h n

सरकारी आश्वासन से नहीं मान रहे रिसर्च स्काॅलर्स, ट्विटर पर चलाया अभियान

देश भर के रिसर्च स्कॉलरों ने केंद्र सरकार पर फेलोशिप में 80 से लेकर 100 फीसदी तक वृद्धि करने का दबाव बढ़ा दिया है। 8 नवंबर को उन्होंने ट्विटर पर अभियान छेड़ दिया है

भारत सरकार के प्रिंसिपल साइंटिफिक एडवाइजर के. विजय राघवन से ट्विटर पर मिले आश्वासन के बाद भी रिसर्च स्कॉलर मानने तो तैयार नहीं हैं। फेलाेशिप में 80-100 फीसदी वृद्धि की मांग को लेकर आंदोलनरत स्कॉलरों ने 8 दिसंबर को माइक्रो ब्लागिंग सोशल साइट ट्विटर पर अभियान छेड़ दिया। उनके ट्विटर अभियान में देश भर के रिसर्च स्कॉलर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार आश्वासन के बजाय वृद्धि की जल्द से जल्द घोषणा करे।

इससे पहले के. विजय राघवन को सौंपे अपने ज्ञापन में भी रिसर्च स्कॉलरों के संगठन सोसायटी फॉर यंग साइंटिस्ट्स की ओर से कहा गया था कि यदि सरकार 10 दिसंबर 2018 तक वृद्धि की घोषणा नहीं करती है तो राष्ट्रव्यापी आंदोलन किया जाएगा।

रिसर्च स्कॉलरों द्वारा सोशल मीडिया पर जारी आह्वान

इस बीच रिसर्च स्कॉलरों द्वारा सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए ट्विटर पर आकर ट्विट, रीट्विट व कमेंट करने की अपील की गई है। इसके लिए एक स्लोगन दिया गया है – ‘वॉयस ऑफ रिसर्च स्कॉलर्स नॉव इन ट्विटर टिल द विक्ट्री’। इसका मतलब ‘जीत मिलने तक ट्विटर पर रिसर्च स्कॉलराें की आवाज’ है।  

यह भी पढ़ें : नाराज फेलोशिप स्कॉलर्स को मिला सरकार का आश्वासन

इस मुहिम का नाम ‘नेशन वाइड प्रोटेस्ट ट्विटर कैंपेन फॉर हाइक इन फेलोशिप 2018’ दिया गया है और सवाल उठाया गया है कि आखिर क्यों हर चौथे साल फेलोशिप की राशि में बढ़ोतरी के लिए धरना- प्रदर्शन करना पड़ता है? स्वत: वृद्धि की व्यवस्था आखिर क्यों नहीं की जा पा रही है? साथ ही बढ़ोतरी 100 फीसदी यानी 25,000 से 50,000 रुपए पर अडिग रहने की बात की गई है।

बता दें कि रिसर्च स्कॉलर्स ने फेलोशिप राशि में बढ़ोतरी के लिए 10 दिसम्बर तक का समय दिया हुआ है और यह मियाद अब बस पूरी ही होने वाली है। मियाद पूरी होने से लगभग 76 घंटे पहले सरकार की तरफ से ट्विटर पर इन सबों को भरोसा दिया गया था कि दिसम्बर माह में जल्द ही फेलोशिप में बढ़ोतरी की जाएगी लेकिन रिसर्च स्कॉलर्स को लगने लगा है कि उनके द्वारा दी गई डेडलाइन 10 दिसम्बर तक घोषणा होगी भी या नहीं। इन्हीं आशंकाओं के कारण रिसर्च स्कॉलर्स ने भी डेडलाइन से पहले ट्विटर का सहारा लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाने का फैसला किया है।

यह भी पढ़ें : ‘खुशखबरी’ से रिसर्च स्कॉलर नाराज, कर रहे शत-प्रतिशत वृद्धि की मांग

  • मुहिम का नाम दिया नेशन वाइड प्रोटेस्ट ट्विटर कैंपेन फॉर हाइक इन फैलोशिप-2018.
  • कहा, वॉयस ऑफ रिसर्च स्कॉलर नॉव इन ट्विटर टिल द विक्ट्री, इट्स फाइट फॉर आवर राइट, नॉट डिमांड।

इसके लिए डेडलाइन से 48 घंटे पहले छुट्टी वाले दिन रविवार को चुना गया है और रिसर्च स्कॉलर्स से अपील की गई है कि वे लोग सुबह आठ बजे से रात के 11.45 बजे तक ‘Hike in research fellowship 2018’ और ‘Sysaiims@AIIIRSA’ पर बढ़कर रीट्विट व कमेंट करें ताकि सरकार पर डेडलाइन तक फैलोशिप बढोतरी के लिए दबाव बनाया जा सके। इस मुहिम की खास बात यह भी है कि नॉन नेट, नॉन जेआरएफ से भी इस मुहिम से जुड़कर अपने-अपने इश्यू उठाने की अपील की गई है।

फेलोशिप की राशि बढ़ाने को लेकर बैठक करते रिसर्च स्कॉलर्स

अपनी मुहिम के बारे में सोसायटी आॅफ यंग साइंटि्स्ट्स के अध्यक्ष लालचंद्र विश्वकर्मा ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में बताया, “हमलोगों ने पहले ही सरकार को 10 दिसंबर 2018 तक का समय दे रखा है। इस बीच हम अपने-अपने संस्थानों जैसे एम्स, आईआईटी, विश्वविद्यालयों आदि के प्रमुखों से अनुशंसा पत्र पर हस्ताक्षर करने हेतु लगातार अनुरोध कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि वे हम रिसर्च स्कॉलरों की फेलोशिप वृद्धि के संबंध में सरकार से अनुशंसा करें। यदि केंद्र सरकार 10 दिसंबर 2018 तक वृद्धि की घोषणा नहीं करती है तब हम आंदोलन को तेज करने को बाध्य होंगे। इस क्रम में हम सरकार को दस दिनों की और मोहलत देंगे और साथ ही आंदोलन भी करेंगे। यदि 20 दिसंबर 2018 तक भी सरकार की तरफ से वृद्धि की घोषणा नहीं की गयी तब हम आगामी 22 फरवरी को दिल्ली में विशाल प्रदर्शन करेंगे जिसमें देश भर के रिसर्च स्कॉलर जुटेंगे।”

बताते चलें कि कि बीते चार वर्षों से नेट, गेट उत्तीर्ण करने वाले रिसर्च स्कॉलरों की फेलोशिप की राशि नहीं बढ़ी है जबकि हर चार साल में फेलोशिप राशि बढ़ायी जाती रही है। इस बार चार साल पूरा हुए छह महीने से अधिक हो चुका है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब देश भर के लाखों जूनियर रिसर्च फेलो व सीनियर रिसर्च फेलो फेलोशिप बढ़ाने के लिए इस तरह अपनी आवाज बुलंद कर रहे हों। इससे पहले फेलोशिप राशि व भत्ता बढ़ाने के लिए 2014 में भी इसी तरह हजारों रिसर्च फेलो को आंदोलन करना पड़ा था।
(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

कुमार समीर

कुमार समीर वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सहारा समेत विभिन्न समाचार पत्रों में काम किया है तथा हिंदी दैनिक 'नेशनल दुनिया' के दिल्ली संस्करण के स्थानीय संपादक रहे हैं

संबंधित आलेख

बिहार : राजपूतों के कब्जे में रूपौली, हारे ओबीसी, जिम्मेदार कौन?
भाजपा ऊंची जाति व हिंदू वर्चस्ववाद को बढ़ावा देने वाली पार्टी के रूप में मानी जाती है। उसका राजनीतिक कार्य व व्यवहार इसी लाइन...
संविधान के पुनर्लेखन, आरक्षण के खात्मे का एजेंडा नहीं त्यागेंगे भाजपा-आरएसएस
संविधान में बदलाव का खतरा अभी टला नहीं है। हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों के नतीजों ने संविधान के पुनर्लेखन और आरक्षण की समाप्ति...
अठारहवीं लोकसभा के पहले सत्र का हासिल
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कोई घंटा ख़ाली नहीं गया जब संविधान का ज़िक्र न हुआ हो। इस दौरान...
हाथरस हादसे की जाति और राजनीति
सूरजपाल सिंह नारायण साकार हरि उर्फ भोले बाबा जाति से जाटव है। उसके भक्तों में भी अधिकांश या तो जाटव हैं या फिर अति-पिछड़े...
पश्चिमी उत्तर प्रदेश : चुनाव में अगर ऐसा होता तो क्या होता, मगर वैसा होता तो क्या होता?
एनडीए यहां पर अपनी जीत को लेकर अति-आत्मविश्वास में था जबकि इंडिया गठबंधन के कार्यकर्ता तक़रीबन हतोत्साहित थे। हालात ऐसे थे कि चुनाव सिर...