जॉन डेवी का व्यवहारवाद और आंबेडकर

आंबेडकर, जॉन डेवी के दर्शन से प्रभावित व्यवहारवादी थे। परन्तु उन्होंने इस दर्शन के कुछ पक्षों को अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया और उसमें कुछ रचनात्मक चीज़ें जोड़ीं

जॉन डेवी

सन 1950 के दशक तक, भीमराव आंबेडकर जीवन के अनेक झंझावातों से गुज़र चुके थे। वे हिन्दू जाति व्यवस्था में अछूत होने के दर्द और अलगाव को महसूस कर चुके थे। दलित बहुजनों के राजनीतिक प्रतिनिधि में वे चुनावी हार-जीत का भी उन्हें अनुभव हो गया था। प्रधानमंत्री नेहरु के सलाहकार की जिम्मेवारी से मोहभंग होने के वावजूद वे भारतीय संविधान के निर्माता बतौर सत्ता के नज़दीक थे। भारत में उनकी विधायी उपलब्धियों को भले ही मान्यता न मिली हो, परन्तु दुनिया ने उन्हें भरपूर सराहा। सन 1952 के जून में, न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय (जहाँ के वे पूर्व छात्र थे) ने भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका को मान्यता देते हुए उन्हें मानद उपाधि से विभूषित किया।दिल्ली और बम्बई – जो आंबेडकर के कार्यक्षेत्र थे – से हजारों मील दूर न्यूयार्क में मिला यह सम्मान महत्वपूर्ण था। वैसे स्वयं आंबेडकर भी न्यूयार्क के आकर्षणों और जिंदादिली को भला कैसे भुला सकते थे। आखिर यही वह शहर था, जहाँ उन्होंने श्रेष्ठतम अमरीकी  प्रोफेसरों के सानिध्य में सन 1913 से 1915 तक पढ़ाई की थी। परन्तु सन 1952 के न्यूयार्क में, जिस एक व्यक्ति की याद उन्हें बहुत सता रही थी, वे थे अमरीकी व्यवहारवादी दार्शनिक जॉन डेवी, जिन्होंने आंबेडकर को पढ़ाया था।जब आंबेडकर न्यूयार्क की तरफ बढ़ रहे थे, उसी दौरान, 2 जून, 1952 को डेवी की मृत्यु हो गयी।आंबेडकर ने अपनी पत्नी सविता को लिखा, “मैं अपने पुराने मित्रों से घिरा हूँ, जो हर तरह से मेरी मदद कर रहे हैं। मैं प्रोफेसर जॉन डेवी से मिलने के लिए बहुत आतुर था परन्तु वे 2 तारीख को गुज़र गए।उस समय मेरा हवाईजहाज़ रोम में था”।

कोलंबिया विश्वविद्यालय में आंबेडकर

  न्यूयार्क में आंबेडकर के कई शिक्षक थे परन्तु डेवी से वे कितने अधिक प्रभावित थे, यह उनके पत्र की अगली पंक्तियों से जाहिर होता है। “मुझे उनकी मृत्यु से बहुत दुःख हुआ।अपने बौद्धिक ज्ञान के लिए मैं उनका ऋणी हूँ। वे एक अद्भुत  व्यक्ति थे”[1]। अपने जीवन के इस मोड़ पर, जब आंबेडकर काफी सफलताएं अर्जित कर चुके थे तब उन्हें न तो अतिरिक्त विनम्रता दिखाने की ज़रुरत थी और ना ही झूठ बोलने की। और एक निजी पत्र में तो बिलकुल भी नहीं।अतः हमें उनके शब्दों को गंभीरता से लेना चाहिए और यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि वे स्वयं को डेवी के प्रति इतना ऋणी क्यों मानते थे।

 डेवी के प्रति आंबेडकर के इस श्रद्धाभाव ने अन्य अध्येताओं का ध्यान भी खींचा और उनके निष्कर्षों पर नज़र डाल लेना भी बेहतर होगा। सन 1930 के दशक में आंबेडकर ने लिखा, “मेरे सबसे अच्छे मित्रों में कोलंबिया के मेरे सहपाठियों के साथ-साथ मेरे प्रोफेसर जैसे जॉन डेवी, जेम्स शॉटवेलम, एडविन सेलिग्मेन और जेम्स हार्वे रोबिन्सन भी शामिल हैं”[2]। आंबेडकर के विद्यार्थी जीवन के अपने अध्ययन में एलेनोर ज़ेल्लिओट कहती हैं, “आंबेडकर पर जॉन डेवी का सबसे गहरा प्रभाव था”[3]। केएन कदम बताते हैं कि “जब डेवी कक्षा में व्याख्यान देते थे, तब आंबेडकर उनका हर शब्द ध्यान से सुनकर अपनी नोटबुक में लिखते थे। वे अपने मित्रों से कहा करते थे कि अगर दुर्भाग्यवश डेवी की अचानक मृत्यु हो जाये तो वे उनके व्याख्यानों को शब्दशः लिख सकते हैं”[4] 

 डेवी ने निश्चित तौर पर आंबेडकर पर प्रभाव डाला।परन्तु किस तरह? अगर हम इन दोनों मौलिक विचारकों की तुलना करें तो हम पाएंगे कि आंबेडकर, जॉन डेवी के दर्शन में वर्णित व्यवहारवादी तो थे परन्तु उन्होंने इस दर्शन के कुछ पक्षों को अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया और उसमें कुछ रचनात्मक पहलू जोड़े, जिनका सम्बन्ध उनके भारतीय सन्दर्भों में दलितबहुजन होने से था। आंबेडकर चूँकि चिन्तक के अतिरिक्त कार्यकर्ता और वकील भी थे, अतः उन्होंने व्यवहारवाद में संवाद और सम्प्रेषण के पहलू का भी समावेश किया, जो कि जॉन डेवी के दर्शन में नहीं है। जबकि आंबेडकर का व्यवहारवाद, संवाद के जरिये, हमें अन्यों से जुड़ने को प्रोत्साहित करता है।

