ऑस्कर में विविधता की फिर धूम

2017 में ऑस्कर सम्मान में अश्वेतों और मुस्लिम अभिनेता को मिले प्रतिनिधित्व से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिकी समाज पर राष्ट्रपति ट्रंप के नस्लवादी अभियान का असर नहीं हुआ है, अमेरिकी समाज अभी भी उदार और लोकतांत्रिक है, एच.एल. दुसाध का विश्लेषण :

27 फरवरी, 2017 की सुबह परम्परागत भव्यता के मध्य शुरू हुआ 89 वां ऑस्कर समारोह दोपहर होते-होते समाप्त हो गया। वैसे तो फिल्मों के नोबेल पुरस्कार सरीखा यह पुरस्कार समारोह हर बार ही दुनिया के लिए आकर्षण का विषय रहा, किन्तु इस बार इसके प्रति एक अलग उत्सुकता थी। लोग देखना चाहते थे कि विगत दो वर्षों से निरंतर सफ़ेद होता ऑस्कर ट्रंप युग में बदलता है या उसमें विविधता की उपेक्षा का सिलसिला जारी रहता है। कहना न होगा विविधता को सम्मान देने में 89 वां समारोह सबको पीछे छोड़ दिया। ऑस्कर में विविधता को इतना सम्मान मिलते देख दुनिया सुखद आश्चर्य से घिर गयी है। ऐसा हो भी क्यों नहीं इसके पहले एक साथ पांच अश्वेतों और किसी मुस्लिम अभिनेता को ऑस्कर ट्राफी उठाते हुए कब देखा गया था!

निदेशक बैरी जेन्किन्स और ‘मूनलाईट’ टीम सर्वश्रेष्ठ पिक्चर का ऑस्कर लेते हुए

वैसे तो इसमें जलवा 14 श्रेणियों के लिए नामित और छः श्रेणियों में पुरस्कार जीतने वाली ‘ला ला लैंड’ का रहा,पर चर्चा हो रही है अश्वेत बैरी जेनकिंस द्वारा निर्देशित मूनलाइट की, जिसने बेस्ट पिक्चर सहित कुल तीन पुरस्कार जीत कर ऑस्कर में नए सिरे से काले रंग की धाक जमा दी है। पुरस्कारों का सीजन शुरू होते ही बड़ी उम्मीदें जगाने वाली इस फिल्म को लेकर बहुत पहले से ही लिखा-कहा जा रहा था, जिसमें अब काफी इजाफा हो गया है। 8 जनवरी, 2017 को गोल्डन ग्लोब अवार्ड की घोषणा के बाद यह फिल्म मेरे लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गयी थी। इसीलिए मैंने 10 जनवरी को ‘अब मूनलाइट लेगी: अमेरिकी प्रभुवर्ग के सामाजिक विवेक का टेस्ट’ शीर्षक से फेसबुक पर यह पोस्ट डाला था :

