सरकारी लापरवाही से दलित लोकगायिका कबूतरी देवी का निधन

मशहूर लोकगायिका कबूतरी देवी का 73 साल की उम्र में निधन हो गया। इस मिरासी गायिका ने अपने जागर (गीतों) से समाज को कई साल तक जगाया लेकिन वह सरकारी तंत्र को नहीं जगा सकी। उनके इलाज के लिए जिस हेलीकॉप्टर का इंतजार किया जाता रहा, वह आता कि उससे पहले ही उनकी मौत हो गई। कमल चंद्रवंशी की रिपोर्ट :

जागर का मतलब है जगाना। कबूतरी देवी देवताओं को जगाने वाले इन्हीं गीतों को आवाज देती थीं। कहते तो यहां तक हैं कि इस आवाज को सुनकर मनुष्य भी जाग जाते थे। वह उत्तराखंड की तीजनबाई के नाम से मशहूर थीं। हारमोनियम पर जब उनकी उंगलियां चलती थीं तो आवाज खुद ही हवाओं से सुर पकड़ लेती थी। वह आवाज जाती रही। बीते 7 जुलाई 2018 की सुबह कबूतरी देवी ने सदा के लिए अलविदा कह दिया। पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) अस्पताल में उनका निधन हुआ। अनुसूचित जाति की मिरासी (डोम) परिवार में पैदा हुई कबूतरी देवी उत्तराखंड की अग्रणी गायिका थीं लेकिन ‘सवर्ण सरकारों’ के राजकाज में उनके कामकाज की कोई पहचान नहीं हुई, उनसे जूनियर से कलाकारों को जागर गायन के लिए बड़े पद्मी-छद्मी पुरस्कार मिले लेकिन वह उनमें नहीं पड़ीं। दरअसल कबूतरी देवी ने सिस्टम से भीख नहीं मांगी और ना ही अपने लिए किन्ही सम्मानों को नवाजने की सिफारिश के लिए तिकड़में चलाईं। वह सच्चे अर्थों में बड़ी कलाकार थीं।

कबूतरी देवी (जन्म 1945, मृत्यु 7 जुलाई 2018)

अस्पताल के बाहर उनके चाहने वाले नवोदय पर्वतीय संस्कृति केंद्र के कार्यकर्ता मौजूद थे। वह सभी उनके गायन के वो मुरीद संस्कृतिकर्मी थे जो अपने लोगों की कद्र करना जानते हैं। जनार्दन उप्रेती और हेमराज उनमें शामिल थे। वह बताते हैं, हां हम हेलीकॉप्टर का इंतजार करते रहे लेकिन छोडिए इनको (सरकारी सिस्टम)…। बस, हम एक धरोहर को नहीं बचा सके। उनकी सेहत ठीक सी थी, हम उनको आईसीयू में लाए…। उनकी आखिरी रिकॉर्डिंग की हमने तैयारी कर दी थी। वह हसरत अधूरी रह गई। अब हमें आर्काइव्स (निजी, सरकारी पुरानी ऑडियो रिकॉर्ड्स लाइब्रेरी) पर निर्भर रहना पड़ेगा। उनके एक प्रशंसक कहते हैं, “हमने कालीपार (नेपाल) और काली वार (भारत) के कामगार मजदूरों महिलाओं और पहाड़ी जिजीविषा के विकट और संयुक्त साझे अनन्त स्वर को खो दिया है जो अब विलीन है।” बताते चलें कि पिथौरागढ़़ और चंपावत जिले सीमावर्ती इलाकों में आते हैं जहां से नेपाल भी सटा हुआ है।

पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में कबूतरी देवी के लोकगीत और जागरों का गायन ऑल इंडिया रेडियो से लोकप्रिय हुआ। उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि उनके गीत आज भी लोगों की जुबां पर हैं। पिथौरागढ़ के लोगों का साफ कहना है कि प्रशासन अगर उनके इलाज के लिए सही समय पर हेलीकॉप्टर का बंदोबस्त कर देता तो उनकी जान बचाई जा सकती थी। इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है कि पिथौरागढ़ के लोगों ने कबूतरी देवी के शव को रखकर विरोध प्रदर्शन किया और राज्य सरकार और विमानन विभाग के खिलाफ नारे लगाए।

