वर्ष 1968 में एक फिल्म आयी थी। नाम था ‘संबंध’। इसी फिल्म में एक गीत है जिसके गायक मुकेश हैं। गीत में एक पंक्ति है – ”बिछौना धरती काे करके, अरे आकाश ओढ़ ले………।”
इन पंक्तियों की प्रासंगिकता किस संदर्भ में है मुझे नहीं पता, मगर उसे देखने के बाद अनायास ही ये पंक्तियां जेहन में कौंध गई। शाम के चार बज रहे थे। झारखंड के औद्योगिक जिलों में से बोकारो के जरीडीह प्रखंड मैं सड़क से गुजर रहा था। बगल में एक रेफरल अस्पताल है। नजर सड़क से सटे हुए उस मैदान पर चली गई, जहां बच्चे खेला करते हैं। मैदान के एक किनारे एक आदमी ईंटों के चूल्हे पर देगची चढ़ाए हुए था और आस-पास की सूखी झाड़ियों का इस्तेमाल जलावन के रूप में कर रहा था। उसके बगल में कुछ कपड़े समेट कर रखे हुए थे। मुझे लगा कोई विक्षिप्त होगा।
मैं उसकी ओर बढ़ा और उसकी गतिविधि को गौर से देखने लगा। वह चूल्हे की आग को तेज करने की चेष्टा कर रहा था। उसने मुझे अपने पास खड़ा पाया तो बोल पड़ा – क्या है बाबू?
उसके इस सवाल ने जवाब दे दिया था कि वह विक्षिप्त नहीं है।
क्या कर रहे हो? जवाब देने बजाय इसबार सवाल मैंने किया।
भात बना रहा हूं। उसने कहा।
अकेले हो? मैंने पूछा।’
नहीं बाबू, पत्नी और एक बच्चा भी है, वे लोग अभी आएंगे। मेरे सवाल पर उसने तपाक से कहा।

इस बातचीत के बीच एक जरूरी काॅल आ गई। मोबाइल से छूटते ही उस आदमी को लेकर कई सवाल ज़हन में कौंधने लगे।
मैंने उससे पूछा – क्या करते हो?
हमलोग गोदना (टैटू) गोदने (उकेरना) का काम करते हैं बाबू। उसने चूल्हे में फूंक मारते हुए कहा।
यहां कब तक रहना है? मैंने पूछा।
दो-तीन दिन। उसने बिना रूके जवाब दिया।
मेरे जेहन में कई सवाल कुलबुला रहे थे। फिर लगा कि अपने पेट की आग बुझाने में तल्लीन इस व्यक्ति से अभी बात करना मुनासिब नहीं। उसके अंतिम जवाब से मुझे तसल्ली हुई कि कल इससे बात की जा सकती है।

दूसरे दिन जब मैं सुबह दस बजे के आसपास उस मैदान की ओर गया तो देखा कि वह अपनी पत्नी और बच्चा के साथ खाना खा रहा था।
मैं जाकर उनकी बगल में बैठ गया। मैंने पहला सवाल किया।
तुम्हारा नाम क्या है?
शिवा मल्हार। उसका जवाब था।
तुम्हारा घर कहां है? मेरे इस सवाल को सुन उसके चेहरे का भाव बदल गया। मुझे नहीं पता कि मेरे इस सवाल पर वह मुस्कराया या फिर दुखी हुआ।
घर कहां बताएं बाबू …, हमलोग तो घूमते-फिरते रहते हैं। शिवा मल्हार के बोलने के पहले उसकी पत्नी बोल पड़ी।
जनवरी का पहला सप्ताह था। ठंड अपनी जवानी पर थी। उनका ओढ़ना-बिछौना मैदान में ही उनकी बगल में पड़ा था। बिस्तर की ओर इशारा करके मैंने पूछा – रात में यही सोते हो?
नहीं बाबू, वहां सोते हैं। शिवा ने लगभग 50 मीटर की दूरी पर स्थित एक दुकान के बरामदे की ओर इशारा करते हुए बताया।
अचानक मुझे ‘पूस की रात’ का हल्कू और झबरा याद आ गया। मैं सोचने लगा आजादी के इन 70 बर्षों बाद आज अगर प्रेमचंद होते तो उनके कथानक में कोई बदलाव होता क्या?
इससे बड़ी बिडंबना इस देश के लिए और क्या हो सकती है कि आजादी के इन सत्तर बषों बाद भी हमारा शासक वर्ग देश के हर नागरिक को एक अदद छत तक मुहैया कराने में असफल रहा है। मुझे जानकी बल्लभ शास्त्री की कविता ‘मेघ गीत’ की पंक्तियां याद आयीं।
‘उपर ही उपर पी जाते, जो पीने वाले हैं।
कहते हैं ऐसे जीते हैं, जो जीने वाले हैं।’
काफी कुरेदने के बाद उनके बारे में जो जानकारी मिलीं, उसके हिसाब से उनके परिवार के कुछ सदस्य पश्चिम बंगाल के पुरूलिया स्थित पालूंजा डाकबंगला के पीछे सरकारी जमीन पर अस्थायी तौर पर झोपड़ी बनाकर रहते हैं। कुछ सदस्य झारखंड की राजधानी रांची के कांके रोड में सरकारी जमीन पर किसी नेता के कहने पर प्लास्टिक की चादर डाल कर रहते हैं। छ: भाइयों में तीसरे नंबर पर 22 वर्षीय शिवा मल्हार के दो छोटे भाई अपनी मां के पास रहते हैं और बाकी खानाबदोश इसी पेशे से अपना पेट पालते हैं।
इन्हें यह भी नहीं पता कि वे कब और कहां पैदा हुए। इनकी हिन्दी में न तो बांग्ला का पुट था और न ही किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा की झलक थी। गोदना (टैटू) गोदना (उकेरना) इनका पुश्तैनी पेशा है। इनके पास न तो वोटर कार्ड है, न आधार कार्ड और न राशन कार्ड। मतलब सरकारी सुविधाओं के लाभ का कोई भी आधार इनके पास नहीं है।
(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)
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