‘74 वें गोल्डन ग्लोब अवार्ड की घोषणा 8 जनवरी को हो गई। ऑस्कर का प्री-टेस्ट माने जाने वाले गोल्डन ग्लोब अवार्ड भारतीयों के लिए बहुत खास रहा। वह इसलिए कि प्रियंका चोपड़ा के रूप में पहली बार किसी भारतीय को इस समारोह में किसी को अवार्ड प्रदान करने का अवसर मिला। यदि ‘स्लम डॉग मिलेनियर’ फेम देव पटेल को ‘लायन’ के बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड मिल गया होता, ख़ुशी दो गुना हो गयी होती। अगर भारतीय प्रियंका चोपड़ा की वजह से खुश हैं तो इस समारोह में ‘सेसिल बी डी मिले’ से सम्मानित मेरिल स्ट्रिप ने मोदी के अमेरिकी क्लोन,  डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिए बिना उनपर जो निशाना साधा है, उससे दुनिया भर के डाइवर्सिटी समर्थक अभिभूत हैं। ‘मेरिल ने अमेरिकी मोदी की विभाजनकारी नीतियों पर हमला बोलते हुए कहा है-’’हॉलीवुड बाहरी लोगों से बना है। हम सब कौन हैं और हॉलीवुड क्या है? यह एक ऐसी जगह है, जहां अन्य जगहों से लोग आये हैं।’ उनके इस बयान से बौखलाए ट्रंप ने कह डाला है,’ मेरिल, हिलेरी क्लिंटन की समर्थक हैं, जिन्हें हॉलीवुड में ओवर रेट किया जाता रहा,’ व्यापारी से राजनेता बने ट्रंप को शायद नहीं मालूम कि ‘क्रेमर वर्सेज क्रेमर’ की बेमिसाल नायिका मेरिल स्ट्रिप ने न सिर्फ फिल्मों के सबसे प्रतिष्ठित अवार्ड ऑस्कर में किसी भी अन्य अभिनेत्री के मुकाबले ज्यादा बार ऑस्कर में एक्टिंग का नॉमिनेशन जीता है, बल्कि तीन-तीन ऑस्कर ट्राफी जीतने का विरल गौरव भी हासिल किया है।

अभिनय के लिए ऑस्कर (2017) : महेर्शाला अली (अभिनेता सहायक भूमिका), केसी अफेक (अभिनेता, मुख्य भूमिका), एम्मा स्टोन (अभिनेत्री, मुख्य भूमिका) और वायोला डेविस (अभिनेत्री, सहायक भूमिका)

बहरहाल मेरिल और ट्रंप के बयानों से दुनिया का अलग से ध्यान आकर्षित करने वाले 74 वें गोल्डन ग्लोब अवार्ड में धूम रही संगीत और रोमांस से भरपूर ‘ला ला लैंड’ का, जिसने बेस्ट मोशन पिक्चर (कॉमेडी /म्यूजिकल) और बेस्ट एक्टर सहित सात अवार्ड जीत कर एक नया रिकार्ड बनाया। ला ला लैंड के बाद जिस फिल्म की चर्चा रही, वह है अश्वेत डायरेक्टर बैरी जेनकिंस द्वारा निर्देशित ‘मूनलाइट’, जिसने बेस्ट ड्रामा मोशन पिक्चर कैटगरी में बेस्ट फिल्म का अवार्ड जीत लिया। मूनलाइट को बेस्ट- पिक्चर,डायरेक्शन,स्क्रीन प्ले,सपोर्टिंग एक्टर,ऐक्ट्रेस,बेस्ट ओरिजिनल स्कोर सहित 6 श्रेणियों में नॉमिनेशन मिला था।  रंगभेद के शिकार लोगों के हिसाब से मूनलाइट का गोल्डन ग्लोब अवार्ड में प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराना भारी ख़ुशी की बात है। सामान्यतया गोल्डन ग्लोब में प्रभावित करने वाली फ़िल्में ही ऑस्कर में कारनामा करती हैं। ऐसे में उम्मीद करना चाहिए कि मूनलाइट ऑस्कर में हमारी प्रत्याशा पूरी करेगी। लेकिन ऐसा तब होगा जब ऑस्कर में नॉमिनेशन का अधिकार रखने वाले गोरे लोग अपने उस सामाजिक विवेक का परिचय दें,जिसकी भूरि-भूरि तारीफ़ डॉ. आंबेडकर किया था। लेकिन अमेरिकी मोदी (ट्रम्प) और उनके जैसे लोगों ने जिस तरह श्वेत अमेरिकियों में विभाजनकारी मानसिकता इंजेक्ट किया है ,वहां अब उनमें वंचित नस्लों के प्रति पहले जैसी सदाशयता नहीं रही। इसीलिए पिछले दो वर्षों से ऑस्कर और सफ़ेद होते जा रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि ऑस्कर में वोट देने वाले 90 %से ज्यादा गोरे लोग हैं। इस विशाल समुदाय में आये अनुदारता के कारण अब कालों को नॉमिनेशन बहुत कम मिल रहा है। जिस तरह भारत में पुरस्कार चयन समितियों में सवर्णों की बाहुल्यता के कारण दलित-आदिवासी-पिछड़े बेहतर काम करने के बावजूद पुरस्कारों से वंचित रह जाते हैं,वही हाल अब अमेरिकी अश्वेतों के साथ हो रहा है। इसीलिए मूनलाइट ऑस्कर में गोल्डन ग्लोब का इतिहास दोहराएगी, इसमें मुझे तो संदेह है। इसीलिए कह रहा हूँ ऑस्कर में मूनलाइट लेगी अमेरिकी प्रभुवर्ग के विवेक की परीक्षा। अगर यह फिल्म बेहतर करने में विफल हो जाती है,तब मान लेना पड़ेगा अमेरिकी पभुवर्ग भारत के सवर्णों की मानसिकता में ढल चुका है। यह पोस्ट इस जानकारी के बगैर अधूरा रहेगा कि ऑस्कर विजेता महान अश्वेत एक्टर डेंजिल वाशिंगटन ने भी गोल्डन ग्लोब में बेस्ट एक्टर के श्रेणी में नामांकन पाया है। मूनलाइट के साथ डेंजिल भी गोरों के विवेक की परीक्षा लेंगे।’

