आम्बेडकर : रेगिस्तान में खिला हुआ फूल

उन्होंने दुनिया को दिखा दिया – विशेषकर उन लोगों को जो भारत में जातिवाद के सरपरस्त हैं – कि अगर उसे अवसर मिले तो कोई अछूत क्या कुछ नहीं कर सकता। वे इस बात के जीवंत प्रतीक थे कि भारतीय समाज में हमेशा से हाशिए पर पड़े वर्गों के लोगों को आरक्षण देना कितना सही निर्णय था। फॉरवर्ड प्रेस के अंग्रेजी संपादक, अनिल वर्गीस का भाषण अंश:

गत 9 अप्रैल 2017 को जोतिबा फुले पुस्तकालय समिति, देओरहा, हरियाणा ने महात्मा फुले और बाबासाहेब आंबेडकर को याद करने के लिए एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। गाँव के पुस्तकालय प्रांगण में आयोजित इस कार्यक्रम में महिलाओं और बच्चों समेत लगभग 500 व्यक्ति उपस्थित थे। रामफल, जो कि एक स्थानीय शिक्षक हैं, इस समिति के सचिव हैं और इसके सदस्यों में युवा महिलाएं व पुरुष और एक ब्राह्मण सज्जन भी शामिल हैं। कार्यक्रम में वरिष्ट पत्रकार अनिल चमडिया, समाजशास्त्री डॉक्टर अनिल कुमार और फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (अंग्रेजी) अनिल वर्गीज़ ने अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर अनिल वर्गीज़ द्वारा पठित भाषण यहाँ प्रस्तुत है :

मैं यहां फारवर्ड प्रेस के नुमाइंदे-बतौर आया हूं। महात्मा जोतिराव फुले और डा. भीमराव आंबेडकर को याद करने के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में फारवर्ड प्रेस को निमंत्रित करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

अनिल वर्गीस संबोधित करते हुए

फारवर्ड प्रेस निकालने का विचार सबसे पहले आयवन कोस्का को आया, जिन्होंने सन 1970 के दशक में एक युवा पत्रकार के तौर पर महाराष्ट्र में दलित पैंथर आंदोलन को कवर किया था। अपनी प्लास्टिक सर्जन पत्नी के साथ मिलकर उन्होंने स्वयं को बहुजनों के लिए एक मीडिया प्लेटफार्म बनाने के अभियान में झोंक दिया – चुप कर दिए गए लोगों को आवाज़ देने के अभियान में। उन्होंने इसमें अपना व्यक्तिगत धन लगाया। फारवर्ड प्रेस का जन्म दिल्ली में मई 2009 में देश की पहली पूरी तरह द्विभाषी (अंग्रेज़ी-हिन्दी) पत्रिका के तौर पर हुआ। इसके जन्मदाताओं आयवन और डा. सिल्विया कोस्का ने ब्राह्मणवादियों की चुनौतियों का मुकाबला करते हुए और अपनी बढ़ती उम्र, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और आर्थिक संघर्षों के बाद भी, फारवर्ड प्रेस को जिंदा रखा और आज वह बीज एक फलते-फूलते वृक्ष के रूप में हमारे सामने है।

पिछले आठ वर्षों में बहुत कुछ बदला है और यह अपेक्षित भी था क्योंकि आखिरकार फारवर्ड प्रेस का सामना संस्कृति, समाज और पत्रकारिता में भी गहरे तक जड़ें जमाए जातिगत पूर्वाग्रहों से था। पत्रिका के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन और आयवन कोस्का ने बहुजन साहित्य पर विमर्श शुरू कर हिन्दी साहित्य को एक नया आयाम दिया। पत्रिका ने उस नस्लवाद और जातिवाद को उजागर किया, जिसके चलते महिषासुर नामक बहुजन राजा को एक राक्षस में बदल दिया गया। मेरे प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन, जो पिछले दो दशकों से हिन्दी पट्टी में ज़मीनी स्तर पर हो रही हलचलों पर सूक्ष्म नज़र रखे हुए हैं, को यहां आज बोलना था। वे अपनी व्यस्तता के कारण यहां नहीं आ सके। मेरे लिए उनका स्थान लेना बहुत कठिन होगा परंतु मैं कोशिश करूंगा।

