भिक्खु बोधानन्द : जिनके विचारों की नींव पर खडा हुआ पिछडों का आंदोलन

भिक्खु बोधानन्द ने 1928 में नवरत्न कमिटी की स्थापना की, जिसका विकास बाद में चलकर “हिन्दू बैकवर्ड क्लासेस लीग” व “मूल भारतवासी समाज” के रूप में हुआ। पढिए उनके अविस्मरणीय व्यक्तित्व व ऐतिहासिक कामों पर केंद्रित यह आलेख :

काश आप जैसे दस भिक्षु भी यदि आज भारत में होते तो देश की यह दुर्दशा नहीं होती।” बाबा साहब आंबेडकर ने यह बात बौद्ध आंदोलन में सक्रिय भदंत बोधानंद महास्थविर के बारे में कही थी।

वास्तव में भदंत बोधानंद उन महापुरुषों और प्रखर विद्वानों, आलोचकों में से एक थे जिनके कार्यों से समाज के उत्थान का एक मार्ग प्रशस्त होता है। चुनार (वाराणसी) में बारेंद्र-श्रेणी के एक ब्राह्मण परिवार में सन 1874 ई॰ में जन्मे भिक्खु बोधानंद जी बचपन से ही सच की खोज के तीव्र जिज्ञासू थे इसी कारण उनका आरंभिक जीवन साधू संतों, और योगियों की सेवा में बीता। उन्होंने हिन्दू धर्म शास्त्रों का बड़े प्रेम और उत्साह से अध्ययन किया लेकिन अध्ययन के बाद उनकी मानवीय संवेदना ने ब्राहमणवाद से ग्रसित हिन्दू धर्म के उस अमानवीय पहलू पर सोचने पर विवश किया जो सदियों से पिछडों और दलितों के पतन का कारण रही है। अपने निजी जीवन में भी ऐसे अमानवीय भयावह अत्याचारों को उन्होंने अपनी आँखों से देखा और लिखा कि- “मैंने हिन्दू शास्त्रों और हिन्दू संस्कृति का बड़ी गवेषणा के साथ अध्ययन किया, किन्तु मुझे शांति न मिली और यह मालूम हुआ कि हिन्दू–धर्म में एक अति भीषण जन्मगत वर्णव्यवस्था है, जिसके कारण एक विशाल मानव समूह, अर्थात शूद्रों और अछूतों कि अवस्था बड़ी दयनीय है। उन्हें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और शिक्षा संबंधी जीवन के उन्नति और विकास के सभी क्षेत्रों में नीचे गिराया गया हैसाझा उनके जन्म सिद्ध मानवीय अधिकारों और उच्च आकांक्षाओं को बड़े कौशल और निर्दयता के साथ कुचला गया है। उच्च जाति के हिन्दू लोग वंशानुक्रम से हजारो वर्षों से जन्मगत वर्णव्यवस्था द्वारा उनके श्रम से अनुचित लाभ उठा रहे हैं। इसे देखकर मेरा हृदय अत्यंत चिंचित, दुखित और द्रवित हो गया।”[1] उन्होने तथाकथित शूद्रों (पिछड़ों) और अछूतों (दलितों) को संबोधित करते हुए कहा था कि –“तुममें से प्रत्येक को उचित है कि तुम इस ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था को तोड़कर पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करो। याद रखो, वर्णव्यवस्था अत्यंत भयानक विष है, जिसने सोलह करोड़ मानव प्राणियों को शूद्र और अछूत बना डाला है।यह मनुष्य समाज में किसी भी तरह रहने योग्य नहीं है। इसे तो एकदम मिटा देना चाहिए।”[2]

कहा जाता है कि शब्द विचारों के परिचायक होते हैं और जहाँ तक मैं समझती हूँ व्यक्ति के कार्य उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की कसौटी होते हैं। भिक्खु  बोधानंद के कार्य उनके व्यक्तित्व और विचारों के वाहक तो हैं ही साथ ही वे समाज में बौद्धधम्म के मानवतावादी दृष्टिकोण के प्रसार के लिये हमेशा कार्यरत भी रहे। उन्होने 1916 में लखनऊ में “भारतीय बौद्ध समिति” की स्थापना की जिसके द्वारा वे लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य नगरों व गाँवों में बौद्ध धम्म की सर्वसाधारण शिक्षाओं का प्रचार करते रहे। भिक्खु भदंत ने विहार में एक पुस्तकालय की स्थापना की, जो बौद्धधम्म से संबंधित पालि, संस्कृत, अँग्रेजी, हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों तथा विविध धार्मिक दार्शनिक ऐतिहासिक पुरातात्विक और सामाजिक दुर्लभ किताबों और वैदिक पूर्व व वैदिक इतर भारतीय संस्कृति सभ्यता कला एंव पूर्वकालीन विदेशी यात्रियों के भ्रमण वृतांतों और भारतीय पुरातत्व की खोजपूर्ण रिपोर्टों का गवेषनापूर्ण अध्ययन का एक विशाल संग्रहलय है। जाहिर है उनके इस पुस्तकालय का उद्देश्य समाज के लोगों को शिक्षित करना है जिससे कि वे अपने उत्थान के साथ-साथ समाज के प्रति भी एक जिम्मेदार इंसान बन सकें। उन्होंने उत्तर भारत में अपने समकालीन तमाम पिछड़ों, दलित समाज के बुद्धिजीवियों, विचारकों, वकीलों, प्रोफेसर्स, विद्वानों और सुधारकों को पिछड़े वर्ग के आंदोलन के लिए लामबद्ध किया। कहना न होगा कि वे 1930 के दशक में उत्तर भारत में पिछड़े वर्ग की लड़ाई लड़ने वाले जुझारू विचारक और महान सामाजिक कार्यकर्ता थे। जिन जातियों पर उन्होंने विशेष रूप से काम किया, उनमें प्रमुख हैं – कलवार, तेली, बरई, तम्बोली, गडरिया, कहार, मल्लाह और कुम्हार आदि। उन्होंने सन 1928 में, लखनऊ में, एक “नवरत्न कमेटी” की स्थापना की। इसी संस्था का बाद में विस्तार हुआ और यह “हिन्दू बैकवर्ड क्लासेस लीग” व “मूल भारतवासी समाज”  नाम की एक संस्था बन गई। इन संस्थाओं के प्रवर्तक भिक्खु भदंत थे तथा इसके ऑर्गनाइजर कलवार जाति में पैदा हुए चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु थे।

प्रगतिशील विचारों के भिक्खु भदंत को लाग-लपेट और सपाटबयानी की आदत नहीं थी इस संदर्भ में पूर्व कुलपति अंगने लाल ने एक दृष्टांत  अपने लेख में उनके बारे में उल्लिखित किया है। वे लिखते हैं –“ऐसा मैंने सुना है कि भदंत जी जितना मृदु थे–उतने ही वे कड़े भी थे। वे गलत बात का तुरंत प्रतिवाद करते थे- यह बात चाहे जितने ही बड़े आदमी ने क्यों न कही हो। एक बौद्ध समारोह था। भदंत जी उसके सभापति और संचालक थे। मुख्य अतिथि (शायद राजश्री पुरुषोत्तमदास टंडन) ने बोलते समय बौद्धधर्म को हिन्दूधर्म की एक शाखा और बुद्ध को हिन्दू अवतार (विष्णु का अवतार) सिद्ध करने का प्रयास कर ही रहे थे कि भदंत जी ने उसका प्रतिवाद ही नहीं किया, बल्कि उनको बोलने से ही रोक दिया। इसी प्रकार एक बार बुद्ध जयंती के अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर राजनारायण ने कहा कि लोगों ने बौद्धधर्म को नहीं ‘बेचारे’ बुद्ध को भारत देश से बाहर कर दिया। भदंत जी ने ‘बेचारे’ शब्द पर कड़ी आपत्ति की और उन प्रोफेसर साहब को अपने ‘बेचारे’ शब्द को वापस लेना पड़ा। इस प्रकार अनेक घटनाएँ उनके जीवन की संस्मरण बनकर सामने हैं।” [3] वास्तव में भिक्खू भदंत के तार्किक ज्ञान और हर बात डंके की चोट पर कहने की आदत के पीछे उनका अपने सामाजिक सिद्धांतों के प्रति ईमानदारी और दृड़ता ही थी। अपनी इसी सोच को लेकर वे जीवन भर आंदोलित रहे। मौजूदा हालात आज भी बद से बदतर हैं, जिसका सामना कई दशक पहले भिक्खु बोधानंद ने किया आज भी वही षड्यंत्र अब भी जारी है। बुद्ध को विष्णु का अवतार और बौद्धधम्म को हिंदूधर्म की शाखा के तौर पर स्थापित करने वाले ब्राहमणवादी मानसिकता के लोगो का एक वर्ग निरंतर लगा हुआ है। भदंत बोधानंद कहते थे कि भविष्य में हम सबको, जिनका जातिगत और धार्मिक आधार पर शोषण हुआ है, एक सांस्कृतिक युद्ध लड़ना है, जिसके लिए हमें मजबूत किले चाहिए –और लखनऊ स्थित उनका बुद्ध विहार और उसमें स्थित –“बौद्ध धर्मानुसंधान पुस्तकालय”,उस वर्ग संघर्ष का अभेद्य किला है, जिसको उन्होंने मिल–बैठकर और मंत्रणा करके आंदोलन को आगे बढ़ने का केंद्र बिन्दु बना कर लोगों को दे दिया है। अपने लोगों को वे कहते थे कि “आप लोग ही जुझारू सैनिक हो! लड़ाई लंबी है, और उसमें सतत लगे रहने की जरूरत है। उस सेना में सच्चे, तपे तपाए, जुझारू और तन-मन और धन से लड़ने वाले सिपाहियों की भर्ती करने की जरूरत है।”[4] अपने शिष्यों के समक्ष लायब्रेरी की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा था कि –“यह मैं तुमको मानसिक बारूद दे रहा हूँ, जिसमें बैठकर पढ़ो, पुस्तकों का अध्ययन करो, इससे तुमको बहुत कुछ मिल जाएगा।”[5]