2002 की एक पत्रिका का कवर डें वाशिंगटन और हली बेरी को उनके ऑस्कर के लिए तारीफ़ करते हुए

इस बार आस्कर की घोषणा से मेरे लिए कम से कम यह बताने वाली घटना थी कि अमेरिकी समाज ट्रंप युग में पूरी तरह बदल कर नस्लवादी हो गया है या विविधता के प्रति अब भी उसमें आदर बरक़रार है। कहना न होगा परिणाम देखने के बाद मेरी पलकें नम हो गयीं। यह देख कर अच्छा लगा कि मोदी का अमेरिकी क्लोन ट्रंप अमेरिकियों के विवेक को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाया है। इसीलिए तो इस बार अश्वेतों को विभिन्न कैटेगरी में पर्याप्त नॉमिनेशन मिला। मूनलाइट ने जहां 8 नॉमिनेशन पाए, वहीं ऑस्कर विजेता ग्रेट डेंजिल वाशिंगटन ने सातवीं बार ऑस्कर के लिए लीडिंग एक्टर के रूप में नामांकन पाया। ऑस्कर वोटरों में गोरों की उपस्थित 90 % से अधिक होने के बावजूद जिस तरह बड़े पैमाने पर अश्वेतों को नामांकन मिला, जिसमें ‘स्लम डॉग फेम’ देव पटेल भी है, उम्मीद करनी चाहिए कि इस बार ऑस्कर उतना सफ़ेद नहीं होगा, उसमे काला रंग भी दिखेगा!’ और दिखा भी। इसीलिए 27 फरवरी की सुबह 11.48 पर राष्ट्रवादियों से त्रस्त दुनिया के कोटि-कोटि लोगों की भावना का प्रतिबिम्बन इस शीर्षक -‘हुर्रे! अमेरिका नहीं बदला: जारी है विविधता के प्रति सम्मान– से मेरे एक फेसबुक पोस्ट में हुआ।

मैंने कुछ दिन पहले लिखा था कि ट्रंप काल में अमेरिका बदल गया है या नहीं, ऑस्कर की घोषणा हो गयी है और साथ ही यह तय हो गया है कि अमेरिकी बदले नहीं हैं; उनमें विविधता को सम्मान देने की भावना पूर्ववत है। मैं तो यहां तक कहूँगा कि ट्रंप की विविधता विरोधी नीतियों को चुनौती देने के लिए ही ऑस्कर अकादमी ने अतिरिक्त तत्परता दिखाई है। तभी तो 2002 के बाद ऑस्कर में एक बार फिर काले रंग का जलवा खूब दिखा और पिछली बार की तरह यह सिर्फ सफ़ेद और नहीं हुआ।

जी हाँ, विविधता को सम्मान देने में 89 वां ऑस्कर ऐतिहासिक 2002 से भी आगे निकल गया है। स्मरण रहे 2002 के 74 वें ऑस्कर समारोह को आज भी अश्वेतों के कारण विशेष याद किया जाता है। तब ऑस्कर समारोह का संचालन करने के मंच पर उतरी थीं महान अश्वेत अभिनेत्री हूपी गोल्डबर्ग। उस दिन हॉलीवुड के कोडक थियेटर में हिस्ट्री के अन्यतम श्रेष्ठ अभिनेता सिडनी पोयटीयर को उनके जीवन भर के कार्यों के लिए ऑस्कर का मानद पुरस्कार मिला था। लेकिन दुनिया विस्मित हुई थी एक साथ दो अश्वेतों-डेंजिल वाशिंगटन और हैलेबेरी- को बेस्ट एक्टर और ऐक्ट्रेस से सम्मानित होते देखकर। 2002 में डेंजिल वाशिंग्टन और हैलेबेरी ने हाथों में ऑस्कर की मूर्ती लिए जो तस्वीर खिंचवाई थी, वह ऑस्कर की हिस्ट्री की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक बन गयी थी,जिसका असर 2017 में एक साथ 5 अश्वेतों के हाथ में ट्राफी देखने के बाद ही कुछ कम हुआ है। 89 वें ऑस्कर में पहली बार रिकार्ड संख्यक पांच अश्वेतों को ऑस्कर ट्रॉफी उठाते देखने के साथ और भी कई बातें हुईं। पहली बार ऑस्कर में 7 अल्पसंख्यक समुदायों के कलाकारों को, जिसमें 6 काले रहे, अभिनय विभाग में नामांकन मिला। ऐसा पहली बार हुआ कि अभिनय की सभी श्रेणियों-बेस्ट एक्टर-ऐक्ट्रेस और बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर-ऐक्ट्रेस- में अश्वेतों को नामांकन मिला। पहली बार एक साथ तीन अश्वेत अभिनेत्रियों  को सपोर्टिंग ऐक्ट्रेस और 3 अश्वेत पुरुषों को स्क्रिप्ट लेखन के लिए नामांकन मिला। यह पहला अवसर था जिसमें बेस्ट फिल्म की कटेगरी में 5 में से 3 को नामांकन अश्वेत निर्माताओं के हिस्से में आया। पहली बार अश्वेतों को सिनेमाटोग्राफी और एडिटिंग के लिए नामांकन मिला। बेस्ट पिक्चर का अवार्ड पाने वाली ‘मूनलाइट’ पहली ऐसी फिल्म बनी जिसमें एक्टिंग करने वाले शत प्रतिशत कलाकार अश्वेत समुदाय से रहे।‘मूनलाइट’के पीछे जिस बैरी जेनकिंस का सबसे बड़ा योगदान रहा,वे ‘ला ला लैंड’ के श्वेत डायरेक्टर शैजेल से जरुर मात खा गए, किन्तु चौथे अश्वेत डायरेक्टर के रूप में नामांकन दर्ज कराने में सफल रहे। 89 वें ऑस्कर में विविधता को इतनी तरजीह दी गयी कि बेस्ट पिक्चर की श्रेणी में नामांकन पाने वाली 5 में 4 फिल्में ही अश्वेत प्रधान चरित्रों पर आधारित रहीं।

