बतौर आईएएस व सामाजिक कार्यकर्ता मैंने बाबासाहेब से क्या सीखा

जैसे-जैसे वर्ष बीतते जा रहे हैं, बाबासाहेब भीमराव रामजी आंबेडकर का मुझ पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है और वे मेरे समक्ष नई-नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं। आप भारत को तब तक नहीं बदल सकते, जब तक आप उसे न समझें; आप भारत को तब तक नहीं समझ सकते, जब तक आप जाति को न समझें और आप जाति को तब तक नहीं समझ सकते, जब तक आप आंबेडकर को न समझें। यहां, हर्ष मंदर आंबेडकर के चिरस्मरणीय योगदान की व्याख्या कर रहे हैं।

बाबासाहेब से सीख

भारत के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील तबके का यह दृढ़ मत है कि भारत अपने लंबे इतिहास के अधिकांश हिस्से में एक विविधवर्णी, बहुवादी और सहिष्णु सभ्यता रहा है – यह बुद्ध, कबीर और नानक का देश हैः अशोक, अकबर और गांधी की भूमि है। यहां की संस्कृति ने दुनिया के सभी बड़े धर्मों को जगह दी और फलने-फूलने का अवसर भी दिया। यह वह देश है जिसमें दुनिया भर की प्रताड़ित आस्थाओं ने शरण पाई, जहां विधर्मिक और नास्तिक परंपराओं के लिए भी उतनी ही जगह थी, जितनी कि आध्यात्मिक और रहस्यवादी आस्थाओं के लिए। यह वह देश है, जहां के लोग दूसरों की आस्थाओं को भी सम्मान देते आए हैं। मौलाना आज़ाद के शब्दों में, ‘‘यह भारत की ऐतिहासिक नियति थी कि कई मानव नस्लें, संस्कृतियां और धार्मिक आस्थाएं उसमें प्रवाहित हों और कई कारवां यहां डेरा डालें…और जो कारवां यहां सबसे बाद में पहुंचे, उनमें से एक था इस्लाम के अनुयायियों का कारवां…’’ ।[1]

यही कारण है कि देश की संस्कृति की एकसार, संकीर्ण और असहिष्णु व्याख्याएं – जिन्हें रोमिला थापर हिन्दू धर्म का दक्षिणपंथी यहूदीकरण बताती हैं – का उभार, बेचैनी और चिंता का सबब है।[2] परंतु हमारी व्याख्याएं अकसर इस तथ्य पर पर्याप्त ज़ोर नहीं देतीं कि नए और पुराने, दोनों भारत की इमारत, भयावह असमानता और जातिगत दमन की नींव पर खड़ी है। कभी-कभी मुझसे पूछा जाता है कि मेरी राजनीतिक आस्थाएं क्या हैं। मैं खंखारता हूं और थोड़ा-सा शर्मिंदा महसूस करता हूं कि मैं इस प्रश्न का कोई सटीक और संक्षिप्त उत्तर नहीं दे सकता। कभी-कभी मेरा उत्तर यह होता है कि मैं धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक, मानवतावादी और समाजवादी हूं। परंतु यदि मुझे इनमें से कोई एक संज्ञा चुननी हो तो मैं मानवतावादी को चुनूंगा। यहां मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि मेरी राजनीतिक विचारधारा पर कई तरह के प्रभाव हैं। कॉलेज के दिनों में मैं कार्ल मार्क्स से बहुत प्रभावित था। मैं उन्हें खूब पढ़ता और गुनता था। मैंने कार्ल मार्क्स से वर्गीय विश्लेषण करना सीखा; उनके कारण मैं समतावादी समाज और एक ऐसे राज्य का हिमायती  बना, जो अपने नागरिकों में संपत्ति का पुनर्वितरण करे। मार्क्स ने मुझमें श्रमिकों और दमितों के अधिकारों के प्रति चेतना जागृत की। जब मैं सरकारी तंत्र का हिस्सा था, तब मुझे व्यंग्य और स्नेह दोनों से कॉमरेड कलेक्टर कहा जाता था। परंतु मैं नहीं जानता कि मार्क्सवादी मुझे अपने खेमे में रखना चाहेंगे या नहीं, क्योंकि मैं सामाजिक और आर्थिक समानता की बात तो करता ही हूं, मैं समतावादी करूणा की बात भी करता हूं।