 असाधारण दार्शनिक

 जॉन डेवी कौन थे? आज यह प्रश्न हमें स्वाभाविक जान पड़ सकता है क्योंकि मानव जाति की बौद्धिक पड़तालों के इतिहास पर नज़र डालते समय हमारा सामना अनेकानेक दार्शनिकों और दर्शनों से होता है। परन्तु यह प्रश्न 1910 के दशक में अजीब-सा जान पड़ता। उस दौर में डेवी, दर्शनशास्त्र की दुनिया के शहंशाह थे। उन्होंने मिशिगन विश्वविद्यालय में अपने दर्शन को धार दी और शिकागो विश्वविद्यालय में “लेबोरेटरी स्कूल” चला कर शिक्षा के क्षेत्र को समझा।जब कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें वहां पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया, तब तक वे पर्याप्त प्रसिद्धि हासिल कर चुके थे। विलियम जेम्स (1842-1910) और चार्ल्स एस।पियर्स (1839-1914) जैसे अपने युग के अन्य व्यवहारवादी दार्शनिकों की तरह, जॉन डेवी (1859-1952) भी ‘समुदाय’ और ‘अनुभव’ पर जोर देते थे। उन्होंने “स्थायी और अपरिवर्तनशील” पर ध्यान केन्द्रित करने की यूरोप की सदियों पुरानी परंपरा के विरुद्ध विद्रोह कर, दुनिया की सतत परिवर्तनशील और अनिश्चित प्रकृति पर जोर दिया। वे “अनुभव” की अवधारणा के आधार पर हमारी गतिविधियों, जिनमें “ज्ञान हासिल करना” शामिल है, की परस्परता पर बल देते थे।अनुभव, व्यक्ति और उसके वातावरण की अंतःक्रिया से जनित होता है। वह किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में छवियों की श्रृंखला नहीं होता, जैसा कि आदर्शवादी कहते हैं। मनुष्यों और अन्य जीवों में कई समानताएं हैं।हम उद्देश्यों, इच्छाओं और आवेगों से चालित होते हैं और इनके चलते हम गतिविधियाँ करते हैं। जो गतिविधियां हम करते हैं, व्यवहारवादी उन्हें आदत के रुप में संबोधित करते हैं।आदतें केवल शारीरिक नहीं होतीं। हम अन्यों से किस तरह बात करते हैं या हम समस्याओं को कैसे सुलझाते हैं, वह भी हमारी आदतों का हिस्सा होता है। आदतें हमारे लक्ष्यों को पाने में हमारी मदद करतीं हैं और इसलिए वे नकारात्मक नहीं होतीं।डेवी की दृष्टि में, हमारी आदतों को इस तरह से आकार देने का प्रयास ही जीवन है, जिससे हम हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक लक्ष्यों को हासिल कर सकें।यह दर्शन, नित-परिवर्तित हो रही दुनिया के बारे में शाश्वत सत्यों की तलाश नहीं करता।वह एक ऐसा उपकरण है जो एक अनिश्चित वातावरण से हमें हमारे इच्छित को पाने में हमारी मदद करता है।

24 सितंबर 1932 को पूणे के यरवदा जेल में एम आर जयकर, तेज बहादुर शप्रु और आंबेडकर। इसी दिन “पूना पैक्ट” पर हुआ था हस्ताक्षर

 स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का पहला सबक   

डेवी ने बहुत लम्बा जीवन जिया और इसलिए उनके दर्शन का उपरलिखित संक्षिप्त विवरण, जटिल विचारों का अति सरलीकरण है। परन्तु यह उनकी सोच को मोटे-मोटे रूप में प्रस्तुत तो करता ही है। और वह यह भी बताता है कि जब युवा आंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में जिन डेवी से पढ़ रहे थे उनके विचार क्या थे। यद्यपि आंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में 1913 में प्रवेश लिया, परन्तु वे 1914 से पहले डेवी के संपर्क में नहीं आये। आंबेडकर के नोट्स और कोलंबिया विश्वविद्यालय के बुलेटिनों के तुलनात्मक अध्ययन से मुझे पता चला कि आंबेडकर पहली बार डेवी की कक्षा में सन 1914 की शरद ऋतु में उपस्थित हुए होंगे। आंबेडकर ने डेवी का जो पहला व्याख्यान सुना होगा, उसका शीर्षक था, “फिलोसोफी 31: साइकोलॉजिकल एथिक्स एंड मोरल फिलोसोफी”। यह एक वर्ष की अवधि के दो पाठ्यक्रमों – फिलोसोफी 231 और 232 का भाग था।परन्तु दूसरे पाठ्यक्रम का जिक्र आंबेडकर के नोट्स में नहीं मिलता। आंबेडकर ने 1915-1916 में डेवी के दो अन्य पाठ्यक्रमों को चुना : फिलोसोफी 131 और 132, “मोरल एंड पोलिटिकल फिलोसोफी”। मैंने फिलोसोफी 131-132 पाठ्यक्रमों के वे स्टूडेंट लेक्चर नोट्स ढूँढ निकाले हैं, जिनमें आंबेडकर को तीन दिन के लिए वैकल्पिक नोट्स-लेखक बताया गया है।[5] सन 1916 के वसंत में आंबेडकर ने – शायद अपने जीवन में पहली बार – फ्रांसीसी राज्य क्रांति का प्रसिद्ध ध्येय वाक्य डेवी के मुंह से सुना: “लोक कल्याण – एक नैतिक मानक और एक लक्ष्य के रूप में; लोक कल्याण के लिए व्यक्ति पर नियंत्रण।स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व, और यह कि समानता का अर्थ है लोक कल्याण”[6]। ये अवधारणाएं आंबेडकर के लिए आगे चलकर महत्वपूर्ण और समाजसुधार के उनके अभियान की पथप्रदर्शक बनीं। डेवी जैसे व्यवहारवादियों का, इनमें से एक मूल्य से कोई लेना-देना नहीं था।और वह था व्यक्ति की स्वतंत्रता या कार्य करने की उसकी आज़ादी। व्यव्हारवादियों के अनुसार, समानता और भाईचारा भी व्यतिगत आज़ादी जितना ही महत्वपूर्ण है। आंबेडकर ने डेवी को यूरोप के सन्दर्भ में इस ध्येय वाक्य की व्याख्या करते हुए सुना होगा। परन्तु वे मन ही मन में इसे भारत में सामाजिक न्याय के अपने संघर्षों से जोड़ रहे होंगे।

