रामस्वरूप वर्मा, लोहिया और आंबेडकर के विचारों के आईने में उत्तर प्रदेश की राजनीति

रामस्वरूप वर्मा ने गाय पट्टी में अर्जक संघ के माध्यम से ब्राह्मणवाद को कड़ी चुनौती दी थी। वे आंबेडकर और लोहिया के बीच के ऐतिहासिक संवाद की कड़ी थे। रामस्वरूप वर्मा की आंबेडकर से क्या बाते हुईं, बात-चीत के क्या-क्या मुद्दे थे, क्या परिणाम निकले? बता रहे हैं, हरनाम सिंह वर्मा :

1947 में अंग्रेज़ों से शासन करने का अधिकार गांधी-नेहरू की कांग्रेस को भले ही प्राप्त हो गया हो, लेकिन दो-तीन साल बीतते-बीतते कांग्रेस का तीखा राजनीतिक विरोध शुरू हो गया था। कांग्रेस के विरोधी लामबंद और संगठित होने का प्रयास करने लगे थे, क्योंकि कांग्रेस राज में अधिकांश जन के साथ कमोवेश वही हो रहा था, जो अंग्रेज़ों के ज़माने में हुआ करता था। अंग्रेजी शासन में अंग्रेजों से मेल-मिलाप कर गरीब जनता, किसानों, मज़दूरों का खून चूसने वाले रातों-रात आजादी के बाद पुश्तैनी कांग्रेसी हो गए थे। इस प्रकार विदेशी अंग्रेजों का स्थान देशी अंग्रेजों ने ले लिया था। जनता का शोषण जारी था। देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में राजनैतिक असंतोष उठ रहा था। 1950 के दशक में भारतीय राजनीति में एक व्यापक परिवर्तन लाने के लिए कई राजनेताओं ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया। उन लोगों ने  कांग्रेस का एक विकल्प तैयार करने की कोशिश की। धुर-दक्षिण में रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’, पश्चिम में भीमराव आंबेडकर और उत्तर में राममनोहर लोहिया इन प्रयासों को अपनी-अपनी सोच के अनुसार मूर्तरुप दे रहे थे। पेरियार ने इसकी शुरुआत सनातनी संस्कृति से अलग द्रविड़ संस्कृति को केंद्र में रख कर किया था। वैैचारिक भिन्नता होते हुए भी आंबेडकर और लोहिया की वैचारिकता में थोड़ा बहुत साम्य था। 1950 के दशक में लोहिया और आंबेडकर के करीब आने के राजनैतिक कारण भी मौजूद थे। अांबेडकर की राजनैतिक स्थिति अपेक्षाकृत रुप से बहुत कमजोर थी, लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी की स्थिति अपेक्षाकृत रुप से  आंबेडकर से बेहतर थी। लोहिया यह चाहते थे कि उनकी पार्टी से पिछड़ों के साथ अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग भी जुड़ें, जिससे  नेहरू की कांग्रेस को सशक्त चुनौती दी जा सके।

आंबेडकर और लोहिया

आंबेडकर और लोहिया ने गठबंधन की संभावना तलाशने का निर्णय लिया। लोहिया ने आंबेडकर से देश के पूरे वंचितों का नेता बनने का आह्वान करते हुए, एक पत्र भी भेजा। लेकिन इन दोनों ने ख़ुद आमने-सामने बैठ कर दो टूक वार्ता करने से पूर्व अपने सहयोगियों के माध्यम से वार्ता के लिए माहौल बनाने की शुरूआत की। दिल्ली में निवास कर रह रहे डॉ. भगवान दास और लखनऊ में वकालत कर रहे डॉ. छेदीलाल साथी, अांबेडकर के करीबी सहयोगी थे। इन दोनों ने लोहिया के सहयोगी राम स्वरूप वर्मा से प्रारंभिक बात की और एक दूसरे की थाह लेने की पहल की। इसके उपरांत राम स्वरूप वर्मा ने अांबेडकर से 1954  में लंबी वार्ता की।

लोहिया द्वारा राम स्वरुप वर्मा (22 अगस्त, 1923 – 19 अगस्त, 1998) के माध्यम से आंबेडकर से बातचीत करने की जानकारी मुझे 1990 के दशक में हुई। तब तक राम स्वरूप वर्मा सक्रिय राजनीति से लगभग अलग हो चुके थे और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। लखनऊ की कुर्मी क्षत्रिय सभा के एक आयोजन में मैं भी आमंत्रित था और वहां मेरे एक प्रशसंक ने मुझे राम स्वरुप वर्मा द्वारा लिखित सामग्री उपलब्ध कराई। आयोजन से लौट कर आने के उपरान्त मैंने वर्मा जी से भेंट करने और आंबेडकर से उनकी हुई बातचीत के संबंद्ध में जानकारी लेने का निर्णय लिया।

