कौन पूरा नहीं होने दे रहा आंबेडकर का सपना?

भारतीय समाज की वे कौन सी प्रवृत्तियां हैं, जो बाबासाहेब के अधूरे सपनों के पूरा होने में बाधक हैं। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी नरेंद्र कुमार का आकलन :

हमें राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करनी है। उसके लिए निर्देशक तत्व हमारे आदर्श हैं। पूरे संविधान का उद्देश्य इन आदर्शों का पालन करना है। ये निर्देशक तत्व सरकार के लिए जनता के आदेशपत्र होंगे। जनता ही उनका बल है और जनता किसी भी कानून से अधिक बलशाली होती है। – डॉ. आंबेडकर

डॉ. भीमराव आंबेडकर आधुनिक भारत की महानतम शख्सियत हैं। उनके सम्मान में जितने भी विशेषण इस्तेमाल किए जाएं कम है – भारतीय संविधान रचयिता, आधुनिक भारत के निर्माता, ज्ञान के प्रतीक, सच्चे राष्ट्रभक्त, भारतरत्न, बोधिसत्व, प्रातः स्मरणीय, मानवता के प्रहरी आदि। महात्मा गांधी के सपनों का भारत गांवों में बसता था। आंबेडकर को भारत जैसा है या था, उससे संतोष नहीं था। वे उसे आधुनिक भारत बनाना चाहते थे। संविधान की रचना से लेकर, भाषणों, लेखों और पुस्तकों में उन्होंने इसी पर जोर दिया है। इसलिए उनका कहना था – ‘संविधान में हमारे सपनों का भारत बसता है।’ आखिर कौन-सा सपना था, जिसके लिए वे आजीवन प्रयास करते रहे। और जिसे उन्होंने स्वतंत्र भारत के संविधान में पिरोया था? वह सपना था, ऐसे राज्य का जिसमें सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक समानता तथा न्याय सुनिश्चित किया जा सके। आजकल हम सामाजिक सरसरता की बात करते हैं। न्याय की बात करते हैं, भारत के सांस्कृतिक वैविध्य को देखते हुए वह अत्यावश्यक है। बाबासाहेब के सपने और सामाजिक समरसता में कोई अंतर्विरोध या विवाद नहीं है। लेकिन हालात वैसे नहीं है, जैसी उन्होंने कामना की थी। बल्कि बेहद निराशाजनक, आज अगर वे जीवित होते तो अपनी व्यथा किन शब्दों में व्यक्त करते, उसे एक गजलकार, इमरजेंसी के दौरान व्यक्त कर गया था-

आज वीरान अपना घर देखा

तो कई बार झांककर देखा

पांव टूटे हुए नजर आए

एक ठहरा हुआ सफर देखा

होश में आ गए कई सपने

आज हमने वो खंडहर देखा

(दुष्यंत कुमार, साये में धूप)

वे सपने कहां गए जो बाबासाहेब ने संविधान में पिरोया था? हालात बताते हैं कि कुछ नहीं बदला? उनके जीवन की एक घटना के बारे में आप सबने खूब पढ़ा-सुना होगा। जब वे विदेश से शिक्षा ग्रहण करके लौटे थे तो उनकी योग्यता को देखते हुए महाराजा बड़ौदा ने उन्हें नौकरी पर रख लिया। रहने के लिए घर की जरूरत पड़ी तो एक पारसी महिला के यहां किराये पर मकान लेकर रहने लगे। लेकिन लोगों को यह स्वीकार्य न था। विरोध बढ़ा तो पारसी महिला ने उन्हें घर से निकाल दिया। क्यों? इसलिए कि वे अछूत थे। हालांकि पारसियों का जाति-प्रथा से कोई लेना-देना नहीं है। बावजूद इसके डॉ. आंबेडकर जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के साथ ऐसा वर्ताब किया गया। यह सन चालीस के दशक की घटना है। अब जरा वर्तमान पर आ जाइए। दिल्ली में एक कन्या, अछूत कन्या देहरादून की आती है। अपने सपने को साकार करने, हायर एजुकेशन के लिए। यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए वह मुखर्जीनगर में मकान लेती है। साथ में उसकी छोटी बहन और भाई भी है। उन्हें भी पढ़ाना है। होता क्या है? मकान मालकिन को पता लगता है कि यह तो अछूत है। वह कहती है कि मकान तुरंत खाली करो। लड़की कहती है कि थोड़ा वक्त चाहिए। वक्त नहीं मिलता। रात नौ बजे पुलिस से मिलकर मकान खाली करा लिया जाता है। उसके बाद उन्हें पुलिस स्टेशन में बिठा लिया जाता है। परेशान लड़की अपने घर फोन करती है। उसके पिता देहरादून से आते हैं। एससी/एसटी (अट्रासिटी) एक्ट में एफ़आईआर लिखवाई जाती है। निचले कोर्ट में मामला रफा-दफा हो जाता है। उसके बाद मामला हाईकोर्ट में उठता है। फिर सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी-अभी निर्देश दिया है कि यह केस दुबारा से सुना जाए। हालात जैसे पहले थे, वैसे ही आज भी हैं। बदलाव कहां आया है!

