बहुजन साहित्य : एक नई सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि की प्रस्तावना

बहुजन साहित्य और संस्कृति की अवधारणा ने पिछले कुछ वर्षों में आकार लेना शुरू किया है। इस अवधारणा को समझने के लिए इन तीन किताबों का अध्ययन आवश्यक है। सिद्धार्थ का विश्लेषण :

भारतीय समाज, संस्कृति, साहित्य, मिथक और इतिहास के पुनर्पाठ और प्रतिपाठ का उपक्रम हजारों वर्षों से चला आ रहा है। वैदिक-अवैदिक, आर्य-अनार्य और अन्य विभिन्न पाठों, पुनर्पाठों और प्रतिपाठों की लंबी प्रक्रिया रही है। औपनिवेशिक कालावधि में यह प्रक्रिया बहुत तीव्र हो गई। राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के दौरान विविध विचार सारणियों और हितों के आधार पर नए सिरे से भारतीय समाज, इतिहास और भविष्य को लेकर तीखे विमर्श शुरू हो गए। इन विमर्शों का प्रयोजन यथार्थ की समझ कायम करने से ज्यादा विभिन्न वर्गाें, समुदायों और संप्रदायों के हितों की रक्षा करना और उन हितों के इर्द-गिर्द लामबंदी करना था। इन दृष्टियों को आमतौर पर औपनिवेशिक, राष्ट्रवादी, उदारवादी, वामपंथी और वर्ण-जाति/ब्राह्मणवाद विरोधी (दलित दृष्टि) दृष्टियों के रूप में जाना जाता है। इसके साथ ही खुले और छद्म रूप में हिदू राष्ट्र की स्थापना के नाम पर ब्राह्मणवाद/ मनुवाद की पुनर्स्थापना की भी पुरजोर कोशिश हो रही थी। सतह पर दिखने वाली इन विचार-सारणियों के वास्तविक अन्तर्य भी वह नहीं थे, जो उनकी संज्ञाओं से परिलक्षित होते हैं। आज यह जग-जाहिर सत्य है कि न केवल राष्ट्रवादी तथा उदारवादी (गांधीवादी), बल्कि वामपंथी दृष्टि भी अपने भीतर गहरे स्तर पर अपने नाभिकीय तत्वों के रूप में ब्राह्मणवाद और जातिवादी पितृसत्ता को समाहित किए हुए थी।

फूले, पेरियार और आंबेडकर की परंपरा ने इन सभी दृष्टियों के भीतर दृश्य-अदृश्य रूप में अस्तित्वमान वर्ण-जातिवादी, ब्राह्मणवादी, द्विज और पितृसत्ता की उपस्थिति को चिह्नित किया और इनके शूद्र, अतिशूद्र और स्त्री विरोधी चरित्र का तीखा प्रत्याख्यान और प्रतिरोध किया। राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के दौरान शूद्रों-अतिशूद्रों के आंदोलन का मुख्य शत्रु ब्राह्मणवाद था, जो उनके हजारों वर्षों के अपमान, उपेक्षा, अवमानना, दासता, उत्पीड़न और शोषण का कारण था। ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की समाप्ति के बाद के राजनीतिक, आर्थिक और  इससे उपजे एक हद के सामाजिक-सांस्कृति परिवर्तनों ने धीरे-धीरे शूद्रों (अन्य पिछड़े वर्गों/ओबीसी) और अति शूद्रों के आंदोलन के बीच गहरी विभाजक रेखा खींच दी। अति शूद्रों (अन्त्यजों/एससी) के आंदोलन ने दलित आंदोलन के रूप में अपने को स्थापित किया। शूद्रों (ओबीसी) की गोलबंदी राजनीतिक भागीदारी और ज्यादा-से-ज्यादा सामाजिक न्याय तक सीमित होकर रह गई। सांस्कृतिक मूल्य के तौर पर इस वर्ग का ब्राह्मणवाद से संघर्ष धुंधला पड़ गया या हाशिये पर डाल दिया गया या ओबीसी की अगड़ी जातियों ने पूरी तरह से सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य के तौर पर ब्राह्मणवाद और ब्राहमणवादी पितृसत्ता को गले लगा लिया। इस प्रक्रिया के साथ ही ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन दलित आंदोलन तक सीमित होकर रह गया, लेकिन पिछड़ा वर्ग के कुछ हिस्से और व्यक्ति पिछड़े वर्गों का स्वतंत्र सांस्कृतिक- साहित्यिक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। अभी हाल (2016) में आए तीन संकलन- ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘हिन्दी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’और ‘महिषासुर एक जननायक’- बहुजन साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की प्रस्तावना और अवधारणा को सामने रखते हैं और इसे पल्लवित-पुष्पित तथा विकसित करने का पुरजोर आग्रह करते हैं तथा इसे भारत के बहुसंख्यक समाज के बेहतर भविष्य हेतु अपरिहार्य और अनिवार्य मानते हैं।

हिन्दी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष

क्या है बहुजन साहित्य, भारतीय समाज के किस तबके का यह प्रतिनिधित्व करता है? किस संस्कृति-साहित्य, मूल्य व्यवस्था, संस्कार, परंपरा और समाज व्यवस्था की यह मुखालफत करता है और इसके बरक्स किन चीजों की स्थापना करना चाहता है तथा इसकी वैचारिकी क्या है? और अतीत में किन परंपराओं से यह अपना नाता जोड़ना चाहता है और किसे खारिज करता है? इन प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश ये संकलन करते हैं। चूंकि, ये संकलन किसी एक व्यक्ति-विशेष की लिखी हुई एक पुस्तक  नहीं है, बल्कि विभिन्न व्यक्तियों के लेखों का संग्रह हैं और ये व्यक्ति भी भिन्न-भिन्न धारणाएं रखते हैं। अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों के हैं। स्वाभाविक है कि इन विविध लेखों के बीच अंतर्विरोध, असंगति और कुछ मामलों में तीखी टकराहटें और असहमतियां मौजूद हों। इसका निहितार्थ यह नहीं है कि समग्रता में इनके बीच से सहमति का कोई स्वर नहीं निकलता है। कुछ मूलभूत बिंदुओं पर सहमति का स्वर मौजूद है। बहुजन साहित्य की अवधारणा के संदर्भ में संपादक प्रमोद रंजन की अवधारणा पूरी तरह से स्पष्ट है। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘बहुजन साहित्य की अवधारणा अपने आप में एकदम सीधी है- अभिजन के विपरीत, बहुजन का साहित्य। जैसा कि ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने कहा था- बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय[i]।’ आगे वे स्पष्ट करते हैं कि ‘बहुजन साहित्य बहुसंख्यकों का साहित्य जरूर है, लेकिन यह बहुसंख्यकवाद का साहित्य नहीं है। इसका आधार संख्याबल नहीं, बल्कि इसके विपरीत सामाजिक और सांस्कृतिक वंचना के पक्ष में जिस सामूहिक-सामुदायिक चेतना का निर्माण मनुवाद करता है, बहुजन साहित्य उसके विरुद्ध विभिन्न सामाजिक तबकों की आवाज है। यह साहित्य उस अंतिम आदमी का साहित्य है, जो किसी भी प्रकार की वंचना झेल रहा है। यह न सिर्फ आर्थिक वंचना और अस्यपृश्यता के सवाल को उठाता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूपों को भी चिह्नित करता है, तथा उसे भी उतना ही महत्वपूर्ण मानता है[ii]।’ संपादक किसी भी प्रकार की अस्पष्टता को दूर करने के लिए आज के वंचित तबकों को चिह्नित करते हुए कहते हैं कि ‘आज के भारतीय परिप्रेक्ष्य में वंचित तबके हैं- स्त्रियां, अनसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां, अन्य पिछड़ा वर्ग, विमुक्त घुमंतू जातियां व सभी पसमांदा धार्मिक अल्पसंख्यक। बहुजन साहित्य की अवधारणा इन सभी की पीड़ाओं में समानता देखती है और इनके शोषण के कारणों को कमोवेश समान पाती है। इनकी पीड़ाओं के मुख्य कारणों को एक शब्द में व्यक्त करना हो, तो निःसंकोच कहा जा सकता है कि वह कारण मनुवाद है[iii]।’ बहुजन साहित्य की इस अवधारणा और भारतीय जनता के बहुसंख्यक हिस्से के संदर्भ में इसकी अनिवार्यता, अपरिहार्यता और उपयोगिता से शायद ही कोई इनकार कर पाए। एक और कारण से इस अवधारणा की उपयोगिता और बढ़ जाती है। वह यह कि वर्ग और वर्गीय साहित्य के नाम पर जिस जन साहित्य की अवधारणा भारतीय वामपंथी प्रगतिशील साहित्यिक संगठनों और उनके नेताओं ने रखी, वह एक अमूर्त-सा जन था। जिसका रूप-रंग और ठोस आकार भारतीय जन से तो नहीं मिलता-जुलता था। वह यूरोप या रूस का सर्वहारा वर्ग था, भारत का शूद्र-अतिशूद्र सर्वहारा वर्ग नहीं। (प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन और एक हद तक मुक्तिबोध ने इससे भिन्न रास्ता अपनाया। वैसे भी ये लोग वामपंथी सांगठनिक घेरे से बाहर ही थे और मार्क्सवादी जड़सूत्रों से जीवन-जगत को देखने की जगह अपनी खुली आंखों से देखते थे। एक हद तक वामपंथी दायरे से बहिष्कृत भी थे)  इसका बुनियादी कारण यह रहा है कि भारतीय वामपंथ यह नहीं समझ पाया कि वर्णजाति व्यवस्था ही भारत में वर्गीय शोषण-उत्पीड़न का बुनियादी आधार रही है। वर्ग विभाजन, वर्णजाति, पितृसत्ता और राज्य का उदय एक साथ हुआ है[iv]। दूसरी बात यह कि भारत के वामपंथी सांस्कृतिक-साहित्यिक आंदोलन के नेताओं का द्विज संस्कृति/मनुवादी-ब्राह्मणवादी संस्कति से प्रेम जग-जाहिर है। इसे मध्यकाल में मनुवादी संस्कति के सबसे बड़े पोषक तुलसी और उनके साहित्य के प्रति प्रगतिशील आलोचकों के नजरिये से समझा जा सकता है। प्रगतिशील साहित्य के सबसे बड़े आलोचकों में से एक रामविलास  शर्मा तुलसी के बारे में लिखते हैं कि ‘तुलसीदास भारत के श्रेष्ठ भक्त-कवि, भक्ति-आंदोलन के निर्माता, उसी भक्ति-आंदोलन की महान उपलब्धि हैं[v]।’

प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन के यांत्रिक, जड़सूत्रवादी और द्विज समर्थ रुख और अमूर्त वर्गीय साहित्य के बरक्स भारतीय जन-जीवन के ठोस साहित्य को यदि बहुजन साहित्य की संज्ञा दी जाती है, जो अपने में सभी प्रकार के उत्पीड़न और शोषण के शिकार लोगों को समाहित कर लेता है, जैसा कि प्रमोद रंजन ने प्रस्तावित किया है, तो इस अवधारणा से शायद ही कोई इत्तेफाक न रखे। दिक्कत वहां शुरू होती है, जब बहुजन साहित्य को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) का पर्यायवाची बना दिया जाता है और इसकाे इस हद तक खींच दिया जाता है कि ओबीसी जातियों में जन्म लेना ही जनपक्षधरता और प्रगतिशीलता का प्रमाण बन जाता है। ऐसे साहित्यकारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की जाने लगती है, जिनका साहित्य मनुवाद को ही सारतः पोषित करता रहा है या जिनके साहित्य में शूद्रों-अतिशूद्रों की विशिष्ट वेदना और पीड़ा का कोई जिक्र ही नहीं। जिनके साहित्य में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की शिकार स्त्रियों की पीड़ा के लिए कोई जगह नहीं। साथ ही ओबीसी साहित्य की धारणा पेश करने वाले कुछ लेखों (संग्रह में संग्रहित) में एक स्वर यह भी है कि दलित साहित्य ओबीसी का प्रतिद्वंद्वी है, उसका हक मार रहा है। ये स्वर सबसे मुखर रूप में राजेन्द्र सिंह के लेख ‘ओबीसी साहित्य की अवधारणा’ में सामने आता है। वे इस साहित्य की परिभाषा संवैधानिक-कानूनी संदर्भ में व्यक्त करते हैं- ‘ओबीसी साहित्य सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों का साहित्य है[vi]।’ वे बिना किसी मूल्यगत मानदंड के जाति के आधार पर ओबीसी साहित्यकारों की सूची पेश करते हैं। इसका प्रतिवाद करते हुए वीरेन्द्र यादव लिखते हैं कि ‘दलित साहित्य की अवधारणा की तर्ज पर ओबीसी साहित्य की परिकल्पना एक विवादास्पद और जोखिम भरा मुद्दा है। विशेषकर जब इसे ओबीसी समाज की पहचान तक सीमित रखा जाए। यह जातिगत पूर्वाग्रह का ही परिचायक है कि भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद के साहित्य में ओबीसी तत्वों को दूरबीन से ढूंढा जाता है। जबकि गैर-पिछड़े समाज से आए लेखकों के साहित्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिनमें श्रमशील पिछड़े वर्ग और हाशिये के समाज की केंद्रीयता है। प्रश्न यह है कि यदि प्रभुत्वशाली अभिजन साहित्य के बरक्स पिछड़े समुदाय की श्रमशील परंपरा की तलाश की जाती है, तो वह साहित्य की विषयवस्तु के आधार पर की जानी चाहिए या लेखक की जाति के आधार पर[vii]?’

दलित साहित्य के साथ ओबीसी साहित्य के रिश्ते पर प्रेमकुमार मणि का यह सवाल जायज है कि ‘ओबीसी साहित्य की कोई अलग विचारधारा है, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए अन्यथा जाति को लेकर एक नया पंथ खड़ा करना बहुत होशियारी की कोई बात नहीं है।’ दलित साहित्य के साथ एक विचारधारा थी। फुले और अांबेडकर की विचारधारा[viii]। ओबीसी साहित्य का स्वागत करते हुए कंवल भारती भी उसका दर्शन क्या होगा? यह प्रश्न उठाते हैं और दलित साहित्य के सापेक्ष में यह प्रश्न उठाते हैं कि जिस तरह दलित साहित्य की एक पहचान है, उसके मूल में ज्योतिबा फुले, डॉ. अांबेडकर, बुद्ध और कबीर-रैदास का दर्शन है। वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यता उसकी मुख्य वैचारिकी है। उस प्रकार ओबीसी साहित्य का दर्शन क्या होगा[ix]?

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना

जहां ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ बहुजन साहित्य की अवधारणा को अपने विमर्श का विषय बनाती है, तो ‘हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’ इस अवधारणा की रोशनी में हिंदी के वर्चस्वशाली साहित्येतिहास को देखने-परखने की वैकल्पिक दृष्टियों को सामने रखता है साथ ही इस वर्चस्वशाली साहित्येतिहास से बहिष्कृत किए गए या हाशिये पर फेंक दिए गए तबकों और उनके जीवन-यथार्थ का प्रतिनिधित्व करने वाली रचनाओं एवं रचनाकारों को समुचित जगह देने का प्रस्ताव करता है। बहिष्कृत तबकाें में स्त्री, आदिवासी, शूद्र-अतिशूद्र हैं। वर्चस्वशाली इतिहास दृष्टि से टकराहट के केंद्र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। ऐसा होना एक हद तक लाजिमी भी था, क्योंकि हिंदी का मुकम्मल इतिहास तो शुक्ल जी ने ही लिखा है। लेकिन, यही इस संकलन की सीमा भी है। शुक्ल जी के बाद के महत्वपूर्ण माने जाने वाले आलोचकों- हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह की इतिहास और आलोचना की दृष्टि के छिटपुट संदर्भों के अलावा कोई चर्चा भी नहीं है, गंभीर विवेचना और विश्लेषण की बात तो दीगर है।

ज्यादातर लेख यह स्थापित करते हैं कि शुक्ल जी की आलोचना के मूल्यों और इतिहास दृष्टि के मानकों का निर्धारण द्विज संस्कृति/ब्राह्मणवादी मूल्यों के आधार पर हुआ है। इस चीज को मुक्तिबोध इस प्रकार रेखांकित करते हैं- ‘पं. रामचन्द्र शुक्ल जो निर्गुण मत को कोसते हैं, वह यों ही नहीं है। इसके पीछे उनकी सारी पुराण-मतवादी चेतना बोलती है[x]।’ वे दो टूक शब्दों में कहते हैं कि ‘एक बार भक्ति-आंदोलन में ब्राह्मणों का प्रभाव जम जाने पर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा में कोई देर नहीं थी। ये घोषणा तुलसीदास ने की थी[xi]।’ हिंदी के प्रगतिशील आलोचकों द्वारा शुक्ल जी की वर्ण-जातिवादी मानसिकता को ढकने और उन्हें जनवादी-उदारवादी ठहराने  की कोशिशों का पर्दाफाश करते हुए मुक्तिबोध लिखते हैं कि ‘आश्चर्य की बात यह है कि आजकल प्रगतिवादी क्षेत्रों में तुलसीदास जी के संबंध में जो कुछ लिखा गया है, उसमें जिस सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के तुलसीदास जी अंग थे, जान-बूझकर भुलाया गया है। पंडित रामचन्द्र शुक्ल की वर्णाश्रमधर्मी जातिग्रस्त सामाजिकता और सच्चे जनवाद को एक-दूसरे से ऐसे मिला दिया गया है, मानो शुक्ल जी (जिनके प्रति हमारे मन में अत्यन्त आदर है) सच्ची जनवादी मानसिकता के पक्षपाती हों[xii]।’ तब क्या हिंदी आलोचना चतुर्वर्ण की संहिता को मजबूत करने वाली आलोचना रही है? शुक्ल जी की धर्मभूमि की यह झांकी लेने के बाद ऐसा कहा जा सकता है कि शुक्ल जी के कैननाइजेशन में इस वर्णवाद की बड़ी निर्णायक भूमिका है। शुक्ल जी का सत्ता-विमर्श यहीं से सत्ता प्राप्त करता है और इसी सत्ता को बहाल करता है[xiii]। शुक्ल जी के इस वर्ण-जातिवादी इतिहास और आलोचना की दृष्टि का प्रत्याख्यान करते वैकल्पिक बहुजन इतिहास की दृष्टि काे प्रस्तुत करने का प्रस्ताव पेश किया गया है- ‘साहित्य की बहुजन-दृष्टि से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास दृष्टि का किया गया अध्ययन हिंदी साहित्य के इतिहास और उसके प्रतिमानों को खारिज करता है और इतिहास के पुनर्लेखन की मांग करता है[xiv]। बहुजन साहित्येतिहास के प्रस्तावक पुनर्लेखन की चुनौतियों से भली-भांति परिचित हैं। इतिहास दृष्टि इसमें सबसे बड़ी चुनौती है। इसे निर्धारित कर पाना और उस पर कायम रहकर एक हजार साल के इतिहास का सम्यक मूल्यांकन कर पाना अत्यंत कठिन कार्य है।[xv]

हिंदी के वर्चस्वशाली साहित्येतिहास में बहिष्कृतों और हाशिये के तबकों में स्त्री भी शामिल है। इस संदर्भ की कई आलेखों में चर्चा आई है। सुनीता गुप्ता, प्रेमपाल और रामनरेश राम के आलेख विस्तार से इस बहिष्करण और इसके कारणों का विवेचन-विश्लेषण करते हैं। सुनीता गुप्ता सुमन राजे को उद्धृत करते हुए कहती हैं कि ‘ज्यों-ज्यों आधे इतिहास का लेखन गति पकड़ता गया, यह धारणा पुख्ता होती गई कि पुरुष इतिहासकारों ने महिला रचनाकारों के साथ बहुत अन्याय किया है। यह अन्याय उदासीनता के चलते हुआ हो, ऐसी बात नहीं। यह अन्याय विमुख रहकर किया गया[xvi]।’ इन आलेखों में बहिष्कृत और हाशियाकृत स्त्री रचनाकारों की लंबी सूचियां भी दी गई हैं। आदिवासी तो हजारों वर्षों से मुख्यधारा से बहिष्कृत रहे हैं। इस संकलन के कुछ आलेखों में भी बहुजन साहित्य या ओबीसी साहित्य के प्रतिद्वंद्वी के रूप में दलित साहित्य को देखा गया है, जो इस विमर्श की व्यापकता को सीमित और संकुचित करता है।

साहित्य और मिथक

वर्ण-जातिवादी ब्राह्मणवादी द्विज संस्कृति अपने वर्चस्व की स्थापना और उसे बनाए रखने के लिए अनवरत तौर पर मिथकाें की रचना और पुनर्रचना करती रही है। ऐसे ही मिथकों में एक प्रभावी मिथक दुर्गा और महिषासुर का युद्ध और इस युद्ध में महिषासुर की पराजय तथा दुर्गा द्वारा उनकी हत्या है। प्रमाेद रंजन द्वारा संपादित ‘महिषासुर एक जननायक’ संकलन इस मिथक का प्रत्याख्यान करता है। संपादक इसे एक सांस्कृतिक युद्ध के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। उनका यह कहना बिलकुल ठीक है कि किसी भी कथा के, चाहे वह पौराणिक हो या साहित्यिक या फिर अय्यारी के ही किस्से क्यों न हो, निहितार्थ को समझने के लिए उसका ‘पाठ’  विखंडन आवश्यक है।’ वे स्वयं ही यह प्रश्न उठाते हैं कि दुर्गा-महिषासुर की पौराणिक कथा का आज पुनर्पाठ क्यों? भारतीय समाज को इससे क्या लाभ है? बहुजन समाज को इससे क्या फायदा है? वे स्वयं ही इसका जवाब भी देते हुए कहते हैं कि वस्तुतः यह पुनर्पाठ न्याय की अवधारणा और मनुष्योचित नैतिकता को स्थापित करने के लिए है। सामर्थ्य पर सच्चाई की विजय के लिए है। सैकड़ों वर्षों से जाति-व्यवस्था से ग्रस्त इस समाज को अपनी मुक्ति के लिए अपने इस अवचेतन में उतरना ही होगा। आधुनिकता के बाहरी औजारों की शल्य क्रिया से इसकी मानसिक-मवाद पूरी तरह खत्म न की जा सकेगी। पौराणिक कथाओं के पुनर्पाठ को इसके मनौवैज्ञानिक इलाज की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए[xvii]।’ मिथकों के पुनर्पाठ या प्रतिपाठ की परंपरा कोई नई चीज नहीं है।

महिषासुर एक जननायक

प्रतिक्रियावादी-यथास्थितिवादी संस्कृतियों के बरक्स प्रगतिशील संस्कृतियों की रचना की चाह रखने वालों के लिए ऐसा करना अपरिहार्य हो जाता है। यह पुनर्विचार ज्योतिबा फुले ने आरंभ किया। अपनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘गुलामगीरी’ में उन्होंने हिंदू मिथकों और उनके आधार पर प्रचारित मान्यताओं की कठोर निंदा की है और उन मिथकों में छिपे षड्यंत्रों को भी उजागर किया किया है। डॉ. अांबेडकर ने भी ‘रिडल्स इन हिंदुइज्म’ में स्पष्ट संदेश दिया है कि भारतीय शास्त्रकारों ने मिथकीय व्याख्याओं के आधार पर इस धर्म और इसके समाजशास्त्र का ढांचा खड़ा किया है। डॉ. आंबेडकर और ज्योतिबा फुले के अध्ययन को आधार बनाकर और परवर्ती शोधकर्ताओं और लेखकों को देखें, तो स्पष्ट होता जाता है कि इसमें से अधिकांश मिथकीय चरित्र और उनसे निकलने वाले संदेश किन्हीं सच्चाइयों को छिपाकर, किन्हीं गलत तथ्यों को प्रचारित करने के लिए ही गढ़े गए हैं। विशेष रूप से देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय, डी.डी. कोसंबी और गेल ओमवेट का अध्ययन स्पष्टता से बताता है कि भारतीय मिथकों ने कैसे आकार लिया और उनकी दिशा-विशेष की मौलिक प्रेरणाएं कहां निहित हैं[xviii]? महिषासुर का पुनर्पाठ अपने को इस परंपरा का ही विस्तार मानता है। कांचा आयलैया जैसे अध्येता इसे व्यापक सांस्कृतिक संघर्ष के हिस्से के रूप में देखते हैं और कहते हैं कि ‘यह एक तरह से हिदुत्ववादी ताकतों के गाय आधारित राष्ट्रवाद के खिलाफ भैंस आधारित राष्ट्रवाद का विरोध है। महिषासुर को भैंस की तरह काले रंग में दिखाया जाता है।’ वे इसे भविष्य के व्यापक सांस्कृतिक संघर्ष की संभावना के रूप में देखते हुए कहते हैं कि ‘दलित बहुजन और सवर्णों के बीच अगर पंचायत स्तर से लेकर संसदीय स्तर पर सांस्कृतिक संघर्ष की शुरुआत हो गई है, तो कोई इसे रोक नहीं पाएगा[xix]।’ जो लोग महिषासुर की ऐतिहासिकता का प्रश्न उठाते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि मिथक लोकमानस के अवचेतन के हिस्से होते हैं। महिषासुर का इतिहास तो लोकमानस की यादों में जीवित है, उसे इतिहास-ग्रंथाें में खोजना बेईमानी है[xx]। इस संकलन में लोकमानस में महिषासुर की उपस्थिति की व्यापक पड़ताल की गई है और विविध प्रमाणों से लोकमानस में महिषासुर की उपस्थिति को दिखाया गया है।

तीनों संकलनों के विविध लेख अपनी भीतरी टकराहटों, अंतर्विरोधों और सीमाओं की उपस्थिति के बावजूद भारत की वर्चस्वशाली वर्ण-जातिवादी/ब्राह्मणवादी द्विज साहित्य, संस्कृति और मिथकों का प्रत्याख्यान करते हुए एक नई वैकल्पिक बहुजन दृष्टि की प्रभावशाली प्रस्तावना रखते हैं।

(हिन्दी पत्रिका सबाल्टर्न के अक्टूबर 2018 अंक में पहली बार प्रकाशित)

(काॅपी संपादन : प्रेम बरेलवी)


[i] प्रमोद रंजन (2016), बहुजन साहित्य की प्रस्तावना, बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, संपादक- प्रमोद रंजन, आयवन कोस्का, द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन, वर्धा, महाराष्ट्र, पृष्ठ.-7

[ii] वही, पृष्ठ-7,8

[iii] वही, पृष्ठ-8

[iv] सुवीरा जायसवाल (2004) वर्णजाति व्यवस्था, उद्भव प्रकार्य और रूपांतरण, भूमिका.पृष्ठ-20 , ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली

[v] रामविलास शर्मा (1981), परंपरा का मूल्यांकन, भक्ति- आंदोलन और तुलसीदास, पृ.-90, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

[vi] राजेंद्र प्रसाद सिंह, बहुजन साहित्य की प्रस्तावना, ओबीसी साहित्य की अवधारण, पृष्ठ-21

[vii] वीरेंद्र यादव (2016) बहुजन साहित्य की प्रस्तावना, ओबीसी की अवधारणा कितनी प्रासंगिक, पृष्ठ-54

[viii] प्रेमकुमार मणि (2016) बहुजन साहित्य की प्रस्तावना, आलोचना की अधोगति, पृष्ठ-47

[ix] कंवल भारती (2016) बहुजन साहित्य की प्रस्तावना, मुख्यधारा बने बहुजन अवधारणा, पृष्ठ-98

[x] मुक्तिबोध (2016), हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष, मध्ययुगीन भक्ति- आंदोलन का एक पहलू, पृष्ठ-21, संपादक- प्रमोद रंजन, शृंखला संपादक- किशन कालजयी, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली

[xi] वही- पृष्ठ-20

[xii] वही- पृष्ठ-23

[xiii] सुधीश पचौरी (2016), हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष, रामचन्द्र शुक्ल की धर्म भूमि, पृष्ठ-40

[xiv] उद्धृत, विशेष राय, हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष,  राजेंद्र प्रसाद सिंह (2009), हिंदी साहित्य सबाल्टर्न इतिहास, गौतम बुक सेंटर, दिल्ली

[xv] कमलेश वर्मा (2016), हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष, कबीर और वर्चस्वविहीन-संस्कृति, पृष्ठ-46

[xvi] उद्धृत, सुनीता गुप्ता, हिंदी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष, सुमन राजे (2003) हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ-27, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

[xvii] प्रमोद रंजन (2016), महिषासुर : एक जननायक, भिन्न जीवन-मूल्य की अभिव्यक्ति, पृष्ठ-13 , द मार्जिनलाइज्ड, महाराष्ट्र

[xviii] संजय सोठे, प्रतिमान (जनवरी-जून 2016), महिषासुर–विमर्श, एक मिथकीय पुनः पाठ, पृष्ठ-108

[xix] कांचा आयलैया (2016), महिषासुर : एक जननायक, नहीं रुकेगा सांस्कृतिक संघर्ष, पृष्ठ-88, 89

[xx] डॉ. राजेन्द्र सिंह (2016), महिषासुर एक जननायक, भाषाविज्ञान की दृष्टि में महिषासुर, पृष्ठ-47


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दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

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