अत्याचार और भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती जनसरोकार की ग़ज़लें

शायर मूलचन्द सोनकर ने बिंबों में उन किरदारों को लिया है, जिन्होंने दलितों-शोषितों-पिछड़ों पर जमकर अत्याचार किए हैं। सोनकर की शायरी में बहुजनों को झकझोरने की ताक़त है, तो जाति-वर्ण-भाषा-क्षेत्र के नाम पर लोगों का शोषण और उनसे भेदभाव करने वालों के ख़िलाफ़ गुस्सा भी है

महबूब की तारीफ़ों और इश्क़ की गलियों से निकलकर ग़ज़ल अब दुनियावी रंगों यानी जन-सरोकार के दूसरे पहलुओं पर खुलकर गुफ़्तगू कर रही है। ग़ज़ल का यह रंग शायरी के शौक़ीनों और अदीबों के साथ-साथ आम लोगों को भी ख़ूब भा रहा है। क्योंकि, इसमें ग़रीबों और आम लोगों के हक़ की बात है, इसलिए ऐसी शायरी के हमज़ुबां और तरफ़दारों की भी बड़ी तादाद है।

इस फन की शायरी में अनेक शायरों ने क़लाम कहे हैं। मूलचन्द सोनकर उन्हीं में से एक हैं। मूलचन्द सोनकर ने अपनी शायरी में लोगों के ग़मों, ख़ासकर दलितों-शोषितों-बहुजनों पर होने वाले द्विज मानसिकतावादी. दौलतमंद और ताक़तवर लोगों के ज़ुल्मों-सितम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी है। उनकी शायरी में संजीदगी भी है, और समाज में फैले भेदभाव और ज़ुल्म करने वालों के आगे बेबस लोगों की लाचारी की बयानबाज़ी और उससे निजात पाने की तरकीबों, बग़ावती तेवरों की हिमायत के साथ-साथ उनसे टकराने की हिमाकत और इंसाफ की मांग भी है। क्योंकि, मूलचन्द सोनकर आम पाठकों ख़ासकर दलितों-पिछड़ों-शोषितों यानी बहुजनों को उन पर हो रहे ज़ुल्मों के प्रति जागरूक करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने आज की आम बोलचाल की भाषा में ही शायरी की है। उन्होंने अपने शे’रों में अनेक सवाल उठाए हैं, जो बहुजनों को एकजुट होकर उठाने चाहिए और उठा भी रहे हैं।

शायर मूलचन्द सोनकर

इसके लिए सोनकर ने इतिहास के बिंब भी लिए हैं। इन बिंबों में उन किरदारों को लिया है, जिन्होंने दलितों-शोषितों-पिछड़ों पर जमकर अत्याचार किए हैं। सोनकर की शायरी में बहुजनों को झकझोरने की ताक़त है, तो जाति-वर्ण-भाषा-क्षेत्र के नाम पर लोगों का शोषण और उनसे भेदभाव करने वालों के ख़िलाफ़ गुस्सा भी है। उन्होंने जिस सलीक़े से तर्कों के साथ सवाल उठाए हैं, वे जायज़ ही हैं। उन्होंने अपने ग़ज़ल संकलन ‘चिनार हरे रहेंगे’ में अधिकतर इसी तरह की शायरी की है, जिसमें बहुजन चिंतन और बहुजन सरोकार कूट-कूटकर भरा है। सोनकर एक सच्चे अदीब और समाज-चिंतक की तरह जाति-वर्ण-भाषा-क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर इंसानियत और इंसाफ़ का समाज चाहते हैं। वे अपने पहले ही शे’र में कहते हैं- ‘महज़ ओहदे से ओहदेदारों में मिल्लत नहीं बनती, कि अक्सर ज़ात का मसला यहाँ भी आड़े आता है।’

हालांकि, कोई भी शायर इश्क़िया शायरी से पूरी तरह दूरी बनाकर नहीं रह सकता; सो मूलचन्द सोनकर भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। उन्होंने अपनी इस किताब में पहली ही ग़ज़ल में इस तरह के शे’र कहे हैं। मतले में ही उन्होंने कहा है- ‘अपनी यादों में तिरी सेज सजायी मैंने, गुज़रे लम्हात की इक दुनिया बसायी मैंने।’ लेकिन, यह कहा जा सकता है कि दबे-कुचले लोगों के लिए उनका परेशान और द्रवित मन इश्क़ में बहुत देर तक रम नहीं पाया है। पहली ही ग़ज़ल में वे समाजिक भेदभाव और अन्याय से आहत भी दिखे हैं और उन्होंने कहा है- ‘वो समझता है फ़क़त राह का काँटा मुझको, जिसकी बहबूदी में ये उम्र खपायी मैंने।’ सोनकर का यह शे’र दलितों-शोषितों-बहुजनों ने सदियों से सवर्णों की सेवा की है। सामाजिक कल्याण में बड़े-बड़े और महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं और इसके बावज़ूद भी उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ राह का कांटा ही माना गया है और माना भी जा रहा है। सोनकर ने यह अच्छी तरह देखा है कि दलितों-बहुजनों पर अत्याचार होने के बावज़ूद उनके साथ न्याय के लिए पैरवी करने वाला तक कोई नहीं होता। या यूं कहें कि दलितों-शोषितों-बहुजनों के पक्ष के लोग न्यायालयों में नहीं हैं, जो उनके पक्ष में पैरवी कर सकें।