कबूतरी देवी एक आवाज जो हमेशा के लिए खामोश हो गई (फाइल फोटो)

नीलम बिष्ट ने कहा कि कबूतरी देवी के निधन से उत्तराखंड की लोक संस्कृति और संगीत के एक युग का अंत हुआ है। उन्होंने पहाड़ की बोली और उसके लोकगीतों को आकाशवाणी के माध्यम से पहचान दिलाई।  सांस्कृतिक विधा और लोक साहित्य को उन्होंने एक नई ऊंचाई दी। उनके गीत उत्तराखंड के हर पर्व और त्योहार पर गाए जाते हैं। कबूतरी देवी ने पर्वतीय लोक शैली को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया था। उनका निधन पहाड़ के लिए अपूर्णीय क्षति है। संस्कृति जगत की महान हस्ती हमारे बीच में नहीं रहीं।

कबूतरी देवी पिथौरागढ़ के दूरदराज के क्वीतड़ ब्लॉक मूनाकोट की रहने वाली थीं। कबूतरी देवी ने पहली बार दादा-नानी के लोकगीतों को आकाशवाणी और अन्य प्रतिष्ठित मंचों पर गाया। कहते हैं ये वो दौर था जब पहाड़ की महिला गायिकाएं आकाशवाणी के लिए नहीं गाती थीं। 70 के दशक में उन्होंने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचाई। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए 135 गीत गाए। उनके आखिरी 20 साल अभावों में बीते। खासकर जब उनका बेटा मैदानी शहरों में रोजगार के लिए चला गया और उनके पति का निधन हो गया। कोई डेढ़ दशक पहले उनकी प्रतिभा को पहचान मिलनी शुरू हुई लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंची। कबूतरी देवी अपनी बेटी के साथ पिथौरागढ़ में रह रही थीं जिन्होंने चिता को मुखाग्नि दी भी। आमतौर पर पहाड़ों में महिलाएं ना तो शव यात्रा में श्मशान तक जाती हैं और ना ही चिता को मुखाग्नि देने का काम करती हैं।  

सरयू नदी का रामेश्वरी घाट: मां की चिता को मुखाग्नि देती कबूतरी देवी की बेटी हेमंती। उन्होंने उन सब मान्यताओं को धत्ता बताया जहां कोई महिला चिता को आग नहीं देती। (फोटो : मुकेश)

उनके गीतों में पहाड़ का दर्द तो था ही वहां की प्राकृतिक सौंदर्य का शानदार वर्णन था। वह कई अनाम पहाड़ी गीतकारों की लिखी रचनाओँ को अमर करके गई हैं। “आज पनि झौं-झौ, भोल पनि झौं-झौं, पोरखिन त न्है जूंला”  (आज भी जा सकते हैं, कल भी जा सकते हैं, पर परसों तो जाना ही जाना है। और “पहाड़ों को ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी”। यानी पानी और बाणी (भाषा-बोली) उनके सुर में ऐसी गूंजती थी जो सालों साल तक याद रखी जाएगी। कबूतरी देवी के गांव जाने के लिए पिथौरागढ़ अड़किनी से पांच किलोमीटर से ज्यादा पैदल जाना पड़ता है।

इनका जन्म मिरासी लोकगायक परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी मां देवकी देवी और अपने पिता रामकाली से दीक्षा ली थी जो उस समय के नामी लोक गायक थे। लोक गायन की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने अपने पिता से ही ली। पहाड़ी गीतों में प्रयुक्त होने वाले रागों का निरन्तर अभ्यास करने के कारण इनकी शैली अन्य गायिकाओं से अलग रही। विवाह के बाद इनके पति दीवानी राम ने इनकी प्रतिभा को पहचाना और इन्हें आकाशवाणी और स्थानीय मेलों में गाने के लिये प्रेरित किया।

