आंबेडकर का धर्म पर पुनर्विचार

आंबेडकर धर्म के कटु और निर्भीक आलोचक तो थे ही, इसके साथ-साथ उन्हें धर्म की गहरी समझ भी थी। उन्होंने जब हिन्दू धर्म को असमानता का धर्म बताया क्योंकि वह जाति को पवित्र दर्जा देता है; या, जब वे अपने समर्थको के साथ बौद्ध बने, तब, दरअसल, जो वे कह रहे थे वह यह था कि धर्म की आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए। वे धर्म को खारिज नहीं कर रहे थे; वे एक ज़्यादा न्यायपूर्ण और सच्चे धर्म की ओर बढ़ रहे थे। प्रथमा बैनर्जी यहां धर्म के बारे में आंबेडकर की सोच पर प्रकाश डाल रही हैं

आज हमारे लिए आंबेडकर के धर्म संबंधी विचारों पर फिर से नज़र डालना ज़रूरी हो गया है। भारत के परिदृश्य पर तेजी से छा रहे हिन्दुत्व से मुकाबला करने में आंबेडकर हमारी मदद कर सकते हैं। इस हिन्दुत्व के निशाने पर हैं दलित, मुसलमान और वे सभी, जो उससे सहमत नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, आंबेडकर हमें धर्म की समालोचना करने और एक परिघटना के रूप में धर्म को समझने में सहायक हो सकते हैं। आंबेडकर के धर्म संबंधी विचारों का पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि एक लंबे अर्से से भारत में धर्म पर विचार, केवल ‘हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न’ तक सिमट कर रह गया है और दूसरा, क्योंकि ‘प्रगतिशीलों’ ने हमेशा धर्म को नज़रअंदाज़ किया – उदारवादी यह कहते रहे कि धर्म, व्यक्ति का निजी मामला है और होना चाहिए और इसलिए उस पर सार्वजनिक विमर्श का कोई अर्थ नहीं है। माक्र्सवादियों का यह तर्क रहा है कि धर्म एक फरेब है, जो लोगों को उनके असली आर्थिक हितों को समझने से रोकता है। परंतु क्या हम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं कि धर्म आज भी हमारी राजनीति और सामान्य लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

धर्म के प्रश्न पर आंबेडकर का पुनर्विचार एक बहुत विस्तृत विषय है। यहां हम केवल उसके कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा करेंग। हम पाठकों को आमंत्रित करते हैं कि वे इस विषय के अन्य पहलुओं पर विचार प्रस्तुत करें। आंबेडकर, धर्म के कटु और निर्भीक आलोचक तो थे ही, इसके साथ-साथ उन्हें धर्म की गहरी समझ भी थी। यह अनूठा था, क्योंकि उनके समय में सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोग या तो धर्म को बांटने वाला और अतार्किक कहकर उसकी आलोचना करते थे या गांधी की तरह, यह मानते थे कि सभी धर्म सच्चे और हमारे सम्मान के पात्र हैं। आधुनिक भारत में सर्वधर्मसमभाव की परिकल्पना – अर्थात राज्य द्वारा सभी धर्मों को एक दृष्टि से देखना – धर्मनिरपेक्षता की कसौटी बन गई है। यह कसौटी इसी विचार पर आधारित है कि सभी धर्म मूलतः अच्छे हैं। आंबेडकर जहां यह मानते थे कि धर्म, जीवन के लिए अपरिहार्य है और सार्वजनिक जीवन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, वहीं वे इस बात से सहमत नहीं थे कि सभी धर्म अच्छे हैं। उन्होंने जब हिन्दू धर्म को असमानता का धर्म बताया क्योंकि वह जाति को पवित्र दर्जा देता है; या जब वे अपने समर्थको के साथ बौद्ध बने, तब, दरअसल, जो वे कह रहे थे, वह यह था कि धर्म की आलोचना की जा सकती है, और की जानी चाहिए। वे धर्म को खारिज नहीं कर रहे थे; वे एक ज़्यादा न्यायपूर्ण और सच्चे धर्म की ओर बढ़ रहे थे। और यह सब उन्होंने लाहौर के जातपात तोड़क मंडल जैसे अपनी अनुयायियों को अपने से दूर करने का खतरा मोल लेकर भी किया। जातपात तोड़क मंडल ने उन्हें ‘एनिहीलेशन आॅफ कास्ट‘ पर उनका भाषण नहीं पढ़ने दिया था।

दूसरे, आंबेडकर ने धर्म को केवल पहचान के रूप में देखने का कड़ा विरोध किया। जैसा कि हम जानते हैं, यूरोप में आधुनिकता का उदय, धर्म के विरूद्ध विवेक और चर्च के विरूद्ध राज्य को खड़ा कर हुआ। परंतु आधुनिकता न तो धर्म का उन्मूलन कर सकी और ना ही उसे केवल व्यक्तिगत आस्था का प्रश्न बना सकी। धर्म, सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता रहा। जर्मन दार्शनिक कार्ल श्मिट के अनुसार, धर्म ने आधुनिक यूरोपीय राज्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हेगेल जैसे दार्शनिक, विश्व के नक्शे को धार्मिक इकाईयों (ईसाई धर्म/यूरोप, हिन्दू धर्म/भारत, कन्फ्यूशीवाद/चीन, इस्लाम/मध्यपूर्व इत्यादि) से बना मानते थे। इस तरह, धर्म, आधुनिकता पर विमर्शों में भी पिछले दरवाजे से प्रवेश कर गया। उसे अब धर्म के रूप में नहीं बल्कि संस्कृति/सभ्यता के रूप में देखा जाने लगा। धर्म और संस्कृति के बीच का यह स्पष्टतः झूठा अंतर्संबंध, औपनिवेशिक काल में पूरे विश्व में स्वीकार्य हो गया क्योंकि औपनिवेशिक देशों ने पूरी दुनिया में लोगों को धार्मिक-सांस्कृतिक समुदायों के रूप में देखना और उन पर शासन करना शुरू कर दिया। नतीजे में भारत जैसे देशों में भी राष्ट्रवाद ने धार्मिक राष्ट्रवाद का स्वरूप ग्रहण कर लिया।

यही कारण है कि आंबेडकर के काल में धर्म की आलोचना करना बहुत कठिन बन गया था। वह इसलिए भी क्योंकि धर्म की आलोचना को राष्ट्रीय संस्कृति की आलोचना के रूप में देखा जाता था। जब आंबेडकर ने हिन्दू धर्म की आलोचना की तो उससे उनके कई समकालीनों को धक्का लगा। इनमें गांधी शामिल थे। इन लोगों की यह मान्यता थी कि धर्म की आलोचना, दरअसल, भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचना है। परंतु आंबेडकर अपनी बात से डिगे नहीं। उन्होंने खुलकर कहा कि ऐसा राष्ट्रवाद, जो देश के नागरिकों के एक बड़े तबके (अर्थात अछूतों) को अलग-थलग रखता है और उन्हें प्रताड़ित करता है, वह राष्ट्रवाद कहलाने लायक नहीं है। रवीन्द्रनाथ टेगौर के अतिरिक्त, आंबेडकर, उन चंद साहसी व्यक्तियों में से थे जिन्होंने उस समय राष्ट्रवाद की समालोचना की, जब भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन अपने चरम पर था। जाहिर है कि ऐसा करना किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व के लिए खतरों से भरा था। ‘‘मेरा कोई देश नहीं है’’, आंबेडकर ने गांधी से कहा (यह हमें माक्र्स के इस प्रसिद्ध कथन की याद दिलाता है कि श्रमिक वर्ग का कोई देश नहीं होता)। जब आंबेडकर ने अछूतों को ‘सामाजिक अल्पसंख्यक’ बताया और दमित वर्गों के लिए मुसलमानों की तरह पृथक मताधिकार की मांग की तब, दरअसल, वे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक शब्दों को पुनर्परिभाषित कर रहे थे। वे उन्हें धार्मिक-सांस्कृतिक नहीं बल्कि विधिक-संवैधानिक वर्ग बता रहे थे। जैसा कि हम जानते हैं, इस नए वर्गीकरण ने स्वतंत्र भारत के प्रजातंत्र के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यही नहीं, आंबेडकर का यह तर्क भी था कि धर्म को केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित कर देना, उसे उसके असली महत्व से विहीन कर देना है। आंबेडकर यह चाहते थे कि वे धर्म को स्वनियुक्त धार्मिकतावादियों के चंगुल से मुक्त करें – उन धार्मिकतावादियों के, जिन्होंने धर्म को केवल सांस्कृतिक आचरणों और प्रतीकों तक सीमित कर दिया था – और धर्म के दार्शनिक और धर्मशास्त्रीय आयामों पर फिर से लौटें। यह आंबेडकर के धर्म पर पुनर्विचार का तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष था, जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। अपनी पुस्तक ‘फिलाॅसफी आॅफ हिन्दुज़्म’ में आंबेडकर लिखते हैं कि धर्म, मानव समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा इसलिए है क्योंकि वह मानव जीवन के आधारभूत प्रश्नों से जुड़ा हुआ है जिनमें जन्म और मृत्यु, भोजन और रोग आदि शामिल हैं। परंतु यह कहने कि धर्म, मानव के अस्तित्व का भाग है, का यह अर्थ नहीं है कि सभी स्थानों और सभी कालों में धर्म मूलतः समान रहा है। सच्चाई इसके ठीक उलट है। आंबेडकर का कहना था कि धर्म का इतिहास, क्रांतियों का इतिहास है और धर्म को समझने के लिए हमें पूरी दुनिया में उसमें आए भारी परिवर्तनों पर ध्यान देना होगा। आंबेडकर का कहना था कि ‘‘क्रांति, दर्शन की जननी है’’। यह दिलचस्प है कि आंबेडकर आधुनिकता के पारंपरिक आख्यान से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि विज्ञान का उदय और धर्म पर उसकी तथाकथित विजय, धर्म के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम नहीं था। आंबेडकर के अनुसार धर्म के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण क्रांति थी ईश्वर का अविष्कार!