क्या हम भाईचारे की बलि दिए बगैर दलितबहुजनों को समान अधिकार दिला सकते हैं? यह प्रश्न आंबेडकर के साम्यवाद के विरुद्ध संघर्षों पर हावी रहा। वे मानते थे कि साम्यवाद, समानता (कम से कम भौतिक संपत्ति के सन्दर्भ में) तो स्थापित कर सकता है परन्तु भाईचारे की कीमत पर। व्यव्हारवादियों की सोच यह थी कि एक लक्ष्य को पाने के लिए हम दूसरे लक्ष्य को पाने की आशा को समाप्त नहीं कर सकते।इसलिए, आंबेडकर की सदा यही कोशिश रही कि वे भाईचारे को संरक्षित रखते हुए, दलितबहुजनों को समानता और स्वतंत्रता दिलवा सकें।मेरी यह मान्यता है कि आंबेडकर को जिन स्त्रोतों से यह विचार मिला, उनमें डेवी के व्याख्यान शामिल थे।बाद में, उन्होंने भारतीय सन्दर्भों में इन विचारों को परिशोधित किया।आंबेडकर एक मौलिक चिन्तक थे परन्तु उन्होंने अमरीकी व्यव्हारवाद के उपयोगी और महत्वपूर्ण मूल्यों का अपने चिंतन में समावेश किया।

प्रजातंत्र, जीने के एक तरीके के रूप में

व्याख्यानों के अतिरिक्त, आंबेडकर पुस्तकों के ज़रिये भी डेवी के व्यवहारवाद से प्रभावित हुए। आंबेडकर को पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था और वे हर तरह की पुस्तकें पढ़ा करते थे। एक बार, जब वे पानी के जहाज़ से लन्दन जा रहे थे, तब किसी कारणवश जहाज़ में वे पुस्तकों के अपने बक्से को खोल न सके। उन्होंने यात्रा के दौरान लिखे गए अपने एक पत्र में कहा कि उन्हें “मजबूरी में” बिना पुस्तकों के यात्रा का आनंद लेना पड़ा। आंबेडकर की व्यक्तिगत लाइब्रेरी में से जो कुछ बचा है, वह मुंबई के सिद्धार्थ कालेज – जिसकी स्थापना उनकी पीपुल्स एजुकेशनल सोसाइटी ने 1946 में की थी – में सुरक्षित है।कुछ अन्य पुस्तकें, मुंबई के सिम्बयोसिस इंस्टिट्यूट में भी हैं।पुस्तकों के इस खजाने को खंगालने पर मुझे पता चला कि जिस लेखक की सबसे अधिक पुस्तकें इसमें हैं, वे हैं डेवी।सिद्धांत कॉलेज में मुझे डेवी द्वारा लिखित निम्न पुस्तकें मिलीं: “एथिक्स” (1908), “द इन्फ्लुएंस ऑफ़  डार्विन ऑन फिलोसोफी” (1910), “जर्मन फिलोसोफी एंड पॉलिटिक्स” (1915), “डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन” (1916), “एक्सपीरियंस एंड नेचर” (1919), “द क्वेस्ट फॉर सरटेंटी” (1930), “फ्रीडम एंड कल्चर” (1939), और “प्रोब्लम्स ऑफ़ मेन” (1946)।इनके अतिरिक्त भी, डेवी व व्यवहारवाद पर केन्द्रित कई पुस्तकें उनके संकलन में थीं।इनमें शामिल हैं, सिडनी हुक की “जॉन डेवी: फिलोसोफेर ऑफ़ साइंस एंड फ्रीडम” (1950), जेरोम नथांसन की “जॉन डेवी: द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ द डेमोक्रेटिक लाइफ” (1951), पॉल आर्थर शिल्प की “द फिलोसोफी ऑफ़ जॉन डेवी” (1951) और एएच जॉनसन की “द विट एंड विजडम ऑफ़ जॉन डेवी” (1949)।इसके अतिरिक्त, सिम्बयोसिस इंस्टिट्यूट में मुझे व्यवहारवाद पर दो अन्य पुस्तकें भी मिलीं: डेवी की “एसेज इन एक्सपेरिमेंटल लॉजिक” (1953) और जोसफ रैटनर का डेवी के लेखों का संग्रह “इंटेलिजेंस इन द मॉडर्न वर्ल्ड: जॉन डेवीस फिलोसोफी” (1939)।

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में आंबेडकर ने किया था बौद्ध धर्म स्वीकार

इनमें से जिन दो किताबों में हाशिये पर सबसे अधिक नोट्स लिखे हुए हैं और कई पंक्तियों को रेखांकित किया गया है, वे डेवी द्वारा लिखित हैं। उन्होंने डेवी की “डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन” (1916) की प्रति जनवरी 1917 में लन्दन में खरीदी थी।[7] यह पुस्तक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह डेवी के विचारों पर समग्र प्रकाश डालती है। इसकी विषयवस्तु है दर्शन, विज्ञान, इतिहास और करियर प्रशिक्षण से शिक्षा का संबंध। इस पुस्तक में अपनी पूर्व अवधारणा को संशोधित करते हुए, डेवी लिखते हैं कि शिक्षा के जरिये समाज स्वयं को संरक्षित और संचारित करता है। समाज के नए सदस्यों का निर्माण, उस अनुभव के ज़रिये होता है जिससे वे स्कूलों में गुज़रते हैं। डेवी का तर्क है कि व्यक्ति अपने पर्यावरण से सीखता है परन्तु इस पर्यावरण – जैसे स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा – को इस तरह से आकार दिया जा सकता है, जिससे वह लोगों में ऐसी आदतों का निर्माण कर सके, जिनकी हमें प्रजातंत्र के लिए ज़रुरत है।प्रजातंत्र की सफलता के लिए यह ज़रूरी है कि दूसरों के साथ अंतर्व्यव्हार करने की हमारी आदत हो और हम, अपने साथियों के साथ मिलकर समस्यायों को सुलझाना सीखें। डेवी के लिए प्रजातंत्र एक आदत थी, जीने का एक तरीका था।और उसका निर्माण जनसाधारण को एक विशिष्ट प्रकार से व्यव्हार करने की आदत ड़ाल कर किया जा सकता था।

प्रजातंत्र के जीने का एक तरीका होने की संकल्पना से आंबेडकर भी सहमत थे। जाति व्यवस्था, प्रजातान्त्रिक सोच और सामुदायिक भावना के विकास में बाधक थी क्योंकि वह जन्म के आधार पर लोगों को विभाजित और श्रेणीबद्ध करती थी। प्रजातान्त्रिक आदतों से प्रजातान्त्रिक समुदायों के निर्माण का यह आदर्श, आंबेडकर के दिलो-दिमाग में इतने गहरे तक पैठ गया था कि वह उनका ही विचार बन गया था।उदाहरण के लिए, सन 1919 में, साउथबरो समिति के समक्ष, भारतीयों को मताधिकार देने के प्रश्न पर अपनी गवाही में उन्होंने जाति व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि वह प्रजातान्त्रिक और विचारगत समानता को नष्ट करती है।आम्बेडकर ने कहा :

“मनुष्य, समुदाय में इसलिए रहते हैं क्योंकि उनके बीच कुछ साँझा होता है।किसी समुदाय के निर्माण के लिए उसके सदस्यों के उद्देश्य, आस्थाएं, आकांक्षाएं, ज्ञान और समझ साँझा होनी चाहिए।समाजशास्त्रियों की भाषा में, उन्हें एक-सा सोचना चाहिए।परन्तु उनके बीच यह सब साँझा कैसे हो सकता है? उनकी सोच एक-सी कैसे हो सकती है? निश्चय ही यह केवल एक दूसरे के साथ चीज़ें बांटने से नहीं हो सकता, जैसे हम केक का कोई टुकड़ा बांटते हैं।समान सोच के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि लोग एक-दूसरे से संवाद करें और एक दूसरे की गतिविधियों में भागीदारी करें।लोग केवल एक-दूसरे के नज़दीक रहने से एक-दूसरे के समान विचारों वाले नहीं बन सकते।उसी तरह, जैसे एक-दूसरे से दूर रहने से उनकी सोच की समानता नष्ट नहीं हो जाती”।[8]

ये मोटे तौर पर डेवी के शब्द हैं, जो उनकी पुस्तक ‘‘डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन” से लिए गए हैं। परंतु इनमें जातिगत भेदभाव किस तरह प्रजातंत्र का विरोधी है, इसे समझाने के लिए कुछ परिवर्तन किया गया है।आंबेडकर ने एक ऐसी समिति, जो भारत के विभिन्न वर्गों तक प्रजातंत्र को पहुंचाने के मुद्दे पर विचार कर रही थी, के समक्ष जाति व्यवस्था की बुराईयों का वर्णन किया। इससे स्पष्ट है कि वे डेवी की प्रजातंत्र की अवधारणा से कितने प्रभावित थे।

2 मई 1951 नई दिल्ली में बुद्ध जयंती समारोह के मौके पर जनसभा को संबोधित करते आंबेडकर

डेवी के प्रजातंत्र के दर्शन का एक केन्द्रीय तत्व यह था कि प्रजातंत्र, मतदान केन्द्र से शुरू और उस पर खत्म नहीं होता। प्रजातंत्र का संबंध अंतर्व्यवहार की आदत से है, जो हममें हो सकती है या नहीं भी। आंबेडकर इस विचार से प्रभावित थे, यह इससे स्पष्ट है कि उन्होंने ‘‘डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन” की इस महत्वपूर्ण पंक्ति को किताब की अपनी प्रति में अपनी हस्तलिपि में लिख थाः ‘‘प्रजातंत्र, केवल एक शासन व्यवस्था नहीं है। यह मुख्यतः मिलकर रहने का तरीका है और संयुक्त अनुभवों को सांझा करने की प्रणाली है[9]।  जाति व्यवस्था उन आदतों को नष्ट करती है, जिनसे सांझा हित निर्मित होते हैं। वह सहयोग की उस भावना को नष्ट करती है,  जो एकसमान विचारों से उपजती है। आंबेडकर को यह एहसास था कि भारत में विभिन्न समूहों की बीच की खाई को धर्म के नाम पर और गहरा व चौड़ा किया जा रहा है। सन 1936 के ‘‘एनीहिलेशन आफ कास्ट” पर अपने विवादास्पद भाषण, जिसे वे अंततः पढ़ नहीं सके थे, में उन्होंने प्रजातंत्र के जीने का तरीका होने के महत्व को रेखांकित किया। इसके लिए उन्होंने अपने गुरू की इस महान पुस्तक की इसी पंक्ति का उपयोग किया। आंबेडकर ने डेवी के शब्द ही दोहराए, परंतु जाति-आधारित अन्याय के विरूद्ध संघर्ष के संदर्भ में। उन्होंने अपने भाषण में डेवी के प्रति उनके ऋणी होने की बात भी कही। भाषण का यह हिस्सा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह पुनर्निर्माण से सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा को प्रस्तुत करता हैः

“प्रोफेसर जॉन डेवी, जो मेरे शिक्षक थे, और जिनका मैं ऋणी हूं, ने कहा था कि प्रत्येक समाज इस तरह के मुद्दों में उलझ जाता है जो तुच्छ और क्षुद्र होते हैं; वह मृत अतीत के मुद्दों में उलझ जाता है, वह ऐसी चीज़ों में उलझ जाता है जो विकृत होती हैं। जैसे-जैसे समाज प्रबुद्ध होता जाता है उसे यह एहसास होता है कि अपने वर्तमान को समग्र रूप से संरक्षित रखना और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना उचित नहीं है। उसे वर्तमान के केवल उस हिस्से को संरक्षित रखना है और अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करना है जो भविष्य में एक बेहतर समाज का निर्माण कर सके[10]”।

आंबेडकर ने डेवी की ‘डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन’ के मूल पाठ में से वे शब्द हटा कर, जो शिक्षा के बारे में थे, डेवी के ही शब्दों का प्रयोग किया। इससे यह स्पष्ट है कि यद्यपि आंबेडकर, डेवी के व्यवहारवाद से बहुत प्रभावित थे परंतु वे उसे विस्तार देना चाहते थे और उसे ऐसे परिवर्तनों का वाहक बनाना चाहते थे, जो तत्कालीन भारत के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का मुकाबला कर सके। आंबेडकर और डेवी के बीच समानता यह है कि दोनों ही यह मानते थे कि हमें हमारी पुरानी परंपराओं को पूरी तरह से त्यागने की आवश्यकता नहीं है। उनमें जो अच्छा है, उसे हमें संरक्षित रखना चाहिए; जो क्षतिग्रस्त हो गया है, उसे ठीक करना चाहिए और जो बुरा है, उसे छोड़ देना चाहिए। दूसरे शब्दों में, हमें अतीत के विरूद्ध विद्रोह करने की ज़रुरत नहीं है। हमें आज की आवश्यकताओं के अनुरूप, अतीत का पुनर्निमाण करने की ज़रूरत है। और इसीलिए, आंबेडकर ने अपने भाषण में ऊँची जातियों के समाज-सुधारकों से धर्मशास्त्रों को त्यागने के लिए कहा, ताकि वे अपनी उन आदतों को बदल सकें जिनके कारण वे जातिगत विभेद करते हैं। जब तक अतीत का पुनर्निर्माण नहीं किया जाता तब तक हम ऐसे समुदाय का निर्माण करने की आशा नहीं  कर सकते जिसके सदस्य एक-से विचार रखते हों। प्रजातांत्रिक भविष्य के निर्माण के लिए अतीत के पुनर्निर्माण पर आंबेडकर का यह ज़ोर, उनकी सोच पर डेवी के प्रभाव को दर्शाता है।

