गोंडवाना स्वदेश : हिंदी पत्रकारिता में प्रभावकारी हस्तक्षेप

बहुजन समाज के अन्य घटकों की तुलना में आज  उत्तर और मध्य भारत के आदिवासी सबसे अधिक दमन का शिकार हो रहे हैं। विडंबना है कि मुख्य धारा की पत्र-पत्रिकाओं में उनके विषयों को जगह भी नहीं मिल पाती है। ऐसे में सीमित संसाधनों के बावजूद गोंडवाना स्वदेश प्रभावकारी हस्तक्षेप करने में सफल हो रही है। नवल किशोर कुमार की समीक्षा :

आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित मासिक पत्रिका गोंडवाना संदेश को पढ़ते हुए हम हिंदी की बहुजन-पत्रकारिता की खूबियों और संघर्षों से परिचित होते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब दो वर्ष पहले 2016 में शुरू हुई इस पत्रिका ने कई प्रयोग किये हैं। इनमें से एक प्रयोग है गोंडवाना क्षेत्र को एक सूत्र में बांधने के साथ ही बहुजन समाज के सभी घटकों यथा आदिवासी, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग सभी को एक-दूसरे के साथ लाने का प्रयास।

इस पत्रिका की विशेषता इसकी शैली और लेखों व खबरों के चयन में झलकती है। मसलन अपने अद्यतन अंक(अप्रैल 2018) में पत्रिका ने बीते 2 अप्रैल को भारत बंद और इसकी पृष्ठभूमि पर केंद्रित आलेख को आवरण कथा के रूप में प्रकाशित किया है। आवरण कथा पत्रिका के संपादक रमेश ठाकुर ने स्वयं लिखा है। शीर्षक है – ‘भारत बंद से मोदी की सत्ता हिली’। इस लेख की शैली कथित तौर पर मुख्य धारा की पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले लेखों से अलग है।

रमेश ठाकुर, संपादक, मासिक पत्रिका गोंडवाना स्वदेश

पाठकों को खबर पढ़ने के लिए प्रेरित करने वाले हेडिंग और प्रस्तुति पत्रिका की विशेषता है। पत्रिका के दूसरे आलेख का शीर्षक देखिए – ‘अजजा/अजा अत्याचार प्रतिबंध अधिनियम 1989 पर अत्याचार’। लेखक हैं पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रदीप सुमेदार। मुख्य धारा के पत्र-पत्रिकाओं में जहां एक ओर कर्मियों की भरमार होती है, वहीं बहुजनों की पत्रिकाओं को लेखकों और अन्य कर्मियों की कमी से जुझना पड़ता है। यह इस पत्रिका में स्पष्ट दिखता है। मुख्य संपादक से लेकर संपादक मंडल के सभी सदस्य ही लेखक हैं। लेखकों की कमी बहुजन पत्रकारिता करने वाले हर छोटे-बड़े संस्थान की सबसे बड़ी समस्या है।

खैर पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रदीप सुमेदार ने अपने लेख में पाठकों के लिए एक स्ट्रैप का प्रयोग किया गया है। बोल्ड अक्षरों में कहा गया है – “2 अप्रैल 2018 की प्रात: एक नए समाज आयाम की साक्षी बनकर सामने आयी और सारे दिवस देश के सामाजिक पहलू को स्वत:स्फूर्त निर्देशित करती रही। देश के नये ताने-बाने के बदलते सामाजिक पहलू का एक अनोखा उदाहरण भी प्रस्तुत हुआ कि देश अनुसूचित जाति/जनजाति के मामले में अब नए रूप से देखने या समझने की कोशिश करनी होगी, अन्यथा देश के इस नए आयाम को समझने की चेष्टा पर प्रश्न चिन्ह खड़े होंगे।”

अतिरेकपूर्ण शब्दों से बचते हुए लेख को वैज्ञानिक तरीके से सजाया गया है। मसलन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार का आंकड़ा एक सारणी के रूप में दिखाया गया है। इसके जरिए 2011-12 में महाराष्ट्र के उन जिलों में जहां गोंड समुदाय के लोग रहते हैं वहां अत्याचार के कितने मामले सामने आये, कितने मामलों में दोष सिद्ध हुए और झूठे मुकदमों की संख्या बतायी गयी है। ये आंकड़े बताते हैं कि 2011 और 2012 में महाराष्ट्र के नागपुर, भंडारा, गोदिया, वर्धा, चंद्रपुर और गढ़चिरौली में क्रमश: 186 और 153 मामले दर्ज किये गये। 2011 में 8 और 2012 में 10 मामलों में दोषियों को सजा मिली। वहीं क्रमश: 4 और 8 मामले झूठे पाये गये।

बहुजनों के लिए अप्रैल का महीना महत्वपूर्ण है। जोती राव फुले(11 अप्रैल 1827 – 28 नवंबर 1890) और बाबा साहब डॉ. आंबेडकर(14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) का जन्म दिवस। इसका असर पत्रिका के हर लेख में देखने को मिलता है। पत्रिका राजनीतिक संकीर्णता को दरकिनार करते हुए सभी के लिए स्पेस उपलब्ध कराती है। जैसे अप्रैल के अपने अंक में पत्रिका में भाजपा के दलित सांसद उदित राज का लेख प्रकाशित है। शीर्षक है – ‘नए सिरे से पारित होना चाहिए एससी/एसटी ऐक्ट’। अपने लेख में वे कहते हैं अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 में बदलाव की आवश्यकता है लेकिन यह अधिकार संसद का है न कि न्यायपालिका को। इसी अंक में कुन्दन साहू का एक लेख है – ‘एक छत्तीसगढ़िया ओबीसी बेटा का दर्द’। इसमें लेखक ओबीसी को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण को लेकर आरक्षण विरोधियों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रमजाल को काटने का प्रयास करते हैं।

पत्रिका के अंत में एक स्तंभ है। यह स्तंभ सामान्य पत्र-पत्रिकाओं से अलग है। सिनेमा, खेल या चटपटी खबरों के बजाय इस स्तंभ को ‘दर्पण’ की संज्ञा दी गयी है। यह एक सूचना परक पृष्ठ है। उदाहरण के तौर पर अप्रेल् 2018 के अंक में देश की वर्तमान व्यवस्था में सवर्णों की हिस्सेदारी सारणी के जरिए प्रस्तुत किया गया है। इनमें जनसंख्या, राजनीति, शिक्षा, नौकरियों, उद्योग और भूमि संबंधी जानकारी दी गयी है। एक दूसरी सारणी शोषितों के संबंध में जानकारी देती है। पत्रिका राजनीति के मूल सवालों को तो उठाती ही है, ऐसे मुद्दे भी सामने लाती है जिनका संबंध तत्कालिक परिदृश्यों से होता है। जैसे दर्पण के तहत ही पत्रिका ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह के परिवारवाद की विस्तृत जानकारी दी है। पत्रिका के मुताबिक रमण सिंह और उनके परिवार के नौ सदस्य सरकार और सरकारी संस्थानों में पदासीन हैं।

इसी तरह के प्रयोग पत्रिका के द्वारा पूर्व में भी किये जाते रहे हैं। नवंबर 2017 के अंक में विशेष परिशिष्ट के रूप में आदिवासी चिंगारी प्रकाशित की गयी है। इसके तहत बिहार के पहाड़िया आदिवासियों द्वारा 1767-1825 तक चलाये गये आंदोलन से लेकर 1916 में ओडिशा के मयूरभंज में हुए आदिवासी विद्रोह का संक्षिप्त विवरण प्रकाशित है।  

पत्रिका बहुजन नायकों को आज की पीढ़ी के समक्ष सहज तरीके से प्रस्तुत का प्रयास करती है। इनमें से अनेक बहुजन नायक वे हैं जिनके बारे में शेष भारत के पास कोई जानकारी नहीं है। उदाहरणस्वरूप मार्च 2017 के अंक में पत्रिका द्वारा नागाओं की रानी अमर क्रांतिकारी मां गाइदिन्ल्यू के बारे में विस्तृत लेख प्रकाशित किया गया है। इस आलेख में केवल 16 वर्ष की उम्र में उनके द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी गयी लड़ाई का जिक्र है।  वहीं दिसंबर 2017 के अपने अंक में शहीद वीर नारायण सिंह और सामाजिक क्रांति के पुरोधा गुरू घासीदास व बाबा साहब डॉ. भीम राव आंबेडकर के बारे में विस्तृत आलेख प्रकाशित किये गये। इसी अंक में दुर्गेश नेताम का एक अालेख भी संकलित है जिसमें उन्होंने बस्तर की आदिवासी संस्कृति में ‘वन वृक्ष देव’ के बारे में बताया है। यह लेख बताता है कि आदिवासी मूल रूप से प्रकृति पूजक हैं। उनका हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।

पत्रिका के संपादक रमेश ठाकुर स्वयं एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं। पत्रिका के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि इसके पहले वे ‘गोंडवाना दर्शन’ नामक पत्रिका के साथ जुड़े थे। लेकिन कुछ विवाद के कारण उन्हें ‘गोंडवाना स्वदेश’ की शुरूआत करनी पड़ी। पत्रिका नियमित रूप से प्रकाशित होती रहे, इसके लिए आवश्यक वित्त का इंतजाम सामुदायिक सहयोग से होता है। आलेखों के संपादन, प्रुफ रीडिंग और डिजायनिंग आदि के लिए रमेश ठाकुर के पास 8-10 लोग हैं। ये गोंडवाना भूभाग से संबंध रखते हैं। इनमें अधिकांश विभिन्न विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे युवा हैं। इसके अलावा पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य हैं। इनमें रायपुर से भारत सिंह, तुहीन, वर्धा से नरेश कुमार साहू, वसुधा मंडावी, गांधीनगर से संतोष कुमार बंजारे, कांकेर से कमल शुक्ला, दुर्ग से लक्ष्मीनारायण कुंभकार और बलोदाबाजार से संतोष कुमार वर्मा शामिल हैं।


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें :

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply