प्रेमचंद की बहुजन कहानियाँ और जाति के प्रश्न

“प्रेमचंद ने ऐसी एक भी कहानी नहीं लिखी है जिसका सम्बन्ध किसान जीवन से हो और उसका किसान पात्र किसी अगड़ी या दलित जाति का हो! उनकी ऐसी कहानियों के जाति-विन्यास पर ध्यान देने से यही पता चलता है कि असली किसान केवल पिछड़ी जातियों के लोग हैं. ऊँची जातियों के लोग कृषि पर आश्रित तो हैं; मगर वे भू-स्वामी हैं, वे मेहनतकश किसान नहीं हैं।” फ़ारवर्ड प्रेस द्वारा शीघ्र प्रकाश्य प्रेमचंद की बहुजन कहानियों पर केंद्रित संकलन में भी यह बात उभर कर आती है। प्रकाश्य पुस्तक की पांडुलिपि के मद्देनज़र लिखा गया कमलेश वर्मा का लेख :

प्रेमचंद की कहानियों के अनेक संकलन विषय के अनुसार प्रकाशित हो चुके हैं. बहुजन दृष्टि से कहानियों का चयन करके तैयार किया गया यह संकलन अपने ढंग का पहला संकलन है. प्रेमचंद की इन कहानियों पर पहले भी विचार-विमर्श किया जाता रहा है. ये कहानियाँ बहुत बार पढी गयी हैं. इनका प्रकाशन भी अलग-अलग संकलनों में अनेक बार हो चुका है. सारांश यह है कि प्रेमचंद की इन कहानियों से हमारा परिचय पुराना है और इन कहानियों की विशेषताओं पर भी कई बार बातें हो चुकी है.

इन कहानियों को बहुजन दृष्टि से संकलित करने का अपना उद्देश्य है. इनके माध्यम से यह बताने की कोशिश की जा रही है कि दलितों-पिछड़ों की बहुसंख्यकता से निर्मित बहुजन समाज को प्रेमचंद ने किस रूप में पेश किया है, इस पर बात होनी चाहिए. ध्यान दिया जाना चाहिए कि इन कहानियों के मुख्य पात्र दलित और पिछड़ी जातियों के बीच से लिए गए हैं. हिन्दी आलोचना में दलित जातियों के पक्ष पर तो विचार हुआ है, मगर पिछड़ी जातियों के पक्ष अभी प्रायः अछूते हैं. मगर, प्रेमचंद की कहानियों में पिछड़ी जातियों को मुख्य विषय के रूप में अपनाया गया है. इनमें प्राप्त विवरणों और उद्देश्यों पर ध्यान दिया जाए तो हम पाएँगे कि प्रेमचंद ने किसान की संवेदना को व्यक्त करती जितनी कहानियाँ लिखी हैं, उनके पात्र पिछड़ी जातियों से हैं. आप प्रेमचंद की कहानियों के अलावा उपन्यासों के बारे में भी यह बात विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि प्रेमचंद किसान के रूप में केवल पिछड़ी जातियों के पात्रों को ही चिह्नित करते हैं.

दलित विमर्श के कुछ आलोचकों के द्वारा प्रेमचंद से असहमति जताई गयी है कि उन्होंने दलित जीवन का चित्रण ठीक से नहीं किया है. सर्वाधिक आक्रमण डॉ. धर्मवीर ने किया है. वे मानते हैं कि प्रेमचंद ने दलित समाज को ठीक से नहीं समझा है और अपनी रचनाओं में इस समाज के प्रति अपमानजनक व्यवहार किया है. लेकिन हिन्दी आलोचना ने प्रेमचंद के सामाजिक विश्लेषण को उच्च कोटि का माना है और दलित समाज के बारे में उनके लेखन की खूब प्रशंसा की है. प्रेमचंद के सन्दर्भ में, दलित प्रश्न पर दलित विमर्श के कुछ आलोचकों और हिन्दी आलोचना के कुछ आलोचकों की राय हमें अलग-अलग प्राप्त होती है.

प्रेमचंद की बहुजन कहानियों का विश्लेषण जाति-आधारित सामाजिक विन्यास को ध्यान में रखकर करने की ज़रूरत है. यह काम हिन्दी आलोचना में आज तक नहीं हो पाया है. ऐसा करते हुए इस बात का ध्यान ज्यादा रखना है कि प्रेमचंद की रचनाओं में यह विन्यास किस रूप में मौजूद है! उस विन्यास को सामने रखने के बाद मतभेद हो सकता है कि वह ठीक है या नहीं?

प्रेमचंद की रचनाओं में मौजूद जातियों को अगर अगड़ी, पिछड़ी और दलित जातियों के समूह में बाँट कर देखें तो जाति-आधारित सामाजिक विन्यास को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. उनकी रचनाओं में अगड़ी जातियाँ ‘वर्चस्व’ बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील है. इन जातियों में प्रायः ब्राह्मण और क्षत्रिय जातियाँ हैं. इनका उदेश्य यही दिखाया गया है कि ये गाँव की ज़मीन से लेकर गाँव के लोगों तक पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील हैं. उनका वास्तविक नुकसान भले न हो रहा हो, मगर अपनी हांक कायम रखने के लिए वे निर्मम अत्याचार तक करने पर उतारू हो जाते हैं. ‘विध्वंस’ कहानी में पंडित उदयभान एक संतानहीन विधवा वृद्धा गोंड़िन भुनगी का भाड़ केवल अपनी हनक बनाए रखने के लिए तोड़  देते हैं और उसकी बटोरी हुई पत्तियों में आग लगवा देते हैं. इनका मकसद यही रहा कि इन कमज़ोर जातियों को धन से ही नहीं, मन से भी पराजित करके रखो तभी ये तुमसे डरते रहेंगे! ‘ठाकुर का कुआँ’ में पानी खींचते समय गंगी के मन की दशा का जो चित्रण हुआ है, वह इसी ‘वर्चस्व’ की घोषणा करता है. इन जातियों को तरह-तरह से इतना दबाओ कि तुम्हारी आशंका मात्र से इनकी साँसें रुक जाएँ! यह कहानी साफ़ पानी के लिए तड़पते दलित समाज की शहादत को ‘कर्बला’ की तरह व्यक्त करती है! ‘सद्गति’ दलित जीवन की दुर्गति का बयान करती है. दुखी चमार पं. घासीराम के दरवाज़े पर लकड़ी चीरते-चीरते दम तोड़ देता है. ऐसी अनेक कहानियाँ हैं जिनमें प्रेमचंद ने अगड़ी जातियों की वर्चस्वकामी प्रवृत्ति को रेखांकित किया है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने अगड़ी जातियों के किसी दूसरे पक्ष को रखा ही नहीं है. ‘बड़े घर की बेटी’ एक क्षत्रिय (राजपूत या भूमिहार) परिवार की कहानी है और उसमें पारिवारिक संवेदना के मार्मिक पक्ष चिह्नित हुए हैं. ‘नमक का दारोगा’ कहानी के मुंशी बंशीधर कायस्थ जाति के हैं. उनके पिता रिश्वत को गलत नहीं मानते, मगर वे स्वयं पक्के ईमानदार हैं. इस कहानी में भी बेईमान पात्र के रूप में पंडित अलोपीदीन को रखा गया है. मगर इन दोनों कहानियों का सम्बन्ध जाति-विश्लेषण से सीधे नहीं जुड़ता है. इनकी चर्चा केवल इसलिए की जा रही है कि इस बात को रेखांकित किया जा सके कि प्रेमचंद ने जाति-आधारित परिवार और समाज के अनेक पक्षों को अपना विषय बनाया है.

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अगड़ी जातियों की वर्चस्वकामी प्रवृत्ति का शिकार पिछड़ी जातियाँ भी हैं. किसान-जीवन की जितनी कहानियाँ प्रेमचंद ने लिखी हैं, उनके किसान पात्र पिछड़ी जातियों से ही हैं और उन्हें तबाह करनेवालों की जातियाँ अगड़ी जातियों में से ही कोई है. प्रेमचंद ने ऐसी एक भी कहानी नहीं लिखी है जिसका सम्बन्ध किसान जीवन से हो और उसका किसान पात्र किसी अगड़ी या दलित जाति का हो! उनकी ऐसी कहानियों के जाति-विन्यास पर ध्यान देने से यही पता चलता है कि असली किसान केवल पिछड़ी जातियों के लोग हैं. ऊँची जातियों के लोग कृषि पर आश्रित तो हैं; मगर वे भू-स्वामी हैं, वे मेहनतकश किसान नहीं हैं. खेती-बारी उनके लिए आय का स्रोत है, मेहनत करके उत्पादन करने का साधन नहीं. वे खेतों में काम नहीं करते. वे न तो खेत जोतते हैं, न फसल लगाते हैं, न फसल काटते हैं; मगर कृषि-व्यवस्था के मालिक वे लोग ही हैं. कृषि-व्यवस्था के मालिक किसान नहीं हैं, भू-स्वामी हैं और प्रेमचंद की रचनाओं में ये लोग केवल अगड़ी जाति के हैं.

