बहुजन साहित्य : संघर्षमय अतीत और भविष्य

बहुजन साहित्य का अपना समृद्ध इतिहास रहा है। उसमें चार्वाक, बुद्ध, संत परंपरा के संतों ने काफी मात्रा में साहित्य का निर्माण किया। संत नामदेव, संत गाडगे महाराज, संत सावता, संत चोखोबा, संत तुकाराम की इस संत परंपरा ने मौलिक काम किया है। श्रवण देवरे का भाषण :

महाराष्ट्र के एक सुदूर इलाके गडचिरोली में 5 एवं 6 दिसंबर 2009 को बहुजन साहित्य सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस आयोजन की पूर्वपीठिका दरअसल 16-17 फरवरी, 2008 को नासिक में हुए ओबीसी साहित्‍य सम्‍मेलन में बनी थी। यहां हम बहुजन साहित्य सम्मेलन में मराठी लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता श्रवण देवरे के अध्यक्षीय संबोधन का संपादित अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। यह भाषण मुद्रित रूप में श्रोताओं को वितरित भी किया गया था। – संपादक

मानवीय जीवन के हजारों वर्षों की यात्रा में साहित्य का क्या स्थान है, यह प्रश्न समय-समय पर उपस्थित होता रहता है। साहित्य का संबंध मैं सर्जनशील विचार प्रक्रिया से जोड़ता हूँ। आदिम अवस्था में अन्य जंगली पशुओं से अलग होने की प्रक्रिया मानव की विचार प्रक्रिया से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है। यह विचार प्रक्रिया वह अपनी जरूरत के लिए खोज रहे विकासशील उत्पादन के साधनों से जुड़ी हुई है। भौतिक विश्व और उसके दिमाग का विश्व इनके विधायक समागम की संतान यानी साहित्य! और इसीलिए साहित्य मात्र विशिष्ट कालखंड के समाज जीवन का प्रतिबिंब नहीं होता तो वह कुल मिलाकर विकासशील विचार विश्व का चलता-फिरता चित्र भी होता है। साहित्यिक और उसके साहित्य के पात्रों की ज्ञानपूर्वक हो रही हलचलों में उनकी अंतश्चेतना कैसे कार्य करती है, इसे हम खोज सके तो हम जिस साहित्य को पढ़ रहे हैं वह हमें परिवर्तन की प्रेरणा दिए बिना नहीं रहता।

बहुजनों के आदर्श : जोतीराव फुले, छत्रपति शाहू जी महाराज और बी. आर. आंबेडकर

हमारे देश में रामायण नाम के अनेक अलग-अलग ग्रंथ और उस पर आधारित रचनाओं को सैंकडों वर्षों से पढ़ा, देखा और सुना जा रहा है। उसमें से जो (कु) प्रबोधन का चित्र भारतीय जनमानस में निर्माण हुआ वह वर्ण-जाति समर्थक था, किंतु तात्यासाहब महात्मा जोतीराव फुले, बाबासाहब डॉ. आंबेडकर और शरद् पाटिल जैसे द्रष्टा दार्शनिकों ने जब उसे पढ़ा तब उन्हें उसमें वर्ण-जाति-नारी दास्य विरोधी संघर्ष की, त्राटका-शूर्पणखा-सीता-शंबूक की गौरवशाली परंपरा दिखाई दी। यह उनके द्वारा आरंभ की गई सम्यक् क्रांति की लड़ाई को प्रेरणा देनेवाला साहित्य सिद्ध हुआ। आज हम यही रामायण ‘शंबुकायण’ या ‘सीतायण’ के रूप में लिख सकते हैं। त्राटिका की हत्या करते समय राम की पुरुषसत्तात्मक चेतना काम कर रही थी, किंतु हत्या करने से पहले उसका मन विचलित हुआ तब उसकी स्त्रीसत्तात्मक ‘अंत:चेतना’ काम कर रही थी। स्त्रीसत्तात्मक समाज-व्यवस्था की नीति बताती है कि स्त्री-हत्या घोर पाप होता है। जबकि पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था बताती है कि इस व्यवस्था में बाधा बनने वाली रानियों का वध करना पुण्य है। रामायण यह कृति इस प्रकार की दो समाज-व्यवस्थाओं के उगम-अंत की सीमा पर का साहित्य है। वही बात सीता-शंबूक की!

भौतिक विश्व और मनुष्य के दिमाग की चेतना-अंतश्चेतना के सकारात्मक संघर्षमय-समागम से सर्जक साहित्य निर्मिति होती रहती है। उसकी समीक्षा करते समय इसका ध्यान रखा जाए तो उसमें से नए समाज के निर्माण की प्रेरणा प्राप्त हो सकती है। यह अंत:चेतना क्या है इसे थोड़े विस्तार से समझ लेना चाहिए।

बहुजन समाज का चित्रांकन (साभार डा. लाल रत्नाकर)

कॉ. शरद पाटिल ने 1988 में प्रकाशित अपनी किताब  ‘अब्राह्मणी साहित्यांचे सौंदर्यशास्त्र’ में अंत:चेतना के बारे में लिखा था कि-‘‘अंत:चेतना ऐसे पूर्व संस्कार होते हैं जिसकी उत्पत्ति न साहित्यकार को पता होती है न उसके द्वारा निर्मित साहित्य के पात्रों को। इसका उदाहरण देना हो तो वैशाली की बुद्धकालीन गणिका अाम्रपाली का दे सकते हैं। वह ‘उत्तमा वेश्या’ थी यह तत्कालीन समझ; किंतु उस पर वैशाली का विकास निर्भर था, उसके लिच्छवी ‘स्वामी’ उसे ‘अंब’ या माता कहते थे। ‘अंब+पाली’ का मूल अर्थ मातृदेवता की पुजारिन होता है। और गणिका शब्द का भी मूल अर्थ गण की प्रमुख होता है। ये अंत:चेतना में दर्ज है। —त्रिपिटक असामान्य लोकसाहित्य है, मात्र धर्मग्रंथ नहीं है।-”

आज बहुजन-ओबीसी में टके के तीन साहित्यकार हैं, किंतु उन्हें नहीं लगता कि बलिराजा पर चार पंक्तियाँ भी लिखें! इसका कारण यह है कि बहुजन साहित्यकारों की साहित्य कृति सिर्फ चेतना पर आधारित है। मनुष्य की कोई भी कृति जान-बूझकर होती हो तब भी अंतश्चेतना की प्रेरणा से भी वह अनजाने में ही कुछ कृतियाँ करता है! पठन, लेखन और बोधन या कृति जान-बूझकर होती है। जाति-व्यवस्था द्वारा उस पर पाबंदी लगाने के बावजूद भी ग्रामीण बहुजन साहित्यकारों ने बलीराजा की कथाएँ रची, मातृदेवता के गीत गाए। ये साहित्य कृतियाँ अंतश्चेतना से आई हैं। मनुष्य के मन में (बुद्धि में) चेतना और अंतश्चेतना यह दो खाने होते हैं। इसकी खोज फ्रायड नामक मनोवैज्ञानिक ने की; किंतु टाईनबी और दैसाकू इकेडा इन दो वैज्ञानिकों ने इस खोज का श्रेय बौद्ध दर्शन को दिया है। तत्कालीन बौद्ध दार्शनिक और साहित्यिक वसुबंधू, दिग्नाग तथा धर्मकीर्ति ने चेतना एवं अंतश्चेतना इन दोनों ज्ञानसाधनों का उपयोग करते हुए नया साहित्यशास्त्र और नया सौंदर्यशास्त्र निर्माण किया। इस कारण तत्कालीन बौद्ध साहित्य क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। इस क्रांतिकारी साहित्य के प्रबोधन से ही जनता की क्रांतिकारी मानसिकता गढ़ी गई और इस प्रबोधित जनता ने वर्णव्यवस्था नष्ट करने वाली अहिंसक क्रांति की, जो अखंड रूप से 700 वर्षों तक विकसित होती गई।

मार्क्स और फुले-आंबेडकर का ऐतिहासिक भौतिकवाद

भारत में बौद्ध धम्म के निर्गमन से जाति संस्था प्रवाहमान न रहते हुए कुंठित होती गई। सामान्य जनता का शिक्षा से और अंततः सर्जनशील विचार प्रक्रिया से संबंध जबरदस्ती तोड़ा गया। ऐसे समाज से जो विद्रोह उभरकर आए वे आध्यात्मिक (संत परंपरा) या राजनीतिक क्षेत्र में (छत्रपति शिवाजी-संभाजी तक) सीमित रहे और असफल रहे। जाति-अंत का आक्रामक और निर्णायक पर्व आरंभ होने के लिए फुले-आंबेडकर युग को अवतरित होना पड़ा। ब्रिटिशों के आगमन से जाति संस्था मामूली रूप से प्रवाही बनी और जनता में जैसे-जैसे शिक्षा की मात्रा बढ़ती गई वैसे-वैसे यह आक्रमण प्रगल्भ होता गया। किंतु बाद में यह आक्रमण कैसे रोका गया और उससे साहित्य का क्या संबंध था, इसका जवाब खोजने में हमें साहित्य की क्रांतिकारी और प्रतिक्रांतिकारी भूमिका का परिचय हो सकता है!

लड़ाई चाहे भूगोल परिवर्तन की हो या समाज परिवर्तन की, उसे ऐतिहासिक प्रेरणाओं की आवश्यकता होती है। ‘सेना पेट के बल चलती है’ ऐसा चाहे कहा गया हो तब भी सेना को पेट के लिए भोजन के साथ मानसिक ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है। ‘हर हर महादेव’, ‘जय भवानी जय शिवाजी’, ‘या अली’, ‘दिन् दिन्’ या ‘अल्लाह हो अकबर’ की युद्ध से पूर्व की जाने वली गर्जनाएँ सेना के मानसिक आत्मविश्वास को बढ़ावा देने के लिए हैं। यह मानसिक ऊर्जा उसे उसके गौरवशाली इतिहास से प्राप्त होती रहती है। विदेशी समझे जाने वाले मुसलमान और ब्रिटिश आक्रमणकारियों को इस देश में भौगोलिक राज्य स्थापित करना था; किंतु मुसलमान राज्यों की ओर से और अंग्रेज साम्राज्यवादियों की ओर से भारतीय शूद्रातिशूद्र जनता लड़ी- भौगोलिक परिवर्तन के लिए नहीं तो समाज परिवर्तन के लिए! यह सेना सिर्फ पेट की खातिर नहीं लड़ रही थी तो ब्राह्मणवादी धर्म के अन्याय से मुक्ति पाने के लिए! पेशवा के सैंकड़ों सैनिकों को अंग्रेजों की मुट्ठीभर महार पलटन ने धूल चटाई तो क्या सिर्फ पेट के लिए? इस लड़ाई में कौन-सी प्रेरणा कार्य कर रही थी? यही बात समाज परिवर्तन की लड़ाई पर भी लागू होती है। फुले-आंबेडकर ने उसके लिए इतिहास की पुनर्स्थापना की। आर्थिक शोषण का रहस्य सुलझाने वाला मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद और सामाजिक शोषण की ब्राह्मणवादी कला खोल कर दिखानेवाला फुले-आंबेडकर का ऐतिहासिक भौतिकवाद इसमें प्रादेशिक अंतर छोड़कर कोई भी अंतर नहीं है। जाति-अंत की लड़ाई को प्रेरणा प्राप्त हो इसलिए तात्यासाहब महात्मा जोतिराव ने बलीराजा और शिवाजी राजा यह समता के प्रतीक दिए; तो डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने शंबूक बताया। फुले-आंबेडकर के साहित्य का निर्माण ऐसे प्रतीकों के इर्दगिर्द घूमता रहता है। इसी साहित्य में से समकालीन आंदोलनों ने प्रेरणा ग्रहण कर जाति-अंत की दिशा में मार्गक्रमण किया; किंतु जाति-अंत वालों की छावनी की यह नीति देखकर ब्राह्मणवादी छावनी ने भी प्रतिक्रांति की नीति अपनाई। इन दो छावनियों में क्रांति-प्रतिक्रांति का युद्ध साहित्य की रणभूमि पर कैसे खेला गया इसे हम संक्षेप में देखेंगे!

लड़कियों को पढ़ाते जोती राव फुले व सावित्री बाई फुले : महाराष्ट्र के फुलेवाड़ा में जोती राव फुले के घर में बने संग्रहालय में संरक्षित एक चित्र (एफपी ऑन द रोड, 2017)

तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले ने छत्रपति शिवराय का प्रतीक ‘कुलवाडी कुलभूषण’ छत्रपति के रूप में खड़ा किया। इसका अर्थ है कि शिवाजी राजा बहुजनों का, शूद्रातिशूद्रों का राजा था और वह समतावादी राजा था। समानता की यह प्रेरणा सामान्य जनों तक पहुँचाने के लिए तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले जी ने प्रदीर्घ पोवाडा (वीरगाथात्मक काव्य) लिखा। इस पोवाडे का आधार ग्रहण कर बाद के सत्यशोधकों को बड़े पैमाने पर साहित्य का निर्माण करना संभव हुआ। इस साहित्य के माध्यम से जनता का जो प्रबोधन हुआ होता उसके परिणामस्वरूप जाति-अंत की छावनी में अधिकाधिक शूद्रों की भरती हो कर जाति-अंत की लड़ाई को व्यापक और आक्रामक किया जा सकता था, किंतु इसे मात देने के लिए ब्राह्णवादी छावनी ने भी अपनी कमर कस ली। इस छावनी के ब्राह्मण शोधकर्ताओं ने सर्वप्रथम छत्रपति शिवराय बहुजनों के नहीं तो ‘गोब्राह्मण प्रतिपालक’ होने के (असत्य) प्रमाण इतिहास में बोए हैं। और इन असत्य प्रमाणों के आधार पर उन्होंने ढेर सारे साहित्य का निर्माण किया। इतिहासाचार्य (?) वि. का. राजवाडे, बाळशास्त्री हरदास, श्री.ना. बनहट्टी, वि.दा. सावरकर, चंद्रशेखर आठल्ये, दत्तात्रेय विष्णु आपटे, वसंत कानेटकर, रणजित देसाई, भालजी पेंढारकर, बाबा पुरंदरे आदि ब्राह्मण साहित्यकारों की फौज इस काम में जानबूझकर जोती गई। उन्होंने पोवाडे, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, सिनेमा, लेख, वैचारिक ग्रंथ आदि साहित्य का भंडार खोल दिया। इस साहित्य ने सामान्य जनों को जकड़ लिया। परिणामस्वरूप जो शूद्र सत्यशोधकों के साथ दिखाई देने चाहिए थे वे ब्राह्मणों की छावनी में दिखाई देने लगे।

वही बात बलीराजा की। तात्यासाहब ने बलीराजा का प्रतीक खड़ा कर शूद्र किसानों को संगठित करने का प्रयास किया; किंतु बलीराजा को पुनः दफनाने के लिए ब्राह्मणी छावनी ने ‘गणपति’ को आगे लाया। आज महाराष्ट्र में ही नहीं तो संपूर्ण देश के किसान भाद्रपद माह में गणपति उत्सव मनाते हैं, बलीराजा का (भालदेव) का उत्सव नहीं। अपने सामाजिक और आर्थिक शोषण के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देनेवाला बलीराजा का गौरवशाली इतिहास किसान भूल गया इसलिए युद्ध से पहले ही वह आत्महत्या कर गुजरता है। शत्रु को प्रेरणाहीन बनाने पर वह शरणार्थी का जीवन जीता है। और जिस दिन यह शरणार्थी जीवन असह्य हो जाता है उस दिन वह आत्महत्या कर मुक्ति प्राप्त करता है। पिछले 10 वर्षों में जिन 15 हजार किसानों ने आत्महत्याएँ की वे किसान सम्यक् क्रांति के अग्रदूत क्यों नहीं बन सके? सेठों, भटों और लाटों के विरोधी सत्यशोधक आंदोलन में वे क्यों नहीं उतरे? उनका नेतृत्व करने के लिए (लाल) किसान सभा, शेकाप, लानिप आदि क्रांतिकारी संगठन अपने झंडे गाड़ कर उनके आने की राह देखते रहे, उस समय इन किसानों ने उनकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखा, उसकी बजाय उन्होंने मुक्ति की मयसभा खड़ी करने वाले शरद जोशी आदि की राह क्यों चुनी?

शरद जोशी, दत्ता सामंत, बाळ ठाकरे, राज ठाकरे ये लोग अचानक जनता के नेता कैसे बन जाते हैं? और जिंदगी दाँव पर लगाकर श्रमिकों की लड़ाई लड़ने वाले डांगे, रणदिवे, रांगणेकर, परुळेकर, गायकवाड आदि के तंबू क्यों खाली हो जाते हैं। इस सारे षड्यंत्र के पीछे बनिया पूँजीवादियों का पैसा, मीडिया में बैठे ब्राह्मणों की बुद्धि और उनको राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करने वाले सत्ता में बैठे प्रस्थापित मराठा, इस त्रयी का गठबंधन होता है, यह सच हो फिर भी यह षड्यंत्र रातोरात कैसे सफलता प्राप्त करता है, इसका विचार नहीं किया जाता। बीज बोने पर वह एक दिन में उगता है; लेकिन उसके लिए बीजे बोने से पहले जमीन को तैयार करना आवश्यक होता है। जनता के मन की जमीन को साहित्य के औजारों से और उनसे जुड़े विचार-दर्शन के हल-फाल से तैयार किया जाता है। बनियों का पैसा और राजनेताओं का संरक्षण इसके सहयोग से ब्राह्मणवादी विचारों का जहरीला खाद-पानी दिया जाता है। साहित्य के द्वारा की जा रही सामान्य जनों की यह जमीन अखंड रूप से और लगातार रात-दिन तैयार की जाती है। इसलिए ऐसी जमीन में बोए गए जोशी-सामंत-ठाकरे जैसे लोग रातोंरात नेता बन जाते हैं। जिस जमीन में धर्म, भाषा, प्रांत और जाति-वर्चस्व की ब्राह्मणी जहरीली खाद मिली होगी उस जमीन में श्रमिकों का सच्चा नेतृत्व उगना दूर की बात है, अंकुरना भी असंभव! और इन सब बातों पर मात कर मान्यवर कांशीराम जैसा कोई नेतृत्व उग आया तो उसे उसके ही मायावती जैसे अनुयायियों द्वारा कैसे काटना है, इसकी व्यवस्था इन प्रस्थापितों ने पहले ही कर रखी होती है।

बुद्धिजीवियों पर है बड़ी जिम्मेवारी

अब हम अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु की ओर आएँगे! ‘गोब्राह्मण प्रतिपालक’ जैसे असत्य इतिहास पर और धर्म-भाषा जैसे झूठे बिंदुओं पर ढेर सारे साहित्य का निर्माण ब्राह्मणवादी छावनी के बुद्धिजीवी करते हैं और वे सफल भी हो जाते हैं। वर्ग, जाति, स्त्री-दास्य और उनके शोषण की दुःखदायक व्यथा का चित्रण करने वाले साहित्यकार होकर भी वे सफल क्यों नहीं होते। पुरोगामी कहलाने वाले साहित्यकार, विचारक का साहित्य शास्त्र, प्रमाण शास्त्र और उसपर आधारित सौंदर्यशास्त्र सीमित है और इसलिए वे भारतीय शोषण-शासन की बहुप्रवाही समाज व्यवस्था को अपने साहित्य और समीक्षा में चित्रित नहीं कर सकते। इसलिए अंतश्चेतना के स्तर का उनका आकलन भी भ्रमित करने वाला ही होता है। यह बुनियादी बिंदू होने पर भी आज उस पर अधिक न बोलते हुए उससे ही जुड़े एक उप-बिंदू पर हम चर्चा करने वाले हैं। ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों द्वारा बताए गए, लिखे हुए और दिखाए गए 100 प्रतिशत असत्य होने पर भी उस साहित्य को लोग स्वीकारते हैं, किंतु 80-90 प्रतिशत सच्चा साहित्य लोगों के मन को क्यों नहीं छूता? इसका उत्तर खोजते हुए हमने अभी देखा, कि ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों द्वारा सामान्य जनों की मानसिक जमीन को तैयार करना। किंतु यह एक कारण हुआ, वह इकलौता नहीं है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है, कि इस ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों को मात देने वाला बहुजन बुद्धिजीवी वर्ग कहाँ है और वह क्या कर रहा है?

महात्मा बुद्ध की एक पेंटिंग (साभार नीतिन सोनावाले)

पहली महत्वपूर्ण बात यह है, कि बहुजनों में बुद्धिजीवी वर्ग तैयार हुआ है, फिर भी वह अभी जाति-अंत के समान हितसंबंधों से जुड़ा नहीं है और इसलिए वह एकसूत्र नहीं है। वह प्रशिक्षित भी नहीं है। उसकी तुलना में ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवी वर्ग जाति-वर्ग व्यवस्था के दृढि़करण के हित संबंध से इतना बँधा हुआ है कि वह धर्म, पंथ, पक्ष, देश, प्रांत, भाषा ऐसे कितने ही टुकड़ों में बँटा हुआ होने के बावजूद भी सुसंगठित है। भारतीय जनता को किसी भी परिस्थिति में जाति-अंत की दिशा में एक कदम भी न उठा पाए इसलिए वह रात-दिन आँखों में तेल डाल कर पहरा देता रहता है। इसलिए वह जिन अलग-अलग धर्म, दर्शन, पक्ष, भाषा, प्रांत, देश आदि में है, उसका भी इस्तेमाल करता है। विश्व के स्तर पर क्रांतिकारी सिद्ध हुए मार्क्सवाद जैसे दर्शन का भी इस्तेमाल ब्राह्मण बुद्धिजीवी अपने हितसंबंधों के लिए कर सकता है। विविध धर्म, भाषा आदि का इस्तेमाल वह आसानी करता है। भारतीय जनतंत्र का एवं संविधान का जितना इस्तेमाल ब्राह्मण कर रहे हैं उसकाके एक प्रतिशत भी इस्तेमाल वाम दल और जागरूक दलित पुरोगामी नहीं कर सकते। यह मुट्ठीभर बुद्धिजीवी वर्ग इतना प्रभावी है, कि वह जो तय करता है वह दी गई समय सीमा में दूसरों से पूरा कर ही लेता है। फिर जातीय दंगे करवाने हो या बाबरी विध्वंस हो! गली से दिल्ली तक की निर्णय-प्रक्रिया उसके मूक इशारे चलती है। गलतियां उससे से भी होती हैं,किंतु हर गलती से सीख लेते हुए वह अपना विचार-व्यवहार प्रगल्भ और विकसित करता रहता है।

इस तुलना में बहुजन बुद्धिजीवियों की बात बिलकुल उल्टी है। वे जिस धर्म, पंथ, पक्ष, भाषा, देश, संस्कृति, दर्शन आदि से जुड़े हैं उन सबमें जाति-उन्मूलन की प्रेरणा होती है; किंतु सम्यक् दृष्टि एवं इच्छाशक्ति के अभाव में वे अपाहिज हो गए हैं। इसका एक ताज़ा उदाहरण दिया जाए तो आप समझ सकेंगे। जाति-उन्मूलन की लड़ाई के अग्रदूत दलित शक्ति हैं, ऐसा स्वयं बाबासाहेब ने कहा था और वह आज के संदर्भ में भी उतना ही सच है। इसलिए दलित बुद्धिजीवियों पर उन्होंने सौंपी हुई जिम्मेदारी अधिक गंभीरता से लेनी चाहिए। प्रातिनिधिक रूप में दलित बुद्धिजीवियों का जो संगठन अखिल भारतीय स्तर पर आज अस्तित्व में है, वह सरकारी कर्मचारी और अधिकारी वर्ग का होने पर भी सुसंगठित है। किंतु क्या पूरी तरह से शक्तिशाली है? ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवी वर्ग ने काँग्रेस, भाजपा सहित संसदीय मार्क्सवादी पक्ष-संगठनों को नियंत्रित किया हुआ है, तब क्या दलित बुद्धिजीवियों के नियंत्रण में आरपीआई, पैंथर, बसपा हैं? अर्थात् इसका उत्तर है- नहीं। भाजपा के जनाधार वाले पदाधिकारियों को हटाने की ताकत आरएसएस में है। इतना ही नहीं तो काँग्रेस के ओबीसी वादी अर्जुन सिंह, करकरे जी की हत्या का गुत्थी पार्लियामेंट में सुलझाने वाले अंतुले आदि को सत्ता से बाहर रखने का षड्यंत्र भी आरएसएस का ही था! दलित बुद्धिजीवियों का संगठन क्या कम-से-कम फुले-आंबेडकरवादी पक्ष-संगठनों का नियंत्रण कर सकता है? नहीं तो क्यों नहीं? और उसके लिए क्या करना होगा?

किसी भी सामाजिक क्रांति के या प्रतिक्रांति के शॉर्ट टर्म और लाँग टर्म – ऐसे दो कार्यक्रम होते हैं। आधुनिक जनतंत्र के समय में शॉर्ट टर्म कार्यक्रम राजनीतिक पक्ष-संगठनों को सौंपने चाहिए और लाँग टर्म प्रोग्रॅम बुद्धिजीवियों के विविध स्तर पर के संगठनों सौंपने होते हैं। शॉर्ट टर्म प्रोग्रॅाम याने प्रासंगिक आंदोलन। इसमें अन्याय-अत्याचारों के खिला़फ किए गए आंदोलन आते हैं। उसी प्रकार राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के लिए चुनाव आते हैं। कम से कम 51 प्रतिशत जनमत आपके पक्ष में हो तो आपके पक्ष-संगठन की सत्ता आ सकती है। यह 51 प्रतिशत जनमत तैयार करने का काम याने लाँग टर्म प्रोग्रॅाम है। इस लाँग टर्म प्रोग्रॅाम का कार्यान्वयन बुद्धिजीवी संगठनों का काम है। अपना दर्शन एवं विचार 51 प्रतिशत लोगों तक ले जाना, उनके मन पर अंकित करना, उसे संस्कार रूप में स्थापित करने का प्रयास करना और उसके लिए साहित्य आदि का हथियार के रूप में इस्तेमाल करना, ये हैं लाँग टर्म प्रोग्रॅाम!

हम यहां लाँग टर्म प्रोग्रॅाम ब्राह्मण बुद्धिजीवी किस प्रकार कार्यान्वित करते हैं, यह देखेंगे। बौद्ध क्रांति के स्वर्णकाल में भी ब्राह्मण खुलेआम जातिव्यवस्था का समर्थन करते थे और ब्राह्मण ही श्रेष्ठ हैं ऐसा दावा कर रहे थे; किंतु वे सत्ताहीन होने के कारण रक्षात्मक पैतरे में थे। वे उचित अवसर का इंतजार कर रहे थे। किंतु उनका प्रतिक्रांति का कुप्रबोधन अखंड रूप से जारी था। ब्राह्मण बुद्धिजीवी का कुप्रबोधन सामान्य जनों के मन की पकड़ ले रहा है ऐसा दिखाई देते ही पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध राजा बृहद्रथ की हत्या कर प्रतिक्रांति का आरंभ कर दिया। उसके बाद ब्राह्मणों ने अपनी जाति-वर्चस्व की कथाएँ, श्लोक, मंत्र आदि ढेर सारे साहित्य का निर्माण किया। इनको संस्कार रूप में मन पर अंकित करने की विधियां, कर्मकांड, उपवास आदि कार्यक्रम दिए। स्मृति, पुराण कथाओं का निर्माण इसी काल का है। बदलते समय में देवी-देवता बदले, उनकी नई-नई कथाएँ निर्माण की गई। उनके कालानुरूप विधि और कर्मकांड तैयार किए गए। पहले ब्रह्मा, विष्णु यह भगवान थे, बाद में उसमें भूतकालीन लोकप्रिय राम-कृष्ण को जोड़ दिया गया। उनकी दृष्टि से राम, कृष्ण, शिवाजी शूद्र ही थे! किंतु बहुजनों को मूर्ख बनाने के लिए और उनमें अहंकार उत्पन्न करने हेतु यह उनका महत्प्रयास! उनका यह प्रयास सफल होने का एकमात्र कारण याने उन्होंने मनुष्य के दिमाग की अंतश्चेतना का पहचाना हुआ महत्त्व! इसलिए उनके द्वारा निर्मित साहित्य (पौराणिक निरर्थक एवं तर्कहीन कथाएँ) बहुजनों के मन की थाह ले सका और प्रतिक्रांति का कुप्रबोधन संस्कार रूप में मन में अंकित होता रहा। यह सब करवाने वाला उनका बुद्धिजीवी वर्ग काशी-बनारस जैसे ब्राह्मणवादी विश्वविद्यालय की शिक्षा-व्यवस्था द्वारा तैयार किया जा रहा था। कालानुरूप लचीले तरीके से बदलने वाला यह बुद्धिजीवी वर्ग अपने जाति-वर्चस्व का केंद्र बिंदू अधिकाधिक कठिन करने के लिए नए-नए हथियार और दाँव-पेच तैयार करता रहता है।