कहा जाता है कि  कबूतरी देवी ऋतु आधारित गीत (ऋतुरैंण) गाया करती हैं। ‘मेरा पहाड़’ पत्रिका के मुताबिक कबूतरी देवी ने जनमानस में बसे लोकगीतॊं को पहली बार दूर दूर तक पहुंचाया। वह अपने पति के साथ रेडियो केंद्रों पर जाती थीं। अपने पति को वह नेताजी कहकर पुकारती थीं। शुरुआत में एक गीत के लिए उनको कम से कम 25 रुपये मिलते थे। अपने पति की मृत्यु की बाद इन्होंने आकाशवाणी के लिए और समारोहों के लिए गाना बन्द कर दिया था। इस बीच इनका एक मात्र बेटा नौकरी के लिए पहाड़ों से पलायन कर चुका था।

कबूतरी देवी को 2016 में राज्य सरकार ने लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार में सम्मानित किया लेकिन वह भी तब स्थानीय निवासियों ने उनकी अनदेखी को उजागर किया (फोटो : सुधीर)

दरअसल कबूतरी देवी की पहाड़ों की सबसे लोकप्रिय शैली जागर की स्तंभ भी थीं। जागर अमूमन उत्तराखण्ड और नेपाल के पश्चिमी क्षेत्रों में कुछ ग्राम देवताओं की पूजा के लिए गाया जाता रहा है। लेकिन अब यह पूरे राज्य की गायन शैली बन गई है। किसी भी देवता के जगाने के लिए मिरासी लोग अमूमन जागर ही गाते हैं। गंगनाथ, गोलु, भनरीया, काल्सण देवताओं को ‘ग्राम देवता’ के नाम से जाना जाता है जिनको कबूतरी देवी गाती थी। कहते हैं सबसे पहले उत्तराखण्ड और डोटी के लोग देवताओँ को जगाने के लिए जागर लगाते हैँ।

जागर मन्दिर अथवा घर में कहीं भी किया जाता है। जागर कहीं दो दिन, कहीं एक हफ्ते तो कहीं बाईस दिनों का होता है। जागर में “जगरीया” मुख्य पात्र होता है। जो रामायण, महाभारत आदि धार्मिक ग्रंथोँ की कहानीयोँ के साथ ही जिस देवता को जगाया जाना है उस देवता का चरित्र को स्थानीय भाषा में वर्णन करता है। जगरीया हुड्का (हुडुक), ढोल तथा दमाऊ बजाते हुए कहानी लगाता है। जगरीया के साथ में दो तीन लोग रहते हैँ। कबूतरी देवी के अलावा केश राम भगत, गंगा देवी, हरदा ‘सूरदास’, जोगा राम, मंगलेश डंगवाल, मोहन सिंह. नयन नाथ रावल  नारायण राम और बसन्ती बिष्ट प्रमुख जागर गायक रहे हैं।

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‘पहाड़’ पत्रिका से जुड़े स्थानीय निवासियों का कहना है कि उत्तराखंड सरकार की लापरवाही से प्रदेश की पहली महिला लोक गायिका को समय पर इलाज नहीं मिल सका और उनका निधन हो गया। हायर सेंटर यानी सुशीला देवी अस्पताल ले जाने के लिए शुक्रवार शाम (6 जुलाई 2018) से हेलीकॉप्टर का इंतजार होता रहा। हेलीकॉप्टर की व्यवस्था नहीं होने से उनकी शनिवार सुबह मौत हो गई। परिजन उन्हें जिला चिकित्सालय लाए। वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. एसएस कुंवर ने उनके स्वास्थ की जांच की। जांच के बाद उन्होंने बताया कि कबूतरी देवी का ब्लड प्रेशर कम है और उनका हॉर्ट कमजोर हो रहा है। कुछ उपचार के बाद उन्हें हायर सेंटर के लिए रेफर किया गया। तमाम लोगों ने जिला चिकित्सालय पहुंचकर उनका हालचाल जाना। परिजन उन्हें हेलीकॉप्टर से देहरादून ले जाने का प्रयास कर रहे थे। परिजनों का कहना है कि शनिवार सुबह भी हेलीकॉप्टर नहीं पहुंचा और उनकी अस्पताल में ही मौत हो गई।