यह धर्म के बारे में आंबेडकर की सोच का सबसे दिलचस्प पहलू है। ‘आदिम’ धर्मों के मानवशास्त्रीय अध्ययन से आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि धर्म के पुराने स्वरूपों में न तो ईश्वर की अवधारणा थी और ना ही नैतिकता की। उस काल में धर्म मुख्यतः मृत्यु, बीमारी, जन्म, प्रगति, भोजन व अभावों जैसे दुनियावी मसलों से संबंधित था और उसके ज़रिए प्राकृतिक शक्तियों जैसे सूर्य, वर्षा, वायु, महामारियों इत्यादि को प्रसन्न करने की कोशिश की जाती थी। ये शक्तियां न तो अच्छी थीं और ना ही बुरी, न नैतिक और ना ही अनैतिक। उन्हें तो केवल तुष्ट किया जाना था, उनका दोहन किया जाना था और कभी-कभी उनसे संघर्ष किया जाना था। तत्कालीन समाज में नैतिकता तो थी परंतु वह मनुष्यों के परस्पर संबंधों को निर्धारित करने वाले मानदंडों के स्वरूप में थी। उसका धर्म से कोई लेनादेना नहीं था। दूसरे शब्दों मंे, धर्म केवल ज़िंदगी के बारे में था – उसकी ज़रूरतों के बारे में, उसके समक्ष प्रस्तुत खतरों के बारे में और उसकी समृद्धि के बारे में।

ईश्वर और ‘राजनीतिक समाज’

आदिम युग में नहीं बल्कि प्राचीन काल में ईश्वर का विचार, धर्म का हिस्सा बना और इससे धर्म के इतिहास की पहली क्रांति हुई। ईश्वर की परिकल्पना की उत्पत्ति धर्म से इतर थी। शायद वह बड़े और शक्तिशाली व्यक्तियों – नायकों या राजाओं – के प्रति श्रद्धा भाव से उपजी या फिर इस दुनिया के संचालक/निर्माता के बारे में शुद्ध दार्शनिक अटकलबाजी से। ईश्वर के अविष्कार के बाद दूसरी बड़ी क्रांति हुई और वह थी धर्म का नैतिकता के साथ जुड़ाव। पूर्वकाल में ईश्वर और मनुष्यों के बीच के संबंध पारिवारिक हुआ करते थे। देवताओं को अक्सर माता-पिता कहा जाता था। जिसे आंबेडकर ‘राजनीतिक समाज’ कहते हैं, वह सांझा पुरखे-ईश्वर के वंशजों और उसके आराधकों से मिलकर बनता था और इसलिए प्रतिस्पर्धी राजनीतियों के प्रतिस्पर्धी ईश्वर हुआ करते थे। दूसरे शब्दों में, अमूर्त नैतिक नियमों की बजाए, मानव संबंधों को वंशावली और परिवार संबंधी नियम निर्धारित और नियंत्रित करते थे। परंतु आने वाले समय में, जब समाज को केवल मनुष्यों का संघ माना जाने लगा और ईश्वर राजनीतिक समाज का अंग न होकर लोकोत्तर तत्व बन गया, उसके बाद मानव और ईश्वर के संबंध पारिवारिक न होकर आस्था और विश्वास से जुड़ गए। समुदाय के सार्वजनिक और नागरिक जीवन पर नज़र रखने की बजाए ईश्वर अब व्यक्तियों पर नज़र रखने लगा और उनके व्यक्तिगत अंन्तःकरण और आचरण को नियंत्रित करने लगा। अपने पुरखों के प्रति वफादारी का स्थान नैतिकता संबंधी हिदायतों ने ले लिया। नैतिकता और धार्मिकता का परस्पर मेल हो गया। इसके बाद एक ऐसे समुदाय की कल्पना करना संभव हो गया, जिसमें विभिन्न ईश्वरों की आराधना करने वाले लोग हों। इसके साथ ही, एक ऐसे सार्वलौकिक ईश्वर की कल्पना भी संभव हो गई जो संपूर्ण मानवता के कार्याकलापों का प्रबंधक हो। यह इस तथ्य के बावजूद कि मानव समाज विभिन्न राष्ट्रों और राजनीतियों में बंटा हुआ था। उसके बाद से धर्म का परिवर्तन, आवश्यक रूप से राष्ट्रीयता का परिवर्तन नहीं रह गया।