एक और कहानी है। अप्रैल 2016 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी थी। ‘इंस्टीट्यूट ऑफ दलित स्टडीज’ में एक दलित स्कॉलर थे। उन्होंने एक मकान ले लिया दक्षिणी दिल्ली के अंदर। उनके शोध का विषय था कि क्या दिल्ली में आज भी मकान के मामले में दलितों के साथ भेदभाव होता है? उनसे भी मकान खाली करा लिया गया। मेरा खुद का केस है। आरक्षण के विरोध में वे अक्सर मेरिट का तर्क देने लगते हैं। जब मैं आईएएस में आया तो पूरे देश में मेरी सेकेंड पोजीशन थी। (यह रिकार्ड 28 वर्ष बाद 2016 में टीना डाबी के बाद टूटा) मुझे कायदे से मेरा होम काडर मिलना चाहिए था। उस समय चिदंबरम जी ‘मिनिस्टर ऑफ स्टेट और पर्सनल’ थे। एक डिफेंस सेक्रेटरी उस वक्त के थे, एसके भटनागर, जिन्होंने बोफोर्स हेंडल किया था। उनकी बेटी को दिल्ली में रखने के लिए मुझे असम-मेघालय काडर में डाल दिया गया। मैं चिदंबरम जी से मिला। वे नाराज़ हो गए, बोले—‘कोर्ट चले जाओ।’ मैं गुवाहाटी गया। कोर्ट में केस किया और खुद लड़ा। मेरे सामने चार-चार वरिष्ठ काउंसिल-वकील खड़े कर दिए गए। मैंने अपना पक्ष रखा। मैं जीत गया। बावजूद इसके मुझे अरुणाचल भेज दिया। तीन महीने की बिटिया और सवा साल के बच्चे के साथ। मुझे चाइना बार्डर के पास पटक दिया गया। जहां आने-जाने का साधन नहीं था। टीवी नहीं था, अखबार नहीं था, रेडियो नहीं था, दवाईयां नहीं थीं, बच्चों का इम्युनाइजेशन नहीं हो सकता था। वहां मुझे डाल दिया गया।

यह मामला निपटा नहीं है। पर मैं यह बताना चाहता हूं कि संविधान में बाबासाहेब ने अपने सपनों का जो भारत बुना था, उसका क्या हाल हुआ है। यह सपना पूरा हो सकता था। उसके लिए जरूरत थी, कुछ प्रावधानों के साथ ईमानदारी से काम करने की। मैं क्यों बोल रहा हूं यह बात? क्योंकि भारत पूरी दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है, जिसे कुदरत ने इतनी नेमतें दी हैं कि यह पूरे विश्व का लीडर बन सकता है। हमारे पास भरपूर एग्रीकल्चर लेंड, खेती की जमीन है। उसके ऊपर तीन-तीन फसलें साल में उगा सकते हैं। अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा कृषि-योग्य जमीन भारत के पास है। इतनी बढ़िया हमारी समुद्री सीमा है। उसपर हम बेहतरीन पोर्ट विकसित कर सकते थे। इतनी बढ़िया फ्लोरा फार्मा है। प्राकृतिक संसाधन, खनिज संपदा देश में है। हमारे पास हिमालय का संरक्षण है, समुद्री सुरक्षा है। इतनी बढ़िया मेनपॉवर हमारे पास है। इसके बावजूद संविधान लागू होने के 67 वर्ष बाद भी आज हम कहां हैं?