विनीत बिष्ट ने कहा कि सरकार को हेलीकप्टर को आने में देरी के लिए दोषी अधिकारियों पर कबूतरी देवी की हत्या करने का मुकदमा दायर होना चाहिए, क्योंकि राज्य की अफसरशाही इतनी नकारा हो चुकी है कि इनको किसी से फर्क नही पड़ता इसलिए इन नौकरशाहों को सरकार के द्वारा ये बताया जाना जरूरी हो गया है कि आप जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। सुषमा जुगरान कहती हैं कि कुमाऊं के ऋतुरैण गीतों में उनकी विशेषज्ञता थी। भौतिक रूप से बेशक कबूतरी देवी हमारे बीच नहीं रहीं लेकिन अपने मधुर गीतों के माध्यम से वह सृष्टि पर्यंत जनमानस के कानों में रस घोलती रहेंगी।

कबूतरी देवी का बचपन

नौ बहनों और एक भाई में कबूतरी देवी का नंबर तीसरा था। प्राथमिक विद्यालय तक गाँव से 14-15 किमी दूर पुलहिंडोला में था सो लड़के भी 5वीं कक्षा तक ही पढाई कर पाते थे। कबूतरी स्कूल का भी मुंह नहीं देख सकी। उनके घर में गीत-संगीत का माहौल था, सो बचपन से ही साज हाथ में पकड़ लिया और गाने-बजाने की शुरुआत हुई। उनके पिता देवी राम बेहतरीन साजिंदे थे। वह हारमोनियम, सारंगी, हुड़का और तबला बहुत अधिकार के साथ बजाते थे। माँ देवकी देवी उस्ताद और बहुत अच्छी गतार (गायिका) थी। बहुत अच्छे गीत बनाती और गाती थीं। माँ नाना-नानी के लिखे गीत भी गाया करती थीं। घर की अर्थव्यवस्था छोटी खेती से ही चला करती। बचपन बहुत अभाव में बीता। कबूतरी देवी ने अपने एक आखिरी इंटरव्यू में कहा, “उस समय लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाति थी। 14 साल की उम्र में मुझे भी पिथौरागढ़ के विकासखंड मूनाकोट में कवीतढ़ गाँव के दीवानी राम के साथ ब्याह दिया गया। उस ज़माने में यह संयोग न जाने कैसे बैठा। मायके और ससुराल के बीच बहुत ज्यादा दूरी थी। दो दिन तक पैदल चलकर ही मायके आना-जाना होता था।”

लोक कलाकार भानुराम कबूतरी देवी के ककिया ससुर थे। वो भी बहुत अच्छे साजिंदे और गायक थे। कबूतरी उनका बहुत सम्मान करती थी। भानुराम ने खुद के लिखे कुछ गाने कबूतरी देवी से गवाए। यह देखते हुए कि गानों के बोल के लिहाज से वो फीमेल आवाज में ज्यादा जमते थे। विवाह के बाद कबूतरी के पति ने साथ दिया और मार्गदर्शन भी। वह कहती थीं, “उन्होंने मुझे (मेरे पति) ने आकाशवाणी की दहलीज़ तक पहुंचाया। माता-पिता के अलावा उनका ही मेरी संगीत यात्रा में योगदान है।” कबूतरी के ससुराल की आर्थिक स्थिति भी बेहद ख़राब थी। पति फक्कड़ स्वभाव के थे और उनको सामाजिक कार्यों का बहुत जुनून था। वे घर की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े रहते थे। यहां खेती के लिए जमीन भी नहीं थी। कबूतरी देवी ने किसी तरह मेहनत-मजदूरी कर घर का खर्च चलाया। दूसरों के खेतों में मजदूरी कर अनाज भी जुटाया। रेता-बजरी और पत्थर ढोकर घर के कमरे भी बनाए। वह कहती थीं, “मेरे पति को जब मेरे शौक के बारे में पता चला तो उन्होंने भी मुझे बढ़ावा दिया। वो खुद तो नहीं गाते थे मगर मेरे साथ नए गाने बहुत शौक के साथ बनाया करते थे। वह अपने सामाजिक कार्यों के शौक की वजह से दूर देश (दिल्ली, बंबई) घूमने भी जाया करते थे। उनके इसी शौक ने आखिरकार मुझे दुनिया के सामने लाने में भूमिका निभाई। उन्हीं को आकाशवाणी में गाये जाने की प्रक्रिया की जानकारी थी या शायद उन्होंने इसे इकठ्ठा किया था।

खेत मजदूर से कलाकार का सफर

28 मई 1979 को कबूतरी ने आकाशवाणी की स्वर परीक्षा उत्तीर्ण की और अपना पहला गीत आकाशवाणी के लखनऊ केंद्र से गाया था। इसके बाद वह आकाशवाणी के नजीबाबाद, रामपुर और बुंबई (अब मुंबई) केन्द्रों से गाने लगीं। उस वक़्त रामपुर या नजीबाबाद के आकाशवाणी केंद्रों तक पहुँचने के लिए कबूतरी देवी को बहुत रास्ता पैदल चलकर पार करना होता था। सात लोगों के परिवार के भरण-पोषण के लिए रेडियो से मिलने वाला पैसा काफी नहीं था। “उस वक़्त पिथौरागढ़ तो क्या बहुत दूर तक कोई पुरुष गायक भी नहीं था जो लोकप्रिय हो।”

कबूतरी देवी ने अपने अंतिम दिनों में कहती थी “पति की मौत के बाद मैं बहुत अभाव की ज़िन्दगी जी रही थी और मानसिक तौर पर भी बहुत परेशान थी। मेरा शरीर कई बीमारियों का शिकार हो चला था। डेढ़ दशक की गुमनामी के बाद पिथौरागढ़ शहर के संस्कृतिकर्मी हेमराज बिष्ट ने मुझे ढूंढ़ निकाला। उनके मुझ पर कई एहसान हैं। उन्होंने नष्ट होने की स्थिति में पहुँच चुके मेरे दस्तावेजों को सहेजा। उन दस्तावेजों की मदद से संस्कृति विभाग द्वारा दी जाने वाली पेंशन की कार्रवाई शुरू की। उन्होंने ही मुझे अरसे बाद मंचासीन किया और पिथौरागढ़ के संस्कृतिक मेले में गाना गवाया। उनकी ही वजह से मेरा गायिका के रूप में पुनर्जन्म संभव हुआ। मेरा वजूद पहचाना गया। दुनिया को पता लगा कि कबूतरी देवी जिंदा है।

वह कहती थीं, ‘हर बार मीडिया के मुद्दा उठाने के बाद ही सही इलाज़ शुरू होता है। उसके बाद मंत्री-मुख्यमंत्री तक मिलने आये हैं और जोरशोर के साथ घोषणाएं भी की जाती रहीं। लेकिन अमल किसी पर नहीं हुआ। जब मेरा नाती पवनदीप राजन ‘वॉइस ऑफ़ इडिया’ बना तो एसडीएम खुद मेरी बेटी के घर आए थे, जहां मैं अक्सर रहती हूँ और गाँव वालों के सामने कई घोषणाएं कीं। बाद में उनको फोन किया तो बोले कि ‘मेरा तबादला हो चुका है अब मैं कुछ नहीं कर सकता।’

कुल मिलाकर सरकारों को लोकजनों की कोई सुध नहीं है, उनकी विधाओं की पहचान करना तो दूर की बात। इससे बड़ा कष्ट और क्या हो सकता है कि सालों तक मंच पर गाने के लिए इतनी बड़ी फनकार की कोई पूछ ही ना हो। कबूतरी देवी के पास बचपन से एक हारमोनियम था जो जवानी के दिनों में भी काम करता रहा। लेकिन बाद के दिनों में वह घिस गया था। वह बिल्कुल फटी आवाज देता था। उससे सारे सुर बिखर जाते थे, बिल्कुल वैसे ही जैसी बिखरी जिंदगी की दास्तां अब कबूतरी देवी हो चुकी हैं। उस महान आत्मा को नमन।  

(कॉपी एडिटर : नवल)


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