धर्म, सिद्धांत और नियम

आंबेडकर की दृष्टि में धर्म केवल सामाजिक अन्याय का कारण नहीं है। वह सामाजिक अन्याय को दूर करने का महत्वपूर्ण उपकरण भी बन सकता है। आगे चलकर आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की अधिकाधिक चर्चा की और यह बताया कि वह एक एक समतावादी धर्म है, जो समाज के सभी सदस्यों को समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की गारंटी देता है। बौद्ध धर्म इन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है। वह कहता है कि मूलतः सभी मनुष्य समान हैं। परंतु बौद्ध धर्म के समतावादी चरित्र को और मज़बूती देने के लिए आंबेडकर एक ऐसे प्रणालीगत उपकरण का इस्तेमाल करते हैं, जो उन्हें डेवी से मिला था। व्यवहारवाद पर केन्द्रित एक अन्य पुस्तक, जिसमें आंबेडकर ने अपने हाथों से बहुत कुछ लिखा है, वह है ‘एथिक्स’। इसके लेखक जॉन डेवी और जेम्स एच टफ्ट्स थे। आंबेडकर के पास इस पुस्तक का सन 1908 का संस्करण था। यह स्पष्ट नहीं है कि यह पुस्तक उनके संकलन में कैसे पहुंची परंतु इस बात के प्रमाण उपलब्ध हैं कि सामाजिक कार्यकर्ता के।केलूसकर ने आंबेडकर को यह पुस्तक उपहार में दी थी।[11]  यह पुस्तक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह परंपरा पर आधारित नैतिकता से विवेक पर आधारित नैतिकता की ओर बढ़ने की अवधारणा के प्रति डेवी की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उनके अनुसार, नैतिक प्रगति तभी हो सकती है जब व्यक्ति अतीत की प्रथाओं से मुक्त हो, काम करने के पुराने तरीकों को त्यागे और यह आकलन करे कि पुराने तरीकों से काम करना कितना उपयोगी है। व्यक्ति, विचार और आचरण की अपनी परंपरागत आदतों पर लौट सकता है; परंतु उनकी सोच-समझकर व्याख्या और आकलन करने के बाद ही। यही, आंबेडकर की ‘एनिहीलिएशन आफ कास्ट’ में जाति की समालोचना का आधार है। आंबेडकर चाहते थे कि परंपरावादी हिन्दू, अपनी पुरानी प्रथाओं और पारंपरिक ग्रंथों से परे हटकर दमन की जड़ों के बारे में सोचें।

अपने आगे के जीवन में आंबेडकर ने डेवी की ‘एथिक्स’ का इस्तेमाल अपनी एक महत्वपूर्ण अवधारणा को विकसित करने के लिए किया – सिद्धांतों और नियमों के बीच भेद। आंबेडकर इस भेद का इस्तेमाल, धर्म और धार्मिक सुधार संबंधी अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए करते हैं। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द बुद्धा एण्ड हिज़ धम्म’ में अहिंसा पर अपने विचार प्रस्तुत करते समय वे डेवी की ‘एथिक्स’ में सिद्धांतों और नियमों के बीच के विभेद का इस्तेमाल करते हैं। आंबेडकर बुद्ध के सिद्धांतों पर अपनी इस पुस्तक, जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई, में पूछते हैं, ‘‘क्या बुद्ध की अहिंसा पूर्णतः निरपेक्ष थी? क्या वह एक सिद्धांत थी? या वह एक नियम थी?[12]‘‘  आंबेडकर यहां डेवी और टफ्ट्स द्वारा लिखित ‘एथिक्स’ के उस हिस्से को उद्दृत कर रहे हैं, जिसे पुस्तक की उनकी प्रति में रेखांकित किया गया था। पुस्तक कहती है, ‘‘नियम व्यावहारिक होते हैं। वे काम करने की हमारी आदतें होते हैं। परंतु सिद्धांत, बौद्धिक होते हैं। वे चीजों को कसौटी पर कसने के तरीके होते हैं[13]।  नियम सीधे और सरल होते हैं। सुस्पष्टता और सरलता उनके गुण होते हैं परंतु इसी कारण, वे लचीले नहीं रह जाते। यह स्पष्ट नहीं रहता कि किन परिस्थितियों में उन्हें लागू किया जाना चाहिए और किन परिस्थितियों में नहीं। कोई नियम कह सकता है कि ‘‘किसी को जान से मत मारो”। परंतु इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि क्या किसी को इतना मारना स्वीकार्य है, जो जानलेवा न हो। नियम हमें केवल यह बताते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। दूसरी ओर, सिद्धांत हमें वे तरीके उपलब्ध करवाते हैंए जिनसे हम आचरणों, स्थितियों और घटनाओं को कसौटी पर कस सकेंए उनका आंकलन कर सकें। नियमों की तुलना में सिद्धांत अधिक उपयोगी हैं क्योंकि वे विभिन्न परिस्थितियों में लागू हो सकते हैं। बुद्ध और डेवी, दोनों यह मानते थे कि अनुभवए नित।परिवर्तित होते रहते हैं व इससे वर्तमान और भविष्य का हमारा जीवन अनिश्चित हो जाता है। सिद्धांत वे बौद्धिक उपकरण हैं, जिनसे हम अपने पूर्व अनुभवों से प्राप्त सीखों का इस्तेमाल, भविष्य में आने वाली अप्रत्याशित चुनौतियों से निपटने के लिए कर सकते हैं। सिद्धांत अधिक व्यावहारिक और चिंतन-आधारित होते हैं। नियमों के विपरीत, वे हमें चीजों को समझने और अपने आचरण में पुरानी लीक पर न चलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

