‘काउंटर करेंट्स’ आर्थिक संकट में, बुद्धिजीवियों और पाठकों में चिंता

चर्चित अंग्रेजी  वेब पत्रिका ‘काउंटर करेंट्स’ इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही है। इसके संपादक बीनू मैथ्यू ने मदद की अपील की है। देश-विदेश में प्रख्यात इस पत्रिका के महत्व, उसके बहुजन से जुड़े सरोकारों, संपादक के संघर्ष और दुनिया में पत्रिका को मिली प्रशंसा पर पढ़ें इंटरव्यू पर आधारित विशेष आलेख

 मुझे जनपक्ष में एक और विश्व क्रांति का इंतजार है- बीनू मैथ्यू

चर्चित वेब पत्रिका काउंटर करेंट्स इस समय सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। संपादक बीनू मैथ्यू ने इसे लेकर अपने पाठकों और लेखकों से इसका अस्तित्व बचाने के लिए अपील की है। बीनू मैथ्यू का कहना है कि “मैंने नौकरी छोड़ी। पैसे की ताकत को चुनौती देने के लिए काउटंर करेंट्स से मुहिम चलाई और सोचा कि मेरे पाठक और लेखक मेरे साथ होंगे। ऐसा लगता है कि अब मेरे पाठक ही इसे खत्म होता देखना चाहते हैं। हमारे लिए पिछली बार फंड जुटाना भयानक था। हमें काउंटर करेंट्स को जीवित रखने के लिए चार लाख रुपये यानी करीब 6000 डॉलर जुटाने होंगे। अगर मैं यह काम अगले महीने तक नहीं कर सका, तो काउंटर करेंट्स बंद हो जाएगी। मैं सीसी (काउंटर करेंट्स) के भाग्य के बारे में गहरे से चिंतित हूं।” बीनू मैथ्यू ने अपने पाठकों से कहा है कि “आप सीसी का परवाह करते हैं, तो आप इसके मकसद में उदारता-पूर्वक योगदान करें। ऐसा न करने की स्थिति में हम इसे बंद करने पर विवश होंगे।”

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पिछले करीब दो दशक से सक्रिय बीनू मैथ्यू ने अपने अथक प्रयासों से काउंटर करेंट्स वेब पत्रिका के जरिए दुनिया में समसामयिक विषयों, जलवायु परिवर्तन से लेकर फासीवादी और पूंजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ समानांतर पत्रकारिता की ऐसी मिसाल पेश की है, जो भारत में दुर्लभ है।

बीनू मैथ्यू

हाल में भीमा कोरेगांव केस में दलित व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के पक्ष में और केरल में ब्राह्मणवादी शक्तियों के खिलाफ जिन करोड़ों महिलाओं ने राज्य के एक छोर से दूसरे छोर तक महिला दीवार (‘वुमेन्स वॉल’) की चेन खड़ी की थी, उसमें काउंटर करेंट्स के आह्वान की बड़ी भूमिका थी। इसमें लगभग 50 लाख महिलाएं केरल में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हुईं। तिरुवनंतपुरम से उत्तरी जिले कासरगोड तक 620 किलोमीटर “दीवार” बनाई गई। मासिक-धर्म उम्र सीमा की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्पन्न स्थिति के खिलाफ इस दीवार कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता जॉन स्केल एवरी के साथ बीनू

काउंटर करेंट्स के साथ सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरण क्षेत्र के कई ऐसे लोग जुड़े रहे हैं, जिनका नाम आज  दुनिया भर में अपने क्षेत्र के शीर्ष लोगों में आता है। वे सभी लोग काउंटर करेंट्स को लेकर चिंता में हैं। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता जॉन स्केल एवरी विज्ञान और विश्व मामलों के अद्भुत ज्ञाता हैं। उनका कहना है कि बीनू मैथ्यू इंटरनेट पत्रिका ‘काउंटर करेंट्स’ के समर्पित संपादक हैं। वह भारत के केरल राज्य में रहते हैं, जो पिछले दिनों प्रलय की चपेट में आ गया, लेकिन इसके बावजूद वह हर दिन अपने महत्वपूर्ण जर्नल्स को प्रकाशित करते हैं।

