सवर्णों को आरक्षण : संविधान की मूल भावना को नष्ट करने की कोशिश

लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने नाराज चल रहे सवर्णों को मनाने के लिए पासा फेंका है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद के निर्णय के मुताबिक सरकार गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने के लिए संशोधन विधेयक लाएगी

केंद्र सरकार गरीब सवर्णों को नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण देगी। इस आशय से संबंधित एक निर्णय को केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने 7 जनवरी 2019 को हुई बैठक में मंजूरी दी। मिली जानकारी के अनुसार, सरकार इसे लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन के लिए इसी सत्र में संशोधन विधेयक लाएगी।

केंद्र सरकार के इस फैसले को इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे पहले पिछले वर्ष एससी-एसटी एक्ट संशोधन विधेयक लाए जाने पर देश भर के सवर्णों ने केंद्र सरकार का विरोध किया था और वे गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की मांग कर रहे थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

केंद्र सरकार के इस फैसले से उन गरीब सवर्णों को लाभ मिलेगा, जिनकी सलाना आय आठ लाख रुपए से कम है। हालांकि, यह भी एक अहम सवाल है कि क्या केंद्र सरकार आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक बढ़ाने हेतु कोई पहल करेगी। वजह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय कर दी है। वर्तमान में अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी और अति पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है।

अदालत में नहीं टिकेगा सरकार का फैसला

पूर्व आईएएस अधिकारी पी.एस. कृष्णन

इस संबंध में भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह पी.एस. कृष्णन मानते हैं, “केंद्रीय मंत्रिपरिषद के फैसले पर संवैधानिक सवाल उठेंगे। वजह यह कि आरक्षण का प्रावधान उनके लिए किया गया है जिन्हें तालीम और नौकरियों से दूर रखा गया था। इसका आधार आर्थिक नहीं था। हमारे संविधान का जो मूल स्वरूप है और इसके मुताबिक, आरक्षण की जो व्यवस्था है, उसका आधार भी यही है। अब यदि सरकार इसमें कोई बदलाव करना चाहती है, तब उसे अदालत में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। जहां तक गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का सवाल है तो सरकार उनकी बेहतरी के लिए कई योजनाएं चला सकती है। वह चाहे तो उन्हें वजीफे दे सकती है। उनके रोजगार के लिए ऋण आदि दे सकती है। लेकिन, आरक्षण का प्रावधान करने से संवैधानिक सवालों का उठना तय है।”

संविधान में छेड़छाड़ गलत

राजनीतिक विचारक व साहित्यकार प्रेम कुमार मणि

वहीं, प्रख्यात राजनीतिक विचारक व साहित्यकार प्रेम कुमार मणि का कहना है कि, “केंद्र सरकार यदि गरीब सवर्णों के लिए कुछ करना चाहती है तो जाहिर तौर पर कोई इसका विरोध नहीं करना चाहेगा। परंतु, सरकार में बैठे लोग यह समझ नहीं रहे हैं कि दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को जो आरक्षण दिया गया है वह आर्थिक आधार पर नहीं दिया गया, बल्कि उसके पीछे सामाजिक और आर्थिक कारण दोनों हैं। इसके पहले भी जब केंद्र में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार थी, तब गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के लिए एक पहल की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तब इसे खारिज कर दिया था। मैं तो यह कहता हूं कि सरकार सवर्णों का वर्गीकरण करे और जो गरीब हैं उन्हें या तो ओबीसी में शामिल करे या फिर सामान्य कोटे में उन्हें आरक्षण दे। लेकिन, जिस तरह की खबर आ रही है कि सरकार संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन के लिए विधेयक लाएगी तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह संविधान के साथ किस तरह का छेड़छाड़ करती है। यदि सरकार संविधान की मूल भावना के साथ छेड़छाड़ करती है तो एससी, एसटी और ओबीसी को एक साथ मिलकर इसका विरोध करना चाहिए।”

(कॉपी संपादन : प्रेम बरेलवी/एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply