आंबेडकर काे पढ़ें उनकी मूर्ति को धोने वाले वकील और पूजा करने वाले मंत्री

मेरठ में दलित समुदाय के वकीलों ने आंबेडकर की मूर्ति को पानी और दूध से इसलिए धुला कि वह एक बीजेपी सांसद ने छूकर उसे ‘अपवित्र’ कर दिया था। वहीं उत्तराखंड में दलित हरिजनों के नेता और कैबिनेट मंत्री ने इसी शुक्रवार को एक ऐसे मंदिर में पूजा की जहां से वह सवर्णो को ‘पाठ पढ़ाने’ का संदेश दे रहे थे। इन दोनों घटनाएं दलित बहुजन समाज मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं। एक रिपोर्ट :

मंत्री और वकीलों को चाहिए, आंबेडकर का दर्शन भी पढ़े

उत्तर प्रदेश के मेरठ में ना तो दलित वकीलों को आंबेडकर की मूर्ति को दूध से नहलाने की जरूरत थी और ना ही दलित पिछड़े समाज की नुमाइंदगी करने वाले उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य को जागेश्वर धाम मंदिर में प्रतिबंध के बाद भी पूजा कर अपना मंत्री रौब दिखाने की। विरोध के इन जैसे प्रतीकों और तौर-तरीकों के खिलाफ दलित बहुजन विचारकों ने अपना जीवन खपाया, ये दोनों घटनाएं उसके आईने मे बड़ी विसंगति की तरह सामने आई हैं। लेकिन ये सुखद है कि दलित बहुजन समाज के लोगों ने इन दोनों घटनाओँ को लेकर नाखुशी जाहिर की है।

विरोध का ये कैसा तरीका?

लेकिन मौजूदा समय में प्रतिरोध की आवाज के दिखने-दिखाने के जैसे टोटकों का सहारा लिया जाता है, शायद उसका ही असर है कि मंत्रीजी मंदिर में घुस गए और दलित वकील मूर्ति धुलने लगे। क्या इसलिए कि सुर्खियों में आ जाएं? क्या इसलिए कि ‘सामने वाले’ उसकी ही भाषा में जवाब देने की जरूरत है? वकीलों और मंत्रियों को लेकर हम अपन मोटे अनुमान से कह सकते हैं कि इसकी जानकारी उन्हें होगी कि आंबेडकर किसी मनुष्यमात्र में छूने से जीवित-अजीवित के कथित अपवित्र होने के मनुवादी सोच के घोर विरोधी थे और यह उनके जीवन दर्शन का मूल आधार भी था। सवर्णों के मंदिर में जबरन घुसकर अपनी आस्था का प्रकटीकरण तो उनके लिए कल्पना से भी परे था।

उत्तराखंड के मंत्री यशपाल आर्य और मेरठ के वकील बाबा साहेब की मूर्ति को दूध से नहलाते हुए

मेरठ से मिली खबर में कहा गया है कि यहां एक मनुवादी (और कथित ‘विचारक’) ने आंबेडकर की मूर्ति का माल्यार्पण किया था जिसके बाद कुछ दलित वकीलों ने मूर्ति को दूध से नहलाया धुलाया। उत्तराखंड के जागेश्वरी धाम मंदिर में यशपाल आर्य ने मृत्युंजय में पूजा की जबकि वहां ये काम दो साल से प्रतिबंधित है। यशपाल आर्य समाज समाज कल्याण मंत्री हैं और दलित पिछड़े समाज की आवाज रहे हैं। मेरठ में पिछले हफ्ते बीजेपी प्रदेश कार्यसमिति की बैठक से पूर्व उसके कार्यकर्ताओं ने कचहरी के पास आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया था। इसके बाद वहां बीएसपी समर्थक वकील पहुंचे।

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सोशल मीडिया ने सिखाया सबक

सवाल सिर्फ विरोध के तरीके का नहीं है। भंवर मेघवंशी ने मेरठ की वकीलों के विरोध पर अपने सोशल मीडिया पेज पर लिखा है कि ये एक मूर्खतापूर्ण परिघटना है। उत्तर प्रदेश के दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले वकीलों ने डॉ आंबेडकर की मूर्ति को गंगाजल और दूध से धोकर प्रतिमा का शुद्धिकरण का कारण बताया गया है कि बीजेपी के एक राज्यसभा सांसद ने उसे छूकर अपवित्र कर दिया था। वह कहते हैं मैं इस प्रवृत्ति को वाहियात मानता हूँ, यह सरासर मूर्खता है, ऐसी बातों को हतोत्साहित करने की जरूरत है, इस बेवकूफी का महिमामंडन नहीं किया जा सकता। मेरा मानना है कि क्या पत्थर की मूर्ति किसी आदमी के छू देने से अशुध्द हो जाती है? छूने से अपवित्रता का मनुवादी सोच दलित समाज के वकीलों के मष्तिष्क में भरा हुआ है, फिर छुआछूत के लिए सवर्णों को कैसे दोष देंगे? क्या गंगाजल और दूध के धोने से प्रतिमा का शुद्धिकरण हो जाता है? यह ब्राह्मणवादी सोच नहीं है? छूने से अपवित्र होने और गंगाजल तथा दूध से धोने से शुद्धिकरण करने की सोच दकियानूसी मनुवादी सोच है। अगर यह दलित समुदाय के पढ़े लिखे लोगों में घर कर रही है तो बेहद खतरनाक स्थिति है। इसका अभी से निदान जरूरी है इसे रोकना होगा…।