काउंटर करेंट्स का सोशल मीडिया पेज

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल एल. रामदास मैगसेसे अवॉर्ड विनर हैं। वह और सामाजिक कार्यकर्ता ललिता रामदास बीनू मैथ्यू के काम की तारीफ करते हैं। ललिता ग्रीन पीस इंटरनेशनल के पूर्व अध्यक्ष हैं और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए 1000 महिलाओं की ओर से नामित की जा चुकी हैं। वे कहते हैं कि मौजूदा दौर की बहसों और विवादों को पिछले डेढ़ दशक में मैथ्यू ने नई धार दी है। यह काम आसान नहीं है, इसके लिए व्यापक दृष्टिकोण और साहस की जरूरत होती है।

लोकशक्ति अभियान के अध्यक्ष और गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार (जो द ग्रीन नोबल ने नाम से जाना जाता है) के विजेता प्रफुल्ल सामंतारा कहते हैं कि पिछले डेढ़ दशक में ‘काउंटर करेंट्स’ के जरिए मैथ्यू ने वो काम किए हैं, जो जीवन और आजीविका से जुड़े जरूरी प्रश्न हल करते हैं और इनके अधिकार के लिए संघर्ष का धरातल तैयार करते हैं। प्रिंट मीडिया में यह काम मुझे कहीं दिखा नहीं। खोजने में नाकाम रहने के बाद मुझे एक ऑनलाइन पत्रिका मिली- काउंटर करेंट्स! काउंटर मेरी पसंदीदा वेब मैगजीन है, जो हमारे देश में कॉरपोरेट स्वामित्व और मेन स्ट्रीम मीडिया को भी चुनौती देती है।  

काउंटर करेंट्स के प्रशंसक जॉन एवरी, जलवायु वैज्ञानिक डॉ. जी एंड्रू, पीस एक्टविस्ट केली, एडमिरल रामदास, प्रो. राम पुनियानी, प्रो. संदीप व डॉ. ललिता

सामाजिक कार्यकर्ता और मैग्सेसे अवॉर्ड विनर संदीप पांडे ने कहा कि उस कठिन समय में, जब हम मुख्य धारा के मीडिया में असंतोष की कोई आवाज उठाते हैं या सरकार के लिए सुविधाजनक नहीं है, तब हमें वैकल्पिक विचारों के लिए ‘काउंटर करेंट्स’ पर जाना चाहिए। हम भाग्यशाली हैं कि यह ऐसा प्लेटफार्म भी है, जो हमें घुटन भरे माहौल से बाहर लाता है और हमारे आसपास की वास्तविकता से अवगत कराता है।

पीस एक्टिविस्ट कैथी केली तीन बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित हैं। वह कहती हैं कि काउंटर करेंट्स हमें “पुराने पड़े खोल में एक नई दुनिया बनाने में मदद करता है।” हम युद्ध और लालच के परिणामों के बारे में दूसरे बैकग्राउंड के लोगों से सीखते हैं। लेकिन काउंटर करेंट्स हमें चुनौती देती है कि हम तत्परता के साथ लोगों के बीच मजबूत रिश्तों का निर्माण करें, संसाधनों को साझा करें।

डॉ. एंड्रयू ग्लिकसन अर्थ एंड पैलियो-क्लाइमेट वैज्ञानिक हैं। वह कहते हैं कि ‘काउंटर करेंट्स’ प्रगतिशील विचारों, मानव अधिकारों, सामाजिक न्याय और वर्तमान में बढ़ रहे अस्तित्व संबंधी जोखिमों से मानवता और प्रकृति के संरक्षण के लिए एक प्रभावशाली आवाज बनी है।

वहीं, पूर्व आईआईटी प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राम पुनियानी कहते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के मूल्यों के प्रचारक के रूप में कोई कैसे कार्य करता है, यह काम मैथ्यू ने कर दिखाया है। आज के दौर में मानव अधिकारों के मूल्यों के लिए काउंटर करेंट्स बड़ा मंच है। मीडिया का निहित स्वार्थों से लैस विशाल मीडिया समुदाय ऐसा कभी नहीं कर सकता। मैथ्यू और उनके सहयोगियों ने काउंटर करेंट्स के माध्यम से व्यावहारिक रूप से उल्लेखनीय और ईमानदार तरीके से रास्ता दिखाया है। ‘काउंटर करेंट्स’ की विषयों की सीमा अद्भुत है और लेखों की प्रकृति गंभीर महत्व और वैश्विक मुद्दों का सच्चा अक्स है। ग्लोबल वार्मिंग का सवाल हो या फिर साम्राज्यवादी ताकतों के डिजाइन किया कोई षड्यंत्र; वह उसको उधेड़ते हैं और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हर समय तैयार रहते हैं।

बीनू मैथ्यू का सफर

अपनी पारिवारिक और सामाजिक स्थिति को लेकर एक सवाल के जवाब में बीनू मैथ्यू कहते हैं- “केरल जैसे राज्य का मानव विकास सूचकांक प्रदर्शन कई देशों से बेहतर है; जिसकी विकसित राष्ट्रों से तुलना हो सकती है। केरल ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और भूमि पुनर्वितरण पर विशेष ध्यान देने के साथ विकास के अपने मॉडल से वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा दी है। बौद्धिक जिज्ञासा के लिए भी नई खिड़की खोली है, जिससे भविष्य की खोज करने की भी राह निकलती है। कई केरलवासियों ने न सिर्फ दुनिया-भर में यात्रा की है, बल्कि समाज के निर्माण में उल्लेखनीय काम किया है और कर भी रहे हैं। खासतौर पर खाड़ी राज्यों में, यूरोप और अमेरिका में। संपन्न देशों में सेवा देकर यहां के लोगों ने अपनी वित्तीय सुरक्षा हासिल की है। लेकिन, मेरा मानना है कि विकास के केरल मॉडल ने समाज की उच्च जातियों की मदद की। दबी-कुचली या पूर्व की अछूत जातियों को इससे कोई खास लाभ नहीं हुआ।”

अपने परिवार के साथ बीनू मैथ्यू

उनके शब्दों में “इस तरह की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि में 1970 में मैं एक कैथोलिक किसान माता-पिता के यहां पैदा हुआ था। हम 13 भाई-बहन हैं- 5 भाई और 7 बहनें। मैं 11वें नंबर पर पैदा हुआ। इतने बच्चे पैदा होना उन दिनों- विशेष रूप से कृषि परिवारों में, बहुत सामान्य बात थी। यानी जितने लोग, खेती के काम के लिए उतने ज्यादा हाथ। परिवार नियोजन मेरे माता-पिता की पहुंच में नहीं थे, बल्कि कहें कि कोई सुविधाएं ही नहीं थी। उन दिनों मांएं कई बच्चों को जन्म दिया करती थीं, उनके कुछ बच्चे जीवित रहते थे, कुछ काल-कलवित हो जाते थे। मेरे परिवार में सभी बच्चे बचे रहे। हमारी इस अच्छी परवरिश के लिए मैं अपने माता-पिता का धन्यवाद करता हूं, जो उस दौर में जितनी भी चिकित्सा सुविधाएं पहुंच में थीं, उनके बूते हमें जिंदा रख सके। मेरा जन्म सबसे पिछड़े एक पहाड़ी जिले इडुक्की में हुआ था, जहां मेरे माता-पिता 1950 के दशक में बसे थे।”

शिक्षा की कठिन डगर

“मेरी शुरुआती शिक्षा हमारे इलाके में संचालित एक प्राइमरी स्कूल में हुई थी, जहां मैंने चौथी तक पढ़ाई की। पांचवीं से सातवीं कक्षा तक (10 से 13 वर्ष की उम्र तक) मैं चार किलोमीटर, पहाड़ी पर चढ़ते और घने जंगलों में होकर स्कूल जाता था। जब आठवीं में था, तो 10 वीं कक्षा तक मैं अपनी बड़ी बहन के साथ रहने लगा। यहां भी हमें चार किलोमीटर रोज पैदल चलना होता था, लेकिन यहां मैं अकेला नहीं था, बहुत-से दोस्त थे, सब मजेदार अनुभव होते थे। हमारी पढ़ाई का माध्यम मलयालम भाषा थी, जहां अंग्रेजी और हिंदी दूसरी और तीसरी भाषाएं थीं।’’

