दलित राजनीति के सावधान होने का संकेत है राष्ट्रपति के लिए दलित उम्मीदवारी

बाबा साहब ने वर्ष 1924 में बम्बई में हितकारिणी सभा में संबोधन के साथ देश में अपने दलित आंदोलन का आगाज किया था। करीब 93 वर्षों के बाद मौका आया है जब देश के सर्वोच्च पद के लिए संघी सामंत और कथित तौर पर उदार सामंत दोनों ने अपना-अपना दलित उम्मीदवार बनाया है। लेकिन क्या यह सब वैसा ही है जैसा आंबेडकर चाहते थे या यह कोई साजिश है उस आंदोलन को भटकाने की। विश्लेषण कर रहे हैं संजीव चन्दन

राष्ट्रपति चुनाव के लिए दो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो ने ही दलित उम्मीदवार की दुन्दुभी बजाई है। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने जहां कोरी जाति से आने वाले बिहार के पूर्व राज्यपाल रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार बनाया तो

कांग्रेसनीत यूपीए और वामपंथी दलों ने बनाया है मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने संख्या और सत्ता में भागीदारी के लिहाज से दलितों में सबसे बड़ी और प्रभावी जाति से आने वाली पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवनराम की बेटी और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया। यानी यह लड़ाई अंततः दलित बनाम-दलित की हो गई। दोनो प्रभावशाली राजनीतिक गठबन्धनों ने, जिनसे वर्तमान राजनीति का पक्ष-विपक्ष बनता है अचानक से दलित-बिसात की राजनीति शुरू नहीं की है। एक ओर रोहित वेमुला की सांस्थानिक ह्त्या, ऊना-सहारनपुर जैसी घटनाएं हैं, दलितों का प्रतिरोध है, सत्ता की चालबाजियां हैं, वहीं राजनीतिक ताकतें राष्ट्रपति चुनाव का शतरंज दलित बिसात पर खेल रही हैं।

तुष्टिकरण की ऐतिहासिकता

एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद

दलित प्रतिनिधित्व के प्रतीक का एक निहितार्थ है कि दलित एक वोट बैंक के रूप में,राजनीति में प्रभाव के रूप में एक बड़ी ताकत हैं, जिन्हें संतुष्ट करने की कोशिश सत्ता कर रही है। लेकिन इसका दूसरा निहितार्थ भी है और यहीं से दलित राजनीति को सावधान और सचेत हो जाना चाहिए। याद करिये राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एजेंडे में दलित मुद्दे कब से आने शुरू हुए। तबसे जब डा. बाबा साहेब अम्बेडकर की स्पष्ट धमक भारतीय राजनीति में सुनाई पड़ने लगी। मुद्दों को कांग्रेस के दायरे में घेर लाने में दक्ष महात्मा गांधी ने डा. अम्बेडकर के मनुस्मृति दहन, पृथक निर्वाचन क्षेत्र के आंदोलनों और मांगों के बाद दलित मुद्दों को अपने समाज सुधार आंदोलन का हिस्सा बना लिया। अपने द्वारा संपादित अखबार का नाम भी  ‘हरिजन’ कर लिया। एक ओर डा. अम्बेडकर की वर्णाश्रम और जाति उन्मूलन की राजनीति थी तो दूसरी और महात्मा गांधी जी वर्णाश्रम समर्थक लेकिन घोषित रूप से जाति विरोधी सामाजिक आंदोलन था। यह डा. अम्बेडकर के प्रत्युत्तर में शुरू की गई पहली तुष्टिकरण की राजनीति थी। हितों के अंतर 1932 में गांधी जी के जिद्दी अनशन और पूना पैक्ट में देखे जा सकते हैं। डा. अम्बेडकर को पृथक निर्वाचन की अपनी मांग छोडनी पडी और आरक्षण फ़ॉर्मूले पर समझौता हुआ। इसके बाद से तुष्टिकरण के प्रयास में और तेजी आई। बाबू जगजीवन राम डा. अम्बेडकर की राजनीति के बरक्स कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति के पहले हथियार बने, जिन्होंने भारतीय राजनीति में लम्बी पारी भी खेली। 1936 में एक दलित -आबादी वाले गाँव के बगल में महात्मा गांधी द्वारा बनाया गया सेवाग्राम आश्रम ‘हरिजनोद्धार’ के प्रयोगों का केंद्र भी बना ।

डा. अम्बेडकर सत्ता और समाज में दलितों की स्पष्ट और हस्तक्षेपकारी भागीदारी के पक्ष में थे, न कि प्रतीक के तौर पर। धीरे-धीरे डा. अम्बेडकर की राह सपष्ट रूप से अलग हो गई, परिणति बौद्ध धर्म के रूप में धर्म परिवर्तन के रूप में हुई, यहाँ दलित खुद को धर्म-संस्कृति के स्तर पर खुदमुख्तार महसूस करने लगे, किसी के वरदहस्त से मुक्त।  डा. अम्बेडकर की इस राह को राजनीतिक रूप से अनूदित करने का काम कांशीराम जी ने किया। देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से अति महत्वपूर्ण राज्य उत्तरप्रदेश में अपने बल पर दलित-राजनीति को उन्होंने खडा किया, वहाँ सच्चे अर्थों में दलित-सत्ता कायम हुई। परिणाम तुष्टिकरण की नीति बदल गई थी।

क्या हम तुष्टिकरण के दौर में वापस हो रहे हैं?

पूना पैक्ट(1932) के बाद बाबा साहब डा भीम राव आंबेडकर

उत्तरप्रदेश में सामाजिक समीकरण के नाम पर सत्ता के शीर्ष पर बैठी दलित बेटी ने ब्राहमणों को प्रतीक तौर पर तुष्ट करने की कोशिश शुरू की थी। ब्राह्मण चेहरे ढूंढें गये। राजनीति पर पकड़ का ही आत्मविश्वास है कि महाराष्ट्र के कद्दावर दलित नेता और सामाजिक न्याय मंत्रालय में राज्यमंत्री रामदास अठावले ब्राहमणों के लिए तीन प्रतिशत आरक्षण देने का फ़ॉर्मूला देते हुए नजर आते रहे हैं। तुष्टिकरण उनका किया जाता है, जिनका लोकतंत्र में वोट का महत्व तो है लेकिन सत्ता में वे निर्णायक नहीं हैं या नहीं रह गये हैं। तो क्या दलित-तुष्टिकरण के दौर की फिर से शुरुआत हो गई है, क्या फिर से दलित वोट बैंक भर बनाये जा रहे हैं और चातुर्वर्ण तथा वर्णाश्रम में यकीन करने वाली ताकतें सता को अपने कब्जे में ले चुकी है। उत्तर हाँ है, और ऐसा होता है तो ये वर्चस्वशाली जमातें आमूल-चूल परिवर्तन को रोकने के लिए अपने-अपने चेहरे आगे लेकर आती हैं। यदि दलितों का दमन हो रहा है, सामाजिक- सांस्कृतिक शैक्षणिक संस्थानों से परिवर्तनकामी दलित बेदखल किये जाने लगे हैं तो वैसे चेहरे सत्ता की वकालत करने सामने लाये जाते हैं, जिन्हें एक सामाजिक वर्ग के रूप में तो चिह्नित किया जा सके लेकिन उनकी भूमिका वर्चस्वशाली सत्ता के पक्ष में ही हो। डा। बाबा साहेब अम्बेडकर को हराने वाले कांग्रेसी उम्मीदवार भी दलित ही थे और बिहार में उनपर पत्थरवाजी करवाने वाले लोगों का नेतृत्व भी दलित था। आज जब अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े है तो अपने पक्षकार के रूप में सत्ता अप्ल्संख्यक चेहरों को सामने बढाती है- शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी जैसे चेहरे।

भाजपाई तुष्टिकरण अधिक प्रतिगामी है

वर्ष 1972 में चेन्नई में के करुणानिधि के दूसरे बेटे एम के अलाग्री की शादी के मौके पर मिलते पेरियार और जगजीवन राम

ऐतिहासिक रूप से तुष्टिकरण का श्रेय कांग्रेस को जाता है, महात्मा गांधी को जाता जरूर है लेकिन आज दलित-तुष्टिकरण की जो राजनीति भाजपा कर रही है , उसकी तासीर दलित राजनीति के लिए ज्यादा खतरनाक है। भाजपा न सिर्फ सैद्धांतिक रूप से जाति-पोषक हिंदुत्व की राजनीतिक प्रतिनिधि है, बल्कि यह उन जमातों की राजनीतिक उत्तराधिकारी है, जो डा. अम्बेडकर के राजनीतिक लक्ष्यों के स्वभावतः विरोधी रहे। ये वो लोग हैं जो संविधान की जरूरत के बरक्स मनुस्मृति की पैरवी कर रहे थे। ये वे लोग हैं जो समाज में समता की जगह समरसता के प्रति सक्रिय हैं यानी ऐसी स्थिति के प्रति जिसमें लोग अपनी नियत स्थिति और हैसियत में संतुष्ट रहते हुए भाग्य, भगवान और सत्ता के प्रति समर्पित रहें- एक अनुकूलित समाज व्यवस्था की पैरोकार जमातों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व भाजपा की सच्चाई है। यही कारण है कि दलितों के भीतर सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक रूप से बदलाव की क्षमता रखने वाली जातियों के राजनीतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक नेतृत्व को यह हतोत्साहित करने में लगी है और कम प्रभाव वाली दलित जातियों के नेतृत्व को अवसर मुहैय्या कराने का छद्म रच रही है। ऐसा भाजपा-संघ ने न सिर्फ दलित जातियों के मामले में किया है, बल्कि मंडल के बरक्स उग्र हिंदुत्व को नेतृत्व देने वाले चेहरे भी इसने समय-समय पर ओबीसी जातियों के बीच से खड़े किये हैं। इस राजनीति को सर्वसमावेशी की जगह सर्वग्रासी कहा जा सकता है। दलित प्रतिनिधित्व का प्रतीक खडा होते देख यह जश्न मनाने से ज्यादा चौकन्ने होने का समय है। यह ज्यादा जटिल समय है दलित-राजनीति के विरुद्ध।


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