h n

मनुस्मृति एवं वर्ण-जाति व्यवस्था केे समर्थक राधाकृष्णन के नाम पर शिक्षक दिवस क्यों?

डॉ. राधाकृष्णन वर्ण-जाति व्यवस्था के कट्टर समर्थक हैं। डॉ. आंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें पोगापंथी धर्म-प्रचारक कहा है। बहुजन नायक जोतिराव फुले के नाम पर ही शिक्षक दिवस मनाया जाना चाहिए। उनका स्थान सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन कैसे ले सकते हैं? कंवल भारती का विश्लेषण :

यह सवाल हैरान करने वाला है कि डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में क्यों मान्यता दी गई? उनकी किस विशेषता के आधार पर उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस घोषित किया गया? क्या सोचकर उस समय की कांग्रेस सरकार ने राधाकृष्णन का महिमा-मंडन एक शिक्षक के रूप में किया, जबकि वह कूप-मंडूक विचारों के घोर जातिवादी थे? भारत में शिक्षा के विकास में उनका कोई योगदान नहीं था। अलबत्ता 1948 में उन्हें विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का अध्यक्ष जरूर बनाया गया था, जिसकी अधिकांश सिफारिशें दकियानूसी और देश को पीछे ले जाने वाली थीं। नारी-शिक्षा के बारे में उनकी सिफारिश थी कि ‘स्त्री और पुरुष समान ही होते हैं, पर उनका कार्य-क्षेत्र भिन्न होता है। अत: स्त्री शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वह सुमाता और सुगृहिणी बन सकें।’[1] इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह किस स्तर के शिक्षक रहे होंगे?

पूरा आर्टिकल यहां पढें : मनुस्मृति एवं वर्ण-जाति व्यवस्था केे समर्थक राधाकृष्णन के नाम पर शिक्षक दिवस क्यों?

 

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

संबंधित आलेख

मंगू राम मुगोवालिया, आद धर्म आंदोलन और रविदास पंथ का उदय
यद्यपि पंजाब के अछूत समुदाय में पहले से ही गुरु रविदास (रैदास) के प्रति गहन श्रद्धा भाव था मगर आद धर्म आंदोलन ने अत्यंत...
जब दयानंद सरस्वती के विरोधियों के सामने खड़े हो गए फुले
विभिन्न लेखकों द्वारा दिए गए विवरणों से पता चलता है कि दयानंद के जुलूस की तैयारी कर रहे रानाडे जैसे सुधारवादी नेताओं ने जुलूस...
‘किसान का कोड़ा’ : फुले की वह कृति, जिसकी प्रासंगिकता आज भी है
फुले की इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपने समय से बहुत आगे की सोचती है। वे केवल किसानों की...
विमर्श : संतराम बी.ए. हिंदू संगठनकर्ता नहीं थे
जो आलोचक संतराम बी.ए. के विचारों और कामों को डॉ. आंबेडकर के विचारों के साथ जोड़कर उनका मूल्यांकन करते हैं, उन्हें देखना चाहिए कि...
जानिए, तमिलनाडु में द्रविड़ चेतना के बीज बोने वाले अयोती दास के बारे में
महाराष्ट्र में जोतीराव फुले (जो एक शूद्र थे) और उनके गैर-ब्राह्मण सत्यशोधक आंदोलन ने डॉ. आंबेडकर (जो एक अछूत या अति-शूद्र थे) के उदय...