भदन्त बोधानंद : ‘ब्राह्मण’ से बौद्ध भिक्षु की यात्रा

ब्राह्मण कुल में जन्मे बोधानंद ने अपने परिवार के जातीय अहंकार को तोड़ा और चीवर धारण कर समाज के उन लोगों को जवाब दिया, जो अपने को श्रेष्ठ मानकर दूसरों से अमानवीय व्यवहार करते थे। धर्म और समाज के लिए घर और बाहर के उनके संघर्ष को बता रहे हैं, मोहनदास नैमिशराय :

भिक्खु बोधानंद (1874-11 मई, 1952) पर विशेष

आजादी से पूर्व जिन शख्सियतों ने तथागत बुद्ध के बताए हुए मार्ग को शिद्दत के साथ अपनाया और समाज हित में कार्य किये, उनमें भदन्त बोधानंद जी का नाम सबसे आगे की पंक्ति में लिया जाता है। वास्तव में बोधानंद जी ने वह कर दिखाया, जिसकी जरूरत थी। किताबों से ही इतिहास आगे बढ़ता है। उन्होंने लखनऊ में लाल कुआं के नजदीक रिसालदार पार्क के अपने बुद्ध विहार में ही पुस्तकालय की स्थापना की। इसमें हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत, पाली आदि भाषाओं के ग्रन्थों को भी लाकर पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए रखा।

वे कहते थे कि किसी भी लड़ाई को जीतने के लिए किला चाहिए, सैनिक चाहिए और दुश्मन को परास्त करने के लिए गोला-बारूद चाहिए। वे कहते थे कि उनका बुद्ध विहार सैनिकों, यानी बौद्ध अनुयायियों के ठहरने और परस्पर मन्त्रणा करने के लिए किला है और पुस्तकों में लिखे विचार गोला-बारूद हैं, जिनको पढ़ कर सैनिक दुश्मन को परास्त कर सकते हैं। कहना न होगा कि बुद्ध के मानवीय दर्शन को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने यह नायाब तरीका खोज निकाला था, जो व्यावहारिक भी था और दलितों के भीतर चेतना लाने के लिए महत्वपूर्ण भी।

बोधानंद जी का जन्म चुनार के ब्राह्मण कुल में 6 मई 1874 को हुआ था। उनके पिता का नाम दीनबन्धु लाहिड़ी और माता का नाम सुवर्णा देवी था। बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो जाने के चलते वे, विधवा होने के कारण काशी में रहने वाली, अपनी मौसी के पास रहने के लिए चले गए। वहां उन्हें साधु-महात्माओं का सत्संग मिला। वहीं रह कर उन्होंने हिन्दू धर्म, संस्कृति को पढ़ा और जाना। किंतु उन्हें शांति नही मिली। फिर वे उदासीन बन, साधुओं के कपड़े पहन भ्रमण को निकल पड़े। उन्होंने कई राज्यों का दौरा किया। पंजाब भी गए। अपनी जवानी के बारह वर्ष उन्होंने वहीं बिताए।

साधु होने पर वे मुकुंद प्रकाश लाहिड़ी से बोधानंद हो गए। लोगों से मिलने और नए स्थानों को देखने, सत्संग करने आदि से उन्हें असली भारत का पता चला। सभी जगह दलितों की स्थिति विषमता से भरी हुई थी, जिसे देखकर उन्हें भारी दुख हुआ। इसी बीच वे वाराणसी लौट आए। वहीं एक दिन उनकी मुलाकात सिंघल देश से आये भिक्खुओं से हुई। यहीं से उनकी जीवनधारा बदल गई। उन्होंने बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन शुरू कर दिया। जैसे-जैसे वे बौद्ध धर्म से जुड़ते गए, उनके भीतर की अशांति दूर होती गई और उन्हें अपने भविष्य का मार्ग स्पष्ट दिखने लगा। वे फिर से कलकत्ता गए और 4 अक्टूबर 1914 को बहु बाज़ार स्थित बौद्ध धर्मंकुर विहार के संस्थापक भदन्त कृपा शरण के द्वारा उन्होंने प्रवज्या और उपसम्पदा ग्रहण की और विधिवत भिक्खु संघ में सम्मलित हो गए।

