h n

भारतीयों की जाति जानने की मानसिकता

पी.एस कृष्णन का कहना है कि हमारे देश मेंं कोई यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई जाति से मुक्त हो सकता है। मेरी जाति भी लोग जानने की कोशिश करते थे। ऐसे लोगों में केंद्रीय मंत्री से लेकर नौकरशाह तक शामिल थे :

आजादी के बाद का सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी (भाग-3)

मेरी जाति के संदर्भ में विभिन्न अवसरों पर विभिन्न व्यक्तियों की जिज्ञासाओं और पूछ-ताछ का मेरे द्वारा एक ही जवाब हमेशा दिया गया, “मेरी कोई जाति नहीं है, मैं जाति से मुक्त हो चुका हूं”। इसके चलते कभी-कभी दिलचस्प स्थिति पैदा हो जाती थी, इससे जुड़े दो वाकये मैं उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करना चाहता हूं। 1980 में जनता पार्टी की सरकार के बाद इंदिरा गांधी की सरकार में ज्ञानी जैल सिंह केंद्रीय गृहमंत्री बने। इसके पहले जब 1978 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी, उस समय से मैं गृह मंत्रालय  में संयुक्त सचिव था। मेरे जिम्मे अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण से संबंधित जिम्मेदारी थी। मैं अनुसूचित जातियों के मद्दों को हल करने में निरंतर लगा रहता था, इसके प्रति मेरी संबद्धता और गंभीरता को देखते हुए गृहमंत्री बनने के बाद ज्ञानी जैल सिंह की मेरे बारे में जिज्ञासा जगी। उन्होंने मंत्रालय के अन्य अधिकारियों से मेरी जाति के बारे में पूछना शुरू किया। प्रत्येक अधिकारी ने उनको यही उत्तर दिया कि वे लोग उनको जितना जानते हैं, जितने वर्षों से जानते हैं, और उनकी जानकारी के अनुसार हमेशा उन्होंने जो पक्ष चुना, उसके आधार पर उनका कहना है कि उनकी कोई जाति नहीं है।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : भारतीयों की जाति जानने की मानसिकता

 

लेखक के बारे में

वासंती देवी

वासंती देवी वरिष्ठ शिक्षाविद और कार्यकर्ता हैं. वे तमिलनाडु राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष और मनोनमेनियम सुन्दरनार विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रह चुकी हैं। वे महिला अधिकारों के लिए अपनी लम्बी लड़ाई के लिए जानी जातीं हैं। उन्होंने विदुथालाई चिरुथैल्गल काची (वीसीके) पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सन 2016 का विधानसभा चुनाव जे. जयललिता के विरुद्ध लड़ा था

संबंधित आलेख

‘बाबा साहब की किताबों पर प्रतिबंध के खिलाफ लड़ने और जीतनेवाले महान योद्धा थे ललई सिंह यादव’
बाबा साहब की किताब ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें’ और ‘जाति का विनाश’ को जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जब्त कर लिया तब...
जननायक को भारत रत्न का सम्मान देकर स्वयं सम्मानित हुई भारत सरकार
17 फरवरी, 1988 को ठाकुर जी का जब निधन हुआ तब उनके समान प्रतिष्ठा और समाज पर पकड़ रखनेवाला तथा सामाजिक न्याय की राजनीति...
जगदेव प्रसाद की नजर में केवल सांप्रदायिक हिंसा-घृणा तक सीमित नहीं रहा जनसंघ और आरएसएस
जगदेव प्रसाद हिंदू-मुसलमान के बायनरी में नहीं फंसते हैं। वह ऊंची जात बनाम शोषित वर्ग के बायनरी में एक वर्गीय राजनीति गढ़ने की पहल...
समाजिक न्याय के सांस्कृतिक पुरोधा भिखारी ठाकुर को अब भी नहीं मिल रहा समुचित सम्मान
प्रेमचंद के इस प्रसिद्ध वक्तव्य कि “संस्कृति राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है” को आधार बनाएं तो यह कहा जा सकता है कि...
गुरु घासीदास की सतनाम क्रांति के दो सौ साल बाद
गुरु घासीदास जातिवाद और अछूत प्रथा के जड़-मूल से उन्मूलन के पक्षधर थे। वे मूर्ति पूजा, मंदिर और भक्ति को भी ख़ारिज करते थे।...