रामस्वरूप वर्मा की वैचारिकता की थोड़ी बहुत जानकारी तो मुझे थी। मैं उनसे वार्ता करना चाहता था,लेकिन दिक्कत यह थी कि राम स्वरूप वर्मा पार्किंसंस डिजीज से पीड़ित थे और उन्हें चलने-फिरने और बोलने में भी दिक्कत थी। किसी दूसरे को उनसे बातचीत करते समय, उनका उत्तर समझने में कठिनाई होती थी। इन्हीं सब कारणों से वर्मा से बातचीत के लिए मुझे एक ऐसे साथी की  दरकार थी जो उनसे संपर्क में रहा हो और उनके सामाजिक आंदोलन और राजनैतिक कार्यों से भलीभांति अवगत हो। संयोगवश उत्तर प्रदेश के सूचना और जनसंपर्क निदेशालय में सूचना अधिकारी के रुप में कार्यरत भगवान स्वरूप कटियार मुझे मिल गए, जो इन पैमानों पर खरे उतरते थे। वह रामस्वरूप वर्मा के गृह जनपद कानपुर के पैतृक गांव के पास के ही थे और रामस्वरूप वर्मा के निरंतर संपर्क में थे। मैंने कटियार को वर्मा जी से वार्ता के संबंध में उन्हें अपना मन्तव्य बताया और इस परियोजना में उनकी सहमति से  बराबरी का भागीदार बनाया। वर्मा जी से की जाने वाली पूरी वार्ता टेप की जानी थी। इसके लिए टेप का इंतज़ाम कटियार को करना था और फिर वर्मा जी से कई चरणों की वार्ता में उनके उत्तर को सटीक समझने और रिकार्ड करने के लिए उपस्थित रहना था। वार्तालाप के टेप को कटियार को ही ट्रांसक्राइब करना था। लेकिन उसका विश्लेषण पूरी तरह मुझे ही करना था। इन शर्तों के साथ कटियार इस वार्ता को  मूर्तरूप देने के लिए राज़ी हुए। उन्होंने ही राम स्वरूप वर्मा से इस विषय पर प्रारम्भिक बात की और लंबी वार्ता को अंतिम रुप दिया। वार्ता राम स्वरूप वर्मा के हज़रतगंज मुहल्ले के बंदरियाबाग, वर्मा जी की सुविधानुसार 1996 में कई चरणों में की गई। यह जगह उत्तर प्रदेश शासन के सूचना निदेशालय के पश्चिम में स्थित है।

वार्ता समाप्त हो जाने के उपरांत कटियार को यह टेप ट्रांसक्राइब करने थे। मुझे यह पता था कि इस काम को पूरा करने में दो- तीन महीने अवश्य लगेंगे। करीब तीन महीने के बाद मैंने कटियार को फोन किया और तब उन्होंने मुझे सूचित किया कि टेप खराब हो गए हैं और उनसे कुछ भी नही बचाया जा सका। कटियार के उत्तर से मैं सन्न रह गया। यह एक भारी वैचारिक धरोहर को सार्वजनिक करने के प्रयास को गंभीर क्षति थी। व्यक्तिगत तौर मेरे लिए यह एक अमूल्य धरोहर खोने जैसा था, क्योंकि मैं लोहिया का अनुयायी था। रामस्वरूप वर्मा की वैचारिकता का समर्थक तो मैं बहुत बाद में, लगभग 1990 के दशक में बना। मैं यह मानता था कि उत्तर प्रदेश में उस समय घट रहे राजनैतिक घटनाक्रम के लिए आंबेडकर, लोहिया और रामस्वरूप वर्मा की इस साझा सोच की ऐतिहासिक रुप से बहुत बड़ी अहमियत थी।