हम जैसे हैं, उससे कहीं बेहतर हो सकते थे। कैसे? मैं बताता हूं। संविधान में आर्टिकल 16 था(है)। जिसमें आरक्षण की अवधारणा थी कि जो गरीब दलित बच्चे हैं, उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाएगा। क्या हुआ। आरक्षण पॉलिसी का क्या हुआ? जाकर सत्तर के दशक में लागू हुई। और अस्सी के दशक में उसमें तेजी आई। ‘रिजर्वेशन एक्ट’ आज तक नहीं बना है। जो पॉलिसी लागू हुई है वह शासकीय आदेशों के माध्यम से लागू हुई है। इसलिए कोर्ट कभी भी उसमें हस्तक्षेप कर कोई न कोई फेरबदल कर देता है।

आर्टिकल 31 था (है)। आर्टिकल 31 में क्या है? भूमि सुधार लागू करो। जमींदारी प्रथा खत्म करते हुए जो जमीन मिले उसे गरीबों में, दलितों में बांट दिया जाए। भूमि सुधार पर सबसे पहला एक्ट बना -1950 में। बिहार सरकार ने उसे बनाया था। मगर उसको कोर्ट में चेलेंज कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उसको निरस्त कर दिया। उसके बाद और भी कानून राज्यों ने बनाए। एक-एक कर सभी को अदालत में चुनौती दी गई। अंततः पहला संविधान संशोधन लाना पड़ा। आर्टिकल 38 था। डॉक्टर आंबेडकर ने यह प्रावधान किया था कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि हर व्यक्ति को, पूरे देश में सभी को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक न्याय मिलेगा। हकीक़त किसी से छिपी नहीं है। आर्टिकल 39 के अंतर्गत यह कहा गया था कि पूरे देश में, प्रत्येक नागरिक को जीवनयापन का पूरा-पूरा मौका मिलेगा। क्या यह मिल रहा है? आर्टिकल 39 में यह प्रावधान भी था कि जो भौतिक संसाधन हैं, उनके ऊपर किसी एक का वर्चस्व न हो। आज (14 अप्रैल, 2016) ही के एक अखबार में क्रेडिट सूसी (Credit Suisse) जो एक जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्था है, की एक फाइनेंशियल रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके हिसाब से देश के एक प्रतिशत लोगों के पास राष्ट्र की 53 प्रतिशत संपदा है। 10 प्रतिशत लोगों के पास पूरे राष्ट्र की 80 प्रतिशत संपदा इकट्ठी हो चुकी है। ग़ौरतलब है कि ‘क्रेडिट सूसी’ की उपर्युक्त रिपोर्ट 2010 में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद देश में आर्थिक असमानता में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है। उसमें छोटे उद्योग-धंधे तबाह हुए हैं। उनका विशेष असर दलितों तथा छोटे कामगारों पर पड़ा है।

एक  आर्टिकल और था- आर्टिकल 44। इन सबसे महत्वपूर्ण जो प्रावधान था, वह था आर्टिकल 47 में। ‘डायरेक्टिव प्रिसिंपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी’ (राज्य के नीति-निर्देशक तत्व)। उसमें व्यवस्था की गई थी कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि 10 वर्षों के अंदर, (संविधान लागू किया गया था, 26 जनवरी 1950 को) 14 वर्ष तक की उम्र के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा मिलेगी। क्या हुआ? आईआईटीज, बना दिए गए। आईआईएम बना दिए गए। प्राथमिक शिक्षा के लिए पैसा नहीं है! जब कोर्ट में रिट पिटीशन फाइल किए गए, यह बात सच्चाई है, इतिहास में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट में लोग गए कि ‘डायरेक्टिव प्रिसिंपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी’ का क्या हुआ? उस वक्त सरकार ने यही कहा था कि हमारे पास संसाधनों की कमी है। अरे! आईआईटीज बनाने के लिए संसाधन हैं, आईआईएम बनाने के लिए संसाधन हैं- लेकिन प्राथमिक शिक्षा के लिए संसाधन नहीं हैं! जो आईआईटी, आईआईएम बने, उनमें किनके बच्चों को शिक्षा दी जाती है? वे आज कहां हैं? सब के सब करोड़पति, अरबपति बनकर विदेशों में बैठे हैं। इस देश के नागरिक तक नहीं रहे वे लोग।

यह संकुचित प्रवृत्ति क्या है? मैं आपको इसके बारे में थोड़ा-सा बताना चाहता हूं। उसकी ओर से स्वयं बाबासाहेब ने हमें सावधान किया था –