मंडल आयोग के कार्यन्वयन के बाद कुछ मात्रा में ओबीसी कर्मचारी एवं अधिकारी वर्ग जागृत हुआ और उन्होंने भी अपने-अपने विभाग के स्तर पर कुछ संगठनों का निर्माण किया; किंतु उन्होंने भी कुछ अलग कर दिखाया है ऐसा कहने जैसी स्थिति नहीं है। नए-नए विषय खोजकर उस पर काफी साहित्य निर्माण करना और उसके संबंध में जन जागृति इतनी प्रभावी रूप में करना कि जिससे राजनीतिक क्षेत्र में उसकी गूँज पैदा हो। इसके संदर्भ में एक ही उदाहरण देने पर आप सबके ध्यान में यह बिंदू आ जाएगा।

पार्लियामेंट द्वारा नियुक्‍त की गई नचिअप्पन समिति ने ऐसे क्रांतिकारी सुझाव दिए हैं कि जिसके कारण ओबीसी, दलित और आदिवासी आंदोलन एक हो सके और जाति-उच्चाटन का आंदोलन अगले पड़ाव पर ले जाया जा सकेगा। इस पार्लियामेंटरी कमिटी की रिपोर्ट सभागार के दोनों सभागारों में (2005 से) प्रस्तुत होकर चार साल बीत गए; किंतु आज तक इस रिपोर्ट पर एक भी दलित-ओबीसी के बुद्धिजीवी संगठन ने पुस्तक नहीं छापी। पिछले लोकसभा चुनाव महाराष्ट्र में असंवैधानिक, अतार्किक, अ-फुले-आंबेडकर वादी और अनैतिक मराठा आरक्षण का मुद्दे का डंका पीटा गया। एकदूसरे के उपकारों का बदला चुकाने के उद्देश्य से ब्राह्मणवादी मीडिया ने मराठा आरक्षण के मुद्दे को काफी प्रसिद्धी दी; किंतु संवैधानिक नचिअप्पन कमिटि के रिपोर्ट को चुनावी प्रचार में स्थान प्राप्त नहीं होता। इससे क्या चुनाव सचमुच लोकतांत्रिक हैं, यह सवाल खड़ा हो जाता है। इस विषय पर मैंने लिखी पुस्तिका प्रथमतः कुछ ओबीसी कर्मचारी-अधिकारियों की युनियन्स के पास और बुद्धिजीवियों के संगठनों के पास भेजी। यह अपेक्षित था कि ये संगठन यह पुस्तिका छपवाएँगे और आनेवाले चुनाव में उसका मुद्दा (Issue) बनाएँगे; किंतु इस पुस्तिका की ओर नजर उठाकर देखने का समय किसी के पास नहीं है। अंततः हनुमंतराव उपरे काका इस ओबीसी नेता ने उसे छपवाया, वह भी एक नॉन-ओबीसी मित्र के पैसे से! मंडल आयोग का लाभ पिछले 17 वर्षों से लेने वाला ओबीसी कर्मचारी-अधिकारी आज भी इतना भिखारी है कि उसे अपने हित की पुस्तिका छपवाने के लिए नॉन-ओबीसी से भीख मांगनी पड़ती है। ओबीसी कर्मचारी-अधिकारी, उनके बुद्धिजीवी संगठन और उनकी युनियन्स की दृष्टि से यह शर्म की बात है या नहीं यह वे स्वयं तय करें।

महत्वपूर्ण मुद्दा तो आगे है। पिछले लोकसभा चुनाव के लिए लिखी गई यह पुस्तिका छह महिने के बाद की विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि पर छापी गई। इस पुस्तिका का प्रकाशन आज़ाद मैदान पर स्थित मुंबई मराठी पत्रकार संघ के कार्यालय में किया गया। 52 प्रतिशत ओबीसी का यह घोषणापत्र है। वाम दल-रिपब्लिकन और अन्य फुले-आंबेडकरवादी प्रत्याशी चुनाव प्रचार करते समय नचिअप्पन का मुद्दा फोकस करें, ऐसा आवाहन हमने इस प्रसंग पर किया। इस विधान सभा के चुनाव में मार्क्स, फुले, आंबेडकर, कांशीराम इन महापुरुषों के नाम लेकर अनेक क्रांतिकारी नेता मैदान में उतरे थे। उनमें से कुछ बुद्धिजीवी थे। माननीय उपरेकर काका ने इन्हीं में से हर एक प्रत्याशी को इस पुस्तक की हजार-हजार प्रतियाँ अपने खर्चे से भेजी। उद्देश्य यह था कि इस चुनाव के बहाने नचिअप्पन कमिटी की रिपोर्ट जनता तक जाएगी और उनका प्रबोधन होगा। भेजी हुई इन पुस्तिकाओं का क्या हुआ? इन प्रत्याशियों ने अपने चुनाव क्षेत्र में खुद के फोटो वाले हजारो पोस्टर्स लगाए, पत्रिकाएँ बाँटी और घोषणापत्र की प्रतियाँ भी बँटवाई; किंतु नचिअप्पन रिपोर्ट की इस पुस्तिका का पार्सल, जो मुफ्त में इन्हें भेजा गया था, वह पोस्ट ऑफिस में और बस स्टँड के पार्सल विभाग में वैसा ही पड़ा रहा।

दूरगामी कार्यक्रम तय करे बहुजन समाज

बाबासाहब ने चुनाव विचारों के आधार पर लड़ने के लिए कहा था। राजनेताओं के साथ-साथ बुद्धिजीवी भी इसे सुविधाजनक रूप से भूल गए हैं। फिर गलियों में काम करने वाला कार्यकर्ता-पदाधिकारी चुनाव में बिक गया तो उसमें उसका क्या दोष? परिणामस्वरूप खैरलांजी हत्याकांड जिस जिले में घटित हुआ उस जिले के सारे समतावादी प्रत्याशियों को मिले मतों का जोड़ 5 हजार से ऊपर नहीं जाता और जिन प्रस्थापितों के कारण हत्याकांड हुआ वे लाखों के अंतर से चुनाव जीत जाते हैं, यह शर्म की बात समतावादी कहलाने वाले बुद्धिजीवियों के लिए है, राजनीतिक नेताओं के लिए नहीं। दलित-ओबीसी कर्मचारियों एवं अधिकारियों से फुले-आंबेडकर के नाम पर पैसे इकट्ठा करना, अधिवेशन आयोजित कर खुद की भाषण की लालसा पूरी करना और उसके लिए बड़ा-सा मंडप-स्टेज खड़ा कर लाखों रुपये लुटाना इतना ही कार्यक्रम इन एम्प्लॉइज फेडरेशन और संगठनों युनियन्स का रहा है। समाज और आंदोलन को नया विचार देना, नए साधन निर्माण करना, दबाव गुट तैयार करना यह काम कौन करेगा? फटेहाल लोग कोई नेटवर्क न होते हुए भी दैनिक निकालते हैं और सफलतापूर्वक चला कर दिखाते हैं। इन संगठनों के पास लाखों रुपये हैं, देशभर का नेटवर्क है और पाठक भी हैं, फिर भी एक दैनिक नहीं निकाल सकते! इसे क्या कहे? बुद्धिजीवी के रूप में साहित्य, संस्कृति, दर्शन, धर्म, शिक्षा, राजनीति, मीडिया, अनुसंधान आदि क्षेत्रों में बुद्धिजीवी संगठनों का कौन-सा प्रभावी हस्तक्षेप है? दलितों के एम्प्लॉइज फेडरेशन्स स्थापित होकर 25 वर्षों से भी ज्यादा समय बीत चुका है और ओबीसी की संगठनों युनियन्स को 10 वर्ष हो चुके हैं। फिर भी इनकी दौड़ अधिवेशन और सभा-सम्मेलन आयोजित करने से आगे नहीं जाती।

जिस समतावादी बुद्धिजीवी वर्ग को हम दोष दे रहे हैं वह ऐसा बर्ताव क्यों करता है, इसका भी उत्तर खोजने की जिम्मेदारी हमारी है। दूसरों को दोष देने पर हम निर्दोष हैं ऐसा समझने का कोई कारण नहीं। तो यह बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा बर्ताव क्यों करता है? क्योंकि वह जिन स्कूल-कॉलेज में पढ़ा है वहाँ का अध्ययनक्रम ब्राह्मणवादी था और है। फिर यह समतावादी कैसे बने? पाठ्यक्रम के अतिरिक्त पठन में मार्क्स, फुले एवं आंबेडकर पढ़ा इसलिए! अधिकृत अध्ययनक्रम ब्राह्मणवादी होने के कारण और वह बचपन से ही संस्कारक्षम उम्र में अंकित हो जाने के कारण वह अतिरिक्त पठन के मार्क्स, फुले, आंबेडकर के विचारों पर कभी भी हावी हो जाता है। इसका उपाय क्या है? उपाय फुले-आंबेडकर ने ही सक्रिय रूप में सुझाया है। तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर ने जिस प्रकार पाठशालाएँ और कॉलेज निर्माण किए उसी प्रकार उन्होंने उसके अध्ययनक्रम के लिए ग्रंथ भी लिखे; किंतु यह ग्रंथ स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में आने की बजाय लायब्रेरी के अलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

14 नवंबर 1956 काे नागपुर में बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद जनसभा को संबोधित करते आंबेडकर

मार्क्स एवं फुले-आंबेडकर का यह क्रांतिकारी साहित्य अलमारियों से बाहर आए और जनता के दिमाग में संस्कारक्षम उम्र में ही घुस जाए इसलिए हमने व्यक्तिगत स्तर पर अध्ययनक्रम तैयार किया और ‘सत्यशोधक छत्रपति ज्ञानपीठ’ स्थापित कर 15 वर्षों तक चलाया। सरकार की, गॉडफादर की, किसी कर्मचारी-अधिकारी संगठन की या बुद्धिजीवियों के फेडरेशन की सहायता न होते हुए भी यह कार्यक्रम हमने अखंड रूप से 15 वर्ष चलाया। उसमें से बौद्ध विश्वविद्यालयों की तर्ज पर देश के स्तर पर समतावादी विश्वविद्यालय तैयार होगा ऐसी आशा थी। व्यक्तिगत स्तर पर हम इतना काम खड़ा कर सकते हैं तो संगठनात्मक स्तर पर ये एम्प्लॉइज फेडरेशन कितना बड़ा काम खड़ा कर सकते हैं? किंतु पिछले तीन वर्षों से इस ज्ञानपीठ का काम रुका हुआ है। उसका कोई गम या पछतावा इस समतावादी कहलाने वाले बुद्धिजीवियों के संगठनों को नहीं है।

इन संगठनों को हम बुद्धिजीवियों के संगठन क्यों कह रहे हैं यह भी प्रश्न पैदा होता है। क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग याने ऐसा वर्ग जो भूतकाल का अध्ययन कर वर्तमान काल में ऐसे विचार प्रतिपादित करता है और कार्यक्रम कार्यान्वित करता है, जिससे वह जिनका प्रतिनिधित्व करता है उस समाज की इकाई भविष्य काल में सैंकड़ों वर्षों तक सत्ता का उपभोग कर सके। दलित-ओबीसी की कर्मचारी-अधिकारियों के संगठन या बुद्धिजीवियों के एम्प्लॉइज फेडरेशन जैसे संगठनों का काम देखते हुए उन पर दया आती है। वे आज भी मराठों की दहशत मे आकर उनके आरक्षण को खुलेआम समर्थन देते हैं। इससे उनका बौद्धिक दिवालियापन ध्यान में आता है। मराठा आरक्षण को राजनीतिक दहशत के कारण समर्थन देनेवाले अठावले-कवाडे में और इन बुद्धिजीवियों में क्या अंतर है?

नामकरण का सवाल

यह साहित्य सम्मेलन ‘बहुजन’ इस नाम से हो रहा है। आजकल बहुजन इस शब्द पर आक्षेप लेने वाले कुछ विचारक पैदा हो गए हैं। उनका कहना है कि बहुजन शब्द ‘संडास’ हो गया है। उससे बहुत दुर्गंध आती है, ऐसा भी उनका कहना है। अच्छा फिर बहुजन नहीं तो कौन-सा शब्द चाहिए? उस पर उनका कहना है कि ‘मराठा’ शब्द बहुजन का विकल्प हो सकता है। संक्षेप में बताया जाए तो जितना क्रांतिकारी इतिहास ‘बहुजन’ शब्द के पीछे है उतना ही बल्कि उससे भी कई गुणा कालिमा युक्त इतिहास ‘मराठा’ शब्द का है। छत्रपति शिवराय मराठा (क्षत्रिय) नहीं, शूद्र हैं! ऐसा प्रचार करने वाले और उनके राज्याभिषेक का कट्टर विरोध करने वाले 96 कुलीन मराठा थे और इसके लिए उन्होंने जो विदेशी शत्रु थे उन ब्राह्मणों से गठबंधन किया था। मराठा शब्द से जुड़ा यह राष्ट्रद्रोह का इतिहास वैसे बहुत पुराना लगता हो तो नया इतिहास उससे भी भयानक है। जाति-उच्चाटन के सत्यशोधक आंदोलन से द्रोह करने वाले और उसके बदले में सत्ता के टुकड़े आज भी चुभलाने वाले कौन हैं? ब्राह्मणों से गठबंधन कर सत्ता प्राप्त करने के बाद सामाजिक आंदोलनों को बाकायदा कार्यक्रम तैयार कर नष्ट करने वाले कौन हैं? आज भी ग्रामीण क्षेत्र में जो दहशत है वह ब्राह्मणों की या मराठों की? ओबीसी के आरक्षित स्थानों का विरोध करने वाले किंतु अब ओबीसी में घुसने का प्रयास करने वाले कौन हैं? मराठा शब्द से जुड़ी कोई भी एक अच्छी बात यदि कोई बताएगा तो मैं सामाजिक आंदोलन छोड़ने के लिए तैयार हूँ। गटरगंगा जैसे इस शब्द को और संगठनों को महत्व देने का काम कुछ आंबेडकरवादी बुद्धिजीवी करते हैं तब उन्हें आंबेडकरवाद कितना समझ में आया है इसके संबंध में आशंका उत्पन्न होती है।

धर्मांतरण के कारण दलित आंदोलन को एक नया दर्शन प्राप्त हुआ और उसमें से दलित साहित्य अंकुरित हुआ। पद्मभूषण कर्मवीर दादासाहब गायकवाड के नेतृत्व में देशव्यापी अभूतपूर्व भूमिहीनों का आंदोलन सफल होने के बाद दलित आंदोलन कुछ वर्षों तक बढ़ता रहा। किंतु सन सत्तर तक वह प्रस्थापित होने लगी तभी उसे ठिकाने पर लाने का काम दलित साहित्य आंदोलन ने किया। पैंथर के विद्रोह को इसी दलित साहित्य आंदोलन ने जन्म दिया। जाति-उच्चाटन के क्रांतिकारी विद्रोह वाला नामांतर आंदोलन दलित साहित्य से प्रेरित हुआ था। आगे इसी साहित्य से प्रेरणा प्राप्त कर ग्रामीण कहलाने वाले ओबीसी साहित्य आंदोलन ने अपना स्वतंत्र स्थान निर्माण किया। आदिवासी साहित्य आंदोलन भी उसके बाद आकार ग्रहण करने लगा; किंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न मुझे सताता है कि साहित्य को दलित, आदिवासी जैसे जाति-जनजातियों के नाम दिए जा सकते हैं, फिर ओबीसी साहित्य क्यों नहीं? ग्रामीण क्यों? गाँव की पारंपारिक रचना से सबसे पहले ब्राह्मणी साहित्य को हमने अलग किया। इस साहित्य से सबसे पहले तलाक लिया दलित साहित्य ने, बाद में आदिवासी साहित्य अलग हुआ। गाँव में से ब्राह्मण, दलित और आदिवासी घटाने पर बचते हैं वह सिर्फ ओबीसी ही! पिछले 10 वर्षों में मराठा जाति ने भी स्वतंत्र साहित्य आंदोलन खड़ा किया है। ग्रामीण साहित्य यह ओबीसी का ही साहित्य है। उसे ग्रामीण कहकर आज भी किसान को जाति के वर्चस्व के नीचे दबाए रखने का पूरा प्रयास जारी है। ओबीसी के साहित्य को स्वतंत्र पहचान देने पर इस प्रवर्ग की सभी जातियों (नाई, धोबी, बढ़ई, लुहार आदि) को साहित्य निर्माण में सहभागी होने के लिए प्रोत्साहन प्राप्त होगा, किंतु नामकरण करने वालों ने यह दकियानुसी क्यों दिखाई यह पता करने का कोई मार्ग नहीं है। क्या नामकरण करने वाले भी मराठा वर्चस्ववाद के शिकार हो गए हैं? 52 प्रतिशत ओबीसी के आंदोलन को महत्व नहीं देना और ये ओबीसी कुछ नहीं करते ऐसा कहकर उन्हें नीचा दिखाना, यह क्या है? पिछले 5 हजार वर्षों से ब्राह्मणी आक्रमण जारी हैं, फिर भी इन ओबीसी ने अपनी बलीराजा की संस्कृति जीवित रखी है। ओबीसी में क्रांति का जो जबरदस्त पोटेंशियल है उसका संज्ञान फुले-आंबेडकरवादियों को कितना है यह सवाल ही है। किंतु यह निश्चित है कि इस पोटेंशियल की पूरी जानकारी मनुवादियों को है। दलित, आदिवासी आदि के आरक्षण के विरुद्ध ज्यादा अनुदारता न दिखाने वाले मनुवादियों ने ओबीसी के आरक्षण के विरोध के लिए दो केंद्र सरकारें गिरा दी, बाबरी मस्जिद ढहाई और सारा देश दंगों में जला डाला। इस पर से ओबीसी का पोटेंशियल मार्क्सवादी, फुले-आंबेडकरवादियों ने समझ लेना चाहिए। मार्क्सवादी या आंबेडकरवादी फुटपट्टी से ओबीसी आंदोलन का महत्व नापा नहीं जा सकेगा। चेतना और अंतश्चेतना, दोनों सामाजिक स्तरीकरण के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। यह ध्यान में लेकर ही ओबीसी के साहित्य आदि आंदोलन खड़े किए जा सकेंगे।

क्रांतिकारी साहित्य के निर्माण के लिए, वह जनमानस की चेतना-अंतश्चेतना तक पहुँचने के लिए और उससे प्रबोधन की लहर निर्माण होने के लिए कौन-सी नीतियों की और कार्यक्रमों की आवश्यकता है इसकी चर्चा हमने इस अध्यक्षीय वक्तव्य के बहाने की। उसमें यदि हम यशस्वी रूप से कोई कृति कर सके तो बौद्ध काल के समान और यूरोप के समान अब भी इस देश में प्रबोधन की लहर आ सकती है और उस पर सवार होकर जातिमुक्त लोकतंत्र क्रांति अवतरित हो सकती है। जाति-व्यवस्था नष्ट करने वाली क्रांति जिस रास्ते से जाती है उस पर चलते समय उपर्युक्त उपायों की योजना करनी हैं। उसे टाल कर आगे जाना हो तो ‘जाती नहीं वह जाति’ ऐसा कहने के अतिरिक्त चारा नहीं।

कृत्रिमता से ऊबने पर कुछ नया खोजने के लिए हम बार-बार जंगल की ओर भागते हैं। एक सुप्रसिद्ध पॉप सिंगर ने साक्षात्कार में बताया कि नई-नई धुनों को खोजने के लिए मैं आदिवासी बस्ती में जाकर रहता हूँ। प्रगतिशील व्यक्ति जब-जब थक जाता है, तब-तब प्रकृति की ओर भागता है। शारीरिक रोगों पर की सारी दवाइयाँ जड़ी-बूटियों से बनी हैं। और यही जड़ी-बूटियाँ आज भी आदिवासियों की बस्तियों पर सुरक्षित है। समाज क्रांति की भाषा करने वाले जब बार-बार असफल हो जाते हैं तब उन्हें इस क्रांति की यशस्विता की जड़ी-बूटी आदिवासियों की बस्तियों में निश्चित रूप में प्राप्त होने का भरोसा है। गडचिरोली के जंगलों में यदि इस साहित्य सम्मेलन के निमित्त इतना संदेश भी इस देश के तथाकथित मार्क्सवादी और आंबेडकरवादियों को हम दे सके तब भी यह सम्मेलन सफल हुआ ऐसा मैं समझूंगा!!

इसके अलावा वर्तमान के आलोक में जो बातें महत्वपूर्ण हैं उनमें एक तो यह कि आज परिवर्तन के आंदोलन में अनेक जाति-जनजातीय और वर्गीय साहित्य सम्मेलन बड़े पैमाने पर आयोजित हो रहे हैं। इन सभी सम्मेलनों का जाति-उच्चाटन यह समान ध्येय है। इसलिए वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व अटल रखते हुए अब्राह्मणी साहित्य परिषद इस सर्वसमावेशक नाम से फेडरेशन के रूप में एकत्रित हो। साथ ही इस अब्राह्मणी साहित्य परिषद की भूमिका, नीति और कार्यक्रम, उसी प्रकार उनका दर्शन आदि का सूत्रबद्ध प्रतिपादन प्राच्य विद्या पंडित कॉ. शरद पाटील जी ने किया है। उसका स्वीकार चर्चा के बाद करें।

अब समय आ गया है कि मात्र सभा, सम्मेलन और अधिवेशन इतने पर ही न रुकते हुए कुछ स्थायी रूप से संस्थात्मक काम भी करना चाहिए। उसमें शोध संस्था, प्रशिक्षण संस्थानट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट, समतावादी अध्ययनक्रम तैयार करने वाला और उसका कार्यान्वयन करने वाला विश्वविद्यालय निर्माण करना, कार्यान्वित समतावादी दैनिकों को दृढ़ आधार देना आदि शामिल हैं। इनके अलावा नामचीन और नवोदित साहित्यकारों एवं आलोचकों को परिवर्तन का साहित्य निर्माण करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उनके लिए नकद और पुरस्कार आदि की योजनायें हों।

इनके अलावा ग्रामीण क्षेत्र के मजदूर अशिक्षित होकर भी खुद के पोवाडे रचकर गाते हैं, लोककथा बताते हैं, सार्वजनिक उत्सव और विवाह आदि प्रसंगों के गीत, चक्की के गीत, भारूड आदि बड़ी मात्रा में गाए जाते हैं। इन सबको साहित्य का दर्जा देकर संबंधित ग्रामीण और ओबीसी मजदूर साहित्यिक के रूप में प्रोत्साहित करें।

बहुजन समाज का चित्रांकन

आवश्यक है कि गणेशोत्सव जैसे कृत्रिम उत्सवों को अति महत्त्व देने के कारण ग्रामीण-ओबीसी के वैज्ञानिक और खेती से जुड़े बलीराजा जैसे उत्सव लुप्त हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोग अशिक्षित होकर भी बलीराजा का उत्सव बड़े पैमाने पर मनाते हैं। 70 प्रतिशत कृषिप्रधान देश में कृषि का उत्सव देश के स्तर पर नहीं मनाया जाता। इसलिए बलीराजा उत्सव को राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि ग्रामीण क्षेत्र में रूढि़-परंपराओं का और प्राचीन साहित्य का चिकित्सक अध्ययन कर तात्या साहब और बाबा साहब ने ऐतिहासिक भौतिकवाद का निर्माण किया। उसमें नया-नया अनुसंधान कर योगदान देते रहना चाहिए। यह नया अनुसंधान ग्रंथ, उपन्यास, कविता, कथा के रूप में लोगों तक पहुँचना चाहिए। उसी प्रकार वह अध्ययनक्रमों में भी आना चाहिए। इसके लिए विशेष संस्था का निर्माण किया जाना चाहिए।

मैं यह मानता हूं कि कोई समाज एकात्म नहीं होता। वह वंश, वर्ग, वर्ण, जाति आदि व्यवस्थाओं की नींव पर बँटा हुआ होता है। ये शोषण की व्यवस्थाएँ होने के कारण यह बिखराव नींवगत होता है। और इसलिए उनका साहित्य भी अलग-अलग होता है। भारत में मुख्य रूप से वर्ण, जाति, वंश आदि व्यवस्थाओं की नींव पर समाज विभाजित है। उच्चवर्णीय ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य या उच्चवर्णीय जातियाँ शोषक होने के कारण उन्होंने शूद्रातिशूद्र वर्ण-जातियों का हमेशा दमन करने का प्रयास किया। उनका दमन करने के लिए जिस प्रकार जमीनी युद्ध के शस्त्रास्त्रों का प्रयोग किया गया उसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र के अस्त्रों का भी प्रयोग किया गया।

इस उच्चभ्रू मनुवादी साहित्य से टकराने के लिए और बहुजनों को वर्ण-जाति व्यवस्था की मानसिक गुलामी से मुक्त करने के लिए बहुजन बुद्धिजीवियों ने भी साहित्य का निर्माण किया। बहुजनों के साहित्य का भी अपना इतिहास रहा है। उसमें चार्वाक, बुद्ध, संत परंपरा के संतों ने काफी मात्रा में साहित्य का निर्माण किया। संत नामदेव, संत गाडगे महाराज, संत सावता, संत चोखोबा, संत तुकाराम की इस संत परंपरा ने मौलिक काम किया है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि किसी भी समाज की प्रगति का लक्षण क्या होता है? सत्ता, संपत्ति यह तो है ही! लेकिन ये तो पेड़ के फल हैं। यह सदैव, आगे की पीढि़यों को प्राप्त होते रहे इसके लिए समाज का वृक्ष हमेशा बढ़ते रहना चाहिए और फूलते रहना चाहिए। उसके लिए इस पेड़ की जड़ें गहराई में और दूर तक फैलनी चाहिए। पेड़ को कौन-सी खाद डालने पर यह सब साध्य हो सकेगा, इस पर हम विचार ही नहीं करते। आज ओबीसी-घुमंतू-विमुक्‍तों को सत्ता-संपत्ति मिल रही है, वह दूसरे पेड़ों के फल हैं। ऊपर की जाति के अनेक फलों के बागीचे हैं। इन बगीचों के ये पेड़ भले ही ऊपर की जाति की मिल्कीयत रही हो फिर भी उन बगीचों में मजदूरी का काम हम ही करते रहते हैं।

हमारे समाज के पेड़ पर फूल लगकर बहार आनी चाहिए, ऐसा लगता हो तो उसके लिए अपनी सांस्कृतिक भूमि उपजाऊ होनी आवश्यक है। सांस्कृतिक जमीन उपजाऊ रखने के लिए भाषा, साहित्य आदि की सत्वयुक्त खाद उसमें मिलानी पड़ती है; किंतु इसके लिए सत्वयुक्‍त साहित्य का निर्माण करना पड़ता है। उसी के साथ इस साहित्य को सर्वमान्य भी होना पड़ता है। ऐसे साहित्य निर्माण के लिए समाज में बुद्धिमान वर्ग की आवश्यकता होती है। ऐसा बुद्धिमान वर्ग अब तक ओबीसी-घुमंतू-विमुक्‍त जातियों में निर्माण नहीं हुआ है। इसकी वजह यह है कि हम आज भी ऊपर वाली जातियों के फलों के बाग में पानी देने का ही काम कर रहे हैं। हमारे ओबीसी-घुमंतू-विमुक्‍त जातियों में साहित्यकार हैं; किंतु वे अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलनों में जाकर पानी भरने का काम करते हैं। यह अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन याने ब्राह्मणों की ठेकेदारी है, यह सत्य हमें तात्यासाहब महात्मा जोतिराव फुले जी ने सन् 1885 में ही बताया। तब भी हमारे साहित्यकार वहाँ जाकर पानी भरने का काम करते हैं, क्योंकि हमारे साहित्यकारों का अपना कोई मंच नहीं है।

 

(मूल मराठी से हिंदी अनुवाद प्रो. डा. अशोक धुलधुले और फिर हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद अमरीश हरदेनिया)


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