“केरल के कॉलेजों में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी है। मैंने रसायन विज्ञान में बीएससी की डिग्री ली। लेकिन अपने कॉलेज के दिनों में मैंने बहुत पढ़ा। मैंने विश्व के अधिकांश कालजयी साहित्य को पढ़ा। मैं भाग्यशाली था, जिसको पढ़ाकू दोस्त मिले, हमारे बीच सामान्य तौर पर सदा एक बौद्धिक माहौल रहता था और हम सभी दोस्त कई अहम मुद्दों पर चर्चाएं करते थे। मेरे अतिरिक्त रीडिंग के कारण मेरा ग्रेड परीक्षा में प्रभावित हुआ। मेरे पास अंग्रेजी में अच्छे अंक थे, इसलिए मैंने एमए इंग्लिश और साहित्य पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। यहां भी मैं पाठ्यक्रम से बाहर जाकर किताबें ज्यादा पढ़ता था। मैं इसलिए भी कोई तेज-तर्रार छात्र नहीं रहा। यहां मेरा ग्रेड अच्छा नहीं था। फिर भी मैं 50 फीसदी से अधिक अंक प्राप्त करने में कामयाब रहा।’’

खेतों में काम करके गुजारा किया

“इस समय में हमारे घर में वित्तीय स्थिति गड़बड़ा गई, जहां से मेरे लिए आगे की पढ़ाई जारी रखना संभव नहीं था। मैं घर वापस चला गया और परिवार के साथ खेतों में काम करने लग गया। सुबह 8 से शाम 5 बजे तक हम खेतों में काम करते थे- बारिश हो या फिर कड़ी धूप, बिना ब्रेक के काम करते। रात में मैं दोस्तों से उधार ली गई किताबें पढ़ता था। मेरे पास न तो अच्छी लाइब्रेरी उपलब्ध थी औ न ही किताबें खरीदने के लिए पैसे होते थे। दो साल के कृषि कार्य के बाद मैं एक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान से जुड़ गया। वहां अध्ययन करते हुए मैंने समाचार पत्र में एक विज्ञापन देखा, जिसमें केरल के प्रमुख दैनिकों में से एक पत्रकारिता के प्रशिक्षुओं को बुलाया गया था। सौभाग्य से उस समय पत्रकारिता की डिग्री की आवश्यकता नहीं होती थी। मैंने आवेदन किया और मुझे प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में काम मिला। यह बात 1996 की है।’’

काउटंर करेंट्स का जन्म

“सन् 2000 तक हमारे घरों में इंटरनेट का आगमन हो रहा था। वहां मैंने जीनेट, इलेक्ट्रॉनिक इंटीफाडा और ऐसी कई आकर्षक वेबसाइट्स पर नजर पड़ी। यह मेरे लिए एक नया संसार था। जीनेट वाम बौद्धिक साहित्य का एक बड़ा स्रोत था। नोम चोम्स्की जैसे बुद्धिजीवियों को हम क्लिक पर पढ़ सकते थे। उन दिनों चोम्स्की की किताबें खरीदकर पढ़ना बहुत महंगा था। अन्य वेबसाइटों में मैंने लोगों को फिलिस्तीन और अन्य क्षेत्रों के संघर्षों की कहानियां जानीं। लगभग उसी समय में, मैंने डेविड कॉर्टन की पुस्तक “व्हेन कॉर्पोरेशन्स रूल द वर्ल्ड” पढ़ी। यह किताब आंख खोल देने वाला अनुभव है। मुझे लगा कि मुझे अपने पेपर के लिए लोकल बीट्स पर कुछ अधिक काम करना चाहिए। इंटरनेट ने मुझे ऐसा करने का अवसर दिया। मैंने जीनेट जैसी वेबसाइट शुरू करने का फैसला किया।’’

कर्ज लेकर कंप्यूटर खरीदा

“मुझे कंप्यूटर की भाषा का कोई ज्ञान नहीं था। मैंने बेसिक एचटीएमएल पाठ्यक्रम को सीखा। मेरे कुछ दोस्त जो तेज दिमाग के थे, उनके साथ मैंने ‘काउंटर करेंट्स’ नाम तय किया कि इस नाम से वेबसाइट चलाएंगे। मैंने बैंक से लोन लिया और कंप्यूटर खरीदा। यह एक 20 जीबी हार्ड डिस्क, 256 एमबी रैम कंप्यूटर था। यह मुझे 18 फीसदी ब्याज दर पर लोन मिला था, जिसे मैंने मासिक वेतन से किस्तों से वापस किया।’’

सरोकारों की पत्रकारिता

“यह वो दौर था, जब गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ बड़ी हिंसा पनपी थी, जिसमें कम-से-कम 2000 मुसलमान मारे गए थे। हमने जल्द-से-जल्द साइट लॉन्च करने का फैसला किया। कलाकार रज़ी ने साइट को डिज़ाइन किया, अजिथ कुमार बी ने इसे एचटीएमएल में परिवर्तित किया। गुजरात में गर्भवती मुस्लिम महिलाओं पर हुए हमले के बारे में जानी-मानी लेखिका सारा जोसेफ ने मलयालम के एक लेख का अनुवाद किया, जिसका शीर्षक था ‘द वॉम्ब एंड द स्वार्ड’ (‘गर्भ और तलवार’)। गुजरात के कई मामले हुए थे, जब गर्भवती महिलाओं को इतना पीटा गया कि उनके गर्भ में पल रहे भ्रूण खत्म हो गए। बहरहाल, इस तरह मैं ‘काउंटर करेंट्स’ का संपादक बना। 27 मार्च 2002 को पहला लेख प्रकाशित हुआ था। तबसे 50,000 से अधिक लेख प्रकाशित हो हो चुके हैं। हजारों जाने-माने और युवा लोगों ने ‘काउंटर करेंट्स’ के लिए लिखा है। उनमें से आज कई नामी पत्रकार हैं या बड़े सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं, जो उस दौर में हमारी वेबसाइट में लिखकर ऊंचे पदों पर आसीन हैं।’’

“जब ‘काउंटर करेंट्स’ को लॉन्च किया गया था, तो यह मुख्य रूप से एक फासीवादी, वैश्वीकरण, साम्राज्यवाद-विरोधी वेबसाइट थी। शुरू के दिनों या वर्षों में प्रकाशित लेखों से ये सारी प्रवृत्तियां प्रतिबिंबित हुईं। जैसे-जैसे साल बीतते गए, मैंने महसूस किया कि कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जो आज मानव समाज के अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं। बेशक हम सभी परमाणु हथियारों के खतरों की आशंकाओं के बारे में जानते हैं। काउंटर करेंट्स के संपादक के रूप में मुझे एक संभावित खतरे के रूप में जलवायु परिवर्तन का एहसास हुआ। मानवता के लिए आज यह एक बड़ी चुनौती है।’’

“काउंटर करेंट्स के संपादक के तौर पर कोई भी काम आसान नहीं है। शुरुआती चरण में मैं लोगों को निराशा और कयामत की कहानियों के साथ जलवायु परिवर्तन के खतरे को जगाने की कोशिश कर रहा था। मुझे लगा जैसे दुनिया खत्म होने वाली है। मैं जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में एक पागल आदमी की तरह लोगों से बात कर रहा था। यह 2000 के दशक की शुरुआत में था। किसी ने भी समस्या की गंभीरता को नहीं समझा। अबू ग़रीब (इराकी यातना शिविर) की भयावहता, युद्ध की विकरालता, पीक ऑयल की होने वाली दस्तक ने मुझे बहुत परेशान किया। अंत में ये सब मेरे शरीर में ही धंस गए। मुझे अवसाद का दौरा पड़ा, जो स्वभाव से अधिक मनोदैहिक पीड़ादायी था। मैं डिप्रेशन में चला गया। एक महीने तक ‘काउंटर करेंट्स’ का संपादन कार्य बंद रहा। अंत में मुझे एक मनोचिकित्सक के जाना पड़ा, जो एक नीम-हकीम निकला। इसने मुझे कुछ राहत दी। वेबसाइट को अपडेट करना वास्तव में एक विशाल कार्य था। अंत में 2006 में मैं एक सही मनोचिकित्सक से मिला। मैं अभी भी दवा पर हूं। इस तरह के जलवायु परिवर्तन ने मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया।’’

आपदा के बाद लोग होने लगे सचेत

“बहरहाल जैसा कि मैंने कहा कि मैं जलवायु परिवर्तन पर बात कर रहा था और लिख रहा था, लेकिन लोग इसके खतरों के प्रति सचेत नहीं थे और न ही वो ग्रहणशील थे। अगस्त 2018 में इस सदी का बड़े जल-प्रलय केरल में हुआ। इस भारी बाढ़ में लगभग 500 लोग मारे गए। 20 अरब डॉलर की संपत्ति और बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया। केरल को इस बाढ़ से उबरने में कई साल लगेंगे। दिसंबर 2017 में ओखी नाम के एक खतरनाक और अभूतपूर्व चक्रवात से केरल में 250 लोग मारे गए थे और 550 लोग अब भी लापता हैं।’’

“इन दो अभूतपूर्व जलवायु घटनाओं के बाद केरल का समाज अब जलवायु परिवर्तन की समस्या को समझने को उत्सुक हुआ है। कई लोग इस बारे में बात कर रहे हैं। सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं। अकादमिक बिरादरी के लोग भी इसीलिए जाग रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि भारत सरकार, केरल सरकार या मुख्यधारा के मीडिया की ओर से इसे बहुत अधिक तवज्जो नहीं दी गई।’’

“जलवायु परिवर्तन के लिए 12 साल के भीतर जीवाश्म ईंधन का उत्सर्जन रोकना होगा, ताकि इससे बचने के लिए मानव प्रयास दिख सकें। लेकिन, इसके बावजूद भयावह जलवायु परिवर्तन अपरिहार्य होंगे। हालांकि, मैं इस विषय पर आधिकारिक तौर पर बोलने के लिए वैज्ञानिक नहीं हूं। जहां तक मेरे ज्ञान का संबंध है, मीथेन बम, आर्कटिक सर्कल में निष्क्रिय पड़ा हुआ है। अगर इन जगहों से मीथेन गैस निकलती है, तो मुझे लगता है कि मानवता के पास ग्लोबल वार्मिंग से पार पाने का कोई मौका नहीं होगा।’’

समाज की चुनौतियां

“दीर्घकालीन आपदाओं के लिए हमारे पास कोई प्लान नहीं है। ऐसा इसलिए है कि हमारी आर्थिक प्रणाली ऐसी है, जो अनंत विकास के विश्वास पर टिकी है। हमें महसूस करना चाहिए कि एक परिमित ग्रह में अनंत विकास असंभव है। हमारे अर्थशास्त्री, उद्योगपति और राजनेता इस मूल तथ्य को स्वीकार नहीं करते। उनका यह अस्तित्ववाद इसी विश्वास पर आधारित है। अर्थशास्त्री अपने मोटे वेतन और अपने ओहदों को कायम रखना चाहते हैं। उद्योगपति ज्यादा-से-ज्यादा लाभ कमाने चाहता है। राजनेता का जोर अपने वोटों पर है। राजनेता वोट तभी पा सकते हैं, जब वे रोजगार सृजन करेंगे। नौकरियों के लिए अवसर खोले जाने की जरूरत है। यह समय है कि हम प्रतिमान बदलें। हमें विकास से मुंह मोड़े बिना नौकरियां पैदा करनी होंगी। मुझे यकीन है कि यह आर्थिक प्रणाली के स्थायित्व में यह संभव है। लेकिन, इसके लिए व्यवस्थागत कायाकल्प की जरूरत है।  फ्रांसीसी क्रांति ने दुनिया के काम करने के तरीके को बदल दिया। हमें एक और विश्व क्रांति की जरूरत है, जो जनता के पैमाने पर खरी हो, उसका रास्ता तैयार करती हो। मैं चाहूंगा कि यह क्रांति अहिंसक हो।”

(कॉपी संपादन : प्रेम बरेलवी)


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