रामचंद्र माँझी को मिलेगा 2017 का ‘संगीत नाटक अकादमी सम्मान’

भिखारी ठाकुर के रंगसंगी रामचंद्र माँझी को वर्ष 2017 का संगीत नाटक अकादमी सम्मान देने की घोषणा बिहार के लोक रंगमंच के लिए बहुत ही सुखद खबर है। यह सम्मान बिहार के लोक रंगमंच के पुनरुत्थान और उसमें लोगों की दिलचस्पी को पुनर्जीवित करेगा। प्रस्तुत है जैनेंद्र दोस्त की यह रिपोर्ट :

भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध हस्ताक्षर भिखारी ठाकुर के रंगसंगी रामचंद्र माँझी को ‘संगीत नाटक अकादमी सम्मान 2017’ प्रदान किए जाने की घोषणा हुई है। इस घोषणा से देश के रंगकर्मियों, विद्वानों, सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं में ख़ुशी की लहर है। प्रिंट मीडिया से ले कर सोशल मीडिया तथा व्यक्तिगत तौर पर भी रामचन्द्र माँझी को इस सम्मान के लिए बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ है। कहा जा रहा है कि यह सम्मान भिखारी ठाकुर को सम्मानित करने जैसा है। परंतु इसे आश्चर्य ही कहेंगे कि आज से 3-4 वर्ष पहले तक रामचंद्र माँझी को बहुत कम ही लोग जानते थे।

रामचंद्र मांझी की तस्वीर

संगीत नाटक अकादमी सम्मान को भारत में गीत-संगीत, नृत्य एवं नाटक के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ सम्मान माना जाता है। रामचंद्र माँझी को यह पुरस्कार लोक-रंगमंच के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय एवं महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जा रहा है। इस पुरस्कार को भारत के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति) प्रदान करते हैं। पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपए नगद, ताम्रपत्र एवं अंगवस्त्र प्रदान किया जाता है। बिहार के रंगमंच के इतिहास में यह पहला अवसर है जब नाच विधा के किसी कलाकार को इतना बड़ा सम्मान प्राप्त हो रहा है।

रामचंद्र माँझी बिहार की नाच परंपरा जिसे ‘लौंडा नाच’ भी कहा जाता है, की जीवित किंवदंती लेकिन गुमनाम कलाकार रहे हैं। भिखारी ठाकुर से प्रशिक्षित एवं उनके साथ काम कर चुके जीवित बचे कलाकारों में रामचंद्र माँझी सबसे वरिष्ठ ऐसे कलाकार हैं जो उम्र के 93वें वर्ष में भी लगातार भिखारी ठाकुर की नाच मंडली (अब भिखारी ठाकुर रंगमंडल) में भिखारी ठाकुर कृत हर नाटक में मुख्य भूमिका निभाते हैं। वे रंगमंडल में स्त्री की भूमिका करने के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। इन्होंने बिदेसिया नाटक में रखेलिन के किरदार को अपने अभिनय, गायकी एवं नृत्य से एक ऐसी ऊँचाई दी है जिसके आसपास फटकना भी आज के रंगकर्मियों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

 

छपरा (बिहार) के एक छोटे से गाँव तज़ारपुर में जन्मे रामचंद्र माँझी दलित समुदाय के हैं। उनके जन्म का कोई लिखित प्रमाण नहीं है, परंतु चुनाव पहचान पत्र के अनुसार उनका जन्म 1930 में हुआ है जबकि रामचंद्र माँझी अपनी याददाश्त के आधार पर ख़ुद को 93 वर्ष का बताते हैं। श्री माँझी 12 वर्ष की उम्र में भिखारी ठाकुर के नाच दल से जुड़े थे। परंतु वह बताते हैं कि भिखारी ठाकुर से पहले उन्होंने गाँव के ही दीनानाथ माँझी की नाच मंडली में नाच का प्रशिक्षण लेना एवं नाचना-गाना शुरू कर दिया था। उसके बाद उन्हें भिखारी ठाकुर के नाच पार्टी में शामिल होने का ऑफ़र मिला जहाँ उन्होंने आंगिक-वाचिक अभिनय सहित धोबिया नाच, नेटुआ नाच, गजल, कव्वाली, निर्गुण, भजन, दादरा, खेमटा, कजरी, ठुमरी, पूर्वी, चैता गायन का गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के पश्चात भिखारी ठाकुर कृत सभी नाटकों में उन्होंने मुख्य कलाकार के रूप में अपनी भूमिका अदा की। रामचंद्र माँझी अब तक भिखारी ठाकुर के एक-एक नाटकों की हजारों प्रस्तुतियाँ देश-विदेश के विभिन्न समारोहों एवं गाँव के शादी-विवाह तथा त्योहारों में कर चुके हैं। रामचंद्र माँझी अब तक मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, जगजीवन राम, जयप्रकाश नारायण, दारोगा प्रसाद राय, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, राबड़ी देवी, शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे देश के बड़े राजनेताओं के समक्ष अपनी प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं।

भिखारी ठाकुर के नाटकों में रामचंद्र माँझी की भूमिका

नाटकरामचंद्र मांझी द्वारा निभायी गयी भूमिका
बिदेसियारखेलिन/प्यारी सुंदरी
गबरघिचोरगलीज बहू
बेटी-बेचवाहजामिन
पिया निसइलरखेलिन
गंगा-स्नानमलेछू बहू
पुत्र-बधछोटकी बहू
भाई-बिरोधछोटकी बहू
कृष्णलीलायशोदा
ननद-भऊजाईभौजाई
बिधवा-बिलापविधवा स्त्री

 

भिखारी ठाकुर बीसवीं शताब्दी के महान रंगकर्मियों में एक हैं। 1917 में अपने नाच-नाटक दल की स्थापना कर भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी भाषा में बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, भाई-बिरोध, पिया निसइल, पुत्र-बध, बिधवा-बिलाप, गंगा-स्नान, नाई-बाहर, नकल भांड और नेटुआ सहित लगभग दर्जन भर नाटक एवं सैकड़ों गीतों की रचना की है। उन्होने अपने नाटकों और गीत-नृत्यों के माध्यम से तत्कालीन भोजपुरी समाज की समस्याओं और कुरीतियों को सहज तरीके से नाच के मंच पर प्रस्तुत करने का काम किया था। उनके नाटक आज भी उतने प्रासंगिक हैं।  

(कॉपी एडिटर : नवल/अशोक)


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