बहुजनों के वैचारिक योद्धा छेदी लाल साथी

डाॅ. छेदी लाल साथी उत्तर प्रदेश के पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष थे। साथ ही वह बोधानंद और शिवदयाल चौरसिया के बाद के दौर के सबसे जुझारू बहुजन योद्धा थे। बाबा साहेब के परिनिर्वाण के बाद उत्तर प्रदेश में रिपब्लिकन पार्टी को स्थापित करने में उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बारे में विस्तार से बता रहे हैं कँवल भारती :

अगर एक पंक्ति में परिचय देना हो, तो छेदी लाल साथी (1 फरवरी 1921, – 13 नवंबर 2004) उत्तर प्रदेश के पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष थे। किन्तु दूसरी पंक्ति में वह बोधानंद और शिवदयाल चौरसिया के बाद के दौर के सबसे जुझारू बहुजन योद्धा थे।

डॉ. छेदी लालसाथी (1 फरवरी 1921, – 13 नवंबर 2004)

सबसे पहले मैंने उनके बारे में अपने शहर रामपुर में ही सुना और वह भी एक कवि-शायर के मुँह से। सिर्फ सुना ही नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी किताब ‘अतीत से बातें’ में बाकायदा उनका जिक्र भी किया है। यह शायर थे रघुवीरशरण दिवाकर राही, जो शायरी में दिवाकर राही के नाम से मशहूर थे। उनका ‘शराबी’ पिक्चर में यह शे’र बहुत मकबूल हुआ था- ‘आज तो उतनी भी मयस्सर नहीं मयखाने में, जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में’ उनके साथ मेरा काफी उठाना-बैठना था। मैं उन दिनों (1994-98) सिविल लाइंस में उनकी कोठी के पीछे रोशन बाग में सरकारी छात्रावास के आवास में रहता था। रविवार को कभी-कभी वह भी मेरे घर पर आ जाते थे और मैं तो उनके पास जाता ही रहता था। एक दिन जब मैं उनके निवास पर गया, तो मैंने देखा कि उनके पास एक सांवले रंग के दुबले-पतले व्यक्ति बैठे हैं, जिनकी आँखों पर काले फ्रेम का मोटे लेंस का चश्मा था। दिवाकर जी शहर के नामीगिरामी वकील भी थे। इसलिए उनके होने से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। उनके घर में मुझे सभी जानते थे, इसलिए मैं बिना समय लिए कभी भी शाम को अचानक ही उनके बैठके में चला जाता था।

डॉ. छेदी लाल साथी से परिचय

उस दिन भी अचानक ही चला गया था। वह चाय पी रहे थे। मुझे देखकर बैठने को कहा और आवाज देकर एक चाय मेरे लिए भी मँगवायी। यह तो मैं जान गया था कि ये सज्जन कोई मेहमान हैं, क्योंकि वह रामपुर के कतई नहीं लग रहे थे। एक लड़का चाय दे गया, तो दिवाकर जी मुझसे बोले, ‘आप इन्हें जानते हैं?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ चहेरे से तो नहीं जानता, आप नाम बताएं, शायद जानता होऊं।’ बोले, ‘आप छेदी लाल साथी हैं। लखनऊ से तशरीफ़ लाये हैं।’ जब नाम सुना, तो मैंने आश्चर्य से दिवाकर जी से कहा कि ‘मैंने तो इनकी किताब भी पढ़ी है, जो आपने ही मुझे पढ़ने को दी थी।’ मैंने आगे कहा, ‘वह किताब ‘पिछड़े वर्गों का आरक्षण’ आज भी मेरे पास मौजूद है, जो साथी जी ने अपने हस्ताक्षर से 20 मार्च 1982 को आपको सप्रेम भेंट की थी।’ अब मैं साथी जी से मुखातिब हुआ, ‘सर मैं कुछ-कुछ आपको पहचानने की कोशिश तो कर रहा था, पर बार-बार दिमाग में गया प्रसाद प्रशांत जी का चेहरा घूमे जा रहा था। उनकी शक्ल बिल्कुल आपसे मिलती है। पर अगर प्रशांत जी होते, तो मुझे तुरन्त पहचान लेते, मगर आप तक दिमाग नहीं पहुँच पा रहा था, इसलिए मैं मौन था।’ अब दिवाकर जी ने मेरा परिचय दिया, ‘यह कँवल भारती हैं।’ मेरा नाम सुनते ही साथी जी बोले, ‘कांशीराम के दो चेहरे वाले। तो आप रामपुर से हो?’ इस तरह छेदी लाल साथी से मेरा पहला परिचय रामपुर में ही हुआ था।   

