आग समझ ले छूणी ठीक बताई कोन्या

जिसनै छू ली वोहे जळग्या जगहां बचण नै पाई कोन्या

तकी इन्द्र नै परनारी थी, शशी की तै खुद पहरेदारी थी

गौतम नै धोती मारी थी, मिटी चांद की स्याही कोन्या।

अंत में जार-कर्मी सौदागर को मौत के घाट उतार दिया जाता है।

हरियाणा म. छज्जूलाल का नाम समाज सुधारक लोककवि के रूप में प्रचलित है। यह अलग बात है कि लोक साहित्य के मामले में जाति अस्मिता की प्रतिस्पर्धा के चलते दलित समाज से आने वाले लोक कवियों को दोयम दर्जे का साबित करने का प्रयास किया गया। परंतु अब इन कवियों का साहित्य धीरे-धीरे प्रकाश में आ रहा है और अपने अधिकार की मांग कर रहा है। निस्संदेह यह साहित्य समता-स्वतंत्रता और बंधुता की मांग का ही लोक साहित्यिक रूप है, जो साहित्य के महती साध्यों की कसौटी पर खरा उतरता है। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि छज्जूलाल सिलाणा हरियाणा के एक अपरिहार्य लोककवि थे। हरियाणा की वीभत्स जातिवादी संरचना के कारण ऐसे अनेक कवि गुमनामी में खो गए जो समाज को वास्तव में कुछ देना चाहते थे। यह एक खास षड्यंत्र के द्वारा हुआ।


महिषासुर से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए  ‘महिषासुर: एक जननायक’ शीर्षक किताब देखें। द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन, वर्धा/ दिल्‍ली। मोबाइल  : 9968527911

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इस किताब का अंग्रेजी संस्करण भी ‘Mahishasur: A people’s Hero’ शीर्षक से उपलब्ध है।

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