कंधों पर लाश ढोता देश का नया लोकतंत्र

ऐसे कई वाकये सामने आए हैं जब देश में सरकारी अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता ने मानवीयता को लज्जित किया है। ओडिशा, बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड तक गरीबों को अपने प्रियजनों की लाश कंधों पर उठाकर ले जाने के लिए बाध्य होना पड़ा है। पढ़िए कमल चंद्रवंशी की रिपोर्ट :

देश की स्वास्थ्य सेवाएं दम तोड़ रही हैं। देश के संपन्न वर्ग तो अपना इलाज पांच सितारा निजी अस्पतालों में जाकर करा लेते हैं क्योंकि उनके पास इतना पैसा है, पर इसी देश के किसी दलित, गरीब, वंचित और हाशिए पर जी रहे लोगों की सोचिए तो इनकी दुःख भरी दास्ताँ सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक के बाद एक कई दिल दहला देने वाले मामले सामने आए हैं। इनमें सबसे नया है बीते 3 मई को देहरादून अस्पताल का मामला जहां एंबुलेंस देने से इनकार करने पर बिजनौर के पंकज को अपने भाई की लाश कंधों पर लादकर अस्पताल से अपने गाँव ले जाने को मजबूर होना पड़ा।

बीते 3 मई को देहरादून में अपने भाई की लाश को पीठ पर लाद कर ले जाते पंकज

यह कुछ वैसे ही है जैसे पिछले साल इसी महीने के शुरू में इटावा में अपने 15 साल के बेटे को अस्पताल ले गए शख्स को पहले तो पांच मिनट के भीतर ही यह कह दिया गया कि उसके बेटे की मौत हो चुकी है। फिर जब वह बाहर निकला तो लाख मिन्नत के बाद भी उसे शव ले जाने के लिए एंबुलेंस देने से मना कर दिया गया। उसे भी अपने बेटे की लाश कंधे पर उठाकर घर अपने घर तक ले जाने जाने को विवश होना पड़ा था।

इटावा के उदयवीर अपने बेटे की लाश कंधे पर लादकर ले जाते हुए

दून मेडिकल कॉलेज में एम्बुलेंस के लिए पंकज ने अस्पताल के स्टाफ के सामने गिड़गिड़ाया, इमरजेंसी वार्ड के बाहर भी लोगों से मदद मांगी कि उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो अपना वाहन लेकर भाई के शव को घर ले जा सके। इंतजामों से कथित तौर पर लैस सिस्टम उसकी मदद को आगे नहीं आया। व्यवस्था की बदहाली के सामने वह आखिर हार गया। पंकज ने हिम्मत जुटाई और अपने भाई की लाश कंधे पर उठा बिजनौर के अपने गांव धामपुर चल पड़ा।

पंकज के छोटे भाई सोनू के फेफड़े में इंफ्केशन था। घर वालों के पास जितने भी पैसे थे उससे उन्होंने उसका इलाज कराया, लेकिन सोनू की हालत में सुधार नहीं हुआ। धामपुर के डॉक्टर ने सोनू को किसी बड़े अस्पताल में दिखाने की सलाह दी। महंगे अस्पताल में अपने भाई का इलाज कराना पंकज के लिए संभव नहीं था। पंकज उसे देहरादून ले आया और उसे दून मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवा दिया। 3 और 4 मई की दरमियानी रात सोनू की मौत हो गई।

बताया जाता है कि पंकज एक निजी एंबुलेंस सेवा के ऑपरेटर से मिला जिसने पांच हजार रुपये मांगे। लेकिन इतने पैसे पंकज के पास नहीं थे। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ दूर शव ढोने के बाद पंकज को कुछ किन्नरों ने देखा तो मदद की पेशकश की और उसे 3 हजार रुपये दिए। प्राइवेट ऑपरेटर आखिर 3 हजार रुपये में शव ले जाने पर राजी हुआ। यह एक हृदयविदारक दृश्य था।

उत्तराखंड और यूपी में स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठते रहे हैं। उत्तराखंड में 108 नंबर की एम्बुलेंस सेवा सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। उत्तराखंड स्वास्थ्य महकमा का इस समय पूरा ध्यान चार धाम यात्रा के श्रद्धालुओं के लिए सड़कों पर मेडिकल कैंप लगाने पर है। यूपी में तो स्वास्थ्य महकमा पिछले साल तक एंबुलेंस की पुताई (एंबुलेंस में लिखी ‘समाजवादी एंबुलेंस सेवा’ के तीन शब्दों में से ‘समाजवादी’ शब्द हटाने की कवायद) में ही लगा रहा।

घटना के 48 घंटे बाद भी दून का अस्पताल प्रशासन इस घटना पर बात करने से से भागता रहा। दून मेडिकल कालेज के सुपरिंटेंडेंट के. के. टम्टा ने कहा कि उनकी जानकारी में ऐसा कोई मामला नहीं आया। अस्पताल ने साफ किया, “किसी ने शव ले जाने के लिए अस्पताल से सहायता मांगी ही नहीं।” सीसीटीवी फुटेज बाहर आ चुका था, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट बचाव में आ गए। उन्होंने कुछ कागजों की तरफ़ देखते हुए कहा- “अस्पताल के पास ऐसा अलग से कोई शव-वाहन या एंबुलेंस नहीं है जिसमें शव को लेकर जाने की व्यवस्था हो…!”

टम्टा ने कहा, “पहली बात यह कि लाश को एंबुलेंस में नहीं ढोया जाता है। दूसरा, अस्पताल का नियम है कि एंबुलेंस 18 रुपये प्रति किलोमीटर के भुगतान पर उपलब्ध कराई जाती है। हम लोग नियमों से बंधे हुए हैं।”

घटना के फ़ौरन बाद इस संवाददाता ने शुक्रवार 4 मई को देहरादून के मुख्यमंत्री कार्यालय से पूछा तो वहां से कहा गया, “सीएम इस घटना से व्यथित हैं।” मुख्यमंत्री शाम होते-होते खुद ही कैमरों के सामने आ गए और कहा, “मैंने मुख्य सचिव को कहा है कि इस घटना को लेकर शाम तक रिपोर्ट दी जाए। यह घटना राज्य के लिए बहुत शर्मनाक है।”

इटावा में क्या हुआ था

उदयवीर अपने 15 साल के लाडले को इलाज कराने सरकारी अस्‍पताल लेकर गया था। लेकिन अस्‍पताल में डॉक्‍टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उदयवीर ने कहा था कि डॉक्‍टरों ने उसके बच्‍चे को सिर्फ कुछ मिनट तक देखा और कहा कि वो मर चुका है। अस्‍पताल की ओर से उसे और कोई भी सुविधा नहीं मिली। उसके पास पैसे नहीं थे लिहाजा उसे अपने बेटे के शव को कंधे पर रखकर निकलने को मजूबर हुआ। मामले पर सीएमओ राजीव यादव ने कहा था कि घटना से हॉस्पिटल की इमेज ख़राब हुई, गलती अस्पताल की ही थी।

सत्ता का चरित्र

यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के निर्वाचन क्षेत्र कौशांबी में जून 2017 में सरकारी अस्पताल ने एक व्यक्ति को अपनी भांजी का शव ले जाने के लिए एम्बुलेंस नहीं दी। परिजन अपने कंधे पर उसका शव रखकर ले गए। उधर, नीतीश राज में पटना में आईजीआईएमएस में पिछले साल 27 जुलाई को एक पिता को 5 साल के बेटे का शव ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं दिया गया। यह पिता भी अपने बेटे का शव कंधे पर उठाकर लगभग एक किलोमीटर तक गया। बाद में शव को प्राइवेट वाहन से परिजन ले गए। मामले के कुछ ही घंटे बाद संबंधित स्टाफ का इधर-उधर तबादला किया गया। पिता राजेंद्र कुमार का आरोप था कि उन्होंने बच्चे के शव को घर ले जाने के लिए अपर चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर संजय कुमार से एंबुलेंस की मांग की लेकिन उन्होंने देने से इनकार किया।