ध्यान दें कि आंबेडकर कि यह व्याख्या, समाज के धर्मनिरपेक्षीकरण की सरल कहानी नहीं है वरन् यह धर्म और राजनीति के परस्पर रिश्ते में परिवर्तन की कहीं अधिक जटिल कथा है। ऐसा नहीं है कि आधुनिक काल में धर्म, राजनीति के लिए अप्रासंगिक हो गया है। बल्कि धर्म की प्रकृति और मनुष्य व ईश्वर के बीच के रिश्ते में आए परिवर्तन के कारण, आधुनिक काल में धर्म और राजनीति के बीच कोई सीधा संबंध नहीं रह गया है। परंतु वे एक-दूसरे के साथ काफी जटिल तरीकों से जुड़े हुए हैं और कई बार वे एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी भी बन जाते हैं। धर्म की सार्वजनिक जीवन में भूमिका कायम है परंतु एकदम अलग मानदंडों व सिद्धांतों के अंतर्गत। आंबेडकर के शब्दों में:
‘‘इस प्रकार धार्मिक क्रांति, समाज के धार्मिक संगठन में क्रांति नहीं थी, जिसके नतीजे में समाज की बजाए व्यक्ति केन्द्र में आ गया। वह प्र्रतिमानों की क्रांति थी…इस बारे में कोई विवाद हो सकता है कि दोनों में से कौनसे प्रतिमान नैतिक दृष्टि से श्रेष्ठ हंै परंतु मैं नहीं सोचता कि इस बारे में कोई विवाद हो सकता है कि ये प्रतिमान नहीं हैं (पृष्ठ 22)।

दूसरे शब्दों में, आधुनिक काल में धर्म के मुद्दे पर वाद-विवाद, सार्वजनिक जीवन के नियामक ढ़ांचे पर केन्द्रित वाद-विवाद बन जाता है। और वह भी तब जब धर्म को केवल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में न देखा जाए।