मैं स्वभाव से इलेक्ट्रानिक उपकरणों पर पूर्णरूपेण विश्वास रखने वाला प्रोफेशनल नहीं रहा हूं। वह अकसर दगा दे जाते हैं, उन्हें उपयोग करते समय एक वैकल्पित बैक-अप व्यवस्था  हमेशा उपलब्ध होनी चाहिए जिससे दुर्लभ सामग्री, जो मात्र एक बार ही प्राप्त हो रही है, उससे इलेक्ट्रानिक उपकरण के बिगड़ जाने की स्थिति में वंचित ना होना पड़े। प्रणालीगत रूप से मेरा दूसरा स्वभाव यह भी है कि मैं ऐतिहासिक कदम उठाते समय एक से अधिक विकल्प खुले रखता हूं। एक समाजशास्त्री के रुप में मैं एंथनोग्राफी विधा में पारंगत था। इस विधा की एक जरूरी आवश्यकता यह होती है कि किसी दिन शोध-क्षेत्र के किसी भी सूचना सूत्र से प्राप्त या देखी या अनुभव की हुई जानकारी को एक डायरी में सटीक, यदि विस्तार से संभव नही है, तो संक्षेप में ही नोट किया जाय। राम स्वरूप वर्मा जी से की हुई वार्ता कई दौर की थी और लंबी थी, लेकिन मैं उनका सार संक्षेप अपने हाथ से कागज पर लिखता रहा था। समय बीतने के साथ टेप खराब होने की कटियार की बात आई-गई हो गई।

लोहिया और रामस्वरूप वर्मा

1990 के दशक का दौर मेरे व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में बहुत उठापटक, गहमागहमी और गंभीर त्रासदी का भी दौर था। छोटी बेटी नीता की शादी के बाद मैंने 50, गुलिस्ता कॉलोनी का सरकारी आवास छोड़ दिया था और इल्दिको कालोनी, रायबरेली रोड  के अपने निजी घर स्थानांतरित हो गया था। विभिन्न कारणों से घर का पुनर्निर्माण जरूरी था। 1998 की पहली तिमाही में यह काम पूरा ही हुआ था कि गैस रिसाव से घर के किचेन में हुए सिलेंडर विस्फोट में मेरी पत्नि नीलिमा जी मारी गईं। इस त्रासदी और उसके बाद अपनों के व्यवहार के चलते मैं गहरे अवसाद में चला गया। मैं तीन- चार महीने घर से ही नहीं निकला और दूसरों से बात तक भी नहीं की। मुझे जीवन ही निरर्थक लगने लगा था।  मैं शायद आत्म-हत्या ही कर लेता, अगर मेरे घनिष्ठ मित्र ब्रिगेडियर कपिल खरे मेरे घर न आते। वे मेरी त्रासदी जानकर पुणे से मेरे घर आए, मुझसे घंटों बात की। वे मुझे सामान्य हालत में लाए। खरे साहब के आने से पूर्व अवसाद की स्थिति में मैंने अपनी व्यक्तिगत लाइब्रेरी की पुस्तकें, करीब पांच-छः जर्नल्स के बीस साल के सभी अंक, जिनमें से कई को मैं सजिल्द भी करा चुका था और कई पुस्तकों की हस्तलिखित पांडुलिपियां भी रद्दी वाले को बेंच दी थी। सामान्य होने पर मैं अपने इस गंभीर प्रोफेशनल नुकसान से भी बहुत दुखी रहा। चलते-चलते खरे साहब मुझे एक सकारात्मक सुझाव दे गए थे : “वर्मा जी तुम्हारे पास अपने लंबे और बहुआयामी प्रोफेशनल जीवन के अनुभव से, समाज को देने के लिए बहुत कुछ है। उसे लिखो और प्रकाशित करो। इसमे तुम्हारा गम कम हो जायेगा और तुम व्यस्त भी रहोगे”। मैंने खरे साहब की सलाह गांठ बांध ली, एक कंप्यूटर खरीदा और फिर मेरा लेखन शुरू हो गया। मैंने उनकी बात को मान कर स्वयं को अन्य पिछड़े वर्गों पर मानवशास्त्र की पहली पत्रिका ‘ईस्टर्न एंथ्रोपोलोजिस्ट’ के अन्य पिछड़े वर्गों पर एक विशेष अंक के अतिथि संपादन और तत्पश्चात उन्हें तीन पुस्तकों का रुप देने में स्वंय को व्यस्त कर लिया। मैं एक के बाद दूसरा दायित्व लेता गया और इसी में कई वर्ष व्यतीत हो गए।