गौरतलब है कि भिक्खु भदंत की महत्वपूर्ण किताब “मूल भारतवासी और आर्य” नाम से 1930 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब सवर्णों (तथाकथित उच्च जातियों) के धर्म, संस्कृति, आचार–विचार, खान-पान आदि के आधार पर एक शोध है, जिसमें यह सिद्ध किया कि आर्य विदेशी हैं और भारत में आने के सैंकड़ों वर्षों बाद भी वे भारत के मूलनिवासियों में घुल-मिल न सके और न ही वे मूलनिवासियों की सभ्यता और संस्कृति को ही अपना सके| यही नहीं आर्यों और यहाँ के मूलनिवासिओं के बीच लंबे अर्से तक लड़ाइयाँ होती रहीं। वास्तव में उनके इस ग्रंथ से वह बुनियादी हक़ीक़त उजागर होती है, जिसे हजारो वर्षों से ब्राहमणवाद की जालसाजी ने छिपा रखा है। इस किताब ने अपने समय में एक वैचारिक आंदोलन खड़ा कर दबी –पिछड़ी जातियों में बड़ी जागृति पैदा की और उन्हें आत्मगौरवान्वित होने का आधार प्रस्तुत किया था। यह महत्वपूर्ण है कि आर्यों और मूलभारतवासियों की रेस थ्योरी पर लिखी गयी किसी भारतीय विद्वान द्वारा यह पहली शोध किताब है। इस महत्वपूर्ण ग्रंथ के परिचय में श्री चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने जो लिखा है उसमें से कुछ पंक्तियों का उल्लेख यहाँ आज के नए व जटिल संदर्भों को समझने की दृष्टि से बहुत ही अर्थपूर्ण है –“मेरे विचार से इस ग्रंथ का वर्तमान राष्ट्रीय आंदोलन से कोई संबंध नहीं| स्वाधीनता के संग्राम में सभी भारतवासी समान भाव से सहयोग कर रहे हैं; परंतु स्वाधीनता प्राप्ति का यह अर्थ कतई नहीं हो सकता कि अंग्रेजों के शासन से मुक्त होकर इस देश की दुर्बल और भोली-भाली प्रजा को फिर किसी वैदिक या ब्राह्मणी शासन की चक्की में पीसना पड़े! समाज और शासन की व्यवस्था केवल मनुष्यत्व के आधार पर होनी चाहिए, जो दीन-हीन और दुर्बल हैं; उनके अधिकारों की रक्षा सबसे पहले होनी चाहिए॰॰॰॰ यह मानी हुई बात है कि भारतवर्ष में एक भयंकर सामाजिक क्रांति होगी, क्योंकि क्रांति अत्याचारों कि जननी और सुधारों की माता है। जैसे माता से पहले पुत्र का अस्तित्व नहीं होता वैसे ही सुधार नहीं हो सकता। इसलिए क्रांति का आह्वान सुधार के जन्म हेतु हैं। भारतीय हिन्दू समाज अत्याचारों और अन्यायों का आगार है, यह इस ग्रंथ में सिद्ध कर दिया गया है, और इस बीसवीं शताब्दी में इन अत्याचारों को सहन करने के लिए नई संतति तैयार नहीं है, अत्याचारियों को यह स्मरण रखना चाहिए। धर्म की टट्टी खड़ी करके उसकी ओट में वर्ण-व्यवस्था का जाल फैलाकर बहुत दिनों तक शिकार खेला गया, यथेष्ट से अधिक स्वार्थसिद्धि हो गई। अब लोग इस बात को खूब समझ गए कि ब्राह्मणशाही वर्ण-व्यवस्था एक राजनीतिक चाल है, जिसके द्वारा भोली-भाली प्रजा तबाह की गयी।”[6]

उपरोक्त बात उन्होंने भले ही 1930 के सामाजिक संदर्भों को देखते समझते और झेलते हुए लिखी थी मगर आज भी यह उतनी ही अर्थपूर्ण है जितनी उनके तत्कालीन समय में थी। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज की सामाजिक व्यवस्था का लोकतान्त्रिक परिदृश्य भी हमारे सामने कई चुनौतियाँ पैदा करता है क्यों कि इसको संचालित करने वाले हाथ भी उसी वर्ग की कठपुतली हैं जिन्होनें हमेशा जनता के प्रति दमन का भरपूर रवैया अपनाया है और लोकतान्त्रिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर सत्ता में बने रहे हैं। आज एक बार फिर बोधानंद जैसे जुझारू विद्वान की समाज को जरूरत है जो गाँव देहातों में बसे लोगों और उन शहरी लोगों को भी जाकर समतामूलक विचारधारा से शिक्षित करें।

[1] भिक्खु बोधानंद की पुस्तक “मूल भारतवासी और आर्य”, के आनंद साहित्य सदन, अलीगढ द्वारा 2005 में  प्रकाशित पुनमुर्दित पुनर्मुद्रित संस्करण में संकलित गुलाब सिंह के लेख से उद्धृत। इस पुस्तक का पहला संस्करण 1930 में लखनऊ से छपा था।

[2] वही

[3] वही

[4] वही

[5] वही

[6] वही


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