आंबेडकर के धर्म संबंधी पुनर्विचार का चैथा पक्ष था धर्म और नैतिकता के परस्पर रिश्तों के संबंध में उनकी सोच। आंबेडकर एक बहुत साधारण सी बात कह रहे थे और वह यह कि किसी धर्म की श्रेष्ठता की जांच की कसौटी, वह नैतिकता होनी चाहिए जिसे वह अपने अनुयायियों में बढ़ावा देता है। इस आधार पर हिन्दू धर्म निश्चित तौर पर कमजोर है क्योंकि वह पदक्रम, असमानता और अछूत प्रथा को वैध ठहराता है। दूसरी ओर, बौद्ध धर्म एक नैतिक धर्म है क्योंकि वह जाति, लिंग और प्रजाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। बौद्ध धर्म हमेशा से नीची जातियों के लोगों और महिलाओं का बौद्ध संघों में स्वागत करता आया है और वैदिक यज्ञों में मासूम पशुओं की बलि देने का आलोचक रहा है। परंतु यहां आंबेडकर केवल धर्म के नाम पर नैतिकता को वैध नहीं ठहरा रहे हैं। उनका तर्क इससे कहीं अधिक जटिल है। अपनी पुस्तक ‘द बुद्धा एण्ड हिज़ धम्म‘‘, जो उन्होंने अपनी मृत्यु के कुछ ही समय पहले लिखी थी, में आंबेडकर हमें धर्म के सबसे शुद्ध और अनलंकृत रूप से परिचित करवा रहे हैं। वह ऐसा धर्म है जिसमें न ईश्वर और ना ही पैगम्बरों की मध्यस्थता की जरूरत है और ना ही वह आत्मा जैसी किसी अमर आंतरिक शक्ति पर निर्भर है। उनके लिए धर्म का संबंध ईश्वर या आत्मा से नहीं बल्कि सामान्य नश्वर मनुष्य और उसकी रोजाना की जिदंगी से है। बुद्ध और कृष्ण, ईसा मसीह व मोहम्मद के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए आंबेडकर लिखते हैं कि बुद्ध ने कभी यह दावा नहीं किया कि वे ईश्वर या ईश्वर के दूत हैं और ना ही उन्होंने जो कहा उसे ईश्वरीय कथन या ईश्वर के विचारों का प्राकट्टय माना जाता है। बुद्ध ने कभी यह दावा नहीं किया कि उन्हें चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त हैं या वे परालौकिक प्रश्नों का उत्तर जानते हैं (जैसे मृत्यु के बाद क्या होता है, आत्मा की प्रकृति क्या है आदि)। बौद्ध ग्रंथ केवल शून्यता, दुःख, विश्व के अस्थायित्व, अहिंसा व प्रतीत्यसमुत्पाद की दार्शनिक अवधारणाओं के आधार पर मनुष्य की स्थिति पर चिंतन हैं। बौद्ध धर्म, दुनिया को क्षणभंगुर और सतत परिवर्तनशील मानता है और हमें यह गारंटी नहीं देता कि हमारे ऊपर कृपालु ईश्वर है और यह कि मृत्यु के बाद भी हमारी आत्मा जीवित रहेगी। और इसी कारण बौद्ध धर्म में परिवर्तन लाने की असीम संभावनाएं हैं। आंबेडकर ने नव बौद्धधर्म को विश्व के धर्म के रूप में प्रस्तुत किया – एक ऐसे धर्म के रूप में जो जिंदगियों को बेहतर बनाएगा – आज और अभी। और वह ऐसा कैसे करेगा? वह अपने अनुयायियों को जिम्मेदारी से काम करने और नैतिकतापूर्ण आचरण करने की प्रेरणा देकर यह करेगा। इसलिए आंबेडकर शील पर जोर देते हैं, जिसके बिना ज्ञान भी बेकार है। आंबेडकर कहते हैं कि नवायन में धर्म ही नैतिकता है और नैतिकता ही धर्म है।

कर्म के सिद्धांत में संषोधन

जैसा कि हम जानते हैं आंबेडकर कर्म की पारंपरिक ब्राम्हणवादी अवधारणा के कटु विरोधी थे। कर्म का सिद्धांत कहता है कि इस जीवन के दुःख, पूर्व जीवन के पापों के कारण हैं। वे कर्म के आधुनिक राष्ट्रवादी सिद्धांत के भी तीखे आलोचक थे, जो यह कहता था कि हमें कोई भी काम बलिदान स्वरूप करना चाहिए और इसे करते समय न तो भयग्रस्त होना चाहिए और ना ही कोई फल पाने की इच्छा करनी चाहिए। आंबेडकर के अनुसार, कर्म का मूल सिद्धांत अछूतों की दुरावस्था का कारण है क्योंकि वह उनकी हालत के लिए उन्हे ही जिम्मेदार बताता है। और दूसरा सिद्धांत अछूतों के मुक्ति पाने के प्रयासों को राजनैतिक अभियान के दर्जे से वंचित करता है क्योंकि यह आंदोलन निश्चित तौर पर कुछ इच्छाओं की पूर्ति व हितों की रक्षा पर लक्षित है। बौद्ध धर्मग्रंथों के आधार पर आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘रेवोल्यूशन एण्ड काउंटर रेवोल्यूशन इन इंडिया’ में भगवदगीता की समालोचना की। इसमें उन्होंने कर्म के सिद्धांत का एक संशोधित संस्करण प्रस्तावित किया, जिसके अनुसार हर कार्य के अनिवार्य और अपरिहार्य परिणाम होते हैं, चाहे वे तुरंत हों या बाद में और वे परिणाम इसी दुनिया में होते हैं और कई बार उनका प्रभाव मनुष्यों के समूहों पर भी पड़ता है। दूसरे शब्दों में हर व्यक्ति अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार है क्योंकि उसके कार्यों के परिणाम केवल उसे ही प्रभावित नहीं करते बल्कि पूरी दुनिया पर भी प्रभाव डालते हैं। अतः अपनी जिम्मेदारी को स्वीकारना ही नैतिकता है। कर्म के सिद्धांत के इस पुनरीक्षित संस्करण से आंबेडकर ने हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की गतिविधियों को नैतिकता के तराजू पर तोलने की वकालत की। वे आम जिंदगी की बात करते थे, जातिगत हिंसा और भेदभाव जिसका हिस्सा था। ऐसा कर वे राष्ट्रवादी श्रेष्ठिवर्ग द्वारा असाधारण क्रांतिकारी या बलिदानी कार्यों के महिमामंडन का विरोध कर रहे थे। आंबेडकर का कहना था कि नैतिकता केवल सही नियमों का पालन करना नहीं है, बल्कि नैतिकता तो नियमों के बारे में है ही नहीं। वह तो सिद्धांतों के बारे में है। नियम हमें बताते हैं कि हम क्या करें और कैसे करें। नियम हमें एक लीक पर चलना सिखाते हैं। ‘मनुस्मृति‘ इसी तरह के विस्तृत नियमों का संकलन है और हमें इन नियमों का कड़ाई से पालन करना सिखाती है। सिद्धांत हमें यह नहीं बताते कि हमें क्या करना चाहिए। वे हमें व्याख्या करने और उसके आधार पर निर्णय लेना सिखाते हैं। नियमों से उपजती है आज्ञाकारिता, सिद्धांतों से उत्पन्न होती है रचनात्मकता। नियम तय करते हैं, सिद्धांत जिम्मेदार स्वतंत्रता के जनक होते हैं। सच्चा धर्म, सिद्वांतों का धर्म है नियमों का धर्म नहीं क्योंकि सिद्धांतों का धर्म ही रचनात्मक, जिम्मेदार और स्वतंत्र धार्मिक व्यक्तियों को जन्म देता है। ‘एनीहीलेशन आॅफ काॅस्ट‘ में वे लिखते हैंः

‘‘सिद्धांत भले ही गलत हों परंतु कार्य सचेतन और जिम्मेदारी से किया जाता है। नियम सही हो सकते हैं परंतु कार्य यांत्रिक होता है। कोई धार्मिक कार्य सही न भी हो परंतु कम से कम उसे उत्तरदायी होना चाहिए।‘‘

यह एक अत्यंत विलक्षण कथन है – यह कि कोई भी कार्य धार्मिक कार्य तभी कहला सकता है जब वह जिम्मेदारी से किया गया हो, भले ही वह सही हो या गलत।

समाजिक परिवर्तन में धर्म की भूमिका

यह पूछा जा सकता है कि अगर आंबेडकर की वास्तविक रूचि उत्तरदायी कार्य से उदभूत नैतिकता में थी तो उसे धर्म कहने की क्या जरूरत है। यह एक दिलचस्प प्रश्न है। यह स्पष्ट है कि आंबेडकर काण्ट की इस आधुनिक अवधारणा से सहमत नहीं थे कि नैतिकता केवल तार्किक और मानसिक विवेक है (काण्ट का कहना था कि नैतिकता के लिए धर्म के आधार की जरूरत नहीं है)। आंबेडकर की नैतिकता एक प्रकार की पवित्रता से जुड़ी हुई थी और इस पवित्रता का संबंध केवल तार्किकता से नहीं था। इस नैतिकता का पालन करने के लिए उस तरह की प्रतिबद्धता की जरूरत थी, जिस तरह की प्रतिबद्धता की मांग धार्मिक आस्था करती है। यह प्रतिबद्धता हमें अंत तक लड़ने और अपना बलिदान देने की प्रेरणा देती है। और ऐसा इसलिए नहीं था क्योंकि आंबेडकर पारंपरिक अर्थों में परंपरावादी थे (यद्यपि वे परंपरा को काफी गंभीरता से लेते थे और यह इस बात से जाहिर है कि उन्होंने  जीवनपर्यन्त संस्कृत और पाली ग्रथों का अध्ययन किया। वे परंपरा की समालोचना भी करते थे और उसे नए विचारों का स्त्रोत भी मानते थे)। ऐसा इसलिए था, क्योंकि जैसा कि आंबेडकर ने सन् 1950 में लिखे अपने लेख ‘बुद्धा एण्ड द फ्यूचर आॅफ हिज़ रिलीजन‘ में लिखा थाः ‘‘नई दुनिया को पुरानी दुनिया की तुलना में धर्म की कहीं अधिक जरूरत है।’’ उनका आशय था कि नैतिकता के रूप में धर्म, आधुनिकता की जरूरत है। आंबेडकर का कहना था कि नई दुनिया को धर्म की जरूरत इसलिए है क्योंकि कानून (जो कि नियमों का संकलन है और जिसमें हम आधुनिक लोग बहुत अधिक विश्वास करते हैं) समाज को बदलने के उपकरण के रूप में अप्रभावी और अविश्वसनीय है। उनके शब्दों में :

‘‘कानून का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों को सामाजिक अनुशासन के दायरे में रखना है। बहुसंख्यकों को तो नैतिकता के सिद्धांतो के आधार पर अपने सामाजिक जीवन का संचालन करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए और छोड़ देना पड़ता है। इसलिए नैतिकता के अर्थ में धर्म, हर समाज का शासी सिद्धांत होना चाहिए।‘‘

और यह बात उस व्यक्ति ने कही, जो हमारे युग का सबसे बड़ा संविधानवादी और विधिक सुधारक था। इससे यह स्पष्ट पता चलता है कि आंबेडकर धर्म पर इसलिए पुनर्विचार कर रहे थे क्योंकि उन्हें आधुनिक राज्य और आधुनिक उदारवाद के ‘विधि के शासन’ की सीमाओं का अहसास था (यह मात्र संयोग नहीं था कि उन्होंने नेहरू सरकार के विधिमंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद, बौद्ध धर्म अंगीकार किया। उन्हें यह अहसास हो गया था कि हिन्दू संयुक्त परिवार – जो भारत में जातिगत और लैंगिक भेदभाव के मूल में था – में कानून के जरिए सुधार लाना असंभव है)।

आंबेडकर के धर्म के पुनर्विचार के जिस अंतिम महत्वपूर्ण पहलू पर मैं जोर देना चाहती हूं वह यह है कि आंबेडकर धर्म को एक ऐसी शक्ति मानते थे जो राज्य और कानून की सीमाओं पर कार्य करती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि 2 दिसंबर 1956 को – उनकी मृत्यु के केवल चार दिन पहले – उन्होंने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था ‘बुद्धा आॅर मार्क्स ‘। इस लेख में उन्होंने लिखा कि बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद में कुछ मूलभूत समानताएं हैं। जैसे, दोनों यह मानते हैं कि निजी संपत्ति सभी असमानताओं का स्त्रोत है (और इसलिए बौद्ध धर्म में भिक्षु की अवधारणा है और मार्क्सवाद में सर्वहारा की। ये दोनों वे वर्ग हैं जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और इसलिए उनमें परिवर्तन का शक्तिशाली कारक बनने की संभावनाएं हैं)। परंतु मार्क्सवाद और बौद्ध धर्म इसके आगे अलग-अलग रास्तों पर चले जाते हैं। मार्क्सवाद, धर्म को आम लोगों की अफीम बताकर खारिज कर देता है और राज्य को सामाजिक परिवर्तन का प्राथमिक उपकरण मानता है (जैसा कि सोवियत समाजवाद और नेहरूवादी समाजवाद के मामलों में था)। हम सब जानते हैं कि इसका परिणाम तानाशाही और हिंसा के रूप में सामने आता है। समानता के लिए मार्क्सवाद स्वतंत्रता की बलि चढ़ाता है। आंबेडकर, सर्वहारा की तानाशाही की तुलना बौद्ध संघों से करते हैं, जो, उनके अनुसार, प्रजातांत्रिक शासन का संस्थागत स्वरूप है और उनमें प्रवेश पूरी तरह से ऐच्छिक है। उनका कहना था कि बुद्ध, प्रजातंत्र के सिद्धांत की तुलना में अहिंसा के संदर्भ में अधिक लचीले थे। गांधी और दकियानूसी जैनियों के विपरीत, बुद्ध यह मानते थे कि कुछ मामलों में हिंसा अपरिहार्य व न्यायपूर्ण भी हो सकती है। परंतु बुद्ध को तानाशाही कतई स्वीकार्य नहीं थी क्योंकि उनका यह विश्वास था कि किसी को भी सही आचरण करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। सही आचरण करने की प्रेरणा हमें हमारे स्वभाव में परिवर्तन से मिलती है और स्वभाव में परिवर्तन, कानून से नहीं बल्कि धर्म से ही आ सकता है। आंबेडकर का यह तर्क कि धर्म वहां से शुरू होता है, जहां राज्य का क्षेत्राधिकार समाप्त होता है उनके इस उद्वरण से स्पष्ट हैः