मैंने 1998 से 2007 तक इल्दिको कालोनी में 9 वर्ष अकेले ही बिताये। मेरा स्वास्थ्य जब अधिक बिगड़ा रहने लगा, तब  मैं 2007 में अपनी बड़ी बेटी-दामाद, नीरा-दिनेश के घर, भरत नगर, सीतापुर रोड, लखनऊ रहने चला गया। फिर 2012 से मैं छोटी बेटी-दामाद, नीता-मकुंदी के बारामती, पुणे के आवास पर आ कर रहने लगा। जून 2017 में जब बारामती में मैंने अपनी अलमारी में अपने डिग्री/सार्टीफिकेट, अंक तालिकाओं, नियुक्ति पत्रों और अनुभव संबंधी कागज़ों की फ़ाइल उलट-पलट रहा था, तभी मुझे उस फ़ाइल में 1996 में मेरी राम स्वरूप वर्मा से हुई वार्ता के विवरण के सार संक्षेप वाले कुछ हस्तलिखित पन्ने मिले। यह संस्मरण उन्हीं पन्नों और कुछ उस ऐतिहासिक वार्ता को अपनी स्मरण शक्ति से पुनर्जीवित करने की क्षमता पर आधारित है। अच्छी बात यह है कि प्रायश्चित के रूप में भगवान स्वरूप कटियार ने 2015 में राम स्वरूप वर्मा की प्रकाशित पुस्तकों, शोषित समाज दल और अर्जक संघ से संबंधित लिखित सामग्री के दो खंडों का एक संकलन, ‘राम स्वरूप वर्मा समग्र’(नई दिल्ली, सम्यक प्रकाशन, 2015) शीर्षक से प्रकाशित कराने का नेक काम कर दिया।

मेरी राम स्वरुप वर्मा से वार्ता के मुख्य मुद्दे

यद्यपि मेरी राम स्वरुप वर्मा से पूरी बातचीत उनकी आंबेडकर से हुई वार्ता पर केंद्रित थी, लेकिन उसे मूर्त रूप देते हुए मैंने इस साक्षात्कार को मात्र उनकी महामना आंबेडकर से हुई वार्ता तक ही नहीं सीमित रखा था। बल्कि उसी बिन्दु से संबंधित कई और मुद्दों पर भी बात की थी। यह मुद्दे थे : लोहिया द्वारा उन्ही को वार्ता के लिए चुनने के कारण, अांबेडकर से वार्ता के पूर्व लोहिया से उन्हें वार्ता के लिए मिला ब्रीफ, वर्मा के अनुसार आंबेडकर की राजनीति के सशक्त और कमजोर पहलू, आंबेडकर और लोहिया के राजनैतिक सोच में, राजनैतिक और समाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन को एक साथ रखने का पक्ष, लोहिया और आंबेडकर के परिदृश्य से चले जाने के बाद उनके राजनैतिक वारिसों द्वारा उनकी थाती का प्रयुक्त रूप और उसके 1996 तक मिले परिणाम, उनके सोशलिष्ट पार्टी छोड़ने और शोषित समाज दल और अर्जक संघ निर्मित करने के कारण और उनसे प्राप्त अनुभव।  

राम स्वरुप वर्मा ने सोशलिस्ट पार्टी छोड़ दी और अपना शोषित समाज दल बनाया जिसे उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों और बिहार के कुछ ज़िलों में जनसमर्थन मिला। मैं 1982 से 1996 तक स्वयं उत्तर प्रदेश शासन के एक ऊंचे पद पर रहने और सार्वजनिक जीवन में गहरी दिलचस्पी के चलते मुझे लोहिया और आंबेडकर के उत्तराधिकारियों द्वारा उनकी थाती को दिए गए रूप की अंतरंग जानकारी है। इन दोनों महान व्यक्तित्वों की थाती को कांशीराम-मायावती और मुलायम सिंह यादव ने क्रमशः क्या नियति दिखाई है, इसका मैं साक्षी रहा हूं।

जाति विनाश के प्रश्न पर डॉ. अांबेडकर के विचारों के समानान्तर विचार डॉ. लोहिया तथा राम स्वरूप वर्मा (अर्जक संघ तथा अर्जकवाद के जनक) के विचार थे। कुछ समीक्षक डॉ. लोहिया और राम स्वरूप वर्मा को डॉ. आंबेडकर का धुर विरोधी मानते हैं जबकि योगेन्द्र यादव जैसे राजनीति शास्त्री कहते हैं कि डॉ.अांबेडकर और डॉ. लोहिया (और राम स्वरूप वर्मा) सामाजिक न्याय के संघर्ष के दो चरणों के प्रणेता थे।