‘बलिदान’ हरखू कुरमी और उसके बेटे गिरधारी की किसान ज़िंदगी की बर्बादी की कहानी है. इस परिवार की बर्बादी का मुख्य सूत्र लाला ओंकारनाथ से जुड़ता है. ‘सवा सेर गेहूँ’ के किसान शंकर कुरमी को अगली पीढ़ी तक बर्बाद करनेवाले ‘विप्र महाराज’ हैं. ‘बाबाजी का भोग’ के रामधन अहीर से गरीबी में भी घी मंगवा लेनेवाला एक ‘साधू’ है. इस तरह की कहानियों को पढ़ते हुए हमारी धारणा क्रमशः पुष्ट होती जाती है कि किसानों को बर्बाद करनेवालों में सबसे बड़ी भूमिका अगड़ी जातियों की रही है. हिन्दी आलोचना में यह बात बार-बार कही गयी है कि किसान अपने अन्धविश्वास के कारण शोषित होता है, वह धर्म-भीरुता के कारण छला जाता है. इस पक्ष का भी यदि जाति-आधारित विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि धर्म-आधारित पाखंड फ़ैलाने में भी सबसे बड़ी भूमिका इन्हीं अगड़ी जातियों की है. वे स्वयं के लिए जो भी पैमाना बनाते हों, मगर अन्य के मन में भय पैदा करने का जरिया वे धर्म को सदैव बनाते रहे हैं. प्रेमचंद ने यह भी दिखाया है कि धार्मिक पाखंड की प्रवृत्ति जितनी अगड़ी जातियों में रही है, उतनी दूसरों में नहीं रही है. अगड़ी जातियों ने धार्मिक पाखंड का सहारा लेकर अपने ‘वर्चस्व’ को मजबूत किया है और इसके जरिए असीमित धन भी कमाया है. ‘नेउर’ कहानी में एक ‘बाबाजी’ हैं, जिनके हाव-भाव और क्रिया-कलाप ब्राह्मणों की तरह के हैं. प्रेमचंद ने ‘बाबाजी’ की जाति का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है. बाबाजी अपनी मायावी बातों से धार्मिक पाखंड फैलाकर नेउर को प्रभावित कर लेते हैं और अंततः उसके चाँदी के सिक्के और गहने लेकर रातों-रात भाग जाते हैं. प्रेमचंद ने कहानी को यहीं समाप्त नहीं किया है. नेउर अपनी पत्नी से गहने ले चुका था और गाँव के कुछ लोगों से सिक्के! बाबाजी यह सब लेकर भाग चुके थे, इसीलिए नेउर को गाँव छोड़कर भागना पड़ा! झाँसी जिले में जाकर एक गाँव में नदी किनारे ‘बाबा’ बनकर नेउर भी बैठने लगा. वह स्वयं भी पाखंड रचने लगा, मगर जब लम्बा हाथ मारने की नौबत आयी, तब वह एक दुखियारी धनी युवती के सोने के गहने हड़प न सका. उसकी नैतिकता उसे धिक्कारने लगी और रात में उस गाँव को छोड़कर अपने गाँव के लिए चल पड़ा. नेउर अपने गाँव से डर कर भागा था, मगर पाखंड करने के लिए नहीं! प्रेमचंद ने इस कहानी में नेउर की भी जाति का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है, मगर कहानी के ब्योरे बताते हैं कि वह एक किसान परिवार से था और गरीब था. फिर वही बात कि धार्मिक पाखंड के सहारे वर्चस्व बनाने या धन कमाने की प्रवृत्ति बहुजन जातियों के बीच प्रेमचंद ने नहीं दिखाई है.

बहुजन साहित्य : एक नई सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि की प्रस्तावना