फारवर्ड प्रेस, सात सालों तक पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती रही। पिछले साल जून में मीडिया के क्षेत्र में तेज़ी से आ रहे बदलावों के मद्देनज़र, हम सबने इसे एक वेबसाईट और पुस्तकों के प्रकाशक के रूप में बदलने का निर्णय लिया। हमारी कोशिश यही थी कि इन पुस्तकों और वेबसाईट का मूल चरित्र बौद्धिक हो। फारवर्ड प्रेस की हमेशा से यह कोशिश रही है कि वह देश के सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से हाशिए पर पड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व करे, उन्हें उनकी आवाज़ बुलंद करने के लिए मंच उपलब्ध करवाए और उनमें से पत्रकारों और टिप्पणीकारों की पहचान कर उन्हें प्रोत्साहित करे।

सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाट्य मंचन

आज हम यहां महात्मा फुले और डा. भीमराव आंबेडकर की विरासत पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। यदि महात्मा जोतिराव फुले और भीमराव आंबेडकर न हुए होते तो शायद फारवर्ड प्रेस भी न होती और मैं आज यहां आपके समक्ष उपस्थित नहीं होता। फुले और आंबेडकर, फारवर्ड प्रेस के प्रकाश स्तंभ हैं और रहेंगे। मई 2009 में प्रकाशित अपने पहले अंक के मुखपृष्ठ पर फारवर्ड प्रेस ने इन दोनो महान विभूतियों के चित्र प्रकाशित किए थे और इसी अंक में भारत को उनकी विरासत पर एक लेख भी छापा था।

आज, जब हम क्रांति के बारे में सोचते हैं तो हमारे दिमाग में राष्ट्रों और लाखों लोगों के लामबंद होकर दुनिया को बदल डालने की कोशिशों की तस्वीर बनती है। परंतु फुले की क्रांति उनके घर से शुरू हुई थी। उन्होंने अपनी पत्नी और अपनी मौसी को पढ़ना-लिखना सिखाया, फिर फुले और उनकी पत्नी ने लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला और उसके बाद गर्भवती ब्राह्मण विधवाओं के लिए एक सम्मानजनक आश्रय स्थल। फुले दम्पत्ति ने भरपूर लेखन कार्य किया। जोतिराव से पहले सावित्री बाई ने लिखना शुरू किया। उन्होंने ‘‘काव्यफुले’’ की रचना की, जो पितृसत्तात्मकता की सदियों पुरानी, मज़बूत जंज़ीरों को उखाड़ फेकने का प्रयास थी। सावित्री बाई यदि इन जंज़ीरों को तोड़ सकीं तो उसका कारण यह था कि उनके पति ने उनको पढ़ना-लिखना सिखाया था। जब वे लड़कियों को पढ़ाने अपने स्कूल जाने के लिए घर से निकलती थीं तो पुरूष उन पर पत्थर और गोबर फेकते थे। इन्हीं पुरूषों ने जोतिराव के पिता पर दबाव बनाकर उन्हें इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वे अपने क्रांतिकारी शिक्षाविद लड़के और बहू को अपने घर से  निकाल दें। फुले दंपत्ति को अपना घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद उस्मान शेख नामक एक मुस्लिम सज्जन ने उन्हें अपने घर पर रहने के लिए आमंत्रित किया। जोतिराव ने उस्मान शेख की बहन फातिमा और सावित्री बाई को अध्यापक प्रशिक्षण लेने के लिए एक ईसाई मिशनरी संस्था में भेजा। बाद में ये दोनो, पुणे में फुले दंपत्ति द्वारा स्थापित लड़कियों के स्कूल में पढ़ाने लगीं।

लगभग 200 लोगों ने कार्यक्रम में भाग लिया

इस तरह की क्रांति के लिए दिल्ली या मुम्बई की आवश्यकता नहीं है। इस तरह की क्रांति यहीं कैथल में शुरू हो सकती है। इस क्रांति के लिए न तो जंगी प्रदर्शनों की ज़रूरत है और न ही धरनों की, न तो चमत्कृत कर देने वाले भाषणों की और ना ही कैमरों और मीडिया की। यह पुस्तकालय   जो आपने यहां स्थापित की है, वह भी इस क्रांति की चिंगारी बन सकता  है। मुझे विश्वास है कि आप सब के घरों और गांवों में फुले जैसी क्रांतियां आज भी हो रही हैं। बस बात इतनी सी है कि हमें इनके बारे में कुछ दशकों बाद ही पता चल सकेगा। फारवर्ड प्रेस ने कभी घर और परिवार को नहीं भुलाया, क्योंकि ये ही वे स्थान हैं जहां बिना कोई शोर मचाए क्रांतियां होती हैं। फारवर्ड प्रेस में जहां हम बड़े कैनवास पर बात करते थे, वहीं सात सालों तक, लगभग हर माह, हमने नियमित रूप से पारिवारिक मसलों पर केन्द्रित काॅलम प्रकाशित किया।