डॉ. अांबेडकर और डॉ. लोहिया : कुछ समानताएं

योगेन्द्र यादव के अनुसार दोनों विचारकों ने मार्क्सवादी विचारधारा से हटकर जाति को भारतीय समाज में असमानता, शोषण और अन्याय के लिए एक स्वयं में स्वतंत्र ऑटोनामस) और महत्वपूर्ण कारक माना। दोनों ने इसमें लिंग और वर्ग की भी भूमिका स्वीकारी। दोनों ने जातिगत असमानता को प्राथमिकता के आधार पर खत्म करने की वकालत की, दोनों ने ही जाति को भारतीय समाज में बहुत सारी खामियों का जिम्मेदार माना, उन्होंने यह भी माना कि जाति व्यवस्था को सुधारा नहीं जा सकता, उसे नष्ट ही करना होगा, दोनों ने यह माना कि मात्र आर्थिक क्षेत्र में समानता आने से जातिगत असमानता नही जायेगी और इसके लिये वैचारिक और धार्मिक मुददों पर ध्यान देना वांछित होगा।

आंबेडकर  से बातचीत के लिये राम स्वरूप वर्मा ही क्यों?

लोहिया ने अंबेडकर से बातचीत के लिये राम स्वरूप वर्मा को ही क्यों चुना, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। मेरी वार्ता में राम स्वरुप वर्मा ने यह साफ़ किया कि लोहिया और अांबेडकर में कई मुद्दों पर मतभेद थे। राम स्वरूप वर्मा, छेदी लाल साथी और डॉ. भगवान दास से मेरी जो वार्ता हुई उसके आधार पर मेरा यह कहना है कि हालांकि1950 के दशक में  राम स्वरूप वर्मा लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी मे थे ज़रूर, लेकिन उस समय तक वर्मा लोहिया से इतर स्वयं एक प्रखर चिंतक के रुप में उभर चुके थे। उन्होंने  महाराज सिंह भारती और जगदेव प्रसाद के साथ शोषित समाज दल  नाम का राजनैतिक संगठन और अर्जक संघ नाम का सामाजिक सुधार आंदोलन तो बहुत बाद में 1970 के दशक में स्थापित किया। लेकिन सामाजिक सुधार आंदोलन के बारे में उनकी सोच सर्वविदित थी और उसका जनाधार काफी व्यापक था। उनकी सोच में एक अन्य तथ्य भी महत्वपूर्ण था, वह यह कि राम स्वरूप वर्मा सैद्धांतिक रुप से अनुसूचित जातियों को प्रकारांतर से अलग वोट देने और अपने जन प्रतिनिधि स्वयं चुनने देने के पक्षधर थे। इसे सुनिश्चित कराने के लिए उनका यह सुझाव था कि हर जनपद की दो अनुसूचित सीटों को चुनने के लिए मात्र अनुसूचित जातियों के वोटर ही वोट करें और अपने प्रतिनिधि भी वही चुने, कोई राजनैतिक दल नही।

आंबेडकर और रामस्वरूप वर्मा

राम स्वरूप वर्मा लोहिया से स्वतंत्र रुप से अपने राजनैतिक व्यक्तित्व को पहले ही स्थापित कर, उत्तर प्रदेश और बिहार में अपना अस्तित्व बना चुके थे। कई मुद्दों पर उनके विचार लोहिया से बिलकुल अलग थे और बहुत कुछ अांबेडकर से मिलते-जुलते थे। उदाहरण स्वरूप रामायण प्रकरण लीजिये। लोहिया ने रामायण मेला आयोजित करवाने की वकालत की थी और राम स्वरूप वर्मा ने रामायण जलाने का नेक काम स्वयं किया था। 1970 के दशक में स्थापित वर्मा जी का अर्जक संघ तो खुले रुप में ब्राह्मणवाद को समाप्त कर मानववाद स्थापित करने को कृत संकल्पित था। अर्जक संघ ने तो वंचितों को सनातनी सोच से अलग करने के लिए आचार, विचार और व्यवहार और  इसी श्रंखला में विभिन्न विशिष्ट अवसरों (जैसे जन्म ,मृत्यु, विवाह आदि) के नियम भी बनाये हुए थे।  इस प्रकार डॉ. आंबेडकर की ही भांति रामस्वरूप वर्मा भी व्यवस्था परिवर्तन के लिए एक अलग राजनैतिक आंदोलन के साथ-साथ सांस्कृतिक परिवर्तन के आंदोलन को भी उतनी ही मुस्तैदी से चलाने के पक्षधर थे। लोहिया की नज़र में शायद इस वजह से भी वर्मा आंबेडकर से वार्ता के लिए उपयुक्त वार्ताकार थे।