आम्बेडकर इस अंतर का इस्तेमाल, अहिंसा की अवधारणा का पुनर्निमाण के लिए करते हैं। वे कहते हैं कि बुद्ध की दृष्टि में अहिंसा सिद्धांत थी, नियम नहीं। आंबेडकर के अनुसार, बुद्ध की शिक्षा का सार यह है कि ‘‘सबसे प्रेम करो ताकि तुम्हें किसी की जान लेने की इच्छा ही न हो’। यह अहिंसा के सिद्धांत को प्रस्तुत करने का सकारात्मक तरीका है।।।अहिंसा का सिद्धांत यह नहीं कहता कि ‘मारो मत’। वह कहता है ‘सभी से प्रेम करो’।[14]  प्रेम एक ऐसा शब्द है जिसके अर्थ इतने व्यापक और लचीले हैं कि परिस्थितियों के अनुरूपए उनमें परिवर्तन किया जा सकता है। सभी से प्रेम करनाए किसी की जान न लेने से कहीं अधिक बेहतर है। एक-दूसरे को न मारने के नियम का पालन करते हुए भी, हो सकता है कि हम डेवी की परिकल्पना का साँझा हितों वाला समुदाय न बना पाएंण् इस तरह, आंबेडकर, बौद्ध धर्म संबंधी अपने विचारों में डेवी की सोच का समावेश करते है। आंबेडकर के अनुसार, जब बुद्ध अहिंसा की बात कर रहे थे तब वे प्रेम को बढ़ावा दे रहे थे। यह सिद्धांत कई विभिन्न परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है। केवल किसी को नुकसान न पहुंचाने का नियम, उस तरह की सामुदायिक भावना का विकास नहीं कर सकता, जिसे आंबेडकर भारत में विकसित होता देखना चाहते थे।

तब क्या हो जब समुदाय के बीच असहमतियां हों और उन्हें सुलझाया जाना हो। आंबेडकर का “बौद्ध धर्म का पुनर्निर्माण”, इस चुनौती से निपटने का तरीका बताता है। ‘द बुद्ध एण्ड इज़ धम्म’ में आंबेडकर, बुद्ध के अष्ठांगिक मार्ग के एक सिद्धांत ‘सम्यक वाक्’ की इस तरह विवेचना करते हैं, जिससे वह दूसरों से प्रेम करने के सिद्धांत से जुड़ जाता है।

“हमें वही बोलना चाहिए जो सत्य हो; हमें वह नहीं बोलना चाहिए, जो असत्य है; हमें दूसरों के बारे में बुरा नहीं बोलना चाहिए। हमें दूसरों को लांछित करने से बचना चाहिए; हमें हमारे किसी साथी मनुष्य के साथ क्रोधपूर्ण या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। हमें सबके साथ सहृदयता और शिष्टता से बात करना चाहिए। हमें अर्थहीन और मूर्खतापूर्ण बातें नहीं करनी चाहिए। हमें समझदारी से उद्धेश्यपूर्ण बातें करनी चाहिए।“ [15]

इसके पीछे सोच यह है कि हमें हमेशा ऐसे तरीकों की तलाश करनी चाहिए, जिनसे हम अपने क्रोध पर नियंत्रण कर सकें और दूसरों से प्रेम कर सकें – उनसे भी, जो हमारे शत्रु हैं या जो हमसे घोर असहमत हैं। यह है पुनर्निमित अहिंसा और अपने इस नए रूप में वह केवल दूसरों को हानि न पहुंचाने पर केन्द्रित नहीं है। दूसरों को मारने का प्रतिषेध करने की बजाए, वह समुदाय के सदस्यों के बीच बंधुत्व की भावना का विकास करने और उसे बनाए रखने पर जोर देती है। इस प्रकारए आंबेडकर, प्रजातंत्र, पुनर्निमाण और सोच-विचारकर कार्य करने के डेवी के विचारों का, बौद्ध धर्म की भारतीय परंपरा से मेल करवाते हैं। यह पुनर्निमित बौद्ध धर्म, दलितबहुजनों के सशक्तिकरण का वाहक बन सकता है और एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकता है जिसमें सार्वजनिक हित सर्वोपरि हों। डेवी की तरह, आंबेडकर एक समस्या को सुलझाने के लिए समुदाय के परस्पर रिश्तों को नष्ट कर भविष्य में नई समस्याएं खड़ी करना नहीं चाहते थे।

आंबेडकर, डेवी के विचारों को बौद्ध धर्म से इस प्रकार जोड़ते हैं, जिससे समुदाय अपनी समस्याओं को सुलझा सके परंतु साथ ही परस्पर रिश्तों को भी बचाए रख सके। जिस समय उनकी राजनैतिक गतिविधियां चरम पर थीं, उस समय भी वे इस मुद्दे पर जोर देते थे। नव-स्थापित सिद्धार्थ कालेज की विद्यार्थी संसद को संबोधित करते हुए 25 सितंबर, 1947 को उन्होंने विद्यार्थी नेताओं से अपील की कि वे अपने विरोधियों का सम्मान करेंः

“(किसी तानाशाह को) वक्तृत्व कला पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी इच्छा ही कानून होती है। परंतु संसद, जहां कानून बनाए जाते हैं – निःसंदेह जनता की इच्छा से – वहां सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है, जिसे अपने विरोधी को अपने से सहमत करने की कला आती हो। आप संसद में अपने विरोधी को घूंसा मारकर नहीं जीत सकते।।।आपको अपने विचार, शब्दों में व्यक्त करने होंगे; आपको अपने विरोधी को अपने से सहमत करना होगा, आपको तर्क से उसे जीतना होगा। आप चाहे सौम्यता से बोलें या उग्रता से- आपकी बातें हमेशा तार्किक और उद्धेश्यपूर्ण होनी चाहिए।“[16]