मोहनदास गांधी से भी मैंने बहुत कुछ सीखा, जिसमें से सबसे महत्वपूर्ण है साधन और साध्य दोनों की पवित्रता; यह कि चाहे हमारा साध्य कितना ही उदात्त क्यों न हो, उसे पाने के लिए हम हिंसा, अन्याय और झूठ का इस्तेमाल नहीं कर सकते। उनसे मैंने यह भी सीखा कि धर्मनिरपेक्षता का एक अर्थ है सभी धर्मों का सम्मान। मैंने उनसे आर्थिक विकास की एक वैकल्पिक परिकल्पना भी सीखी, जिसमें ‘लोगों का महत्व हो’। मैंने उनसे अहिंसा का पाठ पढ़ा और मैंने उनसे यह भी सीखा कि चाहे हम लगातार हारते रहें, फिर भी हमें जीवन भर संघर्ष करते रहना चाहिए। बापू ने मुझे यह भी सिखाया कि व्यक्ति को अपने आदर्शों को अपने आचरण में उतारना चाहिए।[3]

जैसे-जैसे वर्ष बीतते जा रहे हैं, बाबासाहेब भीमराव रामजी आंबेडकर का मुझ पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है और वे मेरे समक्ष नई-नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं। आप भारत को तब तक नहीं बदल सकते, जब तक आप उसे न समझें; आप भारत को तब तक नहीं समझ सकते, जब तक आप जाति को न समझें और आप जाति को तब तक नहीं समझ सकते जब तक आप आंबेडकर को न समझें। कुछ लोग, जो बाबासाहेब की महानता के गीत गाते हैं और जिनमें मायावती से लेकर अरूंधति राय तक जैसे लोग सम्मिलित हैं, वे यह मानकर चलते हैं कि आंबेडकर का गांधी से मुकाबला किया जाना आवश्यक है और यह भी कि आंबेडकर को आधुनिक भारतीय इतिहास में उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम उस हर चीज़ को गलत सिद्ध करें, जो गांधी ने कही थी। ऐसा लगता है कि मानो वे यह मानते हैं कि आंबेडकर तब तक महान नहीं बन सकते जब तक कि उनके जीवनपर्यन्त राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी गांधी को उनके उच्च स्थान से नीचे न धकेल दिया जाए। मैं इससे सहमत नहीं हूं। मुझे ऐसा लगता है कि इतिहास इतना जटिल और बहुआयामी होता है कि उसे हम नायकों और खलनायकों को खांचों में बांटने या उनके श्रेणीक्रम को पुनर्निधारित करने तक सीमित नहीं कर सकते। इतिहास का इतना विशाल हृदय तो है ही कि उसमें मोहनदास और बाबासाहेब, दोनों की निर्णायक भूमिकाओं के लिए जगह बन सके। ये दोनों एक दूसरे से एकदम अलग थे और दोनों ने औपनिवेशिक शासन के विरूद्ध संघर्ष और स्वतंत्रता के तुरंत बाद के वर्षों में नए भारत के निर्माण में अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाईं।

यह कहते हुए भी मैं बाबासाहेब की गांधी की कई मुद्दों पर आलोचनाओं से सहमत हूं। आंबेडकर यदि मोहनदास के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को खारिज करते हैं तो यह बिलकुल उचित है। यह सिद्धांत सम्पत्ति का पुनर्वितरण करने के उद्देश्य से बनाई जाने वाली नीतियों और कानूनों की आवश्यकता से इंकार करता है और यह उस अन्याय और दमन को नज़रअंदाज़ करता है, जो संपत्ति के संचय के मूल में होती हैं। वह वंचितों को धनिकों की ‘सदाशयता’ और उनकी दया के सहारे छोड़ देता है।

उसी तरह, बाबासाहेब गांधी के ‘ग्राम गणराज्य’ के महिमामंडन से ठीक ही असहमत थे। बाबासाहेब का मानना था कि गांव, दरअसल, जातिगत अन्याय, असमानता और कट्टरता के ‘बदबू मारते पानी के गढ्ढे हैं’। बाबासाहेब की इस सोच से मैं सहमत हूं। बाबासाहेब, गांधी के परंपरा से लगाव से भी असहमत थे और वह इसलिए कि भारतीय परंपरा हमेशा से महिलाओं के अधिकारों और उनकी गरिमा और वंचित समुदायों के लोगों के हितों के खिलाफ रही है। बाबासाहेब, हिन्दू समाज या समुदाय को एक ‘मिथक’ बताते हैं।[4]

बाबासाहेब का मानना था कि हिन्दू समाज में उसे एक करने वाले किसी भी सिद्धांत का अभाव है और वह विभिन्न समुदायों का एक अव्यवस्थित समूह मात्र है।[5] वे यह कहते हैं कि हिन्दू समाज के लोगों की मूल वफादारी केवल अपनी उपजाति के प्रति होती है और शुद्धता और परंपरा की रक्षा के लिए उपजाति के बाहर रोटी-बेटी के सम्बन्ध बनाने पर कड़े प्रतिबन्ध होते हैं। वे लिखते हैं कि विभिन्न उपजातियों और जातियों के बीच एकता, पूरे समुदाय के किसी दूसरे धार्मिक समुदाय के साथ विवाद या संघर्ष की स्थिति में ही स्थापित होती है। जातियों की श्रेणीबद्धता, जिसमें ऊंची जातियों को अधिक अधिकार दिए गए हैं, के कारण जाति व्यवस्था के खिलाफ संयुक्त मोर्चा नहीं बन पाता क्योंकि प्रत्येक जाति इस बात पर गर्व और संतोष महसूस करती है कि उसका स्थान कुछ अन्य जातियों से ऊंचा है।[6]

मोहनदास की सबसे बड़ी असफलता थी, उनके द्वारा जाति का बचाव। वे अछूत प्रथा के खिलाफ थे और जाति-आधारित सफाईकर्मियों, जिन्हें अपने हाथों से मैला साफ़ करना पड़ता था, की गरिमा के प्रभावशाली पैरोकार भी थे। वे अपना शौचालय स्वयं साफ़ करते थे, जो उनके युग में क्रान्तिकारी और मानवतावादी कार्य था। परन्तु उनकी एक बड़ी भूल थी उनकी यह मान्यता कि अछूत प्रथा, जाति प्रथा के सही राह से भटक जाने का उदाहरण मात्र है और यह भी कि जाति प्रथा, श्रम विभाजन की एक उत्तम सामाजिक व्यवस्था है। उनका यह विचार, करोड़ों दमित भारतीयों के साथ घोर अन्याय था और इसके कारण भारत के निर्धनतम वर्ग ने उनकी पूरी विरासत को ही ख़ारिज कर दिया।

आखिर मोहनदास कैसे कर सकते थे जाति प्रथा का बचाव

मेरे लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि मोहनदास आखिर जाति प्रथा का बचाव कैसे कर सकते थे? अगर वे अछूत प्रथा को जाति प्रथा का अंग नहीं भी मानते थे, तब भी वे एक ऐसी व्यवस्था को कैसे सही ठहरा सकते थे जो जन्म-आधारित सामाजिक पदक्रम पर आधारित थी और जो किसी बच्चे के पैदा होते ही यह निर्धारित कर देती थी कि उसे जीवन भर क्या काम करना है। बाबासाहेब बिलकुल ठीक कहते थे कि भयावह अछूत प्रथा, जाति व्यवस्था के पथभ्रष्ट होने का परिणाम नहीं बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा है और यह भी कि जाति प्रथा, श्रम विभाजन न होकर श्रमिकों का विभाजन है, जिसमें लोग अपने माता-पिता के पारंपरिक कार्य – जिसे समाज निचले स्तर का मानता है – को करने पर मजबूर होते हैं।[7] जाति प्रथा में गतिशीलता के लिए कोई स्थान नहीं है और जाति एक तरह का बंद, अंतर्विवाही वर्ग है, जो व्यक्ति को ऐसा काम करने के लिए मजबूर करती है जो उसने न तो चुना है और ना ही उसे पसंद है और इस प्रकार, व्यक्तिगत विकास को बाधित करती है।[8] बाबासाहेब का मानना था कि औद्योगीकरण और पूंजीवाद से ऐसी स्थितियां बनेंगी जिनके चलते दलित, जाति के दंश से मुक्ति पा सकेगें। इसके विपरीत, मोहनदास आधुनिकता और औद्योगीकरण के विरुद्ध थे।

