झारखंड : धर्म के बहाने आदिवासियों की जमीन पर नजर

झारखंड में जमीन कब्जाने को सरकार के द्वारा लाये गये विधेयक पर चर्चा से अधिक धर्म के सवाल पर लाया गया विधेयक अधिक सुर्खियों में है। स्थानीय मीडिया भी इस विधेयक को हवा दे रही है। मंशा साफ है कि लोग जमीन पर कब्जा वाले विधेयक की चर्चा ही न करें। लेकिन इसके उलट झारखंड में सरकार के फैसले का विरोध शुरू हो गया है। पूरे घटनाक्रम पर नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट :

बीते 11 अगस्त को झारखंड सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा झारखंड के विभिन्न अखबारों को जारी एक पन्ने का विज्ञापन जब लोगों के बीच गया तब जिसने भी पढ़ा, उसने दांतों तले उंगलियां दबा ली। विज्ञापन में महात्मा गांधी की बड़ी सी तस्वीर के साथ एक संदेश था जिसके मुताबिक गांधी ईसाई धर्म के खिलाफ थे। विज्ञापन के मुताबिक गांधी को ईसाई मिशनरियों की सेवा भावना पर शक था। विज्ञापन के ठीक नीचे मुख्यमंत्री रघुवर दास की तस्वीर थी। जबकि वास्तव में यह चर्चा अछूतों के धर्मांतरण के सन्दर्भ में थी। जब अम्बेडकर ने पच्चास लाख लोगों के साथ दूसरा धर्म अपनाने की चेतावनी दी थी। इसमें कहीं भी आदिवासियों या वनवासियों का जिक्र नहीं था। (गांधी हेरिटेज पोर्टल, अंक 64, पृष्ठ 33-41)

विधेयक पेश करने के ठीक एक दिन पहले यानी 11 अगस्त को झारखंड सरकार द्वारा प्रकाशित कराया गया विज्ञापन

दिलचस्प यह रहा कि झारखंड सरकार ने यह विज्ञापन ठीक एक दिन पहले जारी किया जब सरकार ने विधानसभा में झारखंड स्वतंत्र धर्म विधेयक 2017 को पारित करवाने में सफलता हासिल कर लिया। इसके मुताबिक झारखंड में जबरन अथवा प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने पर सात वर्षों की सजा और एक लाख रुपए का आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया। इतना ही नहीं यदि कोई स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसे इसके लिए संबंधित डिप्टी कमिश्नर को आवेदन करना होगा। यह बात गौरतलब है कि झारखंड के आदिवासियों में जागरूकता अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है। वे प्रखंड कार्यालयों तक जाने से परहेज करते हैं। वे धर्म के सवाल पर डिप्टी कमिश्नर के पास कैसे जायेंगे।

लेकिन रघुवर दास सरकार की मंशा अलग थी। वह जानती थी कि लोग धर्मांतरण के सवाल पर बहस करेंगे। लोगों का उस विधेयक पर ध्यान ही नहीं जायेगा जो उसने आदिवासियों की जमीन पर गैर आदिवासियेां के कब्जे को आसान बनाने के लिए विधानसभा में पारित करवा दिया है। आश्चर्य न करें। यही हुआ है। एक साथ रघुवर दास सरकार ने विधानसभा के मानसून सत्र में ‘अधिसूचित भूमि अर्जन, पुनर्वासन एवं पुन: व्यवस्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार(झारखंड) संशोधन अधिनियम’ पेश कर दिया। चूंकि विधानसभा में भाजपा के पास बहुमत है इसलिए उसे विधेयक को पारित करवाने में राज्य सरकार को कोई परेशानी नहीं हुई।

गौरतलब है कि राज्य सरकार इससे पहले छोटानागपुर काश्तकारी विधेयक व संथाल काश्तकारी विधेयक में संशोधन का प्रस्ताव बजट सत्र में ही पारित करवा चुकी थी जिसके कारण उसे तीखे विरोध का सामना करना पड़ा था। यहां तक कि प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता सह पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और वरिष्ठ सांसद सह लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष करिया मुंडा ने भी अपना विरोध दर्ज कराया था। तीखे विरोध का ही परिणाम था कि राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने विधेयक पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और उसे वापस लौटा दिया।

झारखंड के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री रघुवर दास

राज्यपाल के इस सख्त 25 जून 2017 को किये गये फैसले के बाद रघुवर दास सरकार बैकफुट पर थी। उनके विरोधियों की मानें तो यह सब सरकार ने कारपोरेट ताकतों के दबाव में किया। वह जल्द से जल्द जमीन को लेकर कड़े फैसले ले। लेकिन मुद्दा विरोध का था। इसलिए सरकार ने नया तरीका खोज निकाला। उसके इस नये विधेयक का विरोध करते हुए झारखंड मुक्ति की ओर से विधानसभा में विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन ने कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य सरकार राज्य की भू-संपदा की खुली लूट एवं उसे जबरन अधिग्रहित कर कतिपय पूंजीपतियों एवं उद्योगपतियों के समूहों को हस्तांतारित करने की है। इस मामले में जेएमएम के केंद्रीय महासचिव सह प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं कि इस विधेयक में राज्य सरकार ने संविधान पर सवाल खड़ा कर दिया है। उनके मुताबिक पारित विधेयक में यह उल्लेख किया गया है कि यह विधेयक 1 जनवरी 2014 के प्रभाव से प्रभावी माना जायेगा। जबकि संवैधानिक प्रावधान के तहत यह स्पष्ट उल्लेखित है कि संसद द्वारा कोई कानून पारित हो तो उसके एक वर्ष की समयावधि में ही उस पर आवश्यक बदलाव करने का अधिकार राष्ट्रपति के अनुमोदन के पश्चात राज्य सरकार को प्राप्त है।

वे बताते हैं कि विधेयक के कंडिका एक के उपखंड तीन में उल्लेखित किया गया है कि “न्यायालय अथवा प्राधिकरण का न्यायादेश अथवा आदेश के अंतर्विष्ट होते हुए भी इस संशोधित अधिनियम के प्रावधान प्रभावी होंगे। इस प्रकार यह विधेयक भारत के संविधान एवं न्याय व्यवस्था से परे है, जिसे न्याय व्यवस्था के किसी भी स्तर पर इसे चुनौती नहीं दी जा सकती है। साथ ही इससे प्रभावित व्यक्तियों एवं समुदायों को न्याय के लिए गुहार लगाने के संवैधानिक अधिकार से भी पूर्णत: वंचित कर दिया गया है।

सुप्रियो बताते हैं कि झारखंड राज्य भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची में सूचीबद्ध है। इसके मुताबिक बिना ग्रामसभा की सहमति से भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है, परंतु विधेयक में ग्रामसभा की सहमति की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया है। यह पी. पेसा-1996 (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) एवं समता जजमेंट 1997 का स्पष्ट उल्लंघन है। उनके मुताबिक नये विधेयक के प्रभावी होने के बाद राज्य सरकार बहुफसली भूखंडों का भी अधिग्रहण कर सकेगी। यह पूरे झारखंड के कृषि व्यवस्था पर मारक प्रहार सरीखा होगा। सुप्रियो बताते हैं कि झारखंड में केवल बीस फीसदी लोगों के पास बहुफसली जमीनें हैं और इसी पर पूरे प्रदेश की करीब 80 फीसदी आबादी आश्रित है।

अब बात धर्म परिवर्तन संबंधी सरकार के नये विधेयक की।  विधेयक के धारा-3 में बलपूर्वक धर्मांतरण को गैरकानूनी बताया गया है। वहीं धारा 3 के उपबंध का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 3 वर्ष तक के कारावास या 50 हजार रुपये का जुर्माना अथवा दोनों से दंडनीय किया जा सकता है। यदि यह अपराध नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के प्रति किया गया है तो कारावास 4 वर्षों तक और जुर्माना एक लाख रुपये तक होगा। साथ ही अगर कोई स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है, तो उस स्थिति में उसे स्थानीय प्रशासन को अनिवार्य रूप से सूचित करना होगा। संबंधित व्यक्ति को इसकी सूचना उपायुक्त को देनी होगी। उपायुक्त को बताना होगा कि उसने कहां, किस समारोह में और किन लोगों के समक्ष धर्म  परिवर्तन किया है. स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन की सूचना सरकार को नहीं देने पर कठोर कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।

धर्मांतरण विधेयक और जमीन पर कब्जे को लेकर लाये गये विधेयक का विरोध करते विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन एवं अन्य

सरकार के इस विधयेक का विरोध विपक्षी पार्टियों ने किया। मसलन झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता स्टीफन मरांडी ने कहा कि इस बिल को प्रवर समिति को भेजा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह बिल मौलिक अधिकारों का हनन है। किसी भी व्यक्ति को अपना धर्म मानने का अधिकार है। सरकार यह बिल लाकर लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है। स्टीफन मरांडी ने सरकार से पूछा कि सरकार बताना चाहिए कि अब तक राज्य में धर्मांतरण के कितने मामले सामने आये हैं। आइपीसी के तहत कितने केस अब तक दर्ज हुए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के बिल ‘धर्म स्वतंत्र विधेयक’ का नाम ही गलत है. इसका नाम ‘धर्म परिवर्तन विरोधी कानून’ होना चाहिए। वहीं साइमन मरांडी ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 294ए में जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर सजा का प्रावधान है. सरकार जो कानून लेकर आयी है, उसमें धर्म परिवर्तन के लिए प्रशासन से इजाजत लेने की बात कही गयी है, जो गलत है।  उन्होंने कहा कि यह बेहद संवेदनशील मामला है। इसलिए इसे प्रवर समिति को भेजा जाये।

वहीं भारतीय जनता पार्टी के विधायक राधाकृष्ण किशोर ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि इस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है. यह पहले ही आ जाना चाहिए था। इसमें डेढ़ दशक से अधिक की देरी हो चुकी है। लेकिन, सरकार विधेयक लाने के लिए बधाई की पात्र है। उन्होंने कहा कि विधेयक में हर चीज की बारीकी से व्याख्या की गयी है। इसी तरह से कानून का अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उनका मत था कि किसी को अनाज देकर, रोटी देकर आप उसका धर्म नहीं बदल सकते। हिंदू धर्म की भी बात कर लीजिए, तो बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह की प्रथा थी, उसे बदला गया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2011 में 10,90,283 क्रिश्चियन थे। आज उनकी संख्या 14,18,783 हो गयी है।  यह 30 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। सबसे ज्यादा धर्मांतरण झारखंड में  हुआ है।

वहीं झारखंड के पहले मुख्यमंत्री सह झारखंड विकास मोर्चा के नेता बाबू लाल मरांडी ने बताया कि धर्मान्तरण विधेयक 2017 भारत के नागरिक के मौलिक अधिकार का हनन है। मौलिक अधिकार में स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार अपना धर्म, उसका प्रचार प्रसार स्वतंत्र रूप से कर सकता है। इस पूरे मामले में विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन का कहना है कि ईसाई मिशनरियों के स्कूलों में पढ़ने वाले या फिर ईसाई मिशनरियों के अस्पतालों में चिकित्सा कराने मात्र से कोई ईसाई नहीं हो जाता है। उन्होंने अपना उदाहरण स्वयं देते हुए कहा कि उन्होंने ईसाई मिशनरियों के स्कूल से शिक्षा पायी, लेकिन उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया। उनके अनुसार सरकार का नया कानून संविधान की धारा 25 का उल्लंघन है जिसमें भारत के हर वयस्क नागरिक को स्वेच्छा से अपना धर्म चुनने का अधिकार है। लेकिन सरकार इस अधिकार को चुनौती दे रही है।

बहरहाल झारखंड में जमीन पर कब्जाने को सरकार के द्वारा लाये गये विधेयक पर चर्चा से अधिक धर्म के सवाल पर लाया गया विधेयक अधिक सुर्खियों में है। स्थानीय मीडिया भी इस विधेयक को हवा दे रही है। मंशा साफ है कि लोग जमीन पर कब्जा वाले विधेयक की चर्चा ही न करें। लेकिन इसके उलट झारखंड में सरकार के फैसले का विरोध शुरू हो गया है। विपक्षी पार्टियों ने राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर दोनों विधेयकों को खारिज करने का अनुरोध किया है।


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