संविधान प्रारुप समिति के सदस्यों के साथ आंबेडकर

आंबेडकर जो कह रहे थे, वह यह था कि आप जोरदार ढंग से अपनी बात रख सकते हैं, अपने तर्कों की जबरदस्त वकालत कर सकते हैं परंतु आपको ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे आपके विरोधियों के साथ आपके मेलमिलाप की आशा ही समाप्त हो जाए। आंबेडकर के अपने भाषण कब-जब इस आदर्श पर खरे नहीं उतरते थे परंतु डेवी के इस आदर्श को उन्होंने भारतीय संदर्भों में सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। अगर प्रजातंत्र अंतर्व्यवहार की उन आदतों के संबंध में है, जो सामुदायिक भावना को संरक्षित रखती हैं और उसे बढ़ावा देती हैं; यदि समुदाय के कुछ सांझा हित हैं और यदि उसके सदस्यों के मोटे तौर पर एक से विचार हैं, तब हम सामाजिक न्याय पाने के अपने संघर्ष के दौरान अपने विरोधियों का न तो तिरस्कार कर सकते हैं और ना ही उन्हें खारिज कर सकते हैं। न्याय केवल समानता और स्वतंत्रता के बारे में नहीं है। उसके लिए समुदाय के सदस्यों के बीच भाईचारा भी आवश्यक है। अतः आम्बेडकर के बौद्ध धर्म में परस्पर संवाद बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि वह सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। बौद्ध धर्म हमें यह भी सिखाता है कि हम, अपने से बहस करने वालों और विरोधियों से भी प्रेम करें।

आंबेडकर के समाजसुधार के कार्यक्रमों के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है।[17]  इस लेख में आंबेडकर के कार्य के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं की चर्चा की गई है और यह बताने का प्रयास किया गया है कि उन्होंने जिस तरीके से अपना काम किया, उसकी प्रेरणा उन्हें कहां से मिली थी। हमें आंबेडकर के व्यवहारवाद से संबंधित विचारों पर भी ध्यान देना चाहिए[18]।  जैसा कि मैंने बताया है, आंबेडकर, डेवी के प्रजातंत्र, पुनर्निर्माण और विवेक पर आधारित नैतिकता संबंधी विचारों के प्रशंसक थे। उन्होंने इन्हें अपनाया और सुधार के लिए समर्पित अपने जीवन का हिस्सा बनाया। वे व्यवहारवादी थे, परंतु उनके सरोकार भारतीय थे। एक बहुवादी समाज में धर्मों के कारण उत्पन्न हुई समस्याओं के साथ-साथ उन्हें धर्मों के वरदानों का भी अहसास था। जाति सुधारक के रूप में आंबेडकर और अमरीकी व्यवहारवादी डेवी के परस्पर संबंधों के बारे में काफी कुछ कहा जा सकता है परंतु यह साफ है कि आंबेडकर की लेखनी, उनके भाषणों और उनकी गतिविधियों पर डेवी की छाप स्पष्ट नजर आती है। डेवी की तरह, आंबेडकर समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की स्थापना के प्रति समर्पित थे। परंतु उनके पास वह परंपरा और संसाधन उपलब्ध थे, जिनके जरिए वे बौद्ध धर्म को इन आदर्शों की स्थापना का साधन बना सकते थे। हमें इस ऋण को स्वीकार करना चाहिए, तभी हम यह समझ सकेंगे कि आंबेडकर ने किस तरह अमरीकी व्यवहारवाद को भारतीय संदर्भों के अनुकूल बनाया।

स्काट आर स्ट्राउड आस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय के संचार अध्ययन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वे संवाद और संस्कृति के पारस्परिक प्रभाव और संबंधों के अध्येता हैं। उनकी पुस्तकों में ‘जान डेवी एंड द आर्टफुल लाइफ‘ (2011) और ‘कांट एंड द प्रामिस आफ रिटारिक‘ (2014) शामिल हैं। सम्प्रति वे एक पुस्तक की पांडुलिपि पर कार्य कर रहे हैं जो कोलंबिया विश्वविद्यालय में 1913 से 1916 के बीच आंबेडकर के डेवी के व्यवहारवाद के संपर्क में आने की कहानी कहती है और यह बताती है कि किस तरह व्यवहारवाद ने भारत में सामाजिक न्याय के लिए आंबेडकर के नवोन्मेषी संघर्ष को आकार दिय। स्ट्राउड के शोधप्रबंध ‘रिटारिक सोसायटी क्वार्टरली’, ‘‘फिलासाफी एंड रिटारिक”, ‘रिटारिक एंड पब्लिक अफेयर्स’, ‘जर्नल आफ कम्युनिकेशन एंड रिलीजन’, ‘वेस्टर्न जर्नल आफ कम्युनिकेशन’, ‘‘एडवांसिस इन हिस्ट्री आफ रिटारिक’ व ‘द जर्नल आफ स्पेक्यूलेटिव फिलासाफी’ में प्रकाशित हैं।

[1] नानक चंद रत्तू, “लास्ट फ्यू इयर्स ऑफ़ डॉ आंबेडकर” (नयी दिल्ली: अमृत पब्लिशिंग हाउस, 1997) पृष्ठ 35

[2] “कोलंबिया अल्मुनी न्यूज़”, 19 दिसंबर, 1930, 12

[3] एलेनोर ज़ेलिओट, “आंबेडकरस वर्ल्ड” (नयी दिल्ली: नवायन, 2013), 69

[4] केएन कदम, “द मीनिंग ऑफ़ आंबेडकरईट कन्वर्शन टू बुद्धिज़्म एंड अदर एसेज” (नयी दिल्ली: पॉपुलर प्रकाशन, 1997), 1।

[5]आंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में किन पाठ्यक्रमों का अध्ययन किया उनके लिए देखें, फ्रांसिस डब्लू प्रिचेट,: कोर्सिस टेकन इन कोलंबिया। यह आनलाईन यहां उपलब्ध हैः http://www।columbia।edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/timeline/graphics/courses।html मैंने विभिन्न पाठ्यक्रमों के शिक्षकों के संबंध में जानकारियां निम्न दस्तावेजों से ली हैं: कोलंबिया यूनिवर्सिटी बुलेटिन आफ इन्फारमेशनः डिवीजन आफ फिलासाफी, साईकोलाजी एंड एंथ्रोपोलाजी एनाउंसमेंट, 1914-1915 (न्यूयार्कः कोलंबिया यूनिवर्सिटी, 30 मई 1914); कोलंबिया यूनिवर्सिटी बुलेटिन आफ इन्फारमेशनः डिवीजन आफ फिलासाफी, साईकोलाजी एंड एंथ्रोपोलाजी एनाउंसमेंट, 1915-1916 (न्यूयार्कः कोलंबिया यूनिवर्सिटी, 27 फरवरी, मई 1915)।

