कहानी : इतनी अनुदार सुबह

क्या जाति की जड़ता टूट रही है, क्या कुछ है पुरानी रूढ़िगत सोच में, जो पिघल रहा है। पढ़ें राज वाल्मीकि की कहानी

हाल ही में एक मित्र की बहन की शादी में उनके गांव गया था। बस से उतरने के बाद बाकी चार-पांच किलो मीटर की दूरी तांगे से तय की जाती थी। मैं बस से उतर कर तांगे में बैठ गया। मैंने सुन रखा था कि तांगे वाले बहुत बातूनी होते हैं, और यह बात सच साबित हुई।

g-d-paulraj-passing-carts-1962तांगेवाले की उम्र चालीस के आसपास थी। सिर पर उसने अंगोछा बांध रखा था। हाथ का चाबुक लहराते हुए वह सवारियों को बुला रहा था। कोई उससे पूछता- ‘कब चलोगे?’ उसका जवाब होता- ‘बस चल रहे हैं हवालई अभी।’ लेकिन यह सिर्फ कहने भर को होता। जब तांगा सवारियों से भर चुका तो लोग जल्दी चलने की कहने लगे। इस पर वह बोला-‘‘चल रहे हैं बस बसन्ती घोड़ी का कोटा पूरा कर दूं चारा खिला दूं।’’

खैर साहब वह चला तभी जब उसका तांगा स्त्री-पुरूषों-बच्चों से ठसाठस भर गया। सबसे पहले तांगेवाले ने तांगे पर बैठकर बीड़ी सुलगाई। फिर बसन्ती को आदेश दिया-‘‘चल बसन्ती।’’ और वह चल पड़ी।

मैंने पूछा – ‘‘फलैदा कितनी देर में पहुंच जाएंगे ?’’

‘‘एक घंटा में, पहली बार आए हो, किनके यहां जानो है?’’

‘‘दुलीचंद के।’’

‘‘कौन जात में? बामनों में या हरिजनों में?’’

‘‘जात पूछना जरूरी है?’’

‘‘साब बात ऐसी है कि जा गाम में दुलीचंद दो हैं। एक बामनों में एक हरिजनों में।’’

‘‘ हरिजन कहना जरूरी है कोई और नाम नहीं है सिड्यूल कास्ट वालों का जैसे दलित…।’’

‘‘सा’ब यहां दलित-फलित तो कोई जानत ना है। हरिजन न कहेंगे तो भंगी कह देंगे। हम या मारे पूछ रहे हैं कि जा गाम में सातों जात रहती हैं। सब के अलग-अलग मोहल्ले हैं। नये आदमी को हम बाकी जात को मोहल्ला बता देंवें- जासु बाय कोई परेशानी न होए।’’

‘‘मुझे दुलीचंद भंगी के यहां जाना है जरा बता देना।’’ मैंने स्वाभाविक रूप से कहा।

‘‘बता दिंगे सा’ब। उनकी लड़की की शादी में आए हुंगे दिल्ली से।’’

‘‘हां लेकिन आपको कैसे मालूम कि मैं दिल्ली…।’’

तांगेवाला मुस्करा कर बोला-‘‘सा’ब टीकमचंद तांगे वाले को पूरे गाम की खबर रेती है। दुलीचंद को लड़का दिल्ली में बैंक में नौकरी करतु है। तुम उसके दोस्त होंगे।’’

‘‘वाकई तुम गांव के बारे में बहुत कुछ जानते हो।’’

‘‘जानूंगा कैसे नहीं। पच्चीस साल से गाम में रह रहूं। पन्द्रह साल की उम्र में जा गाम में हमारो बिया विवाह भयो। हमारे सास-ससुर के कोई लड़का न हतो- सो घर जमाई रख लियो।’’ फिर तांगे में बैठी नवयुवती की ओर देखकर मुस्करा कर बोला-‘‘सा’ब, मैं तो पूरे गाम का जीजी हूं।’’ वह युवती बोल पड़ी- ‘‘किराया तो एक रूपया भी कम न लेवें- वैसे जीजा बनते हो पूरे गांव के।’’ तभी दूसरी महिला घूंघट से बोल पड़ी- ‘‘ननदोई तुम बहुत किराया बढ़ाते हो। आने दो होरी होली तब तुम्हारी खबर लेती हूं।’’

‘‘तुम ननद-भौजाई जे बताओ कै तुम्हारी बहन-ननद बालकन कूं भूखो मारूं? ई ससुरी मंहगाई तो गरीबन  कूं मार के ही छोड़ेगी।’’ कहते हुए उसने घोड़ी को एक और चाबुक दे मारा। वह एक बार थोड़ा तेज दौड़कर फिर अपनी गति पर लौट आई।

मैंने अपने मन मे  सोचा कि जब इसे गांव के बारे मे सारी खबर है तो क्यों न जाति के बारे में इससे कुछ जान लूं। मैंने उससे पूछा – ‘‘अब गांव में जात-पांत, उंच-नीच की भावना कैसी है? क्या कुछ बदलाव हुआ है पहले से?’’

‘‘सा’ब पहले से तो भौत बदलाव आओ है। पहले तो भंगी-चमार के साथ कोई बामन-ठाकुर बैठवे कूं राजी नाओ। अब मेरे तांगे में ही देख लो, सातो जात बैठती है। सवारियां अंगसकर सटकर बैठती हैं कोई ऐतराज नाय है…।’’

घूंघट वाली महिला बोली- ‘‘ऊंची जात, नीची जात सब कहने की बातें हैं। भंगी-चमार क्या इन्सान नहीं होते। हम तो ठाकुर जात हैं फिर भी भंगी-चमार से कोई एतराज नहीं करते।’’ एक बूढ़ी महिला मुझे संबोधित करती बोली- ‘‘बेटा अगेला बड़ी छुआछूत थी। अब तो बहुत बदलाव आ गयो है। आज की नई खेल युवा पीढ़ी पढ़-लिख रई है। सो समझ रही है आदमी-आदमी में का भेद।’’ एक बुजुर्ग सज्जन चुपचाप सुन रहे थे। उन्हें लगा कि इस विषय पर बोलना उनका भी हक है। सो बोल पड़े- ‘‘अरे बेटा, अब कहे से का होत है। हमने बड़े-बड़े जुरम सहे ऊंची जात वारिनवालों के…और सच पूछो तो जुरम की जड़ ये ससुरी गरीबी है। गरीबी आदमी कू मजबूर कर देत है। और बेटा मजबूरी को नाम महात्मा गांधी है…’’

ambedkar-statue-up-villageमैंने कहा – ‘‘ लेकिन बाबा, अब जमाना आंबेडकर का और आंबेडकरवादियों का है। अब कोई ऊंच-नीच नहीं। कानून में सब बराबर हैं। बाबा आपने भीमराव आंबेडकर का नाम सुना है?’’

‘‘बेटा खूब सुनो है। यों बतावें हैं कि उनने जात-पात मिटावे की बात कही। हमारे गांव में उनकी एक मूर्ति भी लगी है।’’

‘‘लेकिन सा’ब बिना जात-पांत के कामउ तो ना चलत।’’ तांगेवाला बोला- ‘‘अब देखो मैं जात को गड़ेरिया हूं। तो अपने लड़का-लड़किन को शादी-बिया अपनी जात में ही तौ करंगौ। अपनी तें छोटी जात में करंगौ नाय। बड़ी जातवारो न मेरी लड़की लेगौ न अपनी देगौ।’’

‘‘फिर एक बात औरउ तौ है।’’ बूढ़ी अम्मा बोलीं- ‘‘पुरखों के जमाने तें जात  के हिसाब से सबके अपने-अपने काम बंटे हैं। अब जात न रही तौ बड़ी गड़बड़ है जावेगी। भंगिन सफाई न करेगी। धोबी कपड़ा न धोबेगौ। चमार जूता न बनाबेगौ। ना बार न काटेगौ तौ समाज के सिगरे काम कैसे चलेंगे। मैं तो कहवे हूं भईया जात के बिना गुजारौ नांय।’’

इस बार एक युवती ने कहा – ‘‘छोड़ो अम्मा, तुमउ अभी तक पुराने ख्याल ही लै डोलती हों। दुनिया कितनी बदल गई पर तुम रहीं वहीं पुराखण्डी। शहर में जाके देखौ कोई जात-पात नहीं मानता।’’

इस बार बूढ़े सज्जन उसे समझाते हुए बोले- ‘‘बिटिया शहर की बात और है। गाम के अपने अलग कादा-कानून हैं।’’ बूढ़ी अम्मा को इससे सहारा मिला और वे फिर बोल पड़ी- ‘‘ का बतावें जब से ये अलीमा-सलीमा टी.वी./वी.डी.ओ. चल गये तब से नई खेल कू शहर की हवा लग गई है। अब तो उन्हें जात-पात, धरम-करम सब बेकार की बात लगत हैं।’’

लड़की को लगा कि बूढ़ी अम्मा ने उसी पर कटाक्ष किया है। सो वह बोली-‘‘अम्मा तुम्हें दीन-दुनिया की कोई खबर भी है। तुम न तो रेडियो में समाचार सुनती हो और न टी.वी. देखो और न अखबार पढ़ो। मायावती जो जात की चमारिन है। चार बार यू.पी. की गद्दी पर मुख्यमंत्री बनकर बैठ चुकी है। तुम पुरानी हो पर आज के समय को ज्ञान रखनो जरूरी है।’’

मैंने कहा – ‘‘आप ठीक कह रही हैं।’’

इस पर बूढ़ी अम्मा न जाने क्या बड़बड़ा कर रह गईं। पर तांगेवाला चुप न रह सका। बोला- ‘‘सा’ब ये ज्ञान।-ध्यान की बातें तो हम जानत नांय। लेकिन इतनो जरूर जानत हैं कि –

नहीं कुछ रक्खा ज्ञान-ध्यान में नहीं कुछ रक्खा पोथी में

कहत कबीर सुनौ भई साधो सब कुछ है दो रोटी में

सो भईया हम अंगूठा छाप दो रोटी कमा बालकन कौ पेट पाल रहे हैं।’’

इसी तरह बातों ही बातों मे फलैदा आ गया। तांगेवाले तथा अन्य कई सवारियों ने मुझे गाईड किया कि कैसे मैं दुलीचंद के घर पहुंच सकता हूं। मैं उन्हें धन्यवाद देकर उतर गया।

दुलीचंद के घर की ओर बढ़ते हुए मेरे मन में आखिरी विचार यही था कि कुछ है जो लगातार बदलते जाने को विवश हो रहा है।


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