बाबासाहेब की यह स्पष्ट मान्यता थी कि न केवल अछूत प्रथा, जाति व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है वरन यह भी कि जाति व्यवस्था को हिन्दू धर्म से अलग कर नहीं देखा जा सकता। मोहनदास, जीवनपर्यंत एक धर्मनिष्ठ हिन्दू बने रहे और ऐसा कहा जाता है कि अपने अंतिम क्षणों में राम का नाम उनके होठों पर था। परन्तु बाबासाहेब ने सन 1936 में यह घोषणा की कि मैं हिन्दू जन्मा था और मैंने अछूत प्रथा को भोगा है परंतु मैं हिन्दू के रूप में नहीं मरूंगा’’। उन्होंने हिन्दू समाज को वर्णित करने के लिए जिस रूपक का इस्तेमाल किया, उसे अरूंधति राय ‘‘दिल को दहला देने वाला’’ बताती हैं। उन्होंने लिखा कि हिन्दू समाज एक बहुमंज़िला अटालिका है जिसमें न तो कोई दरवाजा है और ना ही सीढ़ियां। हर एक को उसी मंज़िल पर मरना होता है, जिसमें वह जन्म लेता है।[9] हिन्दू धर्म के विरूद्ध उनका यह महासंघर्ष 1956 में, उनकी मृत्यु से कुछ महीने पहले, करीब दस लाख दलितों के साथ उनके बौद्ध धर्म ग्रहण करने तक चलता रहा।

बाबासाहेब का जन्म महू नाम के केन्टोनमेंट में एक निर्धन, नीची जाति के महार परिवार में हुआ था। वे शिक्षा इसलिए प्राप्त कर सके क्योंकि उनके पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। उन्होंने बड़ौदा राज्य के वज़ीफे पर कोलंबिया विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई की। भारत लौटकर उन्होंने बड़ौदा राज्य के प्रशासन में नौकरी करनी शुरू की परंतु जल्दी ही उनका उससे मोहभंग हो गया क्योंकि उन्हें जातिगत अपमान और तिरस्कार झेलने पड़े। इसके बाद वे बंबई के सिडेनहैम कॉलेज में प्रोफेसर बन गए। लगभग उसी समय मोहनदास भारत लौटे और उन्होंने देश के स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व संभाल लिया।[10] सन 1924 में बाबासाहेब ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया। इसका लक्ष्य सबसे वंचित जातियों में शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक प्रगति को प्रोत्साहित करने के अलावा, इन वर्गों की शिकायतों को स्वर देने के लिए एक मंच प्रदान करना भी था।[11]

सन 1927 में उन्होंने एक आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसे महाड़ सत्याग्रह कहा जाता है। यह अछूत जातियों के सार्वजनिक जल स्त्रोतों से पानी लेने और हिन्दू आराधना स्थलों में प्रवेश करने के अधिकार पर दावा था। महाड़ में एक हज़ार से अधिक लोग शहर के बीच में स्थित चावदार तालाब पर पहुंचे और उसका पानी पिया। इस आशंका से कि बाबासाहेब और उनके अनुयायी एक हिन्दू मंदिर में प्रवेश करने की योजना बना रहे हैं, शहर में दंगा शुरू हो गया। ऊँची जातियों के हिन्दुओं ने बाद में तालाब का ‘शुद्धिकरण’ किया और वहां प्रार्थना का आयोजन किया। उनका मानना था कि अछूतों ने तालाब का पानी पीकर उसे प्रदूषित कर दिया है। उन्होंने बाबासाहेब के खिलाफ एक मुकदमा भी दायर किया, जिसमें यह दावा किया गया था कि वह तालाब निजी संपत्ति है। उसी वर्ष 25 दिसंबर को बाबासाहेब ने अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिए सार्वजनिक रूप से ‘‘मनुस्मृति’’ को जलाया। इसके कई सालों बाद, दिसंबर 1937 में बंबई उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अछूतों को उस तालाब के पानी का इस्तेमाल करने का हक है।

आंखों देखा जातिवाद

इसके कई दशकों बाद, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में मेरी पदस्थापना के दौरान और राज्य के अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के मुखिया बतौर और तत्पश्चात अछूत प्रथा पर मेरे शोध के दौरान मुझे यह पता चला कि भारत के बड़े हिस्से में अधिकांश गांवों में दलितों की आज भी सार्वजनिक कुंओं और मंदिरों तक पहुंच नहीं है। सन 1991 में मध्यप्रदेश के सागर जिले में कुछ दलित युवकों ने मांग की कि चूंकि गांव के ऊँची जाति के मोहल्लों में जो हैंडपंप हैं, उनसे दलितों को पानी नहीं लेने दिया जाता इसलिए उनके मोहल्ले में भी कम से कम एक हैंडपंप खोदा जाना चाहिए। परंतु ऊँची जाति के निवासी उनके इस ‘दुस्साहस’ से इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने उनका बहिष्कार शुरू कर दिया और उनके खिलाफ हिंसा भी की। अंततः दलितों को झुकना पड़ा। तत्कालीन मध्यप्रदेश के बिलासपुर शहर में सन 1996 में एक दलित व्यक्ति ने हनुमान की मूर्ति को हाथ लगा दिया। वह भगवान को उसकी पत्नी की जान बचाने के लिए धन्यवाद देना चाहता था। उस पर क्रूरतापूर्वक हमला किया गया और उसे गांव से निकाल दिया गया। मैंने इन दोनों घटनाओं का वर्णन अपनी पुस्तक ‘अनहर्ड वाईसेस’ में किया और श्याम बेनेगल ने इस पर ‘समर’ नाम की फिल्म भी बनाई। परंतु ऐसी घटनाएं अनोखी नहीं हैं। इस तरह की चीज़ें आज भी ग्रामीण भारत में होती रहती हैं। सन 1927 के महाड़ सत्याग्रह के दौरान बाबासाहेब के भाषण की कुछ पंक्तियां चिरस्मरणीय हैं, ‘‘ऐसा नहीं है कि चावदार तालाब का पानी पीने से हम अमर हो जाएंगे। उसका पानी पिये बगैर भी हम आज तक जिंदा हैं। हम चावदार तालाब पर उसका पानी पीने के लिए नहीं जा रहे, हम वहां इसलिए जा रहे हैं ताकि हम यह घोषणा कर सकें कि अन्यों की तरह हम भी मनुष्य हैं। सबको यह साफ होना चाहिए कि यह सभा इसलिए की जा रही है ताकि हम समानता के आदर्श की स्थापना कर सकें…’’[12]

मुझे मराठी कवि एलएस रोकाडे़ की जन्म-आधारित अन्याय के विरूद्ध शंखनाद करती ये उग्र पंक्तियां याद हैं :

मां, तुम मुझे बताती थीं,

कि जब मैं पैदा हुआ,

तब तुम्हारी प्रसव पीड़ा बहुत लंबी थी,

तुम्हारी प्रसव पीड़ा क्यों लंबी थी?

मैं, जो तुम्हारे गर्भ में था, सोच रहा था,

क्या मैं पैदा होना चाहता हूं?

क्या मैं इस धरती पर पैदा होना चाहता हूं,

जहां हर राह क्षितिज की ओर जाती है,

पर जो मेरे लिए बंद है,

मां, तुम्हारी इस धरती पर पानी ही पानी है,

नदियां अपने बांध तोड़ रही हैं,

तालाब पानी से लबालब हैं,

और तुम, मानव जाति की एक सदस्य,

खून बहाने के लिए मजबूर हो,

संघर्ष करने के लिए मजबूर हो,

केवल हथेली-भर पानी के लिए…[13]

 

संवैधानिक नैतिकता

मैं बाबासाहेब के प्रति इसलिए भी ऋणी हूं क्योंकि उन्होंने भारतीय संविधान के लेखन का नेतृत्व किया। यह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संविधानों में से एक है। यह सरकारों के पथों को प्रकाशित करता है और न्यायपूर्ण शासन का संदेश देता है। आंबेडकर ने बहुत दृढ़ता से और काफी परेशानियां भोगते हुए इस दस्तावेज को तैयार किया। इस प्रयास में उन्हें निःसंदेह कई राजनीतिक समझौते करने पड़े। हमारा संविधान एक न्यायपूर्ण और समानता पर आधारित राज्य और समाज की गारंटी देता है और नीति निदेशक तत्वों में इसके निर्माण का खाका खींचता है।