2016 में ओडिशा के कालाहांडी में दाना माझी दस किलोमीटर तक पत्नी के शव को कंधे पर उठाकर ले गया था। माझी की पत्नी 42 साल की अमंग देवी का भवानीपटना के हॉस्पिटल में टीबी का इलाज चल रहा था, जहां उसकी मौत हुई। दाना माझी ने बताया था, ”हॉस्पिटल ने कहा हमारे पास कोई गाड़ी नहीं है। मैं गिड़गिड़ाया और कहा असमर्थ हूं पैसे देने में। प्राइवेट गाड़ी में पत्नी की लाश ले जाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। लेकिन उन्होंने इसे अनसुना कर दिया और कहा कि हम मदद नहीं कर सकते।” हारकर माझी ने पत्नी के पार्थिव शरीर को कपड़ों में बांधा और 45 किलोमीटर दूर अपने गांव ले जाने का फैसला किया। राज्य सरकार ने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ‘महापरायण’ योजना चला रखी जिसमें सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक शव को पहुंचाने के लिए मुफ्त परिवहन की सुविधा दी जानी थी। लेकिन यह प्रावधान माझी के किसी काम नहीं आया।

वर्ष 2016 में उड़ीसा के कालाहांडी में अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर लादकर ले जाते दाना माझी

माझी प्रसंग के बाद यहीं बालासोर (ओडिशा) में एक और दर्दनाक मंज़र सामने आया। यहां के एक स्वास्थ्यकर्मी ने लाश के ऊपर खड़े होकर अपने पैरों से उसका कूल्हा तोड़ा ताकि लाश को छोटा करके उसकी गठरी बनाकर ले जाने में सहूलियत हो।

दरवाजे पर लाश को लांघता सिस्टम

प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक और ‘शुक्रवार’ के संपादक अंबरीश कुमार ने कहा, “यह सब बेहद अमानवीय है। इसके लिए अस्पताल के साथ ही शासन और प्रशासन के आला अफसर भी जिम्मेदार हैं जो ऐसे मामले सामने आने पर कोई कार्रवाई नहीं करते। दरअसल स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर सरकार की नीतियां बहुत हद तक जन-विरोधी रही हैं। इसकी वजह से सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ता होती गई और निजी अस्पताल लूट के नए अड्डे के रूप में विकसित होने लगे हैं। कस्बों में सरकारी अस्पतालों में न तो दवा मिलेगी न एंबुलेंस। कैसे कोई गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाए या जब किसी की मौत हो जाए तो उसे किस तरह उसकी लाश घर लाए। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।”

अंबरीश कुमार,वरिष्ठ पत्रकार

उत्तराखंडवासी रतन सिंह असवाल का कहना है कि केंद्र सरकार से राज्यों को नागरिकों के इलाज के लिए जनसंख्या के आधार पर धन मिलता है। निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश को उत्तराखंड से ज्यादा धन मिलता है, तो क्या उत्तर प्रदेश अपने संसाधनों और केंद्र की सहायता से मिलने वाले धन से भी अपने राज्य के नागरिकों का इलाज करने में सक्षम नहीं है? देहरादून में जो हुआ है वह सिस्टम की शर्मनाक हालात बयां करता है। यह वाकया दून मेडिकल कॉलेज का है और खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इस महकमे के मंत्री भी हैं।

जोत सिंह नेगी

देहरादून में कांग्रेस के नेता जोत सिंह नेगी से हमने संपर्क किया तो उन्होंने मुख्यमंत्री और अस्पताल प्रशासन पर सवाल उठाया और कहा, “सच तो यह है कि सीएम पूरी स्थिति से अवगत हो चुके थे – फिर भी उन्होंने कहा कि उन्हें अख़बारों में इस घटना की तस्वीर देखने के बाद इसकी जानकारी हुई – उनका दायित्व था कि वह पीड़ित की तत्काल मदद करते। पर पहले शाम तक, फिर एक हफ्ते के बाद उन्होंने जांच के कोरे आदेश दिए।”

चिकित्सा अधीक्षक केके टम्टा पर के बयान पर नेगी ने कहा, “आप अस्पताल के हेड हैं – एक आदमी जो अकेला अस्पताल आया है उसका भाई मर गया है, क्या यह अस्पताल का फर्ज नहीं है कि वह यह पता करे कि उस शख्स पर क्या बीत रही है? एंबुलेंस तो दूर की बात, आपकी मशीनरी देहरी पर पड़ी लाश को लांघकर आगे बढ़ जाती है…।”

(कॉपी एडिटर : अशोक)


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