जब फुले ने कलम उठाई तो उन्होंने मनुवाद पर निर्मम प्रहार किए। वे जानते थे कि मनुवाद ही ऊँची जातियों के बहुजनों के साथ अमानवीय व्यवहार को औचित्यपूर्ण ठहराती है। उन्होंने महिषासुर सहित सभी मिथकों पर प्रश्नचिन्ह लगाए, उनकी पुनर्व्याख्या की और उनके झूठों को उजागर किया – उन झूठों को जो बहुजनों को खलनायक बताते थे।

फुले एक शूद्र परिवार से थे परंतु उनके परिवार के संपर्क-संबंध बहुत अच्छे थे। उनका माली परिवार अपने गांव में फूल, फल और सब्ज़ियां उगाता था और पुणे में उन्हें बेचता था। शहर और गांव में उनके परिवार को बहुत लोग जानते थे। फुले आसानी से अपने पारिवारिक व्यवसाय को चलाकर अपना जीवन गुजार सकते थे परंतु उन्होंने एक ईसाई मिशनरी हाईस्कूल में शिक्षा प्राप्त की थी, जहां बिना धर्म या जाति के भेदभाव के सभी विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाता था। इसके विपरीत, स्कूल के बाहर जातिवाद का बोलबाला था। इसने उन्हें जातिवाद में निहित अन्याय के विरूद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया। यहां हम सबको कुछ प्रश्न अपने आप से पूछने चाहिए। क्या हम में से जो लोग तुलनात्मक रूप से अच्छी स्थिति में हैं, वे अपनी जाति, किसी दूसरी जाति या दूसरे धर्म के हमारे भाई-बहनों के साथ हो रहे अन्याय से परेशान या दुःखी होते हैं? क्या हम उस अन्याय के खिलाफ लड़ने का प्रयास करते हैं? क्या, जहां तक अन्याय का प्रश्न है, हमारी चिंता हमारे परिवार, जाति या धर्म से आगे जाती है?

फुले की चिंता उनके परिवार, जाति और धर्म से ऊपर उठकर थी। वे उन सभी लोगों के लिए लड़ना चाहते थे जो जातिगत दमन के शिकार हैं और इसीलिए वे स्त्रियों, शूद्रों और अतिशूद्रों की बात करते थे। दुर्भाग्यवश, आज वे राजनीतिक नेता, जो स्वयं को सामाजिक न्याय का पैरोकार बताते हैं, अपनी जाति और अपने लिंग से ऊपर नहीं उठ पाते। और इनमें से अधिकांश पुरूष हैं।

आंबेडकर का जन्म फुले की मृत्यु के कुछ महीनों बाद हुआ था। वे दोनों उस क्षेत्र की संतान थे, जिसे हम आज महाराष्ट्र कहते हैं। आंबेडकर ने सन 1927 में मनुस्मृति दहन किया। परंतु इसके बहुत पहले उन्होंने अपनी उपलब्धियों से यह सिद्ध कर दिया था कि इस ग्रंथ में निहित मान्यताएं गलत हैं। वे वकील थे, अर्थशास्त्री थे और दार्शनिक थे। उन्होंने पीएचडी की दो डिग्रियां हासिल की थीं। वे भारतीय संविधान के निर्माता, भारत के विधि मंत्री, राजनेता, पत्रकार और समाज सुधारक थे। हम में से शायद ही कोई ऐसे किसी व्यक्ति से परिचित होगा, जो इतनी बहुमुखी प्रतिभा का धनी हो। उन्होंने 65 वर्ष की अपनी जिंदगी में जो उपलब्धियां हासिल कीं, उनकी सूची बहुत लंबी है।

आयोजकों को फॉरवर्ड प्रेस की किताबें भेंट की गईं

उन्होंने दुनिया को दिखा दिया – विशेषकर उन लोगों को जो भारत में जातिवाद के सरपरस्त हैं – कि अगर उसे अवसर मिले तो कोई अछूत क्या कुछ नहीं कर सकता। वे इस बात के जीवंत प्रतीक थे कि भारतीय समाज में हमेशा से हाशिए पर पड़े वर्गों के लोगों को आरक्षण देना कितना सही निर्णय था। वे अपने अनुभव से यह जानते थे कि अवसरों की उपलब्धता, किसी ऐसे व्यक्ति के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है, जो ऐसे समुदाय से आता हो जिसे सदियों या शायद हजारों वर्षों से कोई अवसर प्राप्त ही नहीं था। ये अवसर एक सूखे रेगिस्तान पर वर्षा की झड़ी की तरह होते हैं और इस झड़ी से वर्षों से सुषुप्त पड़े बीज अंकुरित होकर खिल जाते हैं। आंबेडकर रेगिस्तान में खिले एक हरे भरे पौधे के समान थे। उन्होंने अन्याय को देखा था, उन्होंने यह देखा था कि किस तरह किसी व्यक्ति की संभावनाओं को कुचला जाता है। उन्होंने अपने आसपास खड़ी की गई दीवारों को तोड़ा और शायद इसी ने उन्हें आरक्षण, महिलाओं के अधिकार और पृथक मताधिकार के लिए लड़ने वाला अथक योद्धा बनाया।

जब हमारे राष्ट्र का जन्म हुआ तब हम भाग्यशाली थे कि हमारे पास एक ऐसा व्यक्ति था जो वंचित समुदाय से था और जो हमारे संविधान का निर्माण करने में सक्षम था। हम भाग्यशाली थे कि हमारे पास एक ऐसा व्यक्ति था जो कानून के रास्ते महिलाओं समेत सभी वंचित वर्गों को उनके अधिकार दिलाना चाहता था। इन वर्गों का ही एक सदस्य उस समिति का प्रमुख था, जिसे संविधान का निर्माण करना था। वह एक ऐसा व्यक्ति था जो जाति के पदक्रम को नीचे से देख रहा था। निश्चित तौर पर हम बहुत भाग्यशाली थे। आंबेडकर के संघर्षों से दलितों और आदिवासियों (अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों) को असीम राहत मिली। परंतु उनकी मृत्यु के बाद सरकारें राष्ट्र निर्माण के काम में जुट गईं और फुले और आंबेडकर की राह से भटक गईं। दशकों तक अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), जो देश की आबादी का लगभग आधा है, सरकारों की नज़र से ओझल रहा। पिछले कुछ समय से उसकी ओर सरकारों का ध्यान गया है।

सदियों बाद वर्षा फिर से लौटी है। इस बूंदाबांदी से सुषुप्त पड़े बीज अंकुरित हो रहे हैं, भले ही इसकी प्रक्रिया कुछ धीमी हो। परंतु उन्हें अंकुरित होने से रोकने के प्रयास भी जारी हैं। कानून की किताबों में आरक्षण होने का अर्थ यह नहीं है कि वह वास्तव में लोगों को मिल रहा है। आरक्षित पद बड़ी संख्या में खाली पड़े हुए हैं। फिर, इस बात के प्रयास भी किए जा रहे हैं कि बहुजनों में व्याप्त आक्रोश और कुंठा के भाव को अन्य धर्मों के लोगों के प्रति घृणा में परिवर्तित कर दिया जाए।

घाव में नमक छिड़कते हुए हाल में यह प्रयास भी किए जा रहे हैं कि आंबेडकर को इस तरह के व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाए जो आज के आरएसएस के खांचे में पूरी तरह से फिट बैठता हो – एक ऐसा व्यक्ति जो तथाकथित इस्लामिक आक्रामकता का विरोधी है और घरवापसी का समर्थक।

लगभग दो वर्ष पहले आरएसएस के मुखपत्रों आर्गनाइज़र और पाञ्चजन्य ने आंबेडकर पर विशेषांक प्रकाशित किए थे। इनमें तथ्यों को तोड़मरोड़ कर आंबेडकर का हिन्दुकरण करने का प्रयास किया गया था। फारवर्ड प्रेस बुक्स में हम इस समय आंबेडकर पर एक पुस्तक तैयार करने के काम में जुटे हैं जो आंबेडकर के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालेगी और हमें बताएगी कि वे वास्तव में क्या थे। वो हमें बताएगी कि उन्हें जबरदस्ती ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व का  चोला पहनाया जा रहा है। अगले कुछ महीनों में यह किताब प्रकाशित होगी।

जानबूझकर अस्पष्ट और अनेकार्थी बातें करने के इस युग में जब नैतिकता और धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों का बोलबाला है, हमें आंबेडकर का ‘‘शिक्षित बनो, आंदोलन करो और संगठित हो’’ के नारे को याद रखना चाहिए और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जब जोतिराव और सावित्री बाई के घरवाले और पड़ोसी उनके दुश्मन बन गए थे तब जिस व्यक्ति ने उन्हें अपने घर में रहने के लिए आमंत्रित किया था उसका नाम उस्मान शेख था। उनका अपराध केवल यह था कि वे समाज के सबसे कमज़ोर तबके – पिछड़ी जातियों की लड़कियों – को शिक्षित करने का प्रयास कर रहे थे।

जय जोति! जय सवित्रीबाई! जय भीम


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