वहां से लौटकर वे लखनऊ आ गए और भारतीय बौद्ध समिति की स्थापना की। यहीं उन्होंने मित्रों और शिष्यों के सहयोग से प्लाट खरीद कर रिसालदार पार्क में पहले बुद्ध विहार की नींव रखी। इस बुद्ध विहार में उनके द्वारा स्थापित पुस्तकालय हजारों ज्ञान-पिपाशुओं के लिए अध्ययन-साधना का केंद्र बना। प्रोफेसर अंगनेलाल ने इसे अनुसंधान पुस्तकालय कहा है। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर जब कभी लखनऊ आते थे, तो इस बुद्ध विहार में अवश्य जाते और पुस्तकालय में आई नई पुस्तकों को जरूर देखते थे। जिन पुस्तकों पर लाल पेन्सिल से निशान लगा होता या टिप्पणी लिखी होती, उसके बारे में बोधानंद जी से चर्चा करते थे। बाबा साहेब ने अपनी सभी पुस्तकों की एक-एक प्रति इसी पुस्तकालय को अपने हस्ताक्षर कर भेंट की थी। पुस्तक-प्रेमी बोधानंद जी भी पुस्तकों के बारे में बाबा साहेब से नियमित चर्चा किया करते थे।

बोधानंद जी की स्पष्ट मान्यता थी कि आर्य विदेशी हमलावर थे, जिन्होंने भारत के मूलनिवासियों को छल-कपट से पराजित कर गुलाम बनाया और अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। बोधानंद जी सदैव ही ज्ञान की खोज में रहते थे और अपने उस ज्ञान को समाज तक पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील भी रहते थे। तथागत गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने हिन्दी में “भगवान बुद्ध” नाम से पुस्तक लिखी और स्वयं प्रकाशित भी कराई। उनके द्वारा लिखित “बुद्ध चर्या पद्धति” महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें उनके द्वारा परिवर्तित दलित और पिछड़े समाज के निर्मित पुराने संस्कारों के स्थान पर नए संस्कारों को अपनाने के बारे में बताया गया है। इन्हीं संस्कारों के बारे में तथागत ने समय-समय पर अपने उपासकों को बताया था। इनमें जन्म, शिक्षा, प्रवज्या, विद्यारम्भ, विवाह और अंतिम संस्कार मुख्य हैं।

बोधानंद जी की विशेषता थी कि वे सिर्फ बुद्ध विहार तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि उसके बाहर क्या हो रहा है, कैसे लोगों को जोड़ा जा सकता है, कैसे उनके बीच धार्मिक क्रांति लाई जा सकती है, इन सब बातों पर भी वे गंभीरता से विचार करते थे। वे अन्य लोगो से नियमित संवाद बनाते रहते थे। बाबा साहेब द्वारा बौद्ध धर्म में 14 अक्टूबर 1956 को दीक्षित होने से पूर्व ही बोधानंद जी का 1952 में परिनिर्वाण हो गया था। उन्होंने लखनऊ में गौतम बुद्ध मार्ग तथा रिसालदार पार्क में दो अलग-अलग बुद्ध विहारों का निर्माण कराया। आज ये बुद्ध विहार सामाजिक और धार्मिक विमर्श के महत्वपूर्ण केन्द्र हैं।

भदन्त बोधानंद जी ने दलित समाज के सम्मान के लिए जहां विकासशील सिद्धांत का प्रतिपादन किया, वहीं दलितों को व्यावहारिक बनने पर भी जोर दिया। जिस बुद्ध विहार की स्थापना उन्होंने की थी, उनके शिष्य और उत्तराधिकारी भन्ते डॉ. प्रज्ञानंद महास्थविर ने उसे संभालने की जिम्मेदारी ली। रिसालदार, लखनऊ के बुद्ध विहार का नाम भदन्त बोधानंद बुद्ध विहार कर दिया गया है। दीवान चंद्र के अनुसार, भदन्त बोधानंद महास्थविर जी आधुनिक भारत में बौद्ध धर्म के पुनर्जागरण में विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनके द्वारा किये गए कार्य अब इतिहास बन गए हैं, जिन्हें पढ़कर बहुजन समाज के लोग प्रेरित होते हैं।

(कॉपी एडिटर : अनिल)


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