‘मेरी राय में इसमें कोई संदेह नहीं हैकहने का मतलब यह है कि 66 वर्षों के बाद भी हमारी जो मूल संवैधानिक प्रतिबद्धताएं थीं, अगर उनके ऊपर ईमानदारी से काम हुआ होता तो कल्पना कीजिए आज हमारा मुल्क कहां होता। और बाबासाहेब की दूरदर्शिता देखिए। संविधान को देश को समर्पित करते हुए उन्होंने कहा था –

‘मुझे पूरा विश्वास है कि संविधान का कार्यान्वन होगा। इसमें आवश्यक सुधारों के लिए स्थान रखा गया है। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि यह दुर्बल संविधान है। और भी एक बात कहूं, इसके लागू होने के बाद में देश में यदि कोई समस्या पैदा हुई तो वह संविधान में दोष होने के कारण नहीं, मानव की संकुचित प्रवृत्ति के कारण होगी।’

कि जब तक आप अपनी सामाजिक व्यवस्था नहीं बदलेंगे, तब तक कोई प्रगति नहीं होगी। आप समाज को रक्षा या अपराध के लिए प्रेरित कर सकते हैं। लेकिन जाति-व्यवस्था की नींव पर आप कोई भी निर्माण नहीं कर सकते। आप राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते। आप नैतिकता का निर्माण नहीं कर सकते। जाति-व्यवस्था की नींव पर आप जो भी निर्माण करेंगे वह चटक जाएगा और कभी भी पूरा नहीं होगा।’

आजकल सामाजिक समरसता की बड़ी चर्चा होती है। यह सामाजिक समरसता क्या है? सामाजिक समरसता आर्थिक सहभागिता और समान अवसरों की उपलब्धता का ही दूसरा नाम है। हमारा संविधान इसी लक्ष्य को समर्पित है। इसके बावजूद यह क्यों नहीं हुआ? इसके लिए जो मूल शर्तें हैं, वे क्या हैं? बाबासाहेब ने अपने लेखों के माध्यम से बार-बार कहा था – सभी को समान अवसर उपलब्ध हों। सभी के लिए समान आचार-व्यवहार और भाव होंवें। कहीं भी किसी भी प्रकार का धर्म, जाति, रंग, क्षेत्र भाषा आदि के आधार पर कोई भेदभाव न हो। इसी के लिए हमारे संविधान में पूरा का पूरा तंत्र विकसित किया गया है – कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और प्रेस की स्वतंत्रता का। फिर भी नहीं हो पाया यह। क्यों नहीं हो पाया? इसलिए कि हमारी जो राजनीतिक संस्थाएं हैं ये बहुलतावादी संस्थाएं नहीं हैं। बहुलतावादी संस्थाओं का अर्थ है कि उनमें समाज के प्रत्येक वर्ग को पूरा-पूरा मौका उसमें सहभागिता का अवसर प्राप्त हो। हमारे राजनीतिक तंत्र पर गिने-चुने परिवारों का कब्जा है। ठीक ऐसे ही जैसे आजादी से पहले देश में रजबाड़े हुए करते थे। जब तक अवसरों की समानता न हो, तब तक सामाजिक समरसता केवल दिवास्वप्न रहेगी।

कुछ बातें जाति व्यवस्था के बारे में। भारतीय समाज के इस कलंक पर जितना बोला जाए उतना ही कम है। फिर भी मैं इसपर ज्यादा नहीं बोलना चाहूंगा। बाबासाहेब बहुत कुछ लिख-बोल गए हैं। मुख्य बात यह है कि जाति-व्यवस्था का उन्मूलन कैसे किया जाए? बकौल मार्क्स ‘दुनिया कैसी है’— इसकी व्याख्या तो दार्शनिक लोग सदियों से करते आए हैं। चुनौती उसको बदलने की है। इसके लिए आज से अठारह साल पहले आर्य समाज रोड पर एक सभा हुई थी। सभी पार्टियों के लोग उसमें आए थे। सभा ‘आरक्षण बचाओ’ के ऊपर थी। उसमें बीजेपी के संघप्रिय गौतम थे। कांग्रेस से शीला दीक्षित थीं। बीसपी और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतागण भी उसमें थे। मैं भी शामिल हुआ था। सभा में मैंने कहा था कि ये जो आरक्षण की बात करते हैं आप, 1990 के दशक में आपको याद होगा, कंपीटिशन इंट्रोडयूश किया गया था। अर्थव्यवस्था को खोला गया था। उस समय राहुल बजाज जैसे अरबपति ने कहा था कि हमको ‘लेबल प्लेन फील्ड’ (चुनौतीविहीन व्यवस्था) चाहिए। क्यों? क्योंकि वे कंपीटिशन से डर गए थे। उदारीकरण के नाम पर सरकार ने ऐसा किया। बड़े-बड़े पूंजीपतियों के लिए ‘लेबल प्लेन फील्ड’ उपलब्ध कराए गए। लेकिन ऐसे समाज जिसके पास हजारों वर्षों से न जमीन है, न पूंजी है, न शिक्षा है, और जो उसकी स्किल थीं, जिनके आधार पर उसका जातियों में विभाजन हुआ था, वे भी भूमंडलीकरण के चक्कर में बेकार हो गईं। ‘लेबल प्लेन फील्ड’ की जरूरत सही मायने में इन्हीं लोगों को थी। मगर उसे उपेक्षित रखा गया।

उस सभा में मैंने मांग की थी कि आप उस समाज के लिए भी ‘लेबल प्लेन फील्ड’ पैदा कीजिए, जो हजारों वर्षों से अपने श्रम-कौशल पर जीता आया है। कैसे? तब मैंने बताया था – बालक का 90 प्रतिशत विकास मां के गर्भ में होता है। उसके लिए मां को चाहिए पौष्टिक आहार-प्रोटीन। दूसरा था – स्कूली शिक्षा का राष्ट्रीयकरण। तीसरा मैंने कहा था – उच्च शिक्षा में सुधार करिए। और उसके 18 वर्षों के बाद आप आरक्षण को प्रतिवर्ष दो-दो प्रतिशत कम करते हुए, अंतर्जातीय विवाह से उत्पन्न जो बच्चे हैं, उन्हें आप सरकारी नौकरियों में आरक्षण दीजिए। अगर ऐसा हुआ तो 5000 साल से चला आ रहा जाति-व्यवस्था का कोढ, 30 साल में समाप्त हो जाएगा।

पर इसके लिए राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक प्रतिबद्धता होनी चाहिए। मुझे उम्मीद है कि अब यह प्रतिबद्धता आएगी। क्योंकि अब से पहले दलितों की आवाज को स्वर देने के लिए कोई मीडिया सामने नहीं था। आज वह मीडिया सामने है— वह है सोशल मीडिया। हालांकि उसपर भी अभी खास वर्गों का दबदबा है। निर्भया कांड जब हुआ था, तो पूरे देश में हलचल मच गई थी।  उसके बाद तीन ऐसे कांड हुए जिनमें दलित बालिकाओं के साथ उतनी ही वीभत्सता के साथ बलात्कार किया गया था। परंतु उसके विरुद्ध कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं हुई। क्यों? क्योंकि एक उदासीनता हमारे खुद के समाज में घर कर गई है। हम खुद जातियों-उपजातियों में बंट गए हैं। इसलिए अपनी बेहतरी के लिए हमें खुद प्रयास करने होंने। शुरुआत अपने घर से करनी होगी। उसके लिए रोटी-बेटी का रिश्ता शुरू करिए। पहले अपने समाज में एकता लाइए। तभी तो हम आगे बढ़ेंगे।

एक छोटी सी कविता याद आती है। कवि का नाम है-पाश। पाश क्रांतिकारी कवि थे। उनकी 23 मार्च 1988 को आतंकवादियों ने पंजाब में हत्या कर दी थी। उसके 57 वर्ष पहले 23 मार्च को ही भगत सिंह की भी शहादत हुई थी। पाश की कविता का शीर्षक है-‘बीच का रास्ता नहीं होता।’ महात्मा बुद्ध ने तो कहा था – ‘मध्यम मार्ग ही सर्वोत्तम है।’ पर जब ऐसी स्थिति आ जाए, विकट स्थिति जब जीवन-मरण का सवाल हो—वहां पर बीच का रास्ता नहीं होता। उन्होंने लिखा था –

सबसे खतरनाक होता है

मुर्दा शांति से मर जाना।

न होना तड़फ का, सब सहन कर लेना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर आना

सबसे खतरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना।

मेरी आपसे यही गुजारिश है कि सपनों को मरने मत दीजिए।

(प्रस्तुत आलेख 14 अप्रैल 2016 को तालकटोरा स्टेडियम में दिल्ली सरकार के कार्यक्रम में दिए गए भाषण पर आधारित है। पूरा भाषण आप यहां देख सकते हैं)


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  1. Rao Marx Reply

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