इस संदर्भ में जो मुख्य प्रश्न उभरता है वह यह है कि लोहिया ने स्वयं ही अंबेडकर से वार्ता करना उचित क्यों नही समझा या फिर उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के ही अन्य बड़े नेताओं (जैसे कि राज नारायण, जनेश्वर मिश्र, राम सेवक यादव ) के माध्यम से अंबेडकर से बातचीत ना करके राम स्वरूप वर्मा को यह दायित्व क्यों दिया। मैंने राम स्वरूप वर्मा से हुई वार्ता में पहला प्रश्न यही पूछा था। वर्मा जी ने जो उत्तर दिया उससे यह साफ़ हुआ कि लोहिया यह जानते थे कि अांबेडकर और राम स्वरूप वर्मा के भारतीय समाज में व्याप्त  ऊंच-नीच, छुआ-छूत और समाज के एक बड़े अंश को शोषण से मुक्त कराने के उपायों के बिंदु पर किए जाने वाले कदमों की सोच में काफी सामंजस्य था। किसी अन्य से वार्ता होने की स्थिति में लोहिया और आंबेडकर की अलग-अलग सोच, एक साथ आने के प्रयास की राह का रोड़ा बनते। लोहिया राम स्वरूप वर्मा की वैचारिकता का लोहा मानते थे।

वर्मा को अंबेडकर से वार्ता से पूर्व लोहिया से मिला ब्रीफ

वर्मा के अनुसार लोहिया ने उन्हें कुछ ख़ास ब्रीफ शायद इसलिए भी नहीं दिया था, क्योंकि उस समय की सोशलिस्ट पार्टी में कुर्मियों में वह और यादवों में राम सेवक यादव ऐसे चेहरे थे, जिनके पास जनसमर्थन के अतिरिक्त अपनी वैचारिक सोच भी थी। उन्होंने राम स्वरुप वर्मा को इस लिए चुना क्योंकि वह दल में सबसे अधिक पढ़े- लिखे और वैचारिकता के नज़रिये से सबसे परिवक्व थे। लोहिया ने यह साफ़ किया था की यह समझौता विशेष परिस्थितियों का समझौता है जिसमें दोनों पक्ष कांग्रेस की तुलना में एक कमजोर पक्ष हैं और उनका संगठन भी उतना सशक्त नहीं है और संसाधन तो खैर बहुत सीमित हैं ही। वर्मा के अनुसार लोहिया इस तथ्य से अवगत  थे कि उत्तर भारत के लगभग 90 प्रतिशत से अधिक दलित, अल्पसंख्यक और पिछडों में अति पिछड़े, सभी उस समय मुख्यतः कांग्रेस को ही वोट देते थे। चूंकि देश भर में आंबेडकर दलितों के महापुरुष थे, हमें उन्हें पिछड़ों के साथ लेना चाहिए। समझौते में मुख्य बात यही होनी थी कि साझा उम्मीदवार उतारे जाएं और कांग्रेस को सीधी टक्कर दी जाए। वर्मा इस तथ्य से अवगत थे कि यह थोड़ा अतिरेक था, क्योंकि उस समय भी कांग्रेस और इस लोहिया -आंबेडकर  साझा मंच से इतर भी अन्य छोटे-मोटे दल भी चुनाव में उम्मीदवार उतार रहे थे और कांग्रेस कुछ उम्मीदवार सशक्त विरोधी उम्मीदवार के वोट काटने के उद्देश्य से धन-बल के आधार पर खड़ा करवाती थी। कुल मिला कर यह लाभ को अधिक करने के स्थान पर हो रहे नुक्सान को कम करना था। वैसे भी उत्तर भारत में आंबेडकर का कोई ज़मीनी राजनैतिक संगठन मौजूद नहीं था और लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी में भी कुर्मी और यादव समूह ही मुख्य रूप से साथ थे और सोशलिस्ट पार्टी ही कुछ ज़िलों तक सीमित थी। यह समझौता भविष्य में होने वाले लाभ के लिए अधिक था और तात्कालिक लाभ के लिए कम, लेकिन यह एक बेहद सार्थक शुरूआत थी।

