नोटबंदी के दो साल : सरकार मस्त, तंत्र पस्त और जनता त्रस्त

बीते 8 नवंबर को नोटबंदी के दो साल पूरे हो गए। इस दौरान क्या खोया, क्या पाया? इसको लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के अपने-अपने दावे हैं। दावों से इतर बदले हालात पर फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

राजनीति में पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप के दौर चलते रहते हैं। नोटबंदी की दूसरी सालगिरह पर भी आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला जारी रहा। सत्तासीन भाजपा जहां यह साबित करने में जुटी रही कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है। वहीं कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी नेता यह साबित करने में जुटे रहे कि प्रधानमंत्री के इस तुगलकी फैसले का खामियाजा आज भी आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। इससे अर्थव्यवस्था का विस्तार तो नहीं हुआ, अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चौपट जरूर हो गई।

इससे इतर हाल ही में एक नई घटना सामने आई। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मनमुटाव इस हद तक बढ़ गया कि दोनों आेर से परोक्ष और प्रत्यक्ष- दोनों रुप से हमले होने लगे। सरकार द्वारा रिजर्व बैंक में जमा धन का एक-तिहाई मांगे जाने की खबर पूरे देश में चर्चा में रही। यह वही उर्जित पटेल हैं, जिन्हें नरेंद्र मोदी कैंप का माना जाता था। उन्हें पसंदीदा अधिकारी माना गया था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। रिश्ता आखिर कैसे खराब हो गया?

खैर, कयासाें का सिलसिला आज भी जारी है। बताया जा रहा है कि उर्जित पटेल द्वारा कार्यभार संभालते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी का फैसला लिया गया। पटेल इसके पक्ष में नहीं थे। यहीं से कड़ुवाहट शुरू हुई और नोटबंदी से जब ।9 लाख करोड़ रुपए के नुकसान की बात सामने आई, तो यह कड़ुवाहट और भी बढ़ गई। आरबीआई ने जब आंकड़ाें पर आधारित रिपोर्ट जारी की, तब सरकार और उसके समर्थकों की तरफ से सवाल उठाए गए। कुछ ने इसे उर्जित पटेल के जमीर का जागना तक कहा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

दो साल पहले का दृश्य

केंद्र में सत्तासीन मोदी सरकार ने 8 नवंबर 2016 को रात 8ः00 बजे जब अचानक नोटबंदी का फैसला लिया था, तो उस समय किस तरह अफरा-तफरी मच गई थी। बैंकों के सामने लंबी-लंबी कतारें और फिर वहां से खाली हाथ लौटना, रोजमर्रा की जरूरतों तक पूरा नहीं कर पाना। लेकिन, इस सबके बावजूद देश की जनता का विचलित नहीं होना बड़ी बात थी। और ऐसा संभव हुआ था केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी के भरोसे पर, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे केवल और केवल 50 दिन मांगे थे। यानी साल 2016 के 8 नवंबर से 30 दिसंबर तक का समय। तब प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया था कि अगर 30 दिसंबर के बाद कोई कमी रह जाए, कोई मेरी गलती निकल जाए, कोई मेरा गलत इरादा निकल जाए, तो आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे मैं खड़ा होंऊंगा और देश जो भी सजा तय करेगा, वह सजा भुगतने को तैयार रहूंगा।  

नोटबंदी लागू होने के बाद रुपए निकालने के लिए बैंकों में लगी लंबी कतारें

आतंकवाद, काला धन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के थे दावे

देश को इससे क्या फायदा हुआ? इस सवाल के साथ-साथ और भी आम लोगों के साथ-साथ सियासी गलियारों में भी उठने शुरू हो गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो यहां तक कह दिया है कि नोटबंदी एक ऑर्गेनाइज्ड लूट और लीगलाइज्ड प्लंडर (कानून सम्मत डाका) है।

हालांकि, इसमें दो राय नहीं कि नोटबंदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के चुनिंदा प्रमुख फैसलों में से एक फैसला रहा है और इस पर देश की जनता का उन्हें भरपूर साथ भी मिला। लोगों ने उस दौरान कष्ट सहे, लेकिन कोई विरोध नहीं किया। उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी के चार मकसद बताए थे। इनमें आतंकवाद, कालाधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के साथ-साथ डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देना शामिल था। लेकिन, आंकड़ों पर नजर डाली जाए, तो इनमें से तीन मकसद तो पूरी तरह से विफल रहे, जबकि चौथा आंशिक रूप से ही सफल साबित हुआ है।

नोटबंदी के दो सप्ताह बाद तत्कालीन अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि सरकार ने यह कदम उत्तर, पूर्व और कश्मीर में भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल हाे रहे चार-पांच लाख करोड़ रुपए तक के चलन काे बाहर करने के लिए उठाया है। लेकिन, अब वित्त मंत्री अरुण जेटली की तरफ से बयान दिया जा रहा है कि कितना पैसा वापस आएगा, ये नोटबंदी का मकसद नहीं था।

इतना ही नहीं, नोटबंदी के वक्त भ्रष्टाचार को दीमक बताते हुए दावा किया गया था कि अंकुश लगाने के लिए नोटबंदी जैसा सख्त कदम उठाना जरूरी हो गया था। लेकिन, इसका हकीकत में असर भी नहीं दिखा। हाल ही में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भ्रष्ट देशों की सूची में जहां भारत 2016 में 79वें नंबर पर था, वहीं 2017 में 81वें नंबर पर पहुंच गया। राफेल डील पर सरकार पर उंगली उठ रही है। विपक्ष जहां रोजाना नए-नए सवाल कर रहा है, वहीं फ्रांस की मीडिया ने भी इस डील पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

