हनुमान की जाति : उलटबांसी करते द्विज

भारतीय राजनीति में हनुमान शब्द एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। मसलन बिहार में कभी नीतीश लालू के हनुमान थे, तो आजकल अमित शाह को प्रधानमंत्री माेदी का हनुमान कहा जा रहा है। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने हनुमान की जाति दलित बताकर पूरी राजनीति में उबाल ला दिया है। सिद्धार्थ का विश्लेषण :

अगले वर्ष 2019 की लोकसभा चुनावी जंग की तैयारी से पहले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव अंतिम चरण में हैं। इस दंगल में अपने विरोधी को चित करने की कोशिश में पहलवान खुद ही चित हो जा रहे हैं। एक दांव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी खेला। उन्होंने राम भक्त- सेवक हनुमान को दलित बता दिया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव में राम भक्त बीजेपी को वोट दें, रावण भक्त कांग्रेस को वोट दें। हिंदुओं के भगवानों की भी जाति है और यह कोई नई बात नहीं है।

राम को क्षत्रिय, कृष्ण को यदुवंशी और परशुराम को ब्राह्मण के रूप में पहले ही हिंदू धर्मग्रंथों में मान्यता प्राप्त है। हां, हनुमान की जाति का पता इन धर्मग्रंथों या पुराणों से नहीं चलता। उनके माता-पिता और जन्म के प्रसंग का तो वर्णन इन धर्मग्रंथों और पुराणों में है, लेेकिन उनकी जाति का कोई जिक्र नहीं है। अब उनकी भी जाति योगी जी ने बता दी।

सिंदूरी-लाल के बदले नीले रंग का हनुमान (पेंटिंग – शेखर पवार)

ज्यों ही उन्होंने हनुमान को दलित या वनवासी कहा, राजनीति के साथ-साथ समाज में एक उबाल पैदा हो गया।

शंकराचार्य ने कहा है कि योगी जी ने हनुमान को दलित कहकर महापाप किया है। उन्होंने हनुमान चालीसा काे उद्धृत किया, जिसमें लिखा है कि हनुमान जी जनेऊ धारण किए हुए हैं। शंकराचार्य ने कहा कि लगता है कि उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ नहीं किया है, जिसमें वर्णित ‘हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै, कांधे मूंज जनेऊ साजै’ है। अगर योगी ने हनुमान चालीसा का पाठ किया होता, तो वह हनुमान जी को दलित न कहते। शंकराचार्य यहां संकेत दे रहे हैं कि जनेऊ धारण सिर्फ द्विज करते हैं, यदि हनुमान दलित होते, तो कैसे जनेऊ धारण करते। महापाप कहने का एक कारण और भी है। सारे हिंदू धर्मग्रंथ साफ-साफ कहते हैं कि दलित यानी शूद्र की पूजा नहीं की जा सकती है, चाहे वह कितना बड़ा ज्ञानी क्यों न हो। इसी बात को तुलसीदास ने रामचरित मानस में इस प्रकार कहा है- ‘पूंजहिं विप्र सकल गुणहीना, शूद्र न पूजहिं ज्ञान प्रवीना’। दलित शू्द्र या अतिशूद्र होते हैं। जयपुर के सर्व ब्राह्मण समाज ने योगी के खिलाफ नोटिस भेजकर माफी मांगने को कहा है। भाजपा सांसद उदित राज ने योगी का समर्थन करते हुए कहा कि जब सभी भगवानों की जाति का उल्लेख हिंदू धर्मग्रंथों में है, तो हनुमान की जाति का भी पता लगाया जाना चाहिए। योगी ने उन्हें दलित-वनवासी ( आदिवासी) कहकर इसकी शुरुआत कर दी है।

‘बात निकलेगी, तो फिर दूर तलक जाएगी’ यह बात यहां सटीक बैठ रही है।

जनेऊ पहने एक सूअर रूपी हिंदू देवता की प्रतिमा : शंकराचार्य महोदय, ये किस गोत्र के ब्राह्मण हैं?

