लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण है मीरा की दावेदारी

राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव गुप्त मतदान के जरिए कराये जाते हैं और विचारधारा से हटकर भी खूब मतदान होते रहे हैं। दिलचस्प उदाहरण वर्ष 2012 में हुआ चुनाव है। जब एनडीए के कई घटक दलों ने भी अपना वोट कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को दिया था…

देश के 15वें राष्ट्रपति पद के लिए चुनावी महासंग्राम का आगाज हो चुका है। पिछले 19 जून को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा कोली(दलित) समुदाय से आने वाले रामनाथ कोविन्द को उम्मीदवार बनाये जाने के बाद यह लगने लगा

राष्ट्रपति पद के लिए 23 जून 2017 को नामांकन पत्र दाखिल करते एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविन्द व साथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह

था कि विपक्ष चुनाव के पहले ही वाक ओवर दे देगा। यह संभावना तब और बढ गई जब 21 जून को बिहार के मुख्यमंत्री व जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविन्द को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। लेकिन यह इस लड़ाई का मध्यांतर के पहले की पटकथा साबित हुई।

22 जून को कांग्रेस के नेतृत्व में कुल 17 पार्टियों ने लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित किया। रविदास जाति की मीरा कुमार की उम्मीदवारी ने राष्ट्राध्यक्ष के लिये होने वाले चुनाव को नया आयाम दिया। बताते चलें कि मतदान 17 जुलाई को होंगे और मतों की गिनती 20 जुलाई को होगी। उल्लेखनीय है कि आगामी 24 जुलाई को 14वें राष्ट्रपति के रुप में प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।

मीरा कुमार की उम्मीदवारी के बाद सोशल मीडिया और यहां तक कि कथित तौर पर मुख्य धारा की मीडिया में यह बात फ़ैलायी जा रही है कि कांग्रेस व विपक्ष ने उन्हें हारने के लिए अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके संबंध में चुनाव के पहले ही वोटों की गिनती भी परोसी जा रही है। मानों इस चु्नाव का कोई महत्व ही न हो। लेकिन जरा ठहरिए। लोकतांत्रिक राजनीति कभी बांझ नहीं होती है। यह बात उस वक्त भी साबित हुई थी जब 14वें राष्ट्रपति के लिए वर्ष 2012 में चुनाव हो रहे थे। तब कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की ओर से प्रणब मुखर्जी उम्मीदवार थे और उनके सामने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी ए संगमा (जन्म 1 सितंबर 1947, मृत्यु 4 मार्च 2016) थे।

22 जून 2017 को नई दिल्ली में विपक्ष की बैठक के बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मीरा कुमार को उम्मीदवार के रुप में घोषित किया

देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि आदिवासी (गारो) समुदाय से आने वाले एक नेता को ब्राह्म्ण के मुकाबले हिन्दुत्व का राग अलापने वाली पार्टी भाजपा ने अपना समर्थन दिया। महत्वपूर्ण यह कि तब बिहार में एनडीए सत्ता में थी और नीतीश कुमार वहां के मुख्यमंत्री होने के बावजूद आदिवासी पी ए संगमा के साथ खड़े न होकर प्रणब मुखर्जी को अपनी पार्टी का समर्थन दिया था।

हालांकि यह पूरी तरह से एकतरफ़ा लड़ाई थी। लेकिन राजनीतिक लड़ाई हुई और परिणाम यह हुआ कि प्रणब मुखर्जी को 7,13,763 और एनडीए उम्मीदवार पीए संगमा को 3,15,987 मत मिले। वैसे यह इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए कि बाबासाहब डा भीम राव आंबेडकर द्वारा रचित संविधान के सहारे आजादी के साढे छह दशक के बाद देश के एक आदिवासी ने डटकर मुकाबला किया।

इस बार की दास्तान दूसरी है और देश में दलित-पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी इस स्तर तक पहुंच गयी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने दलित उम्मीदवार मैदान में उतारा है। सबकुछ मध्यांतर के बाद गोल पोस्ट बदलने के जैसा है। इस बार एनडीए पूरी मजबूती के साथ रामनाथ कोविन्द के पक्ष में है तो कांग्रेस व अन्य विपक्षी कमजोर हैं। मसलन लोक सभा में कुल 543 सदस्य हैं और इनमें 338 सदस्य एनडीए के हैं। जबकि राज्यसभा में कुल 245 सदस्य हैं, लेकिन एनडीए के सदस्यों की वर्तमान संख्या 74 है।

असल में राष्ट्रपति के लिए होने वाले चुनाव में वोटों के महत्व का अपना अंकगणित है। इसकी व्यवस्था संविधान की धारा 55(2) में की गयी है। हालांकि वर्ष 2002 में संविधान के 84वें संशोधन के बाद यह तय किया गया कि वोटों का महत्व 1971 में हुई जनगणना के परिणामों के सापेक्ष आकलित होगा। दिलचस्प यह कि यह व्यवस्था वर्ष 2026 तक लागू है। अब जरा इस अंक गणित को समझते हैं।

इसके मुताबिक एक विधायक के वोट का मतलब संबंधित राज्य की कुल आबादी और राज्य में निर्वाचित कुल विधायकों की संख्या के भागफ़ल के बराबर होता है। जबकि एक सांसद के वोट का महत्व संख्यात्मक रुप से उसके संसदीय क्षेत्र के तहत सभी विधानसभा क्षेत्रों के विधायकों के वोटों के कुल योग व लोकसभा और राज्यसभा में कुल सदस्यों की संख्या के भागफ़ल के बराबर होता है। इस प्रकार लोकसभा के सभी 543 सांसदों के वोटों का महत्व 3,84,444 और राज्य सभा के सांसदों का 1,64,964 है। दोनों को मिलाकर यह संख्यात्मक महत्व 5,49,408 जबकि एक सांसद के वोट का औसतन महत्व 708 है। जबकि देश में कुल 4120 विधायक वोटों का महत्व 5,49,495 है।

लोकसभा के भूतपूर्व अध्यक्ष पी ए संगमा थे राष्ट्रपति पद के लिए देश के पहले आदिवासी उम्मीदवार

बहरहाल इस बार के चुनावी संग्राम में वोटों के संख्यात्मक महत्व से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव होंगे। 1977 के बाद कांग्रेस दूसरी बार अपने न्यूनतम स्वरुप में है जबकि एनडीए सबसे मजबूत स्थिति में। लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष का अपना महत्व होता है और राष्ट्रपति के लिए होने वाला यह चुनाव इस तथ्य को फ़िर से स्थापित तो करेगा ही, साथ ही नयी राजनीतिक समीकरण भी बनायेगा। यह और दिलचस्प होगा जब हार और जीत का अंतर पिछली बार यानी वर्ष 2012 की तुलना में मामूली साबित हो। वैसे इस बार अंतर के न्यून होने की पूरी संभावना है। वजह यह कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव गुप्त मतदान के जरिए कराये जाते हैं और गठबंधन धर्म की लाइन से हटकर भी खूब मतदान होते रहे हैं। दिलचस्प उदाहरण वर्ष 2012 में हुआ चुनाव है। जब एनडीए के कई दलों ने अपना वोट कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को दिया था। यदि ऐसा नहीं होता तो उन्हें अधिकतम सवा छह लाख वोट ही हासिल होते जबकि उन्हें 7,13,763 वोट हासिल हुए थे।


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