मूनलाईट का एक दृश्य

बहरहाल 89 वे ऑस्कर में अश्वेतों का जो अभूतपूर्व दबदबा दिखा, उसका बड़ा श्रेय अमेरिका की अकादेमी ऑफ़ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज (अम्पास) को जाता है। ऐसा लगता है जिस तरह राष्ट्रवादी ट्रंप के सत्ता में आने के बाद उनकी विविधता विरोधी नीतियों का विरोध करने के लिए अमेरिका के श्वेत समुदाय के लेखक पत्रकार, एक्टिविस्ट, न्यायधीश सामने आये, उन्हीं से प्रेरित होकर ऑस्कर अकादेमी ने भी कुछ अतिरिक्त करने का मन बनाया। अकादेमी के सामने दो लक्ष्य थे। पहला, जिस तरह 87 और 88 वें ऑस्कर की प्रमुख श्रेणियों में अश्वेतों को नामांकन नहीं मिलने से ऑस्कर के लगातार सफ़ेद होते जाने को कलंक लगा, उसको धोना और दूसरा, ट्रंप की नीतियों से अमेरिका की एकता और अखंडता पर जो आंच आई है,उसमें योगदान देना। 2001 में जब 9/11 की घटना के जरिये अमेरिका की एकता पर आघात पहुचाने का प्रयास हुआ था, तब अकादमी ने अपना कर्तव्य स्थिर करते हुए ऑस्कर में विविधता को दर्शाने का बलिष्ठ कदम उठाया था, जिसके फलस्वरूप 2002 अश्वेतों का जलवा कायम हुआ था। इस बार जिस तरह ट्रंप की विभाजनकारी नीतियों से अमेरिकी अल्पसंख्यकों (कालों-रेड इंडियंस,हिस्पैनिक्स-एशियाई मूल के लोगों) में असुरक्षा का भाव पैदा हुआ उसे देखते हुए अकादमी ने अश्वेतों को अभूतपूर्व रूप से ऑस्कर में स्थान दिया। यही नहीं विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के रूप में असगर फरहदी की ईरानी फिल्म ‘द सेल्समैन’तथा सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के रूप में ‘मूनलाइट’  के महेर्शाला अली के रूप में पहली बार किसी मुस्लिम अभिनेता को सम्मानित करने के पीछे अकादेमी का लक्ष्य ट्रंपवादियों को हतोत्साहित करना ही रहा।

विविधता को नए सिरे से स्थापित करने की अपनी दूरगामी योजना के तहत अकादमी की अध्यक्ष चेरिल बून आइजक ने ऑस्कर में वोट देने वाले सदस्यों, जिसमें प्रायः 90 प्रतिशत गोरे और गोरों में भी प्रायः 75 प्रतिशत श्वेत पुरुष होते थे, की संख्या में संतुलन बिठाने के लिए विशेष अभियान चलाया। इस योजना के तहत उन्होंने 59 देशों के फिल्म प्रोफेशनल्स को वोट देने का अवसर सुलभ कराया। इससे वोट देने वाले सदस्यों में महिलाओं और अश्वेतों को भी पर्याप्त अवसर मिला, जिसके फलस्वरूप ही अश्वेतों को विभिन्न श्रेणियों में अभूतपूर्व रूप से प्रतियोगिता का अवसर मिला, जिसकी परिणति स्वरूप रिकार्ड संख्यक अश्वेतों को ऑस्कर ट्राफी उठाते देखा गया। वास्तव में ट्रंप की विभाजनकारी नीतियों के विरोध के साथ 89 वें ऑस्कर समारोह का एक बड़ा सन्देश यह है कि जबतक पुरस्कारों की चयन समितियों में विविध सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा, वंचित वर्गों की प्रतिभाएं सम्मानित होने के लिए तरसती रहेंगी। खासकर भारत में, जहां व्यक्ति की सोच स्व-जाति/वर्ण के स्वार्थ के मध्य घूमती रहती है, चयन समितियों में सामाजिक विविधता के बिना दलित,आदिवासी,पिछड़ों  के लिए राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार सपना ही बने रहेंगे।


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