आंबेडकर – लोहिया समझौते के मुख्य बिंदु

आंबेडकर की रामस्वरुप वर्मा से  हुई वार्ता में यह तय हुआ था कि कांग्रेस से  प्रभावी राजनैतिक  प्रतिद्वंदिता के लिए अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, अन्य पिछड़े वर्गों और दलितों को एक साथ रखा जायेगा और सभी को उनकी जनसंख्या के आधार पर वांछित प्रतिनिधित्व दिया जायेगा। इन सभी तबकों की समस्याओं को सुलझाना मंच का उद्देश्य होगा। इसे संभव बनाने के लिए सिविल नाफरमानी की जायेगी और चुनाव में साझे उम्मीदवार उतारे जायेंगे। उम्मीदवारों के चयन में किस भौगोलिक क्षेत्र में इस साझा मंच में सम्मिलित, जिस इकाई की सांगठनिक पकड़ अधिक मज़बूत है, उसे ही प्राथमिकता दी जायेगी। हर भौगोलिक क्षेत्र में और पूरे देश में उम्मीदवार कुछ इस तरह से चुने जायेंगे कि वह वंचित वर्गो के अनुमानित जनसंख्यात्मक अनुपात के अनुरुप हों। चूंकि इन दोनों ही राजनैतिक दलों को उद्योगपतियों से कोई चंदा नहीं मिलता था, अतः इनके उम्मीदवार चन्दा एकत्रित करने की खुद की क्षमता के आधार पर ही चुनाव लड़ते थे। पार्टी की ओर से चुनाव प्रचार के लिए मुख्यतः स्थानीय नेता ही  प्रयोग में लाये जाते थे। यदाकदा ही प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेता कोई बड़ी मीटिंग में बोलने के लिए आ पाते थे। कांग्रेस की तुलना में  यह एक बड़ा बेमेल मुकाबला होता था। उम्मीदवारों की व्यक्तिगत स्वीकार्यता ही, उन्हें वोट दिलाती थी। सोशलिस्ट पार्टी में स्थानीय स्तर के ढेर सारे नेता ऐसे होते थे जिनकी अपनी सार्वजनिक स्वीकार्यता और ज़मीनी पकड़ इतनी अच्छी थी कि उनमे से कुछ (अवध शरण वर्मा ‘लल्ला जी’, हरगोविंद वर्मा) को तो कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने जान से ही मरवा दिया, क्योंकि वह उनके जीवित रहते चुनाव नहीं जीत पाए थे। एक और हथियार कांग्रेस के पास था ही, वह ऐसे चुनाव क्षेत्र को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित करवा देती थी, जहां किसी विपक्षी उम्मीदवार के जीतने की संभावना होती थी।

अंबेडकर-लोहिया समझौते का क्रियान्वयन

लोहिया और डॉ. आंबेडकर के बीच हुए समझौते के क्रियान्वयन को मूर्त रुप देने में दोनों ही पक्षों के सामने व्यवहारिक कठिनाइयां थीं। डॉ. आंबेडकर ने स्वयं यह कहा था कि उन्हें अपने अनुयायियों से बहुत शिकायत थी, क्योंकि वे उनके मिशन के मुख्य निर्देश भूल चुके थे। डॉ. आंबेडकर का स्वास्थ्य भी काफी खराब चल रहा था और उन्हें देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में भ्रमण करने और चुनावी सभाओं में उपस्थित होने में बड़ी समस्या थी। वह महाराष्ट्र के भंडारा जिले से लोकसभा का उप चुनाव एक बार अवश्य लड़े, लेकिन उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। 6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया और उनकी रिपब्लिकन पार्टी कई हिस्सों में विभाजित हो गई। इस प्रकार अनुसूचित जातियों को एक ऐसे नेता से वंचित हो जाना पड़ा, जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व ही इतना आकर्षक था कि उससे  समाज के अन्य वंचित वर्गो के ढेर सारे वोटर उनकी ओर आकर्षित हो जाते थे। सबसे गंभीर कमजोरी थी वित्तीय संसाधनों की गंभीर कमी, जिसके कारण उनका चुनाव प्रचार अभियान सार्वजनिक संज्ञान से लगभग लुप्त सा हो जाता था। राम स्वरुप वर्मा ने इंगित किया कि सोशलिष्ट पार्टी भी अपने प्रभाव के मुख्य भौगोलिक क्षेत्रों- उत्तर प्रदेश और बिहार- में भी कुछ ज़िलों तक ही सीमित क्यों हो जाती थी। उनके अनुसार पार्टी के पास अपना घर फूंक कर पार्टी के लिए चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी ही बहुत कम मिल पाते थे। कुछ प्रत्याशी ऐसे भी होते थे जिनके पास धन-बल तो होता था लेकिन उनकी जनस्वीकार्यता उतनी आकर्षक नहीं होती थी। पार्टी को अनुसूचित जातियों, अल्पसंख्यंकों  और अति-पिछड़ी जातियों का भी पूरा समर्थन प्राप्त नहीं था। लोहिया की सोशलिस्ट  पार्टी ने 1955 से 1967 तक इतनी मेहनत तो अवश्य कर ली थी कि कांग्रेस का अभेद्य राजनैतिक किला कई जगह से ध्वस्त हो रहा था। इस चरण के अंत तक कांग्रेस को उत्तर प्रदेश और बिहार में सत्ता से भी बेदखल होना पड़ गया था। यद्यपि इस गठबंधन के विधायकों की इतनी संख्या नहीं हो सकी थी, जिसके बल पर वह खुद की सरकार बनाते और चलाते। उन्हें कांग्रेस के षड्यंत्रों से तो हर समय ही दो-चार होना पड़ता था। हर राज्य में कांग्रेस का कोई पिट्ठू ही गवर्नर बना बैठा होता था, जो कांग्रेस के इशारे पर विरोधी सरकारों को गिराने में अहम् भूमिका निभाता था। राम स्वरुप वर्मा ने बताया कि लोहिया का 1967 में दिवंगत हो जाना सोशलिस्ट पार्टी के लिए एक बड़ा धक्का था। उनकी मृत्यु के बाद पार्टी के कई नेताओं को कांग्रेस ने तोड़ लिया और पार्टी लगभग नेपथ्य में चली गयी। रामस्वरूप वर्मा ने आंबेडकर-लोहिया समझौते को मूर्त रुप देने के लिए अलग शोषित समाज दल बना लिया, लेकिन उसे सीमित सफलता ही मिली।

राम स्वरुप वर्मा के अनुसार 1967 में लोहिया के निधन के उपरान्त सोशलिस्ट पार्टी तितर-वितर हो गई, बाद में इसकी बची-खुची विरासत उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की जागीर बन गई। मुलायम सिंह यादव ने समाजवाद की सैफई यादव परिभाषा दी और लोहिया को अपनी कब्र में बेचैनी से बार-बार करवट बदलने की स्थिति पैदा की।

मुलायम ने सीधे-सीधे सत्ता को अपने परिवार के हित का साधन  बनाया। मुलायम की पार्टी में रामस्वरुप वर्मा जैसे ईमानदार, समर्पित और कर्मठ कार्यकर्ताओं के लिए कोई जगह नहीं थी। मुलायम सिंह यादव जिस तरीके से पार्टी को चला रहे थे, उसके चलते वर्मा जी ने शोषित समाज दल बनाया। जिसने सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक रणनीति से बहुत कुछ आंबेडकर-लोहिया समझौते के अनुरूप काम करने का प्रयास किया। यह नया दल उत्तर प्रदेश और बिहार में जगदेव प्रसाद के प्रयासों से काफी सक्रिय रहा, लेकिन सारी मुश्किल कांग्रेस की चालों से हो रही थी। वह लगातार विपक्षी पार्टियों के  सशक्त  उम्मीदवारों को तोड़ रही थी और जहां  वह ऐसा नहीं कर पा रही थी – जैसे कि बाराबंकी जिले में – वहां के विधान सभा /संसदीय क्षेत्रों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित करवा देती थी।  

रामस्वरुप वर्मा के अनुसार आंबेडकर-लोहिया समझौते को दलितों की ओर से मूर्त रूप देने का कार्य सही मायनों में अंततः बहुत बाद में कांशीराम ने किया। उन्होंने इस समझौते के सभी विन्दुओं को केंद्रित करते हुए एक आंदोलन खड़ा किया। रामस्वरुप वर्मा ने मुलायम-मायावती  गंठबंधन की 1993-1994 की एक साल सात महीने की साझा  गंठबंधन सरकार को अपनी आंखों से देखी था। उनका कहना था कि इस सरकार के टूटने के दो कारक थे: एक, कांशीराम-मायावती का सत्ता को खुद हथिया लेना और दूसरे भाजपा  द्वारा फेंके गए जाल को जानते हुए भी अनजान बने रहना। इसकी परिणति पिछड़ों और दलितों में कभी न पटने वाली खाई के रूप में हुई।  


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