नेहरु सरकार द्वारा पिछड़े वर्गों के अधिकारों की हत्या? लेखक डॉ. छेदी लाल साथी, सम्यक प्रकाशन

बहुजनों के लिए निकाली पत्रिका  

मैं 1980 से 1986 तक नौकरी के लिए संघर्ष और नौकरी के दौरान लखनऊ में ही रहा था। 104, रायल होटल (जहाँ अब बापू भवन है) से लेकर रिसालदार पार्क के बुद्ध विहार तक और इंदिरा नगर से अलीगंज तक मैं अनेक ठिकानों पर रहा। इन सात साल में ताड़ीखाना, कुकरेल, भूतनाथ, चिनहट, एचएएल गेट, हाईकोर्ट, अमीनाबाद, रानीगंज, नाकाहिंडोला, गुइन रोड, नजीराबाद, लाटूश रोड, जो गौतम बुद्ध मार्ग है, लालबाग, कैसर बाग, चारबाग, चौक, रकाबगंज, मौलवीगंज, और हजरतगंज के इलाके में जितना मैं पैदल चला और घूमा हूँ, उस दर्द को सिर्फ मैं ही जानता हूँ। इस दौरान मैं दलित-पिछड़े वर्ग के अनेक नेताओं, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के संपर्क में आया, जिन्होंने काफी हद तक मुझे प्रभावित भी किया। इन सात साल में मैं पूरी ईमानदारी के साथ कहता हूँ कि मैंने किसी के भी मुंह से छेदी लाल साथी का नाम नहीं सुना। उस 104, रायल होटल में भी मैंने उन्हें कभी नहीं देखा, जहाँ पूरे प्रदेश से बहुजन समाज के अधिकारी और नेता आकर बैठते थे। हाँ, इस दौरान जब भी कभी मैं लालबाग के इलाके में कन्धारी बाज़ार से होकर गुजरता था, तो रास्ते में एक घनी बस्ती की एक दीवार पर बहुजन प्रिंटिंग प्रेस का साइन बोर्ड लगा हुआ देखता था। मैं अनगिनत बार उधर से गुजरा होऊँगा और हर बार उस साइन बोर्ड को देखकर मुझे बस एक ही ख्याल आता था कि क्या जिज्ञासु जी की प्रेस यहाँ आ गयी है, क्योंकि बहुजन नाम से मुझे हमेशा उनके ही प्रकाशन का बोध होता था। हालाँकि, वह एक छोटी सी प्रेस थी, जो बहुत बार बंद मिलती थी। कई साल के बाद, संभवत: 1990 में, जब दिवाकर जी के सौजन्य से मुझे उनकी किताब ‘पिछड़े वर्गों का आरक्षण : इस युग की चुनौती’ मिली। उसमें 48, कन्धारी बाजार का पता छपा देखा, तो मालूम हुआ कि वह प्रेस छेदी लाल साथी जी की थी और वहीँ उनका रिहायशी मकान भी था। किन्तु वह रहते इंदिरा नगर के ए ब्लॉक में थे। एक बार शायद जब वो बीमार थे, तब दारापुरी जी के साथ मैं उनके मकान पर गया था। वहाँ भी उन्होंने मुझसे दिवाकर राही जी के स्वास्थ्य के बारे में पूछा था। बस कुल मिलाकर यही दो मुलाकातें उनसे मेरी हुई थीं।

साथी की राजनीतिक गतिविधियाँ

जहां तक मैं जानता हूँ कि उनके दो कार्य-क्षेत्र थे। एक, वह हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता थे और दूसरे, वह दलीय राजनीति में सक्रिय रहे। साहित्य से उनका कोई बहुत ज्यादा गहरा सम्बन्ध नहीं रहा था। लेकिन इसके बावजूद अनेक साहित्यकार उनके मित्र थे। इनमें नन्द किशोर देवराज, जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, एहसान दानिश, फ़िराक गोरखपुरी और दिवाकर राही रामपुरी उनके घनिष्ट संपर्क में थे। सामाजिक आंदोलनों में उनके प्रेरणा स्रोत के रूप में उन्हें डाॅ. आंबेडकर, राहुल सांकृत्यायन, आनन्द कौसल्यायन, बोधानन्द महास्थविर, रामचरन निषाद और शिवदयाल चौरसिया का सान्निध्य मिला था।

राजनीति के मैदान में उन्होंने अनेक बड़े राजनीतिज्ञों के साथ काम किया था, जिनमें जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, डाॅ. लोहिया, डाॅ. जेड.ए. अहमद, राहत मौलाई, डाॅ. फरीदी, अली मियाँ साहेब, सैयद बदरुद्दीन और इब्राहिम सुलेमान सेठ उल्लेखनीय हैं। वह रामास्वामी नायकर से भी बहुत प्रभावित हुए थे और जब वह लखनऊ आये थे, तो उनकी राजनीतिक गतिविधियों में भी उनके साथ काम करते थे।

जयंती के मौके पर याद किए गये डॉ. छेदी लाल साथी

बाबा साहब डाॅ. आंबेडकर के परिनिर्वाण के बाद रिपब्लिकन पार्टी को स्थापित करने में उत्तर प्रदेश में उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1959 से 1964 तक वह उत्तर प्रदेश में पार्टी के अध्यक्ष रहे थे। इसी पार्टी से वह 1964 में विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए और 1970 तक इस पद पर रहे। उसके बाद महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी में हुई अंतर्कलह और फूट से तंग आकर वह कांग्रेस में चले गए। कांग्रेस की ओर से वह फिर से उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हो गए और 1976 तक बने रहे।

कहा जाता है कि रिपब्लिकन पार्टी छोड़ने के बाद कांग्रेस में उनकी उपस्थिति सिर्फ अपने तक ही रह गई थी। वह दलित-पिछड़ों की आवाज तो उठाते थे। पर उसी वक्त कांग्रेस में अपनी उपेक्षा महसूस करते थे। ठीक जगजीवन राम की तरह, जो सत्ता में न रहने पर दलित की बात करते थे और सत्ता में रहकर दलित को भूल जाते थे। शायद इसीलिए 1973 में कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने साथी जी को रूस, जर्मनी, टर्की, ग्रीक, हाॅलैंड, इटली, चेकोस्लोवाकिया, ईरान आदि देशों के दौरे पर भेज दिया। जिस तरह एक समय कांग्रेस के नेता रामधन को दलितों पर सर्वाधिक मुखर होने के कारण अनेक देशों की यात्रा पर भेजकर शांत कर दिया था। संभवत: साथी जी को भी इसी मकसद से विदेश यात्रा पर भेजा गया था। किन्तु साथी जी इस प्रकृति के बिल्कुल नहीं थे। विदेश यात्रा से जैसे ही साथी जी लौटकर आये वह पिछड़े वर्गों की समस्याओं पर फिर मुखर हो गए और इतने जोरदार ढंग से मुखर हुए कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की हेमवती नंदन बहुगुणा सरकार को सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने के लिए बाध्य कर दिया। परिणाम स्वरूप 31 अक्टूबर 1975 को वह उस आयोग के अध्यक्ष नियुक्त कर दिए गए।

पिछड़ा वर्ग आयोग के पहले अध्यक्ष बने साथी

संभवत: साथी आयोग उत्तर प्रदेश का पहला आयोग था, जिसने पूरे प्रदेश की अति पिछड़ी जातियों का अध्ययन करके 17 मई 1977 को अपनी रिपोर्ट पेश की थी। उन्होंने पिछड़े वर्गों की तीन श्रेणियाँ बनाकर 29.5 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। उन्होंने पहली श्रेणी में भूमिहीन और अकुशल मजदूरों को 17 प्रतिशत, दूसरी श्रेणी में दस्तकार और किसानों को 10 प्रतिशत और तीसरी श्रेणी में मुस्लिम पिछड़ी जातियों को 2.5 आरक्षण देने की संस्तुति की थी। किन्तु सरकार ने साथी आयोग की सिफारिशों को नहीं माना।

अतीत से आज तक के भारतीय इतिहास में दलित व पिछड़ी जातियों की स्थिति : लेखक डॉ. छेदी लाल साथी, सम्यक प्रकाशन

