भारतीय एवं भारतेत्तर साहित्य में ओबीसी विमर्श

ललनप्रसाद सिंह का यह साहित्य विवेचन साहित्य के मार्क्सवादी आलोचना का आधार लेकर और उसकी आलोचना करते हुए ओबीसी साहित्य आलोचना की आधारशीला की मीमांसा कर रहा है, केंद्र में है डा.राजेन्द्र प्रसाद सिंह की साहित्य आलोचना

सीधी सी बात है कि शासक वर्ग, शासक के सहायक व सहयोगी पदाधिकारी वर्ग तथा सम्पति-सम्पन्न वर्ग तो अल्पजन में ही परिगणित होते रहे हैं। पूरी राजतंत्रीय सामंतवादी व्यवस्था तथा साम्राज्यवादी व्यवस्था का संचालन अल्पजनों के ही हाथों में रहा है। इसीलिए राजनीति विज्ञान में अल्पतंत्र की पहचान बखूबी की गई है। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की जिसने बात की है, उसमें शासक तथा विशेषाधिकार वर्ग कदापि नहीं आता है। हमेशा से अल्पजन बहुजन का, विधि संहिता बनाकर राज्य सत्ता की बदौलत शोषण करते रहा है। और अपनी विचारधारा तथा साहित्य बहुजन पर थोपते रहा है। फिर भी बहुजन अपनी सृजनेषणा को कुंद नहीं होने देता है। वजह है कि मनुष्य निसर्गतः आर्थिक जीवन की लड़ाई के साथ-साथ अपनी अस्मिता और अपनी गरिमा की भी लड़ाई लड़ते आ रहा है। सामाजिक और वैचारिक संघर्ष यहीं से उपजते हैं। कहना होगा कि साहित्य की विभिन्न धाराएं भी इन्हीं संघर्षों की अभिव्यक्तियां होती हैं। हिंदी के नाथ एवं सिद्ध साहित्य में सामाजिक समत्व पर विशेष बल है। आगे चलकर, हम देखते हैं कि भक्ति काव्य की भी अनेक धाराएं हो गई, यथा-निर्गुण धारा और सगुण धारा। आज, ओबीसी साहित्य, आदिवासी साहित्य, दलित साहित्य, स्त्री साहित्य- जो कि हिंदी की धाराएं हैं, को देखते ही वही अल्पजन विषवभन करने लगते हैं। उन्हें पिछड़े श्रमजीवी जनों की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां दिखाई ही नहीं पड़ती और न वे इनसे संबंधित नवजागरण को ही देख पाते। बहुजन साहित्य के अभिधान से कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता है।

दरअसल, ऐतिहासिक तथ्य है कि फ्रांसीसी राज्य क्रांति (1789) ने स्वतंत्रता, समता तथा बंधुत्व का नारा देकर बुर्जुआ लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग धीरे-धीरे खोल दिया। इस महान घटना से सारी दुनिया ही देर-सबेर प्रभावित हुई। शासक तथा उसके अमले-जमले के अलावा एक बहुज बड़ा तबका बहुजन का होता है, जिसमें कृषक, शिल्पी, कृषि-मजदूर, दस्तकार, बुनकर, लोहार, सोनार, ताम्रकार, चर्मकार, पशुपालक, नौकर-चाकर कमेरे तथा व्यापारी आते हैं, जो बहुजन समुदाय की निर्मिति के वर्गगत व जातिगत आधार हैं। भू-लगान, मालगुजारी तथा व्यापार-कर सामंती व्यवस्था को जिंदा रखे हुए थे। किसानों का सर्वाधिक शोषण होता था। वे लगान भी देते, साथ ही बेगारी भी।