बाबासाहेब को इस बात का पूरा एहसास था कि भारतीय संविधान में निहित राजनीतिक समानता अपने आप में सामाजिक और आर्थिक समानता की गारंटी नहीं है और इसके लिए एक बहुत लंबा संघर्ष करना होगा। ऑल इंडिया रेडियो से 3 अक्टूबर, 1954 को प्रसारित उनके भाषण, जिसका शीर्षक ‘माई पर्सनल फिलॉस्पी’ था, की ये पंक्तियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी की तब थीं। ‘‘आज भारतीय दो अलग-अलग विचारधाराओं से शासित हैं। उनका राजनीतिक आदर्श, जो भारतीय संविधान की उद्देश्यिका में वर्णित है, उन्हें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी देता है। उनका सामाजिक आदर्श, जो कि उनके धर्म में निहित है, उन्हें इनसे वंचित करता है’’।

उन्होंने बार-बार हमें याद दिलाया कि संविधान एक उच्चतर नैतिकता की स्थापना करता है, जो हम सबकी आस्थाओं, पूर्वाग्रहों और विचारों से ऊँची है और हम सब इस उच्चतर नैतिकता से बंधे हुए हैं, तब भी जब उसका हमारे व्यक्तिगत विचारों से टकराव हो। कई साल बाद, अपने ऐतिहासिक निर्णय, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (जो समलैंगिकता को अपराध घोषित करती है) को असंवैधानिक घोषित किया गया, में न्यायमूर्ति एपी शाह और मुरलीधर ने लोक और संवैधानिक नैतिकता के बीच भेद किया। उन्होंने आंबेडकर की सोच के अनुरूप यह कहा कि जब इन दोनों के बीच टकराव हो तब राज्य को केवल और केवल संवैधानिक नैतिकता को लागू करना चाहिए।[14]

बाबासाहेब जितना ज़ोर स्वतंत्रता और समानता पर देते थे, उतना ही ज़ोर वे बंधुत्व पर भी देते थे। उनका कहना था कि बंधुत्व और कुछ नहीं केवल अन्य लोगों के प्रति सहानुभूति और प्रेम का भाव रखना है और यह किसी भी न्यायपूर्ण समाज का आवश्यक तत्व है।[15] बंधुत्व का अर्थ है ‘‘किसी व्यक्ति द्वारा स्वाभावगत रूप से अन्यों को श्रद्धा और प्रेम से देखना और अपने साथियों के प्रति एकता के भाव का अनुभव करना।’’ उन्होंने यह भी घोषणा की कि ‘‘मैं और मेरे पड़ोसी आपस में भाई हैं…’’[16] । निश्चित रूप से उन्हें इसमें यह जोड़ना था, ‘‘…और बहनें भी’’।

बंधुत्व पर उनका ज़ोर इस तथ्य की स्वीकारोक्ति था कि समकालीन भारत के धर्मनिरपेक्षता, बहुवाद और सामाजिक समानता के उदारवादी मूल्यों की नींव सामाजिक एकता की अवधारणा और उसके आचरण पर रखी है। उनके ये शब्द अमर हैं कि ‘‘सामूहिक स्वतंत्रता ही सच्ची स्वतंत्रता है’’[17]।  भारतीय संविधान की उद्देश्यिका कहती है कि व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता के लिए बंधुत्व आवश्यक है। यह महत्वपूर्ण है कि संविधान और उसके मुख्य निर्माता आंबेडकर का राष्ट्रवाद, राष्ट्र के सभी लोगों – चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, लिंग या वर्ग के हों और चाहे वे कोई भी भाषा बोलते हों – के बीच भाईचारे और बहनापे पर आधारित है। यह आरएसएस के नेतृत्व वाले राजनीतिक गिरोह के एकरूपता पर केन्द्रित, आक्रामक राष्ट्रवाद से मीलों दूर है। यह राष्ट्रवाद, दरअसल, आंबेडकर के बंधुत्व के उस विचार का विलोम है, जिसके लिए हम बाबासाहेब के चिरऋणी रहेंगे।

 

[1] आशुतोष वार्ष्णेय, ‘एथनिक कंफ्लिक्ट एंड सिविक लाईफ : हिन्दूज़ एंड मुस्लिम्स इन इंडिया’, (न्यू हैवन : येल यूनिवर्सिटी प्रेस, 2002), पृष्ठ 67

[2] रोमिला थापर, ‘ए हिस्टोरिकल पर्सपेक्टिव ऑन द स्टोरी ऑफ राम’, सर्वपल्ली गोपाल द्वारा संपादित ‘ऐनाटोमी ऑफ ए कंफ्रन्टेशन : अयोध्या एंड द राईज़ ऑफ कम्युनलिज़्म इन इंडिया’ (न्यू इंडिया : पालग्रेव मेकमिलन, 1993) पृष्ठ 141-163

[3] यह शब्दावली ईएफ शूमाकर के लेखों के 1973 में प्रकाशित संकलन, ‘स्माल इज़ ब्यूटिफुल’ से लिया गया है। इन लेखों में वे आवश्यकता की बजाए मुनाफे से चालित अर्थव्यवस्था के विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन की तकनीकी का हस्तशिल्प या हस्तकौशल पर आधारित पेशों का स्थान ले लेने से जनित कार्य के अमानवीयकरण की चर्चा करते हैं।

[4] भीमराव आंबेडकर, ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट : द एनोटेटिड क्रीटिकल एडिशन’ (नई दिल्ली : नवायन, 2017 पृष्ठ 241

[5] भीमराव आंबेडकर, एनीहिलेशन ऑफ कास्ट, पृष्ठ 243

[6]  भीमराव आंबेडकर, एनीहिलेशन ऑफ कास्ट, पृष्ठ 243

[7] भीमराव आंबेडकर, एनीहिलेशन ऑफ कास्ट, पृष्ठ 223

[8] भीमराव आंबेडकर, ‘कास्ट्स इन इंडिया : देयर जेनेसिस, मैकेनिज्म एंड डेवलपमेंट’ कोलंबिया विश्वविद्यालय में 9 मई, 1916 को प्रस्तुत शोध प्रबंध, 13 जनवरी, 2014 को निम्न लिंक से लिया गया : https://ia600508.us.archive.org/22/items/castesinindia035140mbp/castesinindia035140mbp.pdf

[9] अरूंधति रॉय, ‘‘द डॉक्टर एंड द सेंट’’, भीमराव आंबेडकर, एनिहिलेशन ऑफ कास्ट, पृष्ठ 104

[10] गेल ओमवेट, ‘‘हिन्दूज्म एज़ काउंटर-रेविल्यूशन : बीआर आंबेडकर इन अंडरस्टेण्डिंग कास्ट’’ (न्यू दिल्ली : ओरिएन्ट ब्लैक स्वान, 2011) पृष्ठ 47-48

[11] नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राईट्स, https://www.ncdhr.org.in/ncdhr/general-info-misc-pages/dr-ambedkar

[12] भीमराव आंबेडकर, ‘‘डॉ. अंबेडकर्स स्पीच इन महाड़’’ अर्जुन दांगले सम्पादित ‘‘पाईज़ंड ब्रेड : ट्रांसलेशन्स फ्राम माडर्न मराठी दलित लिटरेचर’’ (नोएडा : ओरिएंट ब्लैक स्वान, 2009), पृष्ठ 259

[13] एलएस रोकाडे, ‘‘टू बी ऑर नॉट टू बी बॉर्न’’, अर्जुन दांगले सम्पादित ‘‘पाईज़ंड ब्रेड : ट्रांसलेशन्स फ्राम माडर्न मराठी दलित लिटरेचर’’

[14] निर्णय के पूर्ण पाठ के लिए देखें : http://www.nazinda.org./judgement _377.pdf

[15] बादल सरकार, ‘‘डॉ. बीआर अंबेडकर्स थ्योरी ऑफ स्टेट सोशलिज्म’’ इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल ऑफ सोशल सांईसेज़, खंड-2, अंक 8, 38-41, अगस्त 2013, पृष्ठ 39

[16] बादल सरकार, ‘‘डॉ. बीआर अंबेडकर्स थ्योरी ऑफ स्टेट सोशलिज्म’’

[17]  बादल सरकार, ‘‘डॉ. बीआर अंबेडकर्स थ्योरी ऑफ स्टेट सोशलिज्म’’

About The Author

Reply