उल्लेखनीय है कि साथी जी जनवरी 1980 से दिसंबर 1980 तक मंडल आयोग के भी उत्तर प्रदेश से को-आप्टेड (सहयोगी) सदस्य रहे थे। नि:सदेह हम कांग्रेस पर यथा स्थिति बनाये रखने या प्रतिरोध को शांत करने का आरोप लगा सकते हैं। …और यह है भी। पर इस सत्य की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि इसके बावजूद कांग्रेस ने दलित प्रतिभा को न सिर्फ उभरने का मौका दिया है। बल्कि, जनहित में उस प्रतिभा का लाभ भी उठाया है। दलित-पिछड़े वर्ग को राजनीति में यह स्पेस अभी तक किसी अन्य पार्टी ने नहीं दिया है। छेदी लाल साथी साहित्य में पीएचडी थे। इसलिए कहना चाहिए डाॅ. छेदी लाल साथी ने कांग्रेस में रहकर सिर्फ कांग्रेस के लिए ही नहीं, बल्कि बहुजन समाज के लिए भी काम किया।

साथी जी के बारे में मुद्राराक्षस

प्रसिद्ध बहुजन आलोचक मुद्राराक्षस ने अपने एक लेख में लिखा है कि लखनऊ की ‘आंबेडकर महासभा लंबे अरसे से ऐतरेय जैसे वफादारों की शरणस्थली बन चुकी है। वर्ना, ऐसा क्यों होता कि कुछ बरस पहले जब मुंबई में हिन्दू तालिबानों ने आंबेडकर की मूर्ति को अपमानित किया था, तो सारे देश में इसका जबरदस्त प्रतिरोध  हुआ था। कुछ नहीं हुआ था तो वहां, जहां यह महासभा है।’

इस टिप्पणी के बाद मुद्रा जी डाॅ. छेदी लाल साथी के सम्बन्ध में एक घटना का उल्लेख करते हैं। ‘अभी कोई तीन-चार बरस पहले कम्युनिस्ट पार्टी और दलित चिंतकों के बीच एक संवाद की कोशिश हुई थी। ए.बी. वर्धन भी उसमें आये थे और डाॅ. छेदी लाल साथी भी थे। डाॅ. छेदी लाल साथी आंबेडकर के साथ थे। दलित और पिछड़ों के आयोगों में उनकी बड़ी भूमिका रही है। मंत्री भी रह चुके हैं। उन्होंने खुलकर दलित पक्ष से बोलते हुए बताया कि दलित नेताओं का कम्युनिस्टों से क्या विरोध है। ए.बी. वर्धन अत्यंत कुशल और प्रभावशाली वक्ता हैं। लिहाजा उन्होंने भी विरोध नहीं किया। उन्होंने बताया कि उन्हें दलित नेतृत्व से क्या शिकायतें हैं।’

इस घटना को स्मरण करते हुए मुद्रा जी अपने विषय पर आते हैं— ‘मैं दोनों की ही इज्जत करता रहा हूँ। अध्यक्ष के तौर पर मैं दोनों ही पक्षों पर अफ़सोस जाहिर कर सकता था कि संवाद जैसी चीज का प्रयत्न वहाँ नहीं हुआ, जहाँ होना था। आज जब आंबेडकर महासभा में शिलान्यास एक भारतीय जनता पार्टी के नेता के हाथों बड़े गर्व से करा डाला गया। मुझे डाॅ. छेदी लाल साथी का वह तेवर याद आ रहा है, जो उन्होंने ए.बी. वर्धन के सामने बोलते हुए दिखाया था।’

आगे मुद्रा जी बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं- ‘डाॅ. साथी उक्त आंबेडकर महासभा का संचालन करते हैं। डाॅ. साथी और पारसनाथ मौर्य जैसे उनके साथी जब बोधिवृक्ष नष्ट करने वाली विचारधारा का इतना स्वागत करते हैं, तो कम्युनिस्ट का विरोध करें, यह गुत्थी थोड़ी खुलती दिखती है। सच का खुलासा ज्यादा मुश्किल नहीं है। ब्राह्मणों का दलाल बन जाने के बाद ऐतरेय दलित विरोधी ही नहीं हुआ था, सवर्णों का सबसे अग्रणी सहायक भी बन गया था। आंबेडकर महासभा के ऐतरेयों को जब सवर्ण सत्ताधारी पसंद आता है, तो कम्युनिस्ट भी बुरा लगेगा, मुलायम सिंह भी और मायावती भी। बहस में वह इन्हें अपना दुश्मन घोषित करेगा।’

यह मुद्रा जी का अतिवादी विश्लेषण हो सकता है, पर यह सच है कि आंबेडकर महासभा के पदाधिकारी कम्युनिस्टों से दूरी और भाजपा के नेताओं के साथ अपनी निकटता दिखाते रहे हैं और डाॅ. छेदी लाल साथी भी उनसे अलग नहीं थे।

चलता रहा पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन

80 के दशक में एक दलित आईएएस अधिकारी डी.पी. वरुण ने इन्दिरा नगर, लखनऊ में प्रेस लगायी थी, जब उन्होंने एक पत्रिका निकालने की योजना बनायी, तो डाॅ. साथी से उनका सलाह-मशविरा हुआ। शायद साथी जी भी कोई अखबार या पत्रिका निकाल रहे थे, जिसका नाम ‘गरिमा भारती’ था। गरिमा साथी जी की बेटी का नाम है। साथी जी ने वरुण जी को इसी नाम पर राजी कर लिया। अत: साथी जी के संपादन में वरुण जी की संस्था से ‘गरिमा भारती’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू हो गया, जो डिमाई आकार में थी और कुछ-कुछ दिल्ली प्रेस की पत्रिका ‘सरिता’ का अहसास कराती थी। संभवतः उसी समय या बाद में डाॅ. अँगने लाल भी उससे जुड़ गए थे। पर यह पत्रिका लम्बी नहीं चली, और चल भी नहीं सकती थी, क्योंकि साथी जी और वरुण जी के विचार समान नहीं थे। उनके विचार समान हो भी नहीं सकते थे। कारण, एक तरफ राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ थीं। दूसरी तरफ सामाजिक और बौद्ध धर्म की विचारधारा थी, जिनमें टकराव होना ही था। वह पत्रिका काफी लम्बे अरसे तक बंद रही। लेकिन, आजकल वरुण जी चार पन्नों के अखबार के रूप में उसके प्रकाशन की रस्म अदायगी कर रहे हैं।

साथी जी की किताबें

1982 में प्रकाशित डाॅ. साथी की किताब ‘पिछड़े वर्गों का आरक्षण : इस युग की चुनौती : संवैधानिक व ऐतिहासिक पृष्टभूमि में’ उनकी पहली पुस्तक थी, जो उन्होंने ऐसे समय में लिखी थी, जब वह उत्तर प्रदेश कानूनी सहायता बोर्ड के सदस्य थे। इस पुस्तक पर अनेक विद्वानों और नेताओं ने अपनी सम्मतियाँ लिखीं हैं। इनमें कर्पूरी ठाकुर, सीताराम निषाद, शिवदयाल सिंह चौरसिया और डाॅ. नंदकिशोर देवराज मुख्य हैं। डाॅ, देवराज हिन्दी के प्रखर कवि और आलोचक थे और वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष रह चुके थे। वह लखनऊ में निशातगंज में रहते थे, जहाँ मैं उनसे पहली बार मिला था। मेरे लिए यह गौरव की बात थी कि उनका गृह जनपद रामपुर ही था। साथी जी की किताब पर उन्होंने सबसे विचारोत्तेजक टिप्पणी लिखी थी, जो यह थी—‘मेरा अनुमान है कि इस देश में दूसरी क्रान्ति होने वाली है, जो आर्थिक क्रान्ति से भी भीषण होगी, अर्थात् ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मानववाद की क्रान्ति, तथाकथित ऊँची जातियों के विरुद्ध दलित व पिछड़ी जातियों का खुला विद्रोह। यदि सवर्ण हिन्दुओं ने सहज भाव से उक्त जातियों को अधिकार नहीं दिए तो रक्त भरी क्रान्ति अनिवार्य है।’