इन नोट्स और संबंधित पाठ्यक्रमों के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखें, स्काट आर।स्ट्राउड, ‘प्रेगमेंटिज्म, पर्सयूएशन एण्ड फोर्स इन भीमराव आंबेडकर्स रीकन्सट्रेक्शन आफ बुद्धिज्म‘‘, जर्नल आफ रिलीजन, 97 (2) 204-243

[6]  होमर एच।डब्स के मूल टंकित नोट साउथ इलीनाय विश्वविद्यालय, कार्बनडेल के सेंटर फार डेवी स्टडीज में उपलब्ध हैं। राबर्ट ली।हेल द्वारा लिए गए मूल हस्तलिखित नोट कोलंबिया विश्वविद्यालय के बटलर लाईबे्रेरी रेयर बुक एंड मेन्यूस्क्रिप्ट कलेक्शन में उपलब्ध हैं।

[7] आंबेडकर के इस पुस्तक के अध्ययन के संबंध में अधिक जानकारी के लिए देखें स्काॅट आर।स्ट्राउड, ‘वाट डिड भीमराव आंबेडकर लर्न फ्राम जान डेवीज डेमोक्रेसी एण्ड एजूकेशन‘‘? द प्लूरललिस्ट, 12 (2), 2017, 78-103।

[8] भीमराव आर।आंबेडकर, “एविडेंस बिफोर थे साउथबरो कमेटी”, “राइटिंगस एंड स्पीचेस, खंड १ (महाराष्ट्र शासन, 2014), 248-49।डेवी के लेखन के जिस हिस्से पर उनके आधारित हैं, उसके लिए देखिये, जॉन डेवी, “डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन”, “द मिडिल वर्क्स ऑफ़ जॉन डेवी” खंड 9, संपादक जो एन बोयाड्सटन, (सदर्न इलिनाय, यूपी, 1985)।

[9] जॉन डेवी, “डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन” 93

[10] भीमराव आर।आंबेडकर, ऐनीहीलेशन ऑफ़ कास्ट”, “राइटिंगस एंड स्पीचेस, खंड 1 (महाराष्ट्र शासन, 2014) 57

[11] केलूसकर की इस भेंट के सम्बन्ध में मेरी अटकलों के लिए देखें, स्कॉट आर।स्ट्राउड, “द इन्फ्लुएंस ऑफ़ जॉन डेवी एंड जेम्स टफ्ट्स एथिक्स ऑन आंबेडकरस क्वेस्ट फॉर सोशल जस्टिस”, रेलेवेंस ऑफ़ डाक्टर आंबेडकर: टुडे एंड टुमारो, प्रदीप अग्लावे (सम्पादित) (नागपुर: नागपुर यूनिवर्सिटी प्रेस, 2017)

[12] भीमराव आर।आंबेडकर, “द बुद्धा एंड हिज धम्म”, “राइटिंगस एंड स्पीचेस”, खंड 11, (बम्बई: महाराष्ट्र शासन, 1992), 345

[13] जॉन डेवी एवं जेम्स एच।टफ्ट्स “एथिक्स”, जो एन बोयाड्सटन सम्पादित “द मिडिल वर्क्स ऑफ़ जॉन डेवी” खंड 5 (कार्बनडेल, सदर्न इलिनाय यूनिवर्सिटी प्रेस, 1908/1985), 301

[14] उपरोक्त, 346।

[15] भीमराव आर।आंबेडकर, “द बुद्धा एंड हिज धम्म”, 71

[16] भीमराव आंबेडकर, “द माइनॉरिटी मस्ट ऑलवेज बी वन ओवर, इट मस्ट बी नेवर बी डिक्टेतिड टू”, “राइटिंगस एंड स्पीचेस” खंड 17, भाग 3 (बम्बई: महाराष्ट्र शासन, 2003), 278

[17] देखें क्रिस्टोफर एस।क्वीन, “आंबेडकरस धम्म: सोर्स एंड मेथड इन द कंस्ट्रक्शन ऑफ़ एनगेजड बुद्धिज़्म” एवं  अड़ेल फिस्के व क्रिस्टोफर एम्म्रीच, “द यूज़ ऑफ़ बुद्धिस्ट स्क्रिप्चरस इन बी।आर।आंबेडकरस द बुद्धा एंड हिज धम्म”, सुरेन्द्र जोंधाले व जोहन्नेस बेल्त्ज़ (सम्पादित) रीकंसट्रक्टिंग द वर्ल्ड: बी।आर।आंबेडकर एंड बुद्धिम्स इन इंडिया (नयी दिल्ली: ऑक्सफ़ोर्ड,2004), धनञ्जय कीर, डॉ आंबेडकर: लाइफ एंड मिशन (बम्बई: पापुलर प्रकाशन, 1990), क्रिस्टोफर जेफरेलोट, डॉ आंबेडकर एंड अनटचेबिलिटी: फाइटिंग द इंडियन कास्ट सिस्टम” (न्यूयार्क: कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस, 2005)।

[18] आंबेडकर के वैचारिक विकास के अन्य पहलुओं की पड़ताल के लिए देखें, स्कॉट आर।स्ट्राउड, “प्रेग्मेटीस्म एंड द परसूट ऑफ़ सोशल जस्टिस इन इंडिया: भीमराव आंबेडकर एंड द रिटोरिक ऑफ़ रिलीजियस रीओरिएंटेशन”, रिटोरिक सोसाइटी क्वार्टरली, 46 (1),2016, 5-27; स्कॉट आर।स्ट्राउड, प्रेगमेटिस्म, पर्सुएशन एंड फ़ोर्स इन भीमराव आंबेडकरस रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ बुद्धिज़्म”, जर्नल ऑफ़ रिलिजन, 97 (2), 2017, 214-243; अरुण पी मुख़र्जी, “बी आर आंबेडकर, जॉन डेवी एंड द मीनिंग ऑफ़ डेमोक्रेसी”, न्यू लिटरेरी हिस्ट्री 40 (2), 2009, 347-348; केया मित्रा, “आंबेडकर एंड द कोंसटीट्यूशन ऑफ़ इंडिया: ए डेवीयन एक्सपेरिमेंट” कंटेम्पररी प्रेगमेटिस्म 9 (2), 2012, 301-320


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