‘‘कम्युनिस्ट स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि राज्य की स्थायी तानाशाही का सिद्धांत, उनके राजनैतिक दर्शन की कमजोरी है। वे यह कहते हैं कि अंततः राज्य विलुप्त हो जाएगा। उन्हें इन दो प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए – राज्य कब विलुप्त होगा और उसके विलुप्त हो जाने के पश्चात उसका स्थान कौन लेगा?…कम्युनिस्टों के पास इन दोनों प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है। कम से कम दूसरे प्रश्न का तो कतई नहीं, जो कि पहले प्रश्न से अधिक महत्वपूर्ण है। क्या राज्य के विलुप्त हो जाने के पश्चात उसका स्थान अराजकता लेगी? अगर ऐसा है तो कम्युनिस्ट राज्य का निर्माण करना बेकार है…। वह एकमात्र चीज जो राज्य का स्थान ले सकती है वह है धर्म।’’ अंत में मैं धर्म पर पुनर्विचार के संदर्भ में आंबेडकर की अद्वितीय मौलिकता की ओर ध्यान दिलाना चाहती हूं।

धर्मनिरपेक्षता का आधुनिक सिद्धांत, जो यह कहता है कि धर्म के समाप्त हो जाने के बाद शुद्ध राजनीति का उदय होगा, के विपरीत आंबेडकर का तर्क यह है कि धर्म तब सक्रिय होगा, जब धर्मनिरपेक्ष राजनीति असफल हो जाएगी या थक जाएगी। इसलिए जो लोग यह मानते हैं कि आंबेडकर का विचार यह था कि धर्म, राजनीति के अधीन एक उपकरण है वे गलत सोचते हैं। यह सही है कि उन्होंने ‘स्वतंत्रता, सामानता और बंधुत्व’ – जो कि फ्रांस की राज्यक्रांति का नारा था- को अपने धर्म का आदर्श घोषित किया था परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्य सभी के विपरीत, वे यह मानते थे कि बंधुत्व ही वह आधार है जिस पर समानता और स्वतंत्रता की इमारत की तामीर हो सकती है। बंधुत्व का अर्थ है एक दूसरे को समझना व एक दूसरे के प्रति करूणाभाव रखना (करूणा की यह परिकल्पना बौद्ध धर्म पर आधारित है)। यह केवल दूसरों के प्रति अच्छी सोच रखने और शीलता से ही संभव हो सकता है। यह केवल धार्मिक सोच से संभव हो सकता है – अनुशासित या नियमों से चालित आचरण से नहीं और ना ही यह शुद्ध राजनैतिक तार्किकता से उपज सकता है। दूसरे शब्दों में, आंबेडकर का धर्म पर पुनर्विचार, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सहिष्णुता के उदारवादी ढांचे की मदद के बगैर नहीं समझा जा सकता। और ना ही उसे जीन जक्कुएस रूसो द्वारा अपनी पुस्तक ‘द सोशल कान्ट्रेक्ट‘ में प्रतिपादित ‘नागरिक धर्म‘ के ढ़ांचे की मदद से समझा जा सकता है। उसे इस ढ़ांचे में समझने का प्रयास कई लोग करते हैं। इसके दो कारण हैं पहला यह कि नागरिक धर्म वह धर्म है जिसमें चर्च या धर्मशास्त्रीय ज्ञान का कोई स्थान नहीं है। वह केवल आधुनिक राज्य के काम आता है। दूसरे, नागरिक धर्म सभी मनुष्यों की प्राकृतिक व मूल समानता पर आधारित है। जैसा कि रूसो ने स्वयं लिखा था कि ‘‘जन्म के समय सभी मनुष्य समान होतेे हैं।’’ इसके कारण, आदिम राजनैतिक समुदाय की कल्पना करना संभव होता है। परंतु आंबेडकर हमें यह याद दिलाना नहीं भूलते कि सभी मनुष्य जन्म के समय समान नहीं होते। ऐसा कोई राजनैतिक समुदाय नहीं होता जो समय के साथ पतित हो गया हो और जिसे उसके पुराने शुद्ध रूप में पुनः ले जाया जा सकता हो। राजनैतिक समुदाय को श्रम पूर्वक, मुसीबतों का सामना करते हुए निर्मित करना होता है और यह पूर्वकाल के पदक्रम और शोषण पर आधारित व्यवस्था के मलबे पर बनता है। इसलिए आज जरूरत एक नए और अभूतपूर्व धर्म की है क्योंकि धर्म के अलावा किसी चीज से काम नहीं चलेगा।


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