किसानों के सम्पूर्ण जीवन को साहित्य में चित्रित करने का सिलसिला फ्रेंच के सुविख्यात उपन्यासकार ओ नोरे द बाल्जाक (1799-1850, जन्म- किसान परिवार में) ने ही शुरू किया। यों भी कहें कि यथार्थवादी उपन्यास लेखन की शुरूआत, उन्होंने ने ही की। ‘किसान’ (Peasantry, Sons of Soil) उपन्यास में उन्होंने फ्रांस के निर्धन कृषकों के अबाध शोषण, सामंती भूमि-संबंधों के पूंजीवादी रूपान्तरण तथा भूस्वामी-महाजन-ठेकेदार की मिलीभगत, उनकी साजिश का पर्दाफाश किया। इस उपन्यास का मुख्य पात्र खेतिहार मजदूर है। सामंत के जंगल से लकड़ी भी चुराकर लाता। यहीं नहीं, वह मालिकों के तालाबों से चोरी-चुपके मछली भी पकड़ लेता। इसके बावजूद उसकी आर्थिक तंगहाली में कमी नहीं आती। नायक फूर्शों ब्लोंदे से कहता है – “सारे कर्नल सिपाही के दम पर जीते हैं, वैसे ही जैसे अमीर लोग किसान के दम पर जीते हैं। हम हमेशा मिट्टी खोदने के लिए अभिशप्त हैं। यहां, जहां हम जन्में हैं, यहीं हम इसे खोदते हैं, इस धरती को। इसमें खाद डालते हैं और इसी में रहते हैं। जनसाधारण (बहुजन) हमेशा ही वैसे ही रहेंगे, जैसे वे हैं और उसी हालत में रहेंगे, जिसमें वे हैं। हममें से जितने लोग ऊपर उठ पाने में कामयाब हो पाते हैं, उनकी तादाद उनके आगे कुछ नहीं है, जिन्हें आप नीचे धकेल देते हैं। आप हमारे स्वामी बने रहना चाहते हैं और हम हमेशा ही दुश्मन रहेंगे। आपके पास सब कुछ है हमारे पास कुछ नहीं, आपको उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि हम कभी दोस्त बनेंगे। (पृ. 100-101) यहां बाल्जाक बुर्जुआ व्यवस्था के आर्थिक तथा सामाजिक अन्तर्विरोध को तो दर्शाते ही हैं, साथ ही साथ इतिहास की वर्गगत नियति, गत्यात्मकता तथा टकराव को भी विश्लेषित कर देते हैं।

उड़िया भाषा के सुविख्यात उपन्यासकार हैं – फकीर मोहन सेनापति (जन्म ‘मल्ल’ जाति में) उनका प्रसिद्ध उपन्यास (1902) ‘छमाण आठ गुंठा’ कृषकों, बुनकरों तथा दस्तकारों के शोषण व दमन को यथार्थ रूप में बयां करने वाला एक क्लासिक कृति है। ब्रिटिश सरकार ने ऐसा कानून बनाया कि अपनी जमीन के शताधिक सालों से प्राप्त भूमि-स्वामित्व से किसान वंचित हो गए। दूसरी वजह यह कि वहां की मुद्रा कौड़ी का प्रचलन को ही समाप्त कर दिया गया। नई मुद्रा की अनुपलब्धता के कारण से किसान लगान व मालगुजारी देने में असमर्थ हो गए, जिसके चलते हजारों किसानों की निजी पुश्तैनी भूमि ही बिक गई। रातों-रात कलकत्ता के धनासेठ तथा कुलीन लोग ओडि़शा के जमींदार-जागीरदार बन बैठे। उक्त उपन्यास में फकीर मोहन सेनापति ने विवेचित किया है कि कैसे मगिया नामक बुनकर के आठ बीघे खेत तथा उसकी गाय को मेगराज नाम क्रूर आदमी हथिया लेता है। इस उपन्यास के प्रकाशन के तैंतीस साल बाद मुंशी प्रेमचंद ‘गोदान’ (1935) में पिछड़े किसान होरी महतो को केन्द्र में रखकर ग्रामीण कृषकों के शोषण तथा पुरोहितों-जमींदारों की अमानुषिकता को बेनकाब करते हैं। ‘गोदान’ में भी पुरोहित धर्म के नाम पर धनिया की गाय हड़प लेता है। प्रेमचंद साहित्य में दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श का संधान तो किया जाता है, लेकिन पिछड़ा विमर्श (ओबीसी विमर्श) की खोज करने में कितनों का दम फुलेन लगता है। जबकि ‘गोदान’ के होरी महतो तथा भोला अहीर के जात-वंश क्रमशः कुशवाहा-कुशवंशी तथा यादव-यदुवंशी की पहचान स्थापित हो चुकी है, जिनके पूर्वजों पर संस्कृत में रामायण तथा महाभारत जैसे महाकाव्य लिखे गए हैं। एक तरह से प्रेमचंद ने ‘गोदान’ में एक किसान को मजदूर बना दिए जाने की सवर्ण शोषकों द्वारा अपनाई गई आर्थिक प्रक्रिया की खोज की है।