बीएसपी के जिलाध्यक्ष सुभाष प्रधान का कहना है कि प्रतिमा शुद्धिकरण पार्टी का सिद्धांत नहीं है। बीएसपी नेता ने कहा कि वे वकील एससी संगठन से जुड़े थे।

भंवर मेघवंशी की राय पर अजमेरवासी गुलाब जिंदल ने कहा कि इस प्रकार की (वकीलों जैसी) सोच बनना और क्रियान्वित होना ही मनुवादी मकड़जाल में फंसे होने की पहचान है। इससे मनुवादी बहुत खुश होते हैं। हम लोगों ने वकीलों तक के दिमाग को मनुवादी व्यवस्था की चपेट में ले रखा है। सामान्य दलितों की तो वखत ही क्या है। महेश वर्मा ने भंवर मेघवंशी का समर्थन करते हुए कहा कि  इन वकीलों ने जरा भी सोचा नहीं कि जिस पाखंड के खिलाफ ताउम्र बाबा साहेब लड़ते रहे, उसी परंपरा से बाबा साहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर की प्रतिमा को शुद्ध किया जा रहा है। मुझे तो इन वकीलों की डिग्री पर भी शक होता है क्या वाकई यह वकील भी है या फिर…। लेकिन सरदार सुरीला ने कहा इसमें विवाद की जरूरत नहीं है- सत्ता में बैठे लोग ऐसी ही भाषा समझते हैं।

उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य ने कहा कि उनसे जानबूझ कर यह गलती नहीं की। यदि नियम का उल्लंघन हुआ है और किसी की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं हैं तो मैं उसके लिए क्षमा मांगता हूं। आर्य ने कहा कि जो कुछ भी हुआ वो अनजाने में हुआ है।  भगवान शिव मेरे आराध्यदेव हैं। मैं सदैव उनकी पूजा करता हूँ। इसीलिए मैं जागेश्वर धाम गया था।

मेरठ में बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की मूर्ति

मालूम हो कि 11 अगस्त को जागेश्वर धाम के श्री मृत्युंजय मंदिर में आर्य ने पूजा की थी। यहां मंदिर में पूजा अर्चना पर रोक है। पिछले साल यह रोक लगाई गई थी। मंदिर को नुकसान पहुंचाने की आशंका से यह व्यवस्था की गई थी। आर्य ने यहां पूजा की और शिव लिंग पर प्रसाद और नैवेद्य अर्पित किए। आर्य ने कहा कि यदि मेरी पूजा से नियमों का उल्लंघन हुआ हो या किसी की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हों तो मै सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को भी तैयार हूं।

बताते चलें कि उत्तराखंड में कई मंदिरों मे दलित हरिजनों को प्रवेश नहीं दिया जाता लेकिन जागेश्वरी में सभी समुदाय के लोग जाते हैं। लेकिन पूजा वहां सभी के लिए प्रतिबंधित है। आर्य के माफी मांगने की बात कही, जाहिर है उनको अपनी गलती का एहसास हुआ।

बाबा साहेब के विचार

लेकिन दलित वकीलों और मंत्री को चाहिए वे बाबा साहेब आंबेडकर के अछूतों के लिए किए संघर्ष को समझेंगे तो वह इस तरह की गलती कभी नहीं दोहराएंगे। बाबा साहेब ने कहा था कि ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अस्पृश्यों की दयनीय स्थिति से दुखी हो यह चिल्ला कर अपना जी हल्का करते फिरते हैं कि ‘हमें अस्पृश्यों के लिए कुछ करना चाहिए।’ लेकिन इस समस्या को जो लोग हल करना चाहते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह कहता हो कि ‘हमें स्पृश्य हिंदुओं को बदलने के लिए भी कुछ करना चाहिए।’ यह धारणा बनी हुई है कि अगर किसी का सुधार होना है तो वह अस्पृश्यों का ही होना है।

यह भी पढ़ें – डॉ. आंबेडकर की आत्मकथा

अगर कुछ किया जाना है तो वह अस्पृश्यों के प्रति किया जाना है और अगर अस्पृश्यों को सुधार दिया जाए, तब अस्पृ‍श्यता की भावना मिट जाएगी। सवर्णों के बारे में कुछ भी नहीं किया जाना है। उनकी भावनाएँ, आचार-विचार और आदर्श उच्च हैं। वे पूर्ण हैं, उनमें कहीं भी कोई खोट नहीं है। क्या यह धारणा उचित है? यह धारणा उचित हो या अनुचित, लेकिन हिंदू इसमें कोई परिवर्तन नहीं चाहते? उन्हें इस धारणा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे इस बात से आश्वस्त हैं कि वे अस्पृश्यों की समस्या के लिए बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं हैं। (अस्पृश्यता उसका स्रोत- भीमराव आंबेडकर)

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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