प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी ‘मुक्ति-मार्ग’ में किसान है झींगुर महतो और पशुपालक है बुद्धू गड़ेरिया. दोनों पिछड़ी जातियों से हैं और उनकी आर्थिक दशा खाते-पीते सामान्य ग्रामीणों जैसी है. इस कहानी में दोनों को झगड़ालू प्रवृत्ति का बताया गया है. मामूली बातों के लिए झगड़ पड़नेवाले ये दोनों ग्रामीण बारी-बारी से एक-दूसरे को बर्बाद कर देते हैं. झींगुर किसान से मजदूर बन जाता है और बुद्धू पशुपालक से मजदूर. कहानी के अंत में दोनों एक ही जगह मजदूर बनकर काम करते हैं और रात में एक साथ खाना बनाकर खाते भी हैं. परस्पर द्वेष के दुखद परिणामों की यह श्रेष्ठ कहानी है. इन दोनों के बीच जाति-आधारित दंश या उत्पीड़न का कोई मामला नहीं है. मगर, झींगुर जब षड्यंत्र रचता है तब वह बुद्धू को गो-हत्या के झूठे मामले में फँसाता है. इस मामले में मौका मिलता है गाँव के ब्राह्मणों को और वे बुद्धू से धर्म के नाम पर इतनी राशि दंड के रूप में वसूलते हैं कि वह अंततः निर्धन होकर मजदूर बन जाता है. इस कहानी में पिछड़ी जातियों के दो ग्रामीण परस्पर द्वेष से निर्धन हो जाते हैं और धन कमाने का मौका मिलता है गाँव के ब्राह्मणों को. प्रेमचंद की कहानियाँ जाति की अनेक परतों को खोलती हैं. इन परतों को खोलते जाइए और इन पर गौर कीजिए तो आप पाएँगे कि अगड़ी जातियों के कुचक्रों को प्रेमचंद कितनी बारीकी से समझ रहे थे और उजागर कर रहे थे. हिन्दी आलोचना इन शोषकों की जाति-आधारित पहचान से हमेशा बचती रही है. कमाल की बात है कि प्रेमचंद की रचनाओं का जो एक मुख्य आधार है, उस आधार को छोड़कर विश्लेषण करने की प्रवृत्ति हिन्दी आलोचना में आज तक बनी हुई है. डॉ धर्मवीर की आलोचना इसमें हस्तक्षेप ज़रूर करती है, मगर वे अपनी तरफ से ढेर सारी बातें जोड़कर प्रेमचंद की रचनाओं का विश्लेषण करने लगते हैं. ऐसा होने के कारण उनकी आलोचना प्रेमचंद की रचनाओं के दायरे का अतिक्रमण करके अविश्वसनीयता का शिकार हो जाती है. ‘कफन’ कहानी के सन्दर्भ में उनका यह दावा कि बुधिया के पेट में ठाकुर का गर्भ पल रहा था — प्रेमचंद की इस कहानी के दायरे के बाहर का दावा है. मगर जारकर्म के प्रकरणों को जोड़ने के क्रम में डॉ. धर्मवीर इस प्रकार का दावा कर बैठते हैं. वे इस तरह की और भी कई बातें करते हैं और इनके आधार पर प्रेमचंद को ख़ारिज करने का प्रयास करते हैं.

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यहाँ यह कहने से परहेज नहीं करना चाहिए कि प्रेमचंद की रचनाओं के दायरे में ‘जाति के प्रश्न’ खूब अच्छी तरह मौजूद हैं, मगर हिन्दी आलोचना इन प्रश्नों पर विचार नहीं करती. इसी तरह प्रेमचंद की रचनाओं के दायरे में जो प्रश्न मौजूद नहीं हैं, डॉ. धर्मवीर की आलोचना उन प्रश्नों को भी अपनी तरफ से जोड़ देती है. विश्वसनीय आधार यही हो सकता है कि प्रेमचंद की रचनाएँ अपने दायरे में जाति के जिन प्रश्नों को उठाती-समझाती हैं उनकी पहचान करके विश्लेषण किए जाएँ. इन्हें हिन्दी आलोचना में शामिल करके प्रेमचंद की रचनाओं के इस पक्ष को समझा-बूझा जाए. यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रेमचंद ने ‘जाति के प्रश्न’ को जितनी जीवंतता-प्रमाणिकता के साथ अपनी रचनाओं में रखा है, वह सम्भवतः समाजशास्त्र की पुस्तकों से भी उपलब्ध कराना संभव न हो! ऐसा कहते हुए इस बात को भुलाया नहीं जा रहा है कि समाजशास्त्र एक भिन्न अनुशासन है और उसके उपकरण दूसरे ढंग के होते हैं. प्रेमचंद की इन रचनाओं में ‘जाति के प्रश्न’ पर विचार करते हुए और उन्हें अपने कथानकों में जीवंत करते हुए एक प्रकार की सैद्धांतिकी भी अंतर्धारा की तरह मौजूद रही है. आग्रह किया जा सकता है कि प्रेमचंद के द्वारा उठाए गए जाति के प्रश्नों को छोड़ना उचित नहीं है और इन प्रश्नों में अपने मनमानेपन को जोड़ना भी उचित नहीं है. प्रेमचंद ने जितना कहा है, उतने की पहचान करना पहली ज़रूरत है.   