पिछड़े वर्गों पर चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु की 1957 में लिखी गई पुस्तक ‘पिछड़ा वर्ग कमीशन की रिपोर्ट और पिछड़े वर्ग के वैधानिक अधिकारों का सरकार द्वारा हनन’ के एक लम्बे अरसे के बाद संभवत: यह पहली पुस्तक थी, जो डाॅ. साथी ने पिछड़े वर्गों की स्थिति पर लिखी थी। 80 के दशक के अंत में गुजरात और तमिलनाडु में आरक्षण के विरोध में सवर्णों के तीव्र आन्दोलन हुए थे। दूसरी तरफ फरवरी 1982 में कर्पूरी ठाकुर, रामनरेश यादव और चौधरी ब्रह्मप्रकाश के नेतृत्त्व में पिछड़े वर्गों ने अपने वैधानिक अधिकारों के लिए दिल्ली में विशाल प्रदर्शन किया था। डाॅ. साथी ने इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी थी, और जिसका उद्देश्य आरक्षण-विरोधियों के सोये हुए विवेक और उनकी मानवीय नैतिकता को जगाना था।

इस किताब के लगभग 10 साल बाद 1992 में डाॅ. छेदी लाल साथी की दूसरी किताब “भारत की आम जनता-शोषण मुक्त व अधिकार-युक्त कैसे हो” प्रकाशित हुई। इसके पहले पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है- ‘फ्रांस की जनक्रान्ति की पृष्ठभूमि में आज के भारतीय समाज का मूल्यांकन।’ लेकिन, यह पुस्तक वास्तव में पहली पुस्तक का ही विस्तार है। इसमें पिछड़े वर्गों के उन अनेक नेताओं का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है, जिनके साथ उन्होंने काम किया था। किताब के अंत में डाॅ. साथी लिखते हैं कि पिछड़े वर्गों के सामने दो ही रास्ते हैं- एक शांति का और दूसरा क्रान्ति का। उन्होंने दोनों ही रास्तों का स्वागत किया है और अंत में लिखा है, ‘अति का अंधेर जागृति  पैदा करता है, जो जनक्रान्ति और खूनी क्रान्ति का रूप भी धारण कर सकता है। लेकिन देश समाज, राष्ट्र और स्वयं शोषक वर्ग के लिए अन्ततोगत्वा वह बहुत महँगा पड़ेगा। फ्रांस में दो सौ वर्ष पहले जो खूनी क्रान्ति हुई थी, वैसी भारत में वर्तमान व निकट भविष्य में कभी भी हो सकती है।’

लेकिन दलित-पिछड़े वर्गों की कोई ख़ूनी क्रान्ति भारत में नहीं हुई, जबकि सवर्णों को जब भी अवसर मिलता है, वे ख़ूनी प्रति क्रान्ति को कभी भी अंजाम दे देते हैं।

डाॅ. साथी की इस पुस्तक पर अनिल सिन्हा ने “आम जनता के लिए जरूरी किताब” शीर्षक से एक लम्बी समीक्षा 27 फरवरी 1993 के नवभारत टाइम्स में लिखी थी। मैं यहाँ उस समीक्षा की इन पंक्तियों को उद्धृत करना जरूरी समझता हूँ—

‘छेदी लाल जी का जीवन एक तरह से समाजवादी व गाँधीवादी आंदोलनों के साथ बीता है। इसलिए अपने जीवन का लम्बा समय आंबेडकर के साथ गुजार कर भी वह अंत में कांग्रेस पार्टी की तरफ से विधान परिषद के सदस्य रहे। यही कारण है कि इस पुस्तक में दलितों व पिछड़ी जातियों को समाज-परिवर्तन के लिए कोई क्रान्तिकारी व समतामूलक वैचारिक चेतना नहीं मिलती। प्रच्छन्न रूप से यह बात इस पुस्तक में आयी है कि समाज का सबसे दलित वर्ग गाँधी के रास्ते चलकर अपने अधिकार हासिल करे।’

लेकिन यह निष्कर्ष ठीक नहीं है। डाॅ. साथी ने लोकतान्त्रिक और संवैधानिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने का समर्थन किया है, जो डाॅ. आंबेडकर का भी रास्ता है।

1 फरवरी 1921 को पिता निधानी राम और माता जानकी देवी के साधारण घर में जन्मे छेदी लाल साथी 13 नवम्बर 2004 को 83 की आयु में इस संसार से विदा हुए।

                                 

(कॉपी एडिटर : प्रेम बरेलवी/नवल)


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