योगी द्वारा हनुमान को दलित कहते ही, भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता और अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष नंद कुमार साय ने हनुमान पर आदिवासियों की दावेदारी ठोक दी। उन्होंने कहा कि जनजातियों में हनुमान एक गोत्र है। हमारे यहां कुछ जनजातियों में साक्षात हनुमान भी गोत्र है। जिस दंडकारण्य में भगवान (राम) ने सेना का संधान किया था, उसमें इस जनजाति वर्ग के लोग आते हैं। इसलिए हनुमान दलित नहीं, जनजाति हैं।


 योगी जी हनुमान को दलित कह रहे हैं, शंकराचार्य उनके जनेऊ की चर्चा कर उनके द्विज होने की तरफ इशारा कर रहे हैं, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष उन्हें जनजाति कर रहे हैं; लेकिन दलितों के एक हिस्से की प्रतिक्रिया इससे भिन्न है। वे हनुमान को दलित कहना दलितों-बहुजनों का अपमान मान रहे हैं और कह रहे हैं कि योगी हनुमान को दलित के रूप में पेश करके यह कहना चाहते हैं कि दलितों का मुख्य कार्य द्विजों की सेवा और भक्ति करना है और वही दलित द्विजों के प्रेम और सम्मान का पात्र हो सकता है, जो दास भाव से द्विजों की सेवा करे।

राम के पैर की मसाज करते हनुमान की पेंटिंग

इस संदर्भ में उनका कहना है कि हनुमान का पूरा मिथक सवर्णों के सेवक का सबसे बडा प्रतीक है। इस मिथकीय चरित्र को दलित कहकर योगी चाहते हैं कि दलित हनुमान की तरह दास भाव से दिन-रात उनकी सेवा करें। हनुमान के मिथकीय चरित्र को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने वाले तुलसीदास हैं। उन्होंने रामचरित मानस में राम के प्रति हनुमान के समर्पण, सेवाभाव और भक्ति को चित्रित करने के लिए राम चरित मानस में पूरा एक कांड लिखा है, जिसका नाम सुंदरकांड है। तुलसी की नजर में हनुमान की सबसे बड़ी विशेषता उनका राम के चरणों का अनुगामी होना है-

 ‘हनुमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ रामचरन अनुरागी।

गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार-बार प्रभु निज मुख गाई ।।’ -(उत्तरकाण्ड, दोहा-49, चौपाई- 3/5)

रामचरित मानस ही नहीं, सभी हिंदू धर्म ग्रंथ शूद्रों (दलितों) का मुख्य कार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना बताते हैं। मनुस्मृति में साफतौर पर कहा गया है कि ब्रह्मा ने शूद्र के लिए सिर्फ एक कर्म निर्धारित किया है, वह यह कि वह विनम्र होकर तीन वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करे-

एकं एव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् ।

एतेषां एव वर्णानां शुश्रूषां अनसूयया ।

दलित-बहुजन समाज का कहना है कि उन्हें सेवक दलित के प्रतीक के रूप में हनुमान पसंद नहीं हैं, क्योंकि आज का दलित-बहुजन समानता चाहता है, बराबर का अधिकार चाहता है। वह किसी का भी सेवक बनने को तैयार नहीं है। उनका यह भी आरोप है कि दलित-बहुजनों द्वारा जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता के लिए चलाए जा रहे संघर्ष को कमजोर करने और दलितों की सेवक के रूप तस्वीर पेश करने के लिए योगी ने हनुमान को दलित के रूप में प्रस्तुत किया है और यह प्रतीक दलितों के लिए अपमानजनक भी है। उनका यह भी कहना है कि यह संविधान की भावना के विपरीत भी है। संविधान किसी को भी स्वामी या सेवक नहीं मानता। संविधान ने हर नागरिक को समान माना है।

राजधानी दिल्ली सहित उत्तर भारत के अधिकांश शहरों में कारों पर लगाए जा रहे हैं क्राेधित हनुमान की पेंटिंग

योगी ने भले ही राजस्थान के 17.5 प्रतिशत दलितों का वोट पाने के लिए हनुमान को दलित कहने का दांव खेला हो, लेकिन यह संघ-भाजपा के लिए उलटा भी पड़ सकता है, साथ ही नए विमर्शों और सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को जन्म दे सकता है।

(राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप में प्रकाशित)

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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