सवर्ण दिखा रहे काले झंडे, फिर भी खामोश हैं भाजपा के नेता

बिहार में जातिवाद भी गजब का है। यह वही बिहार है जहां कभी काला झंडा दिखाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर बच्चियों के काले टुपट्टे तक प्रतिबंध लगा दिया गया था। आज सवर्ण सरेआम भाजपा के बड़े नेताओं को काले झंडे दिखा रहे हैं। उन्हें अपमानित कर रहे हैं। लेकिन फिर भी उनकी जुबान से एक शब्द नहीं निकल रहा। फारवर्ड प्रेस की खबर :

भाजपा की आमसभा और बैठकों का सर्वाधिक लोकप्रिय नारा है- भारत माता की जय। कई बड़े नेता इसी नारे के साथ भाषण शुरू करते हैं और इसी नारे के साथ अपना संबोधन समाप्‍त भी करते हैं। पार्टी के झंडे के अलावा भगवा झंडा भी भाजपा के कार्यक्रमों में दिख जाता है। लेकिन भगवा रंग पर अब ग्रहण भी लगने लगा है। भगवाधारी कार्यकर्ताओं के उत्‍साह के साथ नेताओं को काले झंडे का भी सामना करना पड़ रहा है। कल तक भगवा झंडे के साथ भारत माता का जयकारा करने वाले लोग ही अब काला झंडा दिखा रहे हैं और मुर्दाबाद के नारे भी लगा रहे हैं।

एससी-एसटी एक्‍ट का विरोध

एससी-एसटी एक्‍ट में संशोधन के बाद सवर्णवादी और सामंती ताकत देश भर में विरोध प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी से सरकार को अवगत करा चुके हैं। लेकिन बिहार में सवर्ण सेना और सवर्ण संगठन का विरोध ज्‍यादा तीखा होता जा रहा है। वे भाजपा के वरिष्‍ठ नेताओं का विरोध कर रहे हैं और सभाओं में काले झंडे दिखा रहे हैं। रास्‍ते में काले झंडे दिखा रहे हैं। इसमें आश्‍चर्यजनक बात यह है कि काले झंडे दिखाने वालों के खिलाफ प्रशासनिक स्‍तर पर कोई कार्रवाई भी नहीं जा रही है। पार्टी संगठन की ओर से भी सवर्ण संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई का निर्देश नहीं दिया जाता है। भाजपा इस मुद्दों को तुल भी नहीं दे रही है।

सवर्णों ने इन्हें भी नहीं बख्शा : बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी और केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव

किनको-किनको दिखाया काला झंडा

अब तक बिहार के सात प्रमुख नेताओं को अपने सवर्ण कार्यकर्ताओं का विरोध का सामना करना पड़ा है। इन नेताओं में उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी शामिल हैं। सबसे ताजा उदाहरण 3 अक्टूबर 2018 का है जब सवर्णों ने केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव को मुजफ्फरपुर में काला झंडा दिखा। भाजपा के सवर्ण कार्यकर्ताओं ही सवर्ण सेना और सवर्ण संगठन बनाकर केंद्र सरकार का विरोध कर रहे हैं। सबसे पहले विरोध का सामना करना पड़ा केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे को। भागलपुर के नौगछिया में सवर्ण सेना के कार्यकर्ताओं ने काला झंडा दिखाया और केंद्र सरकार के खिलाफ नारे भी लगाये। उपमुख्‍यमंत्री सुशील मोदी को मधुबनी में सवर्णों के विरोध का सामना करना पड़ा तो पार्टी के प्रदेश अध्‍यक्ष और सांसद नित्‍यानंद राय को सीतामढ़ी के रीगा में काले झंडे के साथ विरोध का सामना करना पड़ा। बीते 30 सितंबर 2018 को भाजपा के दिल्‍ली प्रदेश अध्‍यक्ष और सांसद मनोज तिवारी को भभुआ और सासाराम में सवर्णों के विरोध का सामना करना पड़ा। जबकि एक दिन बाद यानी 1 सितंबर 2018 को पटना के बखि्तयारपुर में भाजपा का शंखनाद सम्‍मेलन का आयोजन किया गया था। इसमें भाग लेने के लिए केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव और कृषि मंत्री प्रेम कुमार पहुंच रहे थे। इन दोनों को रास्‍ते में ही काले झंडा का सामना करना और किसी प्रकार भीड़ से बच कर बाहर निकले।

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क्‍या होगा असर?

2014 में केंद्र में भाजपा सरकार बनाने के लिए जी-जान लगाने वाली सवर्ण जातियां आज भाजपा के खिलाफत बगावत कर रही हैं। भाजपा नेताओं को काला झंडा दिखा रही हैं तो इसका असर चुनाव पर भी पड़ेगा। इससे भाजपा का माहौल बिगड़ेगा। इस मुद्दे को लेकर विपक्ष भी अनिर्णय की स्थिति में है। वह न सवर्ण संगठनों के कार्यों की निंदा कर पा रहा है और न विरोधियों के समर्थन में बोल रहा है। वैसे स्थिति में स्‍पष्‍ट है कि सवर्ण संगठन के भाजपा विरोध का लाभ बिहार में राजद या कांग्रेस को नहीं मिलने जा रहा है। सवर्ण भाजपा नेताओं का विरोध करके भी भाजपा के साथ ही रहेंगे।

सवर्णों के विरोध पर भाजपा मौन

सवर्ण संगठनों और सवर्ण कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद भी भाजपा नेता उनके खिलाफ कोई बयान नहीं दे रहे हैं तो उनकी मजबूरी है। सवर्ण जातियां ही भाजपा के आधार वोट हैं। उनकी अपेक्षाओं से पार्टी अवगत हैं। भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में युवाओं के लिए अच्‍छे दिन के सपने बेचे थे। पिछले चार वर्षों में उनके काले दिन आ गये और वे काले झंडे लेकर सड़क पर उतर आये। वैसी स्थिति में सवर्ण संगठनों के विरोध के बाद भी भाजपा के समक्ष चुप रहने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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