इस बात को बड़ी ही सच्चाई से उन्होंने इस एक शे’र में कहा है- ‘पैरवी किससे हम करायें अब, कोई ऐसा नहीं बशर अपना।’ यहां शायर ने पैरवी करने के लिए केवल दलितों-शोषितों-बहुजनों के बीच के व्यक्ति के न होने का दुःख ही प्रकट नहीं किया है, बल्कि सच्चाई का साथ देने वाले लोगों की कमी पर भी दुःख जताया है। इसी ग़ज़ल में वे उन लोगों के दुत्कारते हैं, जो थोड़ी-सी नेमत आदि के लिए ग़ुलामी स्वीकार कर लेते हैं। सोनकर कहते हैं- ‘मुझको नेमत मिले, मिले न मिले; मैं झुकाता कभी न सर अपना।’ वे यह भी कहते हैं कि कि जंगल यानी असभ्य बन चुकी दुनिया में हर व्यक्ति उन्हें अपना ही लगता है। यानी उनकी नज़र में किसी के लिए कोई भेदभाव नहीं है। वे यह भी कहते हैं कि दैर-ओ-हरम यानी मंदिर-मस्जिद के चक्कर में जो लोग हों, वे वहां सजदा करने जाएं; अपने लिए तो इंसान का दर ही सजदा करने का दर है। ‘ऊबता मैं कभी न जंगल में, हर शजर याँ लगे शजर अपना।’ ‘होंगे दैर-ओ-हरम हों जिनके लिये, बस दर-ए-आदमी है दर अपना।’ इसी तरह वे बढ़ती मुफ़लिसी-बेरोज़गारी के इस दौर में, जहां किसानों को ख़ुदकुशी तक करनी पड़ रही है, वहीं सत्तासीन और उनके समर्थक साधु-संत आदि तरक्की और धर्म आदि के उपदेश दे रहे हैं। ऐसे लोगों से शायर ने कहा हैं- ‘आपका उपदेश लेकर क्या करूँ। क्या इसे मैं ओढ़कर सोया करूँ।

समीक्षित गजल संग्रह ‘चिनार हरे रहेंगे’ का कवर पृष्ठ

मूलचन्द सोनकर ने इसी तरह आज के द्विज मानसिकता वाले शासकों, तथाकथित संतों, पंडितों-मौलवियों और उनके समर्थकों पर अनेक कटाक्ष किए हैं। इस किताब के अनेक शे’र ऐसे हैं, जिनमें हरेक पर लंबी तनक़ीद और तफ़सिरा किया जा सकता है। इसलिए यहां कम ही शे’रों को कोट किया गया है। हां, पूरे विश्वास और दावे के साथ इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि समतावादी-आंबेडकरवादी विचारधारा वाले मूलचन्द सोनकर के इस ग़ज़ल संग्रह को जो भी एक बार पढ़ेगा वह इसे बार-बार पढ़े न पढ़े पर बार-बार सोचने को मजबूर ज़रूर होगा और उस वेदना को महसूस करेगा, जो अत्याचार के बाद दलितों-शोषितों-बहुजनों को होती है। कुल मिलाकर मूलचन्द सोनकर ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से न केवल पूर्वकाल में दलितों-बहुजनों पर हुए अत्याचारों को, द्विजों की चाल को उजागर करते हुए पृश्न-पटल पर रखा है, बल्कि द्विज मानसिकता वाले आज के सत्ताधारी लोगों को भी ललकारते हुए उनकी साजिशों के प्रति दलितों-शोषितों-बहुजनों को सजग किया है। यहां यह भी बताना उचित होगा कि सोनकर केवल शायर और कवि ही नहीं, बल्कि एक अच्छे लेखक और समालोचक भी हैं।

दलित-बहुजनों पर हुए और हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ सोनकर पहले भी ख़ूब लिख चुके हैं। इसकी गवाह उनकी कई चर्चित पुस्तकें तो हैं ही, अगोरा प्रकाशन, आहिरान, शिवपुर (वाराणसी) उनका ‘चिनार हरे रहेंगे’ नामक यह ग़ज़ल संग्रह भी गवाह है। यह ग़ज़ल संग्रह न केवल दलितों-शोषितों-बहुजनों को, बल्कि राष्ट्र-चिंतक, मानवतावादी अदीबों, समाजसेवकों और खासकर द्विजों की चाल में फंसे दबे-कुचले लोगों को ज़रूर पढ़ना चाहिए।

किताब का नाम – चिनार हरे रहेंगे

शायर – मूलचन्द सोनकर

मूल्य – 125/-अजिल्द (एक सौ पच्चीस रुपए मात्र) 

            320/- सजिल्द (तीन सौ बीस रुपए मात्र) 

प्रकाशक – अगोरा प्रकाशन, वाराणसी

संपर्क 9454684118

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply