h n

आदिम जारवा

यशोदा मुर्मू की कविता

अशांत असंख्य लहर लिए
उमड़-घुमड़ रहा है समंदर
उस समंदर के बीच
स्थिर खड़ा है एक द्वीप।

देखती हूं आकाश में उड़ रहे पंछियों को
और दूर-दूर देश जाते जहाजों को
समा जाती हैं असंख्य लहरें मुझमें
मन तरंगित हो उठता है।
अचानक ही घिर जाती हूं
अनंत अपार सघन उदासी से।
यादों में कौंध उठता है
उस द्वीप का एक घना जंगल
मेरा हृदय तपने लगता है।
मानो वैशाख की दोपहर में
सूरज के नीचे खड़ी हूं।

अनंत लहरें जैसे समंदर में
सवाल उठते कई मन में
स्वाधीन देश में
तुम हो कैद में
तुम्हारे लिए नया कानून बना
तुम्हारे साथ मिलना हुआ मना।
क्यों?

जंगल के खूंखार जानवर भी
मिलजुल गए हैं मानव के संग
और अति खूंखार बताए जाते हो तुम

मानव होकर भी।
क्यों?

खाली बदन, सपाट सूरत
खड़े हो जाते हो सड़क किनारे
तुम निकले फर्ज अपना निभाने
लेकिन लोग समझे आए हो रिझाने
अखिर क्यों?

कब तक रहोगे जड़वत स्थिर
अब मानो तुम बात हमारी
प्रकट करो ध्वनियां अपनी सारी
प्रतिध्वनित होगी धरती भी।

तुम हो जारवा तो हम हैं संताली
दोनों का परिचय एक है आदिवासी
तुम भी छीनो अपना हक-अधिकार
तुम भी आदिवासी हम भी आदिवासी
सिनगी, सिदो, बिरसा के उत्तराधिकारी

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई  2014 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

यशोदा मुर्मू

यशोदा मुर्मू संताली की जानी-मानी कवयित्री हैं

संबंधित आलेख

‘हेरि महां दरद दिवाणी म्हारा दरद न जाण्या कोय’
पति की मृत्यु और पुनर्विवाह न होने की स्थिति में मीरा का यह पक्ष अधिक मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है। उन्हें कुछ भी मानने...
‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ : मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद की दास्तान
मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग...
वर्चस्ववादी सत्ता की मुखालफत करतीं मोहन मुक्त की कविताएं
मोहन मुक्त सांस्कृतिक वर्चस्व को सत्ता का सबसे चालाक रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि मिथक, परंपरा, धर्म और भाषा के ज़रिए शोषण...
निष्ठा का सवाल उठाए अरसा गुज़र गया!
कंवल भारती की कविताओं पर सरसरी नज़र दौड़ाने से यही पता चलता है कि उनके अंदर समता को लेकर बेचैनी है। वे महीन से...
प्रगतिशीलों के बीच वीरेंद्र यादव के होने का निहितार्थ
वीरेंद्र यादव का सीना ‘अपनों’ के हाथों होते रहे ऐसे अपमानों से छलनी था। वे अपना ज़ख़्मी दिल लिए सेकुलर-प्रगतिशील विचारों की लड़ाई लड़ते...