निजी कंपनी पेटीएम का यह विज्ञापन काफी विवादास्पद था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर का उपयोग किया गया था। यह विज्ञापन 9 नवंबर 2016 को देश के करीब सभी बड़े अखबारों में प्रकाशित करवाया गया था

इसी तरह नोटबंदी से डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा मिलने का दावा किया गया था और ऐसा हुआ भी। 2016 के मुकाबले 2017 में डिजिटल पेमेंट की राशि 40 प्रतिशत तक बढ़ी और जुलाई 2018 तक इसमें पांच गुना तक बढ़ोतरी हुई। हालांकि, तब नोटबंदी को कैशलेस इकोनॉमी के लिए जरूरी कदम बताया गया था, लेकिन नोटबंदी के पौने दो साल बाद रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक लोगों के पास मौजूदा समय में सबसे ज्यादा नकदी है। रिजर्व बैंक के मुताबिक, ‘‘9 दिसंबर 2016 को आम लोगों के पास 7.8 लाख करोड़ रुपए थे, जो जून 2018 तक बढ़कर 18.5 लाख करोड़ तक हाे गए।’’ यानी नोटबंदी के समय से नकदी लगभग दोगुनी हो गई। वहीं, जाली नोटों के चलन पर भी अंकुश नहीं लग पाया। रिजर्व बैंक के मुताबिक, ‘‘2017-18 में 500 के 9,892 नोट और 2000 के 17,929 नोट पकड़े गए।’’ बता दें कि ये सभी जाली नोट थे। इसके अलावा नोटबंदी से फायदे से उलट इसे लागू करने में रिजर्व बैंक को हजारों करोड़ का नुकसान अलग से उठाना पड़ा। नए नोटों की प्रिटिंग के लिए रिजर्व बैंक को 7,965 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े। इसके अलावा नकदी की किल्लत नहीं हो, इसलिए ज्यादा नोट बाजार में जारी किए गए। इस कारण 17,426 करोड़ रुपए का ब्याज भी अलग से चुकाना पड़ा। इसके साथ-साथ देश भर के एटीएम को नए नोटों के हिसाब से तैयार करने में भी करोड़ों रुपए खर्च हुए।

चरमरा गई देश की अर्थव्यवस्था

इतना ही नहीं, नोटबंदी से देश की आर्थिक विकास दर की गति पर भी असर पड़ा है। 2015-16 के दौरान जीडीपी की ग्रोथ रेट 8.01 प्रतिशत के आसपास थी, जो 2016-17 के दौरान 7.11 फीसदी पर पहुंच गई। इतना ही नहीं 2017-18 के छमाही  तक जीडीपी की ग्रोथ रेट 6.1 फीसदी पर आ गई। उधर, नीति आयोग ने कम आर्थिक विकास दर के लिए आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के मुताबिक, ‘‘रघुराम राजन की नीतियों की वजह से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर असर पड़ा है। कुमार ने कहा कि विकास दर के घटने की एक बड़ी वजह यूपीए सरकार द्वारा दिए गए लोन के कारण बैंकिंग क्षेत्र का बढ़ता एनपीए है, न कि नोटबंदी।’’ नोटबंदी के कारण विकास दर के घटने की चर्चा पर कुमार का कहना है कि इस तरह की बातें बिलकुल गलत हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह

वहीं, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पलटवार करते हुए कहा है कि, ‘‘एनडीए सरकार ने कितना कर्ज दिया है और उनमें से कितनी राशि डूब गई। इसका खुलासा किया जाना चाहिए।’’ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एनडीए सरकार के दौरान दिए गए उन कर्जों का खुलासा करने की मांग की, जो गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में तब्दील हो चुके हैं।

अर्थ व्यवस्था हुई बदहाल : नोटबंदी के दो साल बाद देश के सकल घरेलू उत्पाद दर में एक फीसदी की कमी

हालांकि, सरकार की तरफ से कुछ क्षेत्रों का जिक्र कर जीडीपी ग्रोथ रेट के आठ फीसदी से ऊपर हाेने का भी दावा करने की कोशिश की गई, लेकिन चिदंबरम का कहना है कि, ‘‘आंकड़े की कलाबाजी से अब काम नहीं चलने वाला है। जनता सब समझ रही है।’’ उन्होंने कहा कि, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था के टर्म में 1.5 फीसदी का नुकसान हुआ, जिसका सीधा-सीधा मतलब निकलता है कि एक साल में 2.5 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।’’ वित्त मामलों की पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट में भी नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ एक फीसदी कम होने की बात कही गई है।

टैक्स बढ़ा, रोजगार घटे

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकाेनाॅमी के कंज्यूमर पिरामिड हाउस होल्ड सर्विस के आंकड़ाें के मुताबिक, ‘‘2016-17 की अंतिम तिमाही में करीब 15 लाख नौकरियां गईं।’’ भाजपा के सहयोगी संगठन भारतीय मजदूर संघ ने भी नोटबंदी पर कहा कि, ‘‘असंगठित क्षेत्र की ढाई लाख यूनिटें बंद हो गईं और रियल एस्टेट सेक्टर पर भी बुरा असर पड़ा है। लाेगाें ने बड़ी संख्या में नौकरियां गंवाई हैं।’’ यानी नोटबंदी से नुकसान की लंबी फेहरिस्त है, वहीं नोटबंदी से एक फायदा जरूर दिख रहा है और वह टैक्स भरने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है। 2017-18 के इकोनाॅमिक सर्वे के मुताबिक, ‘‘नोटबंदी के बाद देशभर में टैक्स भरने वालों की संख्या में 18 लाख की बढ़ोतरी हुई है।’’ हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था के अब तक के ट्रेंड के हिसाब से सामान्य है। क्योंकि, प्रत्येक वर्ष टैक्स भरने वालों की संख्या में औसतन 10 फीसदी का इजाफा होता ही है।

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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