अंग्रेजी के नामचीन लेखक मुल्कराज आनंद के उपन्यास ‘कुली’ (1936) में भी एक अभावग्रस्त किसान के दिहाड़ी मजदूर बनते रहने की कारूणिक स्थिति का वर्णन है। उपन्यास का नायक मुन्नू है, जो रोजी-रोटी की खोज में यहां-वहां ठोकर खाते फिरता है। वह कभी नौकर का काम करता, तो कभी भारवाहक का कार्य करता, कभी फैक्ट्री में काम करता, तो कभी पेट के लिए रिक्शा भी चलाता। मुन्नू टी.बी. रोग से ग्रसित हो असमय ही संघर्ष करते-करते मृत्यु के आगोश में सदा के लिए सो जाता है। आजादी के पूर्व होरी महतो महाजन के कर्ज में फंसकर मछली की तरह छटपटाते हुए एक दिन अपने ही खेत पर मजदूरी करते हुए लू में झुलस जाता है। प्रेमचंद की ही ‘बलिदान’ कहानी का नायक कुर्मी कृषक आत्महत्या कर लेता है। आजादी के बाद भी हम देखते हैं कि कर्ज की अदायगी नहीं कर पाने के कारण असंख्य किसानों ने आत्महत्या की है। पिछड़े किसानों की दारूण दुर्दशा काफी चिंताजनक हैं। ऐसी बात नहीं कि पिछड़ा तबका केवल आर्थिक शोषण तथा सामाजिक अन्याय को झेलता ही रहा है बल्कि सच तो यह है कि हमेशा से आर्थिक संघर्ष तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष की संचालक मुख्य शक्तियाँ भी यही है।

अगर मार्क्सवादी लहजे में कहा जाय तो वर्ग संघर्ष की प्रेरक व चालक शक्ति के रूप में स्पष्ट तौर से यही तबका नजर आता है, केवल अतीत में ही नहीं वरन वर्तमान में भी अपनी जमीन छीने जाने तथा रोजगार छीने जाने के खिलाफ जूझता है। नक्सल गाँव, सिंगुर आदी जगहों के संघर्ष के पीछे शोषणकारी शक्तियों का अमानवीय करतूत ही तो कारण रहे हैं। अगर मानव जाति का इतिहास अब तक वर्ग-संघर्ष का इतिहास है तो साहित्य का इतिहास भी अब तक विभिन्न वर्गों के वैचारिकी व संस्कृतिक संघर्ष का इतिहास है। मुख्य बात है साहित्यक धाराओं का पुनर्भिज्ञान करना तथा निर्ममता के साथ उनका विवेचन–विश्लेषण करना। यहीं पर बौद्धिक ईमानदारी की दरकार होती है। सुविख्यात मार्क्सवादी समालोचक डॉ.नामवर सिंह ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में जो दूसरी परम्परा की खोज की है, वह परिवर्तन और निरंतरता की खोज है और जिसमें समाज के पिछड़े और दलित जनों की साहित्यिक संघर्षपूर्ण सृजनशीलता भारी पड़ने लगी है। मार्क्सवाद की विश्वव्यापी संस्थापना के बाद इतिहास व साहित्य–लेखन का केंद्र ही बदल गया उत्पादन के तरीके, साधन तथा उत्पादन के संबंध के आधार पर अधिरचना यथा –राजनीति, साहित्य, दर्शन, संस्कृति, धर्म,कानून आदि निर्मित होते हैं और टिके रहते हैं। एक के परिवर्तित होते ही दूसरे परिवर्तित हो जाते हैं, यह परिवर्तन आवश्यकता और आकांक्षा की कोख से नि:सृत होता है। उत्पादन और निर्माण से जुड़ा हुआ मुख्य तबका किसान और श्रमिक ही है। यही समाज का निचला तबका बुनियाद है। इसीलिए प्रगतिशील बुद्धिजीवी साहित्य एवं इतिहास को नीचे से देखने का वस्तु परक उपक्रम करते हैं। यही दृष्टिकोण डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह के लेखन में सर्वत्र दिखाई पड़ता है। उन्होंने ओबीसी साहित्य की अवधारणा, भाषा, शिल्प, सौंदर्य, सरोकार और प्रयोजन को सुव्यवस्थित स्वरूप दिया है। वे लिखते हैं कि “ओबीसी साहित्य सिर्फ सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों का साहित्य है। ओबीसी साहित्य पुराना है। चर्चा इसकी नई है। जैसे की न्यूटन खोज करने से पहले भी गुरूत्वाकर्षण था।” साहित्यिक धाराओं की पुनर्खोज तथा शोध उनकी अन्तर्वस्तु एवं वैशिष्टय के आधार पर वर्गीकरण तो मानविकीय अनुसंधान का वैज्ञानिक मेथॉडोलॉजी है। इसी वैज्ञानिक प्रविधि तथा प्रगतिशील चिंतन-मंथन का सृजनात्मक परिणाम है डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह कृत ‘हिन्दी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास’ (सिद्ध साहित्य से संत साहित्य तक) यह ओबीसी साहित्य विमर्श का प्रामाणिक बीज-ग्रंथ है और वे उक्त विमर्श के आलोचना-विवेक से संपन्न प्रवर्त्तक हैं। उन्होंने सिद्ध साहित्य के रचनाकारों का पुनर्मूल्यांकन किया है, जैसे मीनपा, कमरिया, तांतिया, चर्पटीपा, कंतलीपा, मेकोपा, भलिपा, उद्यलिया तथा तिलोपा, जो क्रमशः मछुआरे, लोहार, तंतवा, कहार, दर्जी, वैश्य, वणिक तथा तेली, ये सभी ओबीसी के अन्तर्गत आते हैं।

यही क्यों, डॉ. सिंह ने महाराष्ट्र के संतकाव्य, हिन्दी के संतकाव्य तथा सरभंग काव्य के पुरूष तथा स्त्री रचनाकारों, जो ओबीसी के हैं, का उल्लेख किया है। ये सारे रचनाकार जातिवाद के निषेधक तथा मानवतावाद के प्रबल प्रवक्ता हैं। रूसी साहित्य का एक पात्र जमोश्निकोव कहता है – “पादरी लोग हमारे दिमाग में भूसा भरते रहते हैं और हमारी आत्माओं को बिगाड़ते रहे हैं।” हिंदू पादरी (पुरोहित) भी भारतीय मनीषा में भाग्यवाद, वर्णवाद, जातिवाद, पुनर्जन्म, ऊँच-नीच का भेदभाव, स्वर्ग-नरक आदि मनगढंत निष्पतियों से भूसा ही भरते आ रहे हैं, जिसका कड़ा प्रतिवाद ओबीसी साहित्यकार करते हैं, जिसे डॉ. सिंह ने पूर्वोक्त पुस्तक में बारीकी से विवेचित किया है। बात ऐसी है कि ये सारे साहित्यिक संघर्ष सांस्कृतिक संघर्ष से जुड़े हुए हैं और सांस्कृतिक संघर्ष राजनीतिक तथा सामाजिक वर्चस्व बनाए रखने और उसे तोड़ देने का द्वन्द्वात्मक नैरंतर्य है। ओबीसी साहित्य इसी द्वन्द्वात्मक नैरंतर्य की सांस्कृतिक धारा है, जो विमर्श के जरिये अविच्छिनता के साथ प्रवाहमान है। सतही आत्महीन आलोचक इस विमर्श को कोख में ही मार देने का फतवा जारी करते हैं मानो यह कुम्हड़ का भतिया हो।


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