प्रेमचंद की जाति-विन्यास-संबंधी वैचारिकी का एक सैद्धांतिक पक्ष स्पष्ट है कि ग्रामीण जीवन में शोषकों की भूमिका में प्रायः अगड़ी जातियों के ही लोग हैं. प्रेमचंद की रचनाएँ इस बात की गवाही बार-बार देती हैं. वे इस बात को भी खूब पहचानते हैं कि ऊँचे-ऊँचे मूल्यों का दावा करनेवाली अगड़ी जातियों के लोग किस तरह अमानवीय व्यवहार पर उतारू हो जाते हैं. ‘मंत्र’ शीर्षक से प्रेमचंद ने दो कहानियाँ लिखी थीं. संयोगवश इन दोनों कहानियों में अमानवीय चरित्र बनकर डॉ. चड्ढा और पंडित लीलाधर चौबे चित्रित हुए हैं. ये दोनों पात्र अगड़ी जातियों से हैं. इन दोनों कहानियों में मानवीय चरित्र बनकर भगत और चौधरी आए हैं. ये दोनों बहुजन जातियों से हैं. पंडित लीलाधर चौबे और बूढ़े चौधरी के प्रश्नोत्तर, जाति-व्यवस्था की पोल खोलते हुए, क्रमशः अगड़ी जातियों के पाखंडों का पर्दाफाश करते हैं. प्रेमचंद के इन प्रयासों को सामंतवाद-पुरोहितवाद के खिलाफ बताया जाता रहा है, जो अपने अर्थ में गलत नहीं है. मगर, जाति के प्रश्नों को छोड़ देने से सामंतवाद का जो चेहरा यहाँ मौजूद है, उसे ठीक से नहीं समझा जा सकता है. सामंतवाद-पुरोहितवाद तो समाप्त हो गए, मगर जाति-आधारित उनकी रीढ़ अभी भी मजबूती से तनी है. प्रेमचंद इस रीढ़ को उघार-उघार कर दिखा रहे थे.

प्रेमचंद के मन में किसानों के प्रति बेहद सम्मान का भाव है. वे उसकी दुर्दशाओं का चित्रण करने के क्रम में या उसकी कमियों को बताने के क्रम में अपनी गहरी संवेदना के साथ सम्मान का भाव बनाए रखते हैं. इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण है ‘अलग्योझा’ कहानी. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद और उनका युग’ में इसे किसान परिवार के बँटवारे की कहानी के रूप में याद किया है. मगर यह कहानी वस्तुतः परिवार के बँटवारे की कहानी नहीं है. यह किसान के द्वारा परिवार की एकता को बनाए रखने की कहानी है. भोला महतो, रग्घू, केदार और अंततः पन्ना और मुलिया — तमाम उठा-पटक के बावजूद इस बात की कोशिश करते हैं कि परिवार की एकता बनी रहे. परिवार के लिए अटूट श्रम करनेवाले पात्रों से बनी यह किसान-कहानी अनेक मानवीय मूल्यों को अपने भीतर समेटे हुए है. ‘पूस की रात’ का हल्कू रात की ठण्ड सहने को तैयार है, मगर महाजन सहना का तगादा उसे पसंद नहीं है. कष्ट उठाकर इज्जत के साथ ज़िंदगी जीना — प्रेमचंद के किसानों की एक पहचान है. उनका किसान अपनी ‘मरजाद’ बचाए रखने के लिए शारीरिक श्रम करने और कष्ट उठाने को तैयार है. मगर, उसके खिलाफ ढेर सारी शाक्तियाँ हैं, जो उसकी कमाई छीनकर मजबूत हुई जाती हैं.

‘बलिदान’ कहानी में गिरधारी के घर से बैलों के बिक जाने का जो चित्रण मिलता है, वह किसान के चरित्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. गिरधारी बैलों के कन्धों पर सिर रखकर फूट-फूटकर रो रहा है, उसकी पत्नी सुभागी दालान में पड़ी रो रही है और उसका छोटा लड़का, बैल खरीदकर ले जानेवाले मंगल सिंह को, एक बाँस की छड़ी से मार रहा है. किसान की बेबसी और दुर्दशा का चित्रण करने के क्रम में प्रेमचंद प्रायः उसे एक विराट मानवीय व्यक्तित्व के रूप में पेश करते हैं. प्रेमचंद के किसान गरीब हैं, मगर छल-प्रपंच करना उनके स्वभाव में नहीं है. वे अंततः ईमानदारी और मनुष्यता के रास्ते पर चलना पसंद करते हैं.

यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि भारत को कृषि-प्रधान देश माना गया है. भारत की संस्कृति को कृषि-संस्कृति भी कहा गया है. कृषि-प्रधान देश और कृषि-संस्कृति का देश बनाने में किसानों की सबसे बड़ी भूमिका है. प्रेमचंद के साहित्य में किसान केवल पिछड़ी जातियों के लोग हैं. इसलिए कृषि-प्रधान देश और कृषि-संस्कृति का देश बनाने में सबसे बड़ी भूमिका पिछड़ी जातियों की मान ली जानी चाहिए. अगड़ी जातियों ने किसानों को तबाह किया है, इसलिए कृषि-व्यवस्था में उनकी भूमिका नकारात्मक ही मानी जा सकती है. किसान न होते हुए भी कृषि-व्यवस्था पर जैसे अगड़ी जातियों ने अपना ‘वर्चस्व’ कायम कर रखा है, वैसे ही कृषि-प्रधान देश और कृषि-संस्कृति का देश कहे जानेवाले भारत की पहचान पर भी उन्होंने अपना ‘वर्चस्व’ बना रखा है. मगर, सच तो यही है कि भारत को भारत बनाने में सबसे बड़ी भूमिका किसानों की रही है और प्रेमचंद किसान के रूप में केवल पिछड़ी जातियों के पात्रों को हमारे सामने रखते हैं.

प्रेमचंद ने दलित जातियों के बारे में जो कुछ लिखा है उसका सारांश यही है कि ये हर तरह से सताए हुए हैं. ये प्रायः सम्पत्तिविहीन हैं और जातिवाद का दंश इस जाति-समूह ने सबसे ज्यादा झेला है. अगड़ी ही नहीं, पिछड़ी जातियाँ भी इनके साथ अमानवीय व्यवहार करती आयी हैं. पिछड़ी जातियाँ भी जाति-आधारित श्रेष्ठता की घोषणा इनके खिलाफ करती रही हैं. ‘मुक्ति-मार्ग’ में झींगुर महतो कहता है, “मुझे कोई चूहड़-चमार समझ लिया है?” झींगुर को अपने ‘महतो’ होने का अभिमान है और वह दलित जातियों के नाम अपमानजनक तरीके से लेकर अपनी श्रेष्ठता को प्रकट करता है. पिछड़ी जातियाँ जो किसान के रूप में मानवीय हैं, दलितों के प्रसंग में अमानवीय हैं. यह खुली बात है कि प्रेमचंद की रचनाओं में दलित जातियों को सतानेवाली जातियों के रूप में प्रायः अगड़ी जातियों को ही चिह्नित किया गया है, मगर कई जगहों पर पिछड़ी जातियों की दलित-विरोधी मानसिकता को भी उजागर किया गया है.

‘घासवाली’ कहानी में दलित मुलिया और क्षत्रिय चैन सिंह के प्रसंग अनेक कोण लिए हुए हैं. मुलिया के प्रति जो छेड़छाड़ और जबरदस्ती के प्रकरण हैं, उनमें एक अन्य बात महत्त्वपूर्ण है. मुलिया चैन सिंह को कहती है कि तुम्हारी जाति के घरों की स्त्रियाँ अवैध संबंध रखती हैं, कहो तो बताऊँ! वह यह भी दावा करती है कि “जाकर किसी खतरानी (क्षत्राणी) के चरणों पर सिर रखो, तो मालूम हो कि चरणों पर सिर रखने का क्या फल मिलता है. फिर यह सिर तुम्हारी गर्दन पर न रहेगा.” प्रेमचंद स्त्री के शोषण में उसकी जाति की भूमिका को चिह्नित कर रहे थे. ऊँची जाति की स्त्रियाँ अपने लोगों के द्वारा शोषित होती हैं, मगर दलित जाति की स्त्रियाँ अन्य जातियों के लोगों द्वारा भी शोषित होती हैं. उनपर सरेआम आक्रमण होते हैं. दलित स्त्री पुरुषवाद और जातिवाद – दोनों के ज़ुल्म झेलती है. प्रेमचंद दलित स्त्री और गैर-दलित स्त्री के फर्क को अच्छी तरह से चित्रित कर रहे थे. जाति के प्रश्न को झुठलाने वाले कहते रहे हैं कि स्त्री तो स्त्री होती है, उसकी जाति का सवाल जेंडर का सवाल नहीं बन सकता. मगर प्रेमचंद इस भुलावे नहीं थे. उनकी रचनाएँ इस बात की गवाही देती हैं कि स्त्री की जाति से उस पर होनेवाले ज़ुल्म का रिश्ता होता है. उन्होंने ऐसी एक भी रचना नहीं लिखी जहाँ किसी ऊँची जाति की स्त्री से सरेआम किसी गैर सवर्ण पुरुष ने जबरदस्ती की हो!

प्रेमचंद ने उन बहसों को भी अपनी कहानियों में जगह दी है, जिनमें कहा जाता रहा है कि दलितों की दुर्दशा का कारण उनकी अपनी बुराइयाँ हैं. यदि वे अपनी बुराइयों को छोड़ दें तो उनकी प्रगति हो सकती है. प्रेमचंद ने ‘मंत्र’ कहानी में लीलाधर चौबे और चौधरी की बहस में दिखया है कि मांस-मदिरा का सेवन तो कुलीन ब्राह्मण भी करते हैं और गो-मांस खानेवाले अंग्रेजों की जूतियाँ भी चाटते हैं. चौधरी कहता है कि “आपके धर्म में वही ऊँचा है, जो बलवान है; वही नीच है, जो निर्बल है.” प्रेमचंद ठीक कह रहे थे कि दलितों को बलवान बनाने की ज़रूरत है. दलित राजनीति और आरक्षण ने इस मामले में सबसे बड़ी भूमिका अदा की. आज दलित बलवान हुए हैं तो गैर-दलित उनके साथ खाना खा रहे हैं और शादियाँ भी कर रहे हैं.

हर तरह की विपदा झेल रहे दलित समाज की निर्बलता को दिखाने के बावजूद प्रेमचंद ‘घासवाली’ मुलिया को भी रचते हैं जो यथाशक्ति प्रतिकार करने का प्रयास करती रहती है. उनकी अनेक रचनाओं में दलित समाज के प्रतिरोधी तेवर की झलक मिलती है. ‘सद्गति’ में दुखी चमार के मरने पर उसकी जाति के लोग प्रतिरोध-स्वरूप उसकी लाश हटाते नहीं हैं और पंडित घासीराम के घर के सामने ही छोड़ देते हैं. प्रेमचंद ने यह अद्भुत दृश्य रचा है कि अँधेरे मुँह पंडितजी दुखी चमार की लाश को रस्सी से खींचकर गाँव के बाहर खेत तक पहुँचा आते हैं. एक ब्राह्मण के द्वारा दलित की लाश को लेकर जाना यह बताता है कि जाति-आधारित श्रेष्ठता और निकृष्टता के सारे पैमाने अस्वाभाविक हैं, आरोपित हैं. जातिवादी दंश के दो जवाब हैं — अपने को बलवान बनाना और प्रतिरोध करना.

प्रेमचंद के साहित्य का मुख्य आधार बहुजन समाज है. आप इस समाज को और उससे जुड़े विभिन्न पक्षों को यदि हटा दें, तो प्रेमचंद-साहित्य में कुछ भी बहुमूल्य नही रह जाता है. प्रेमचंद की कीर्ति और विश्वसनीयता का आधार बहुजन जीवन का चित्रण-विश्लेषण है. मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना ने प्रेमचंद के महत्त्व को किसानों के सन्दर्भ में खूब उभारा है. सामंतवाद, पुरोहितवाद, साम्राज्यवाद और महाजनी सभ्यता के सन्दर्भ में प्रेमचंद के साहित्य को प्रचण्ड प्रतिरोध के रूप में चिह्नित किया गया है. इन तमाम विश्लेषणों में प्रेमचंद के साहित्य की खूब छानबीन हुई है. उत्पादन के साधनों के आधार पर शोषितों के रूप में किसान-मजदूर-दलित की पहचान बतानेवाली हिन्दी आलोचना के महत्त्व को अस्वीकारा नहीं जा सकता. इस आलोचना के अभाव में साहित्य के सामाजिक विश्लेषण का द्वार उचित तरीके से खुल नहीं पाता.

प्रेमचंद की बहुजन कहानियों पर विचार करते समय जाति के प्रश्नों पर तो विचार करना ही चाहिए, मगर उत्पादन के साधनों में इस समाज की भागीदारी की स्थिति को भी समझते चलना चाहिए. प्रेमचंद के साहित्य में इन्हीं किसानों के बीच में महाजन भी बैठे हैं. इन महाजनों में ज्यादातर ऊँची जातियों के लोग हैं, मगर इनमें बनिया जाति के लोगों की भी पर्याप्त संख्या है. ‘गोदान’ में पंडित दातादीन और ठाकुर झींगुरी सिंह के अलावा दुलारी सहुआइन भी सूद पर रुपये देती है. थोड़ा पैसा कमा लेने पर गोबर भी सूद पर रुपये देता है. महाजनी की कसौटी पर जाति का आधार कमज़ोर होता मालूम पड़ता है. फिर भी, यह कहा जा सकता है कि महाजनी व्यवस्था का लाभ उठाकर धन इकठ्ठा करनेवालों में सर्वाधिक संख्या ऊँची जातियों की है.

केवल जाति के आधार पर समाज को समझने की कोशिश करने पर भूल होने की संभावना बनी रहती है. मगर समाज को समझने-बूझने का एक बड़ा आधार जातियों के विश्लेषण के बीच मौजूद है. प्रेमचंद की ऐसी रचनाएँ हमें वही बड़ा आधार प्रदान करती हैं. जाति पर विचार करने का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम जातिवाद को बढ़ावा दें या जातिवादी आग्रहों से बँधकर सोचने-विचारने की प्रवृत्ति को प्रश्रय दें.

प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ से यह सूत्र प्राप्त किया जा सकता है कि सांप्रदायिकता को तोड़ने का एक आधार जतियों का विश्लेषण हो सकता है. इस कहानी में लीलाधर चौबे अपने भाषणों से हिन्दूवादी राजनीति को बढ़ावा दे रहे होते हैं, तब बूढ़ा चौधरी उनके हिन्दूवाद की हवा निकलने में जाति-आधारित प्रश्नों का उपयोग करता है. चौबेजी के पास इन प्रश्नों के उत्तर हिन्दूवाद के आधार पर मौजूद नहीं हैं. इसका कारण यही है कि हिन्दूवाद की ज्यादातर बातें काल्पनिक हैं और जाति-आधारित विश्लेषण की ज्यादातर बातें ठोस सामाजिक आधार से उत्पन्न हुई हैं. प्रेमचंद बताते हैं कि हिन्दूवाद वस्तुतः ब्राह्मणवाद का ही एक रूप है. इसके पोषण से ऊँची जातियों का भला भले हो जाए, मगर बहुजन समाज को इससे कोई फायदा नहीं है. इन लोगों का उद्देश्य है कि श्रमजीवी समाज अपने को हिन्दू कहता-समझता रहे और इन वर्चस्ववादियों की सेवा करता रहे! प्रेमचंद ने इसका उपाय धर्मान्तरण में भी नहीं दिखाया है. इसी कहानी में तबलीग के कट्टर मुसलमान भी है, जो चौबेजी की हत्या के उद्देश्य से प्रहार करते हैं. धर्मान्तरण कराने या रोकने के पीछे जो सांप्रदायिक राजनीति काम करती है — उसका पर्दाफाश यह कहानी करती है. यह कहानी बताती है कि विभिन्न जातियों से बने इस समाज को सुन्दर बनाने का आधार यही है कि सबसे प्रेम करो! चौधरी ने चौबेजी को बचाया और चौबेजी ने चौधरी को! साम्रदायिकता की राजनीति और बहुजन दृष्टि को आमने-सामने रखकर भी इन कहानियों का अध्ययन किया जा सकता है.

इन तमाम बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रेमचंद की बहुजन कहानियाँ भारतीय समाज की जाति-आधारित सच्चाइयों का ब्यौरा पेश करते हुए भविष्य के भारत के लिए राह भी सुझाती हैं. ये कहानियाँ बताती हैं कि भारत की बहुसंख्यक आबादी शोषित है और इस आबादी का शोषण करनेवाले मुट्ठी-भर लोग हैं. ये मुट्ठी-भर लोग प्रायः ऊँची जातियों से हैं, इसलिए यदि आप वास्तव में सुधार लाना चाहते हैं तो इस ‘वर्चस्व’ को तोड़ने का उपाय करना होगा. इसका उपाय यह नहीं है कि ऊँची जातियों के खिलाफ घृणा का प्रचार किया जाए. ओछी निगाह से देखनेवालों ने प्रेमचंद को ‘घृणा का प्रचारक’ कहकर उनके जीते-जी उनका विरोध तो किया ही था. बहुजन विचारकों को ऐसी दृष्टियों से बचना चाहिए और बात यह होनी चाहिए कि शोषण का आधार यदि जातियाँ रही हैं तो मुक्ति के प्रयासों में जाति के आधार को भला कैसे छोड़ा जा सकता है? प्रेमचंद-जैसे रचनाकारों ने जाति के मसलों को जिस तरह से अपनी रचनाओं में रखा है, उन्हें घुलाए-मिलाए बिना विवेकपूर्ण तरीके